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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुनील थपल्याल घंजीर
September 4 at 6:25pm

किनमजाद ..क्यनमजाद !

दादा अयूं त् छौ घौर... बूंण
तूभि दगिड़ी खिसग जांदू
किनमजाद ..

ह्वेत् गे दस पास ... छुचा
लैंसीडौन दौड़ी आंदु
किनमजाद ..

दाल भात सदनि त् खांण
माछा ब्वगंणा छीं ताल नयरी ..जरसि पौडर छिड़िकी आंदु
किनमजाद ...

बेकारी शान बागम छै फुकेणु
आटु चौंल खु़णि छै तकणेंणु
रेखा गरीबि की खैंचांदु ...
किनमजाद...

भै भौजा कैका ह्वैन ... ?
कखि कै साबा हत-खुटा दबांदु
किनमजाद...

टक्क ये लौला पहाड़ , क्यांकु तेरी "
खै त् याल अपंण बांठौ लूंण पांणी ...
छोड़ हवा स्यांणी गांणी ,अईं च् गाडी
किनमजाद...।।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ी कख हर्ची , सर अर युवर्स फेथफुल्ली का बीच ?

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रचना -- गोकुलानंद किमोठी ( जन्म 1930 , किमोठा , पोखरी च ग )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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कुछ दिन पैली देखी
एक कौथिग , नेहरू स्टेडियम की छोटी पहाड्यूं पर पहाड्यूं को
ढोल दमौ , गीत प्रीत , मिठै सिठै
सब्बि सुणी , करी , चाखो छै ,
पर ह्वैगे छै बिसर्याँ जमाना की बात ,
याद छ त नार्थ ब्लॉक अर गुलाबबाग का बस स्टैंड ,
यस सर अर युवर्स फेथफुल्ली का बीच ,
पहाड़ी कख हर्ची, मेरा छैल तै बि पता नि लगी
कखि अंग्वाळ (डंडरियाळ ) पढ़ी
जग्वाळ (पारु ) देखी
अर्ध्ग्रामेश्वर (धष्माना ) करी
पर बिजल्वाण नि मिली
कौथिग मा मिन देखी बिकट दंदांलो
बरसों कि बिस्मृति को घास
स्यूं जलड़ो भैर आये तब देखणी पाअड़
अफु से भैर आइक मिन देखी त हकाणो ग्यो मि
येकुला चणा अर भड़भूजा का भाड़ की अबारे कथा हि सच हूणी थै
पहाड़ त सब दिल्ली ऐगें फिर मि यकुल वापस
तबारे धरे कैन मेरा काँध ऐसा हाथ
यु मैं हि थौ अप्पू सांस अफ्वी बन्धौणू
पाsड़ त फ़ैल जालो दुनिया मा
पाsड़ मा रै नि रै पर जड़ियु रै रे जलड़ों से
मी आज भी जुड़्यूं छौं पहाड़ से अपणा पहाड़ से।

-( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
September 4 at 8:48am · Edited ·

मेरी औठंडियो न्युतायलि त्वैकु
बँसुली बणि ऐजा छोरी धोरा
मेरा जिकुडा लुकी माया की धुन
बनबनी अनेक तू ऐजा बस छोरी
गुंजलि बंसुली माया की फिर
चौ दिसू डांडी कांठी तू ऐजा बस छोरी
बँसुली बणि मेरी औठंडियो धोरा
पिरेम भौ बन्यु रौ सदा इन्न
मेरु तेरा परति
समझ कतामती
मी लोला मायादार की तू ऐजा बस .................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नये बसंत बुरांश सि
May 16, 2012 at 10:18pm

तुम

का लेज

  मे आइ हो

                        नये   बसंत बुरांश  सि

तुम हो फ्रासेर  स्टुडेंट  फर्स्ट इयरकी

तुम  पे लियर  चड़ी है नय जवानी की

अरे नये नौजवान तो अजमाना चाते है  अपनी किस्मत

तुम से इश्क लड़ाने के ली ये नये नये  फोरुमुले  खोज राय है

अरे बुढे अदैर   प्रोफसिर लाक्चेरार 

   अपनी  किस्मत को रो  रय है

बीमार कर ने के लिये अशिकको को जब हुसून की ये बीमारी पैदा हुई

अरे उस दउओर   काल  मे ये एक्स्पीरे  डेट हुवे

क्या जूनियर क्या  सीनियर सब

धयेक  रय है  इस  हुसून की जवानी की फिगर   .

                                                                कविता  शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

बड़ बड़ी मेरी बोई की

बड़ बड़ी मेरी बोई की
पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी

पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी
बड़ बड़ी मेरी बोई की

मेथे तेन जीबन दी
दी द्वि साँसों को सारो
तेरु द्वि दुधा को धारु बोई जी
बरसे इनि अमृत सारो
अंख्यों कू मि तारो तेरु
सुणा दे सारो कथा तेरी
बैथ्यूछों तेरु खुथु धरु

बड़ बड़ी मेरी बोई की
पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी

पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी
बड़ बड़ी मेरी बोई की

एक ही बेल मा वा
काम धानी अनेक कै जांदी वा
द्वि हाथो द्वि अन्खोंयों
में थे सुप्निया हजार दे जांदी वा
कर करी ऊ नोटों छुईं दगडी
मिथे जीना सिखांदी वा

बड़ बड़ी मेरी बोई की
पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी

पियारी सी छुईं में मि डूब जांदू जी
बड़ बड़ी मेरी बोई की

बालकृष्ण डी ध्यानी
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पढ़े लिखे कया पाई तिल

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

मेर जिंदगी कू फाड़ी बिल
दोई घास कू गफा तू गैई गिल

झिलमिल -२ व्हाई झिल
लात खुटे खैई क़मरी हैगे भिर

तेर पढ़े नि मेर घर लड़ै लगे
स्कुल गुरूजी घोर बोई बाबो नि छलै

सच बोल दे ये पहाड़ ल कया पाई बल
तू बिदेश मा मि यख पड़यूँ ठर

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 3 at 3:09pm ·

कख भति लाई तिल ये चांदी को हिमाला

कख भति लाई तिल ये चांदी को हिमाला
श्वेत रंग मा रंगदेनी तिन कर दियो कमाल
ये मेरो पहाड़ा मेरो पहाड़ा ...... २

अल्जाद्याई दिल तिल ये कांडों का घारा
बारा मैना फुटिगे यख बारा तरका का धरा

कख भति लाई तिल ये मखमली मौल्यारा
हैरा रंग मा रंगगैनी यख हैरा हैरा बोग्याला
ये मेरो पहाड़ा मेरो पहाड़ा ...... २

परित इन जमैगैनी तिल गीत इन लगैगैनी
लोककला ये मेर पहाड़ का तू खूब नचैगैनी

कख भति लाई तिल ये सोना कू श्रृंगारा
घाम इनि झल्कनु जनि हो गुलबंद कु चम्कारा
ये मेरो पहाड़ा मेरो पहाड़ा ...... २

नका नथुली कू घेर कथा ये अब लगनी चा
माया की गेढ़ मा मिथे बांध ले जानी

कख भति लाई तिल ये ज्वानि कू उमाला
ते बान खिंडी खेली मिल अब ये सारू गढ़वाल
ये मेरो पहाड़ा मेरो पहाड़ा ...... २

कख भति लाई तिल ये चांदी को हिमाला
श्वेत रंग मा रंगदेनी तिन कर दियो कमाल
ये मेरो पहाड़ा मेरो पहाड़ा ...... २

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 2 at 2:00pm ·

मेरु पुंगडीयुं कू प्याज

मेरु पुंगडीयुं कू प्याज
तू छूछा किलै हुंय च नाराज
रुपै मिल तै थे बड़ेई भी मिल
फूल खिले ते पर खंदे की तब पाई मिल
मेरु पुंगडीयुं कू प्याज ...

में से जबेर बिछड़ी गै तू प्याजा
तै बगत छे तू भुंय ही भुंय मेर गैल्या मेरा मित्रा
दूर जैकी तिल कद्ग अबरी दा आसमान च छुयाँ
बाथ दे तू अब बैठ्युं कै काला बाजार
मेरु पुंगडीयुं कू प्याज ...

समान्य नजरि मा मचेगे तू रगरायाट
उथल पुथल तू कैगै उंका खाणा कु भांड
मैना कु बजट मा लगै ई दिल तैंन ऐसा उचाट
कन ये दिस जाल उबरयूं च अब ये सवाल
मेरु पुंगडीयुं कू प्याज ...

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 30 at 12:04pm ·

कन नजरि बदली ये बोई कन नजरि बदली या

कन नजरि बदली ये बोई कन नजरि बदली या
१६ बरस ज्वानि कु लागि कन नजरि बदली या

फूली बुरांसा ये पहाड़ बोई कन नजरि बदली या
अंख्यों देखेन सबुका हवस कन नजरि बदली या

कांडों मा गिजी च जिंदगी बोई कन नजरि बदली या
येमा और्री अब अल्झी गेन कन नजरि बदली या

येई जब ज्वानि कू उमाल बोई कन नजरि बदली या
येन ही मचैई सब यख बवाल कन नजरि बदली या

जबै निबदलली ई नजरि बोई कन नजरि बदली या
राम राज नि आलू ये पहाड़ कन नजरि बदली या

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Mahi Singh Mehta
August 29 at 11:19am ·

नि ऐ स्कलू दीदी भूली मेरी पियारी

आच यख यखुली बिदेश मा
भंडी खुद आणि छे
मि थे मेरा पहाड़ की
मेरा गौं चौक घार की
दीदी भुलियुं कू हका की
रीता सुनी दयँ कलैई देखि
सुनि रखडी रैगे मेरा हाथ की

बैठी हुली सुबेर सुबेर
याद करनी हुली अपरा भुलू दादा की
भैर कागा कू कंव् कंव्
धीर बंधनि व्हैली वे धागा की
तिलक चवलों हल्दू मा
मीठी मिठाई सजी व्हैली थला की

कन भग्या मि लेकि अयुं
दूर छोड़ी गढ़ देश मिन ये माया की
माया मिलेकि मायाल मि रुवेई
अन्ख्युं भटिक वा आच बोगी की
नि ऐ स्कलू दीदी भूली मेरी पियारी
अगली बरसी ऐलु मि घौर अणा की

बालकृष्ण डी ध्यानी
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