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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Devendra Uniyal

"अन्वार"
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क्वी बोन्नू स्यू कन दिखेणू
हमरु सि गौं
कैन बोलि स्या कन च
हमरि सि बल्दु कि जोड़ी
बौजि बोन्ना कन दिखेणा
पल्य खोला सि जिठजी
मां बि बोन्नी हे राssम् कन दिखेणू
मेरु लाटु सी
पर नि बोल सकि वा
स्यू कन दिखेणा
मेरा पप्पू का पापा सी।
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" देवेन्द्र उनियाल"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bhishma Kukreti
14 hrs

'फुर घिंडुड़ी आजा : पधानु का छाजा'
कवि : गिरधारी लाल थपलियाल 'कंकाल (1929 -1987 , श्रीकोट , खातस्यूं पौ . ग . )

( आज के कवि हरीश जुयाल 'कूट्ज' शायद नाराज हो जाएँ ; कन्हया लाल डंडरियाल के भक्त मुझसे रूठ जायं किन्तु यह एक असलियत है कि स्व गिरधारी लाल थपलियाल 'कंकाल ' की कविता 'फुर घिंडुड़ी आजा : पधानु का छाजा' पर दर्शकों से सबसे वन्स मोर मिले हैं। )
प्यार की त छुईं इनि कुछ नि लांदो मोल
घिंड्वा घिन्डुड़ी मा ब्वल्द औ बणौला घोल। फुर घिंडुड़ी आजा ! पधानु का छाजा !!
चाड़ नी जु छ्वीं लगऊँ ,
केकु तेरा नेडु अऊँ ,
इन्ना समझि तन्नी छऊं ,
कुछ नि तेरो काsज
पधानु का छाजा !!
तन्नी छै तु कैन बोलि
अपड़ा मनै बात खोलि,
मिन ता सोचि थकीं होलि
इच्छि थौ ता खा जा ! पधान का छाजा !!
जाण कनै कैकि रीत ,
मर्दु कि क्या च प्रतीत ,
दुन्या झट म्यसौन्द गीत,
अपड़ा अपड़ा बाठा जा जा ! पधानु का छाजा !!
इति हस्यार तू चलाक ,
तड़तड़ी छ कुंगळि नाक
संगुळि सी लटकीं बुलाक,
भलि दिंदौ बिराजा पधानु का छाजा !!
xx xxx
छाल ल्हैलो साड़ी ल्हौ लो
त्वेको मी गौणा बणौलो
अब कबी नि दिल दुखौलो
राणि तू मि राजा !पधानु का छाजा !!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Tota Ram Dhaundiyal

हरि ॐ ! हे भगवान् !
ब्वै-बाब नि चान्दा, गूंगी, बैरी, काणि, अपङ्ग सन्तान
तू किलै फिर राछट पैदा कनू' रैंदि भगवान् ?

ऐब, सैब स्सब त्यारै दियाँ, जीव हो चै पदार्थ विज्ञान
चराचर तै' कठपुतली सी, रिमोट से नचाणू' तू भगवान् ?

ऐसान तेरो क्याच् हमफरि, स्वतंत्र त् त्यारा छ्वड्याँ नि हम ?
चाब्यूँ छुम्मा अपणै गाळुन्द, सुदि- सुदि डमणू' क्वड्यां हम !

बल, बुद्धि, विद्या देदीन्दो ता, भीख नि मंगदो त्वे से भी !
गाळा लगीं ग$ळ सन्तान, प्राणदाता ! तिन अंठ नि धारी एक भी !

जब मर्जी तब लीजै अपणी, नखि, भलि सम्पत्ति तेरी चा !
सजसमाळ बि करणै सदनी, तेरी ही जिमेदारी चा !

भय, भरोसो, भरम भी त्व्यैसे, रोष भी, रुसाणु भी !
थमत्यो, बुथ्यो ! प्राणदाता ! रोज को उस्याणु भी !
आँखर मिसैं:- रविवार, 17 अप्रैल 2010
मिसाक-मङ्गळेर:- तोताराम ढौंडियाल 'जिज्ञासु'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दानु शरील
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रचना -- शिव राज सिंह रावत 'निःसंग ( जन्म 1928 , खडोरा , गोपेश्वर , च ग )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

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हात काँपाद गात काँपद , छन काँपणी काया तेरी
बोलि -बोलीक जिबड़ि कांपादि
फिर भी नि छुटदि माया तेरी।
माया कू बोदगू उठैकिन , कुबड़ि ह्वे गेन कमरि तेरी ,
लोथगु तेरी ढीलु पड़िग्ये , रगर्याट करदिन मुण्डळि तेरी।
लाठि टेकिक ढोकरु ह्वेगिन , पिलसि गैनी चौकी तेरी
फिर भी लग्यूं छन देखा बाटा
जणी क्या छन मन मा तेरी
......
ख्वालत छुटिग्ये लाठि तेरी , डांग पर फुटिग्ये कपाळी
हकाण्यूँ सी बुढ्या पौड़ी , हे विधाता ! सांस भी द्वारु नि बोड़ी
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

DrPritam Apachhyan

सौ मा नब्बे छन बेमान
तौ भी मेरो देश महान.
यो बी नकली वो बी नकली
नकली आँखा नकली कान.
स्विस बैंकौं मा रकम जमा
उडिगे सत्तू पितरौं दान.
मैंगै की दर शून्य का तौल
मैंगै चढगे उब असमान.
हमारा मोरिग्यां बम्बे मा
सबूत खोज्णा पाकिस्तान.
दाँत पिडन् देवता फफडाणा
चाॅकलेट खै ल्हे ले भगवान.
सगत्त कुटमदरि जंगल स्वाहा
एक वृक्ष दस पुत्र समान.
औ रे कंपनी वाला औ
हम थैं लुटणू चा आसान.
देश का प्रीतम दारु मा टुन्न
कज्याण्युं हरीगे पुष्पविमान.
(c) डा. प्रीतम अपछ्यांण

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 30 at 11:19pm · Edited ·

न विकू जनान्यु सी भेष छौ
न विकू जनान्यु सी लम्बू केश छौ
फिर भि लुग बोल्दन विकी
जनान्यु सी मेस च
लोग बोल्दा त
कुछ न कुछ
बात त होली
सैद विकी चाल ढाल
छवी जनान्यु सी हो
कत्गा छुयाल लोग त
इन्न बी बोल्दा
जनान्यु सी पोर च
अगर विकी जनान्यु
वल्ली मेस पर
इत्गा शोर च
कुछ न कुछ
बात छेयी च
लोग सुधि कैकु
मखोल नि बणादा................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 31 at 8:58pm ·

लाटी काली माया मेरी नत बिंगी कैन
बिंगै बि नि जानि उमर काट्याली फंडफ़ूका
खिली फूल माया कु जिकुड़ी मेरा बि
न क्वी मांगी न क्वी दे जानी
सुक्खागे झाड़याली फंडफ़ूका
रगरैनी मेरी आँखि बांधू देखी
हैसि कैर कैरी नौ धैर धैरी
बोल्या करियलि फुंड़फूका ......नरेंद्र सिंह नेगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 27

देहरादूण पाड़ बैरी तू ही बन्यु लाटा
देहरादूण गैरसैण की
सौत बि तू ही बन्यु छुचा
पर देहरादूण पाड़ मा
ह्वैकी तू बेजत भौत होंदु
अर खाणा पिणा स्येणु
तू ह्यु सब्भु
पर फिर गाली लोला तू ही खाणु
पर कभी पाड़ी राजाओं
राज सहारनपुर तक छौ
अब देहरादूंण कन्नू बिराणु ह्यु फिर
देहरादूण सैरा पाड़ कांधी मा चढ़की
तब भि छुचा तू बिराणु ह्यु
कत्गा सैणी छे तू
कै मट्टी कु बन्यु छे तू
पर मन मा सोच्दु पाड़ी छे तू
तेरु ईमान अज्यु तक नि डोली
निथर इत्गा गाली नेतागिरी त्वे
पर हुन्दी क्वी हौर होंदु
खौं बाघ बण जांदू................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani

सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो"िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे"ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Khyali Ram Joshi
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सब प्राणीक तुम हित में राया, द्वेश बिना करिया ब्यवहार।
सब्बोंक प्रति दया भाव धरिया, तबै प्रभुजीक मिलौल प्यार॥