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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 11 at 4:08pm ·

दगड़यौं मेरी कल्‍पना, आप भी बतावा अपणा मुल्‍क पहाड़ मा भूत भूतणि भी देख्‍यन आपन।

बसगाळ की बात थै,
घोर अंधेरी रात थै,
भैर अयौं बचपन मा,
नजर पड़ि देखि मैंन,
भूतणि बैठिं चौक मा,
मैंन सोचि कू होलु,
डौर जरा लगणि थै,
सटट भीतर भगि ग्‍यौं.....

-कवि जिज्ञासु की कल्‍पना
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 11.8.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 7 at 10:51am ·

उत्‍तराखण्‍डी....

नौट कमैक नौट्याल बणिक,
कूड़ी पुंगड़ि छोड़ीं बांजा,
मौज मनौणा सैर बजार मा,
साधन संपन्‍न राजा.....

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 6.8.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 27 ·
मनख्‍यौं की खैंचा ताणी देखा त यनि अनुभूति होन्‍दि छ। मनखि बोल्‍दा कुछ अर मन मा कुछ या एक सच्‍चै छ। अहा कख गैन ऊ दिन जब मनख्‍यौं मा मनख्‍वात देखण कू मिल्‍दि थै। अहसास ह्वै अपणि जिंदगी मा, मन मा कसक ऊठि अर शब्‍दु का माध्‍यम सी कविमन की बात बतौणु छौं, पर कविमन मेरु भौत ऊदास छ, कुजाणि किलै, कैन दुखाई होलु मेरु मन । कामना छ मेरी वे मनखि की होणि खाणी हो।

यीं दुनिया कू मनखि.....

भैर बिटिन भलु दिखेन्‍दु,
भीतर बिटि जजांळी,
हैक्‍का की होणि खाणी देखि,
कन्‍न मारदु छ फाळी......

भला मनखि कू यु जमानु,
भलु कतै नि रैगि,
देख्‍यन हाल जब मनख्‍यौं का,
अब समझ मा ऐगि......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 27.7.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
July 24 · Edited ·

ब्‍याळि छिपाड़ु दा खित्‍त हैंसी,
मैं भी हैंस्‍यौं कुजाणि किलै,
बाद मा बताई वैन मैकु,
तेरी बांजी कूड़ी देखि हैंसणु छौं,
तू मैं देखि हैंसी किलै........

मैंन बोलि लठ्याळा छिपाड़ा,
तेरु बड़ु भाग छ,
मेरी बांजी कूड़ी फर बासु तेरु,
मैं फर लग्‍युं पलायन कू,
भारी नखरु दाग छ,
क्‍या छैं तू घ्‍ार जवैं सी बण्‍युं,
इलै हैंस्‍यौं हे छिपाड़ा,
मैं तेरी ढ़गडयान्‍दि धौण देखि.....

- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षति
दिनांक: 25.7.2015
दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Mahendra Thakurathi
August 30 at 5:09pm

द्वि हात बिणाई छाजि रैछ त्यरा,
ओ माता सरस्वती तेरि जैजैकारा।
एक हात पुस्तक एक हात जपमाला,
हंसै कि सवारी तेरि जैजैकारा......।।
क्वै कूनी वाग्देवी क्वै कूनी शतरूपा,
कतुक नौं छन हे जननी त्यरा.....।
भारती, वाणी, वीणावादिनी छै,
हंसवाहिनी, वागेश्वरी, शारदा.....।।
काणों कें साण बणूनै कि शक्ति छै,
साहित्य, संगीत, कला कि देवि छै।
करँछै सबूँक दिलों में उज्याव,
अज्ञानैक अन्यार बै मुक्ति दिछै।।
सदबुद्धि, सन्मति दिबे मनखि कणी,
खोलँछै कपाई गुरु रूप बणी......।
पशु जास मनखी कणि ज्ञान दिबे,
धरँछै वीक नौं सारी दुनीं मणी.....।।
कालिदास, वरदज्यूक आँखी खोली,
उनूकें बणाई महाज्ञानी त्वीले........।
बोपदेवज्यू कि मंदबुद्धि हरी,
खोली ज्ञानैक द्वार हे माता त्वीले....।।
आपणा बिणाई तार झनझनै बे,
भारत भूमि बै अज्ञान भजै दे.....।
मनखीक भितेर शक्ति कें जगैदे,
मुलुकम अमन-चैन तु फैलैदे.....।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi


न विकू जनान्यु सी भेष छौ
न विकू जनान्यु सी लम्बू केश छौ
फिर भि लुग बोल्दन विकी
जनान्यु सी मेस च
लोग बोल्दा त
कुछ न कुछ
बात त होली
सैद विकी चाल ढाल
छवी जनान्यु सी हो
कत्गा छुयाल लोग त
इन्न बी बोल्दा
जनान्यु सी पोर च
अगर विकी जनान्यु
वल्ली मेस पर
इत्गा शोर च
कुछ न कुछ
बात छेयी च
लोग सुधि कैकु
मखोल नि बणादा................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 28 at 1:12am ·

नदियों कु अपणु एक संगीत च
सर सर सुर सुर स्वीस्याट कु
कखी गंग्लोड़ो टकरी बणदू क्वी गीत
पाणी मा कखी मांछा तैरी लगाणा गीत
कखी चखुली उड़ी फिर आणि पाणी मा
लगाणी नदी धुन मा मीठा गीत
कखी लहर च कखी भंवर
नदी पाणी मा लुक्यु च
कत्गा किस्मो गीत संगीत
हर पहर मा हर किस्मो संगीत
सुणादी नदी अपणा स्वीस्याट कु
चल छोरी देख नदी पवन कत्गा भलु
गीत गाणा चखुला भि इन्नु हाल मा
ढौल पुरौणा मिस्से मिस्सेकी
तू भी ऐजा फिर किश्ती मा बैठीकी
नदी सुर मा तू भी गीत लगैजा
मी सुणलू नदी का संगीत मा तेरु गीत....................शैलेन्द्र जोशी

फोटो क्लिक......शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 27 at 8:24am 

देहरादूण पाड़ बैरी तू ही बन्यु लाटा
देहरादूण गैरसैण की
सौत बि तू ही बन्यु छुचा
पर देहरादूण पाड़ मा
ह्वैकी तू बेजत भौत होंदु
अर खाणा पिणा स्येणु
तू ह्यु सब्भु
पर फिर गाली लोला तू ही खाणु
पर कभी पाड़ी राजाओं
राज सहारनपुर तक छौ
अब देहरादूंण कन्नू बिराणु ह्यु फिर
देहरादूण सैरा पाड़ कांधी मा चढ़की
तब भि छुचा तू बिराणु ह्यु
कत्गा सैणी छे तू
कै मट्टी कु बन्यु छे तू
पर मन मा सोच्दु पाड़ी छे तू
तेरु ईमान अज्यु तक नि डोली
निथर इत्गा गाली नेतागिरी त्वे
पर हुन्दी क्वी हौर होंदु
खौं बाघ बण जांदू................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 23 at 11:24pm ·

कैका दिलै राणी छौ नि छौ
कैका लाडै लाडली छौ नि छौ
कैका प्यारै प्यारी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
प्यारी राणी लाडली मी ही छौ
कैकु मान छौ नि छौ
कैकु अभिमान छौ नि छौ
कैकी शान छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
मान शान अभिमान मी ही छौ
कैकु सुपन्यु छौ नि छौ
कैकु ख्याल छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
सुपन्यु ख्याल मी ही छौ
कैकु चाँदे टुकड़ी छौ नि छौ
कैका जिकुड़ी बसी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु का
जिकुड़ा मा बसी चाँदे टुकड़ी मी ही छौ
कैकी आस छौ नि छौ
कैकु बिस्वास छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
आस बिस्वास मी ही छौ
कैकु सुख छौ नि छौ
कैकु चैन छौ नि छौ
कैकु शांति छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
सुखशांति चैन मी ही छौ
कैकु खेलतमासु छौ नि छौ
कैकु तै बाला छौ नि छौ
कैकु दगडया छौ नि छौ
कैका मुखड़ी हैसी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु कु
बाला दगडया खेलतमासु
मुखड़ी हैसी मी ही छौ....................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
August 20 at 10:30am ·

. सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो"िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे"ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.