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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 6 · Edited ·

कख गैन ऊ दिन आज,
जब मारदा था फाळी,
ऊलार भारी रन्‍दु थौ,
नौनु थौ मैं गढ़वाळि.....

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 6.8.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Saroj Upreti
14 hrs

हिमालय
अडिग हिमालय प्रहरी बन , सहता सर्द हवा के वार
गंगा जमुना का उद्गम स्थल,प्राकृतिक संपदा का भंडार
उज्वल, घवल, कन्तीयुत, श्वेत पुष्पों का कर श्रृंगार
गला कर हिम अपनी करता आ रहा मानव का उपकार
आज पर्यावरण से दूषित हो , गल रहे हिम के भंडार
स्वार्थ वशीभूत मानव ने खोखले कर दिए पहाड़
नष्ट करदी प्राकृत संपदा , हिमालय सहता अत्याचार
बचाना होगा अब हिमालय, रोकना होगा अत्याचार
वर्ना उथल पुथल सब होगा , नष्ट हो होगा ये शिव भंडार
सरोज उप्रेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
September 10 at 3:30pm

गौं-गळया
दिनेश ध्यानी।
भिण्डया दिनौं बाद
गौं जाणु ह~वै
मिन गौं कु गळ~यौ थै
सेवा लगौ
वो भक्वैरिकि रूण लगि गे।
मिन बोलि हे! क्य ह~वै?
बल, निरसा त्वै थैं बि
मेरि याद नि एै?
अरै बाळपन त त्यारू
मी दगडि हि बीति
यों ही बाटा-घाटौं म
तिन ग्वाय लगैं
यौं ही गाळ~यौ का रस्ता हिटी
इस्गोल आंदु जादु रै।
इनां सूणि परदे"ा जैकि
कतग बदलेग्यां तुम सब्बि
सच्ची पक्का ब्यौपारि ह~वै ग्यो
जै से मतलब वैका वोरा-धोरा
अर जैसे मतलब नीं वै तन्नि फूका।
मिन बोलि न-न सिनि बात नी
बल, चुपरै, म्यारू गिच्चु नि खुलौ
साख्यों बिटि द~यखणौं छौं
जो उंदै गै वो कब्बि बौडिकि नि ऐ
किलै कि ये पाड म
सदानि खैरि-अखरि हि रै,
हूण खाणा बान
सब्यौंन अपणु मुक्क लुकै,
पण यखौ विकास कनौ
कैन बि सांस नि कै।
बल इनी सूणी
वै छिप्वडू का क्य हाल छन?
मिन बोलि भैजी त रिटैर ह~वैगेन
बल, अरै वैकि कि कविता, स्याणि-गाणि बि
मंचौं अर ल्वखौं तकी सुणौण खुणि रैगेन
वैन बि कबि ये पाड़ कि सुध नि ल्हे,
सच्चु जि होंदु त रिटैर होणां बाद
अपणु गौं ता आंदु।
मिन बोलि ह~वैलि क्वी मजबूरी,
बल चुपरै, पक्ष नि ल्हे,
तु बि उन्नि छै
तुमरि कैकि क्वी मजबूरि नी
तुम सब्बि गुणा, घटाणु, नफा, नुकसान
की कला म पारंगत छां
गमलौं म सज्यां मनखि
बनावटी जिन्दगी जीणां छां।
बल
अरै वै वीरेन्दz पवारं भैन
सब्या धाणि देरादूण, होणि खाणि देरादूण
छोडा पाड~यौ घर गांैउ मारा ताणि देरादूण
गीत क्य लेखि तुम जना चकडैतौंन
अपणा घर गौं छोडिकि
सची देरादूण पौछी सांस सै,
हौरि त हौरि जब नरू भै बि
देरादूण वळु हि ह~वैगे त फिर
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।।
दिनेश ध्यानी। 10/09/15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bharatbhai

हिमालय की पुकार
.
सुनो रे, सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो,
प्रगति के नाम पर कब तक होगी नादानी,
रोकना है विनाश और प्रलय घमासान,
प्रकृति की रक्षा करने वालो के विचार चुनो,
सुनो रे, सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो,
जंगल काटते रहे और पानी को रोकते रहे,
कितना वैभव और सुख देती वसुंधरा हमको,
जागो रे जागो कृतघ्नों सा मत व्यवहार करो,
सुनो रे, सुनो रे हिमालय की पुकार सुनो,
क्या कहती बहती नदिया की धार सुनो,
साभार: विनोद भगत
.
..
...
╚▬▬► ٠•भरत~*रावत~•٠

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
September 11 at 8:38pm ·

बाल उड़िगी जब बटे शैम्पू लगाई।
आँखा फुट्टिगी जब बटे नेट चलाई।।

फेशा कु भि भलिके बिणांस ह्वाई।
बन-बनिकि क्रीम-पौडर जु लगाई।।

व्यसनों कि लत कलेजु फूकी ग्याई।
यु जिकुडु भि अब कामा कु नि राई।।

फ़ास्ट फ़ूड खै-खैकि अंदड़ा सड़ाई।
हड़गों मा बगतल हि कीर्तन कराई।।

रुपय्या-पैंसा त तिल खूब कमाई।
पर सब डॉक्टरों जुगता हि ह्वाई।।

शुद्ध पांणि पेकि बड़ु गालू उबाई।
पेप्सी-कोक ला खूब तीस बुझाई।।

घारा कु खाँणा मा स्वाद हि नि पाई।
भैरा कु बासि-तिबासि खूब पचाई।।

घरर्या नुस्खों कि क्वी कदर नि काई।
इलैई रे आज त्यारू यु कुहाल ह्वाई।।

सिकासैरियों मा तिल कन मौ गंवाई।
तन मन अर् धन कु सत्यानाश काई।।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
09.09.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Mahendra Thakurathi
September 4 at 5:50pm

जब यो मतलबी मनखी.....
धर्तिकि छाति फाड़ि खानौ,
त कैकै दिल नै पसिजनय...!
जब प्रकृति बरपूनी कहर,
त सारि दुनींक दिलम,
पीड़ै पीड़ देखीण फैजाँ...!
एक न एक दिन त आलै,
जब हमूकें.......
आपणि करतूतनक हिसाब,
योई धर्तिक काखिम भैटिबेर,
जरूर चुकूण पड़ल.....!!!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

yan Pant
September 4 at 7:51pm · Edited

..... एक बात छ

मैं आपणि जिंदगी में यसी कै चलते रयूँ
बखता हिसाबैलि अघिल कै बढ़ने रयूँ
जुनालि रातै बात आब् के बतूँ तुमन् कैं
हिटन् बाट्नै " उनन् " याद करनै रयूँ । जुनालि रात -- चाँदनी रात

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Madan Mohan Bisht
September 3 at 3:17pm · Edited

चिंता..
मुलकाक यास बर्बादीक आसार नजर ऊणई,
चोरों दगाड याँ चोकीदार नजर ऊणई।

अन्यार आब कसी मिटोल त्वी बता भगवान,
याँ उज्यावक दुश्मन चोकीदार नजर ऊणई।

हर गौं गाड़, हर सड़क पर, मौन छू ज़िंदगी ,
हर जाग मरघटाक जास हालात नजर ऊणई।

को सुणनों याँ आज द्रोपतीक चीख़ पुकार,
हर जाग दुस्साशन थाणदार नजर ऊणई।

सत्ता दगड समझौता करबे बिकगे लेखनी लै ,
ख़बरों कें सिर्फ अब बाज़ार नज़र ऊणई।

सच्चाईक दगड द्यूण बण जां जुर्म आब,
सच और बेक़सूर आज गुनहगार नज़र ऊणई।

मुल्कक हिफाज़त सौंपि छू जनार हाथों मे ,
उन हुकुमशाहों में लै आज गद्दार नज़र ऊणई।

खंड खंड मे खंडित हैगो अखंड भारत आज,
हर जात, हर धर्म में ठेकेदार नज़र ऊणई....
~मदन मोहन बिष्ट, रुद्रपुर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अनिल सिंह मेहरा कुमाऊंनी with Mahendra Thakurathi and 20 others
September 3 at 7:10pm

आऔ दगडियो जरा आपु दूधबोली भाषा रंगत लिनु ,,,,,,

हम स्याण नैतन हम नानतिन छन
हम बस हंसण जाननु हम खेलण जाननु
हम सबो दगोड जाननु हम प्यार प्रेम झगोड़ जाननु
हम उभत्ती डाढ़ उभत्ती प्यार जाननु किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन ,,,,

हम भेद भाव नी पछ्याणन हम नान ठुल नी जाणन
हम म्योस जाणनु हम दगोड़ में लक्ष्मण रेखा नी जाणन
हम नारंगी दाणी ले बार फिस बनूनो किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन ,,,

हम सबो लिजी सोचनु सबो के आपन खेल में धरनु
कगै घ्वड़ बनूनो कगै शेर कगैजी बाघ बनूनो
हम आपु खेलडी़ चीज आपस में बाट दिनु किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन

हमोर खेल में च्यैली लै रूनी हम राज वू रानी बननी
वूनको ले बरोबरी सम्मान मिलु वू ले हमो पे राज करनी
हम तो रात्ती दोफरी ब्याव हसनें में रूनो किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन ,,,

हम कैके लिजी गलत नी सोचन
हमोर दगडि कै चोट लागे हम पीड़ जस चितुनो
हमोर ऐक दगडि खेलहु नी आलो हम वी घर जै उनो
हम आपस में ऐक बन बैर खूब प्यार बाटन छन किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन

हम कभी झूठ नि बुलान हम कभी चोरी नी करन
हम कभी ध्वाख नी दिन कभी दिल नी दुखोन
हम कभी शराब पी बैर मैसो मैं आपु स्याणो नौ नी बिगोन

हमोर तन मैल कुचैल रू पर हमोर मन गंगा जल जै साफ रू किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन

हम आई ले आपु ईजै काखी में सितनु
हम आई ले आपु बाज्यु कानी मैं बैठनु
हम आई ले आपु दीदी दगै उछ्यात करनु
हम आई ले उणी जाणी मैसो हैं बुले जानु किले की
हम स्याण नैतन हम नानतिन छन ,,,,

हम कभी कैके नोक नी चान ये लिजी मैस हमहो कुनी नान भगवान ,,,
हम आज ऐक बात सबो कै बतुनो कभै ले स्याण नी बणो ,,,
आपु रिस्तो में दगोड में परिवार में नानतिनो रंग भरो किले की

हम स्याण नैतन हम नानतिन छन,,,,,,,

कुंमाऊनी ,,,,,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Madan Mohan Bisht
September 1 at 9:28am · Edited

सन्देश...

आंसुओ तुम आंखोंक क्वाण पन आई नि करो,
घराक हालात दुनी कें बताई नि करो।
आंख बची रौली तो स्वैण देखते रौला,
खाल्ली झुट स्वैण आखों में सजाई नि करो।

कास-कास दिन ऊंनी और निकल जानी,
मणी सा दुखम हा-हाकार मचाई नि करो।
कम भलै खै लिया पर हाथ नि फ़ैलूंण पडो,
चादर बटी भैर पैर फ़ैलाई नि करो।

जे आपण हाथम छू उकैं भौत समझो,
लालच में ईमान धरम लुटाई नि करो।
लोग मुट्ठी में लूण भर बे फ़िरणई,
ज़खम आपण सब्बू कें दिखाई नि करो।

स्याप हमेशा खुश्बूकै आसपास रूनी,
खुशबू वाल पेड आंगन में सजाई नि करो।
जै पर भरोस हूं वी ध्वाक दीजां,
हर आदिम कें चुल तक लिजाई नि करो।

लोग आंगूं पकड बे गिरेवान तक बढ जानी,
बिना सोचिये दोस्तीक हाथ बढाई नि करो।
लोग हाथ मिलै बे आपण आंगू तक गिणनी,
हर मिलणी वाल कैं छाति पर लगाई नि करो।

ख्वारम खुट धर बे लोग मांथि जाणक फ़िराक में छन,
गरदन आपणि हर जाग पै झुकाई नि करो।
जिन्दगीक पन्नों पर पेन्सिल है ज्यादा रबड नि घिसो,
फ़ाटी पन्न जोडण मुस्किल हुनी गल्ती यसि बार बार दोहराई नि करो।

आज बखतौक संदेश यौ समझो 'मदन',
साथ, सांस और स्वैण कभतै लै टुट सकनी,
इनू पर ज्यादा भरौस जताई नि करो।
आंसुओ तुम आंखोंक क्वाण पन आई नि करो...

मदन मोहन बिष्ट, रुद्रपुर उत्तराखंड