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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फूलै जिंदगी
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रचना - सच्चिदानंद कांडपाल( जन्म 1930 -स्वर्गीय , दशज्यूला , चमोली गढ़वाल , )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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गोद मा स्वाणी लगलि का फूल द्वी सुंदर खिल्यां छा
पर्वतों का बीच बण मा मुल्य मुल्की हंसणा छा
उदमदा जीवन भर्यां द्वी लैर माँ अपणी चढ़ीक
हैंसणा छा बात गुपचुप प्यार की अपणी करीक।
हम अस्वाणी जगा तैं सै सजै स्वाणी बणौन्दा
काण्डु से भरपूर डाळयूँ भी भली प्यारी बणौन्दा
प्यार को जीवन हमारो प्यार को वर मिल्यूं छ
और जीवन भर हंसी को हमू अवसर मिल्यूं छ ...... .......
जाणले सुंदर जगा मा ही हमारो बास होलो
या कि कै सुनसान बण माँ ही मझा माँ नाश होलो
प्यार को जेव्वं हमारो प्यार को वर जो मिल्यूं छ
और जीवन भर हंसी को ही हमूँ अवसर मिल्यूं छ।

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फूलै जिंदगी
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रचना - सच्चिदानंद कांडपाल( जन्म 1930 -स्वर्गीय , दशज्यूला , चमोली गढ़वाल , )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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गोद मा स्वाणी लगलि का फूल द्वी सुंदर खिल्यां छा
पर्वतों का बीच बण मा मुल्य मुल्की हंसणा छा
उदमदा जीवन भर्यां द्वी लैर माँ अपणी चढ़ीक
हैंसणा छा बात गुपचुप प्यार की अपणी करीक।
हम अस्वाणी जगा तैं सै सजै स्वाणी बणौन्दा
काण्डु से भरपूर डाळयूँ भी भली प्यारी बणौन्दा
प्यार को जीवन हमारो प्यार को वर मिल्यूं छ
और जीवन भर हंसी को हमू अवसर मिल्यूं छ ...... .......
जाणले सुंदर जगा मा ही हमारो बास होलो
या कि कै सुनसान बण माँ ही मझा माँ नाश होलो
प्यार को जेव्वं हमारो प्यार को वर जो मिल्यूं छ
और जीवन भर हंसी को ही हमूँ अवसर मिल्यूं छ।

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बित्युं जीवन

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रचना -- महिमानन्द सुन्दरियाल

( जन्म 1928 , बडोली , गुराड़स्यूं पौ. ग . )

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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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ब्यखुन होइगे रुमक होणी च
जीवन को 'ओ' ! रात नजदीक ऐगे।
कुंगळो घाम खेलुम बीत /कभी कूड़ी बाड़ी कभी लुका चोरी
उमैली उमंग अर या तरंग /बचपन का दगड़ा अब वो चलिगे।
तीस बढ़दगै भर दोफरीम /टापी ही टापी तृप्ति नि होई
भटकदो रऊँ मैं डबका लगैन /फिरड़म ढळकां ह्वेगे।
गुठ्यर्यू की छाई डाळयूम जैक /सरकी सरकीक पाखोम गैन
ओ लालिमा सी अर स्वीळय घाम /डाँडों यैँच वोभी चलिगे।
छूटी ग्याया दगड़ो अब सौंजड्यों को , जौंळ मंगरी ये खोळयूं की धार।

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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुनील थपल्याल घंजीर
13 hrs

किनमजाद ..क्यनमजाद !

दादा अयूं त् छौ घौर... बूंण
तूभि दगिड़ी खिसग जांदू
किनमजाद ..

ह्वेत् गे दस पास ... छुचा
लैंसीडौन दौड़ी आंदु
किनमजाद ..

दाल भात सदनि त् खांण
माछा ब्वगंणा छीं ताल नयरी ..जरसि पौडर छिड़िकी आंदु
किनमजाद ...

बेकारी शान बागम छै फुकेणु
आटु चौंल खु़णि छै तकणेंणु
रेखा गरीबि की खैंचांदु ...
किनमजाद...

भै भौजा कैका ह्वैन ... ?
कखि कै साबा हत-खुटा दबांदु
किनमजाद...

टक्क ये लौला पहाड़ , क्यांकु तेरी "
खै त् याल अपंण बांठौ लूंण पांणी ...
छोड़ हवा स्यांणी गांणी ,अईं च् गाडी
किनमजाद...।।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुनील थपल्याल घंजीर
September 3 at 2:46pm

( गरीब आदिम व बुद्धिजीवी संवाद )

गरीब आदिम : जी मि भौत गरीब आदिम छौं।

बुद्धिजीवी : तु गरीब आदिम नि ह्वै सकदू।

ग. आ : जी मीमा न त झगुली न ट्वपली, न एक मुट अनाज। फेर मि गरीब कनक्वे ना?

बु.जी : तु अपणी दशा से जणकूर छै। मतलब तेरी बुद्धि त्यारा वशमा चा। मतलब तिन अपंणी बुद्धि गिरवी नि धैरी। मतलब गरीब वो जो अपणीं बुद्धि गिरवी धैर द्यौ। मतलब तु अपंणा वास्ता प्रयास कैर सकदी।

ग. आ : पंण मि त द्वी पास भि नि छौं। कभि गौं से भैर भि नि गायो सो मजदूरी लैक भि नि छौं। यख लोखुन पुंगडीं पाती भी छोड़ यलीं ,हैल भि कख लगांण। अब आप हि बताओ मि गरीब छौं कि ना?

बु.जी : न भै न तु अफ्फू थैं गरीब नि बोल सकदो ।एक रस्ता बंद त् हैंका बाटा जा।

ग. आ : खाली पुटगी से क्वी राह नि सुझणीं। गौंमा मेरी घरवलि थैं छ्वाड़ बटै छ्वाड़ तक सब बौ ब्वलणा छिन। होलि भी ख्यलदिन वीं दगड़। सूंणी होलु आपन "गरीब की जोरू सबुकी बौ" अब आप ही बथावा ह्वाई कि ना मि गरीब ?

बु. जी : म्यारा त मोछ फर सोच पोड़गीं ।

ग. आ : आप बुद्धिजीवी छौं क्वी रस्ता बथावा जी ।

बु. जी : हूं ! तु सरकार का पास जा।

ग. आ : जी माफ कारा मि गरीब ही ठिक छौं।

जै राम जी की ।

सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Tota Ram Dhaundiyal

हरि ॐ ! सबि सुणदरूँ तै' शिर्नो ! आज आपतै' नैं कविता सुणाणू':-
कुकर संस्कृति

गौडूं इब्जिम कुकर सैंतणा, तीनूं बेळि सदाणा !
पिपळपाणि मा कुकर लगलै ? यो ता कैंन् बिङ्गाणा ?

कुकरा का बण्यां मम्मी, पापा, हम्कु बुलाणा- 'अंकल ! अंटी !'
लाण,खाण, पीणु हमुम नी, ठाठ से कारम घुम्दा बंटी !

स्वतंत्र देश, सर्करि सड़क, हमरि मर्जि जखमा हगौं !
तुमर् मोर अग्नै' हगा ता, उर्गौ वैको; हम क्य करौं ?

गौडूं सैंती; गौंत, गोबर, दूद, दै, छाँच्, नौंण, घ्यू खान्दा ?
मुक्दान, प्रेतदान, पिपळा गौड़ी, बैतरणी भी पार करांदा !

मौ बारा, कुकर अठारा, अहर्निश भुक्दा, मुंडरु कना' !
भुक्णयां कतणा, रैबिज हूंणू, देशमेश एकवेष; जां कनाँ ?
आँखर मिसैं:- शिवरात्रि, वि0 सम्बत्- 2071
सोमवार, 16 फरवरी 2015
मिसाक-मङ्गळेर:- तोताराम ढौंडियाल 'जिज्ञासु'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
September 3 at 8:26am

मुर्गा कनै गै? (दुसुरु भाग)

हैंक ब्यखुनी चरि चोरों की फीरि मती मोरी गे।
घुंगर्या बरांड एक जैरकन वूंल कची घटगै दे।।

कची का पुटग जांदी वूंकी लगण लैगे घाण।
ग्यारा सौ फीरि डांड द्यूंला घ्यपळी घपगाण।।

अधा राती मा बबडाट करदा घ्यपळी कु घौर कु गैं।
घ्यपळी कु घार समझी वूंल पदनौं का द्वार भटगैं।।

अस्वाल बाडा ल समझैकि वूंकू घौर कु पैटा दीं।
निरभग्यों की उल्टी खोपड़ी हैंक बाट लगी गैं।।

बियण्या टैम घ्यपळी काका का घार माैं पौंछी गैं।
काका भ्यार जयूंछौ वूंकू समधी थै सटगै गैं।।

काकि त पैली भग्यान ह्वै गेछै, भुलि भि ब्यवै दे।
मुर्गा कु सूंणिकी काका कु समधी मिलणौं अयूं रै।।

काका कु भितर आणु क्य ह्वैई समधी कणाणू रै।
घ्यपळी काका ल चट फोन मिलैक पुलिस बुलै दे।।

थाणा लिजैक चरि चोरों क वूंल मुर्गा बणै द्याई।
थाणादार कुकरेती जी वूंथै लगलि ठ्वकणा छाई।।

तबी बुनूंच "दर्शन "फीरि बडु ह्वैलु बडु जनु रै।
कमजोर ल्वखु की हाय लगद नाजैज ना सतै।।

नाम, जगा, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित@:-दर्शनसिंह रावत "पडखंडांई "
दिनांक 03/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुनील थपल्याल घंजीर
September 2 at 6:22pm

... जोग अर भोग ...

ल्हयूं छौ जोग जौंकु अंग्वाल बोटिक ...
आराम से गैं बल वो दुन्या ईं रीटिक ।।

आंणि जांणि रीत ईं दुन्या मा पक्की
जोग कैका बोतली कैकू ना यख ढक्की ।।

परवाणु का प्रांण भि बल वेलै हरीं
छ्वटा बड़ा थकुला किलै वैल करीं ।।

कैका जोग उकाल अटगी क्वी उंदार
उकल्या कु चुसणा उंदर्या कु संसार ।।

बैठ बात पते की म्वरदी दौ बरमंड
शान बान झूटी छै छाया करमू का फलदंड ।।
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सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Devendra Uniyal

"अन्वार"
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-----------------------
क्वी बोन्नू स्यू कन दिखेणू
हमरु सि गौं
कैन बोलि स्या कन च
हमरि सि बल्दु कि जोड़ी
बौजि बोन्ना कन दिखेणा
पल्य खोला सि जिठजी
मां बि बोन्नी हे राssम् कन दिखेणू
मेरु लाटु सी
पर नि बोल सकि वा
स्यू कन दिखेणा
मेरा पप्पू का पापा सी।
-----------------------
" देवेन्द्र उनियाल"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Tota Ram Dhaundiyal

हरि ॐ ! हे भगवान् !
ब्वै-बाब नि चान्दा, गूंगी, बैरी, काणि, अपङ्ग सन्तान
तू किलै फिर राछट पैदा कनू' रैंदि भगवान् ?

ऐब, सैब स्सब त्यारै दियाँ, जीव हो चै पदार्थ विज्ञान
चराचर तै' कठपुतली सी, रिमोट से नचाणू' तू भगवान् ?

ऐसान तेरो क्याच् हमफरि, स्वतंत्र त् त्यारा छ्वड्याँ नि हम ?
चाब्यूँ छुम्मा अपणै गाळुन्द, सुदि- सुदि डमणू' क्वड्यां हम !

बल, बुद्धि, विद्या देदीन्दो ता, भीख नि मंगदो त्वे से भी !
गाळा लगीं ग$ळ सन्तान, प्राणदाता ! तिन अंठ नि धारी एक भी !

जब मर्जी तब लीजै अपणी, नखि, भलि सम्पत्ति तेरी चा !
सजसमाळ बि करणै सदनी, तेरी ही जिमेदारी चा !

भय, भरोसो, भरम भी त्व्यैसे, रोष भी, रुसाणु भी !
थमत्यो, बुथ्यो ! प्राणदाता ! रोज को उस्याणु भी !
आँखर मिसैं:- रविवार, 17 अप्रैल 2010
मिसाक-मङ्गळेर:- तोताराम ढौंडियाल 'जिज्ञासु'