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Uttarakhand Architecture - उत्तराखंडी वास्तुकला

Started by suchira, December 20, 2007, 02:45:01 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


UTTARAKHAND KE PURANE SAMAY KE MAKAN KE FRONT PORTION

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड अपनी काष्ठ कला के लिये काफी प्रसिद्द है, हमारे पुराने मकान में खिडकी और दरवाजे में जो नक्काशी की जाती थी, वह अब कोई कर भी नहीं पायेगा. अब गांव जाकर इसका वीडियो बनाकर लाऊंगा.
tdil.mit.gov.in से
काष्ठ कला
कुमाऊँ में काष्ठ निर्मित बर्तनों का चलन बहुतायत से है। प्रायः राजी जनजाति के लोग ही बर्तन बनाने की परम्परागत कला में लगे हुए हैं। ये लोग पिथौरागढ़ जनपद में कालीन दी के किनारे के गाँवों में ही फैले हैं। चम्पावत, कनालीछीना तथा डिडीहाट उपखंड में काष्ठ उपकरण बनाये जाते हैं।

काष्ठ के बर्तन बनाने के लिए लकड़ी प्रायः साणण, गेठी (bohmeria regubsa) तुन इत्यादि की प्रयोग की जाती है। इसके लिए खराद मघीन की प्रयोग की जाती है जो जलशक्ति# क सहारे चलती है। बर्ततन निर्माण का कार्य पुरुष ही सम्पन्न करते हैं क्योंकि इस पेशे में अथाह श्रम और शक्ति लगती है। पाली, ठेकी तथा नाली ही प्रायः बनायी जाती है।

खराद को किसी भारी भड़कम पेड़ के तने से बनाया जाता है। नाशपाती के आकार के इस तने के वृहदाकार भाग की ओर बीस तक की संख्या में लकड़ी के पंखे लगे रहते हैं। पानी को आठ से दस फुट की ऊँचाई से जब इस पंखे पर गिराया जाता है तो यह तेजी से घूमने लगता है। इस पर सुख्य धुरी को कसकर उसमें ब्लेड लगाये जाते हैं। पानी की गति से लोहे के ब्लेड तेजी से घूकर खराद का कार्य करते हैं। खराद का स्वामित्व प्रायः सामूहिक होता है। इसी खराद की सहायता से लकड़ी के बर्तन बना लिये जाते हैं। सर्वप्रथम मनचाहे आकार में काटकर तने को खोखला कर दिया जाता है। बर्तन की आकृति देने के लिए उसे अन्दर व बाहर चिकनाकर इसमें रेखाएँ उभार दी जाती हैं। इन बर्तनों की पहले बिक्री नहीं होती थी राजि जनजाति लम्बे समय तक जनसम्पर्क से बचती रही है। इसलिए बर्तन बनाकर वे रात के अंधेरे में घर के बाहर रख जाते थे। दूसरे दिन बर्तन के आकार के बराबर अनाज घर के बाहर रख दिया जाता था। जिसे राजि लोग बदले में प्राप्त कर लेते थे। लेन देन की यही परम्परागत प्रक्रिया थी।

कुमैयाँ भदेलों की लोहाघाट क्षेत्र में व्यापक इकाईयां थी; जो अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रही है। कागज भी हाथ से बरुआ (daphnepapyraccae) से बनाया जाता था। अब यह व्यवसाय भी धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


VASTU KALA IS SEEN IN OLD TYPES OF HOUSES OF UK.


पंकज सिंह महर

कूर्माचल में घर ज्यादातर पत्थर के बने होते हैं। छत में भी पत्थर या पटाल लगे होते हैं, ताकि पानी बह जाये। पानी ज्यादा होने से यहाँ घास के घर नहीं रह सकते। छप्पर पर्वतों में पहुत कम हैं। तराई भावर में ज्यादा हैं। अब पहाड़ में पत्थरों के बदले छत में टीन लगाने लगे हैं। पर्वतीय गाँव दूर से देखने में बहुत सुन्दर दिखाई देते हैं।

गाँववाले घर को कुड़ कहते हैं। नीचे के खंड को गोठ और उसके बरांडे को 'गोठमाल' कहते हैं। गोठ में अक्सर गायें रहती हैं। किसी-किसी के गौशाले अलग होते हैं। ऊपर का हिस्सा 'मझेला' कहलाता है। उसका बरांडा यदि खुला हो, तो उसे 'छाजा' यदि बंद हो, तो 'चाख' कहते हैं। सदर दरवाजा खोली के नाम से पुकारा जाता है। कमरे को खंड। आँगन को 'पटाँगन' भी कहते हैं, क्योंकि वह पत्थरों से पटाया जाता है। घर के पिछले भाग को! 'कराड़ी' कहते हैं। रास्ते को 'गौन, ग्वेट या बाटो' कहते हैं। बहुत से मकान जो साथ-साथ होते हैं, उन्हें 'बाखली' कहते हैं। छत के ऊपर घास के 'लूटे' या कद्द रखे रहते हैं।

Risky Pathak

दीवारे पाथर से बनाई जाती है. जो पास ही कही जमीन के नीचे से खोदी जाती है| वैसे अब तो जहा रोड आ गयी है, वहा ईट और सीमेंट से मकान बनने लग गए है| पहले सीमेंट  के बदले गार-माट से ही चिनाई की जाती थी| गाड़  के पास से बऊ मिल जाता था जो भी चिनाई मे इस्तेमाल होता था| 
गोठ के ऊपर की सतह को बल्ली से बनाया जाता था और उसके बाद पाल डालकर उसे हन्नी माट से लीपा जाता था| लेकिन बाद मे लकड़ी के तख्ते भी इस्तेमाल होने लगे | पर अब तो सीमेंट से  फ्लोर  बनने लग गए है|

दीवारों को चूना-पानी से उछेता जाता था| और कही कही उसके बाद लाल माट से लीप दिया जाता था| मिटटी के कारण ही कुड के भिदेर ठंडक का अहसास होता था, चाहे बाहर कितनी ही रूड़  पड़ रही हो| पाख के नीचे पहले बल्ली हाली जाती थी| फ़िर उसके ऊपर पाख| लेकिन अब तो ज्यादातर लेन्टर  वाल है ग्यान|

Quote from: पंकज सिंह महर on April 24, 2008, 02:47:43 PM
कूर्माचल में घर ज्यादातर पत्थर के बने होते हैं। छत में भी पत्थर या पटाल लगे होते हैं, ताकि पानी बह जाये। पानी ज्यादा होने से यहाँ घास के घर नहीं रह सकते। छप्पर पर्वतों में पहुत कम हैं। तराई भावर में ज्यादा हैं। अब पहाड़ में पत्थरों के बदले छत में टीन लगाने लगे हैं। पर्वतीय गाँव दूर से देखने में बहुत सुन्दर दिखाई देते हैं।

गाँववाले घर को कुड़ कहते हैं। नीचे के खंड को गोठ और उसके बरांडे को 'गोठमाल' कहते हैं। गोठ में अक्सर गायें रहती हैं। किसी-किसी के गौशाले अलग होते हैं। ऊपर का हिस्सा 'मझेला' कहलाता है। उसका बरांडा यदि खुला हो, तो उसे 'छाजा' यदि बंद हो, तो 'चाख' कहते हैं। सदर दरवाजा खोली के नाम से पुकारा जाता है। कमरे को खंड। आँगन को 'पटाँगन' भी कहते हैं, क्योंकि वह पत्थरों से पटाया जाता है। घर के पिछले भाग को! 'कराड़ी' कहते हैं। रास्ते को 'गौन, ग्वेट या बाटो' कहते हैं। बहुत से मकान जो साथ-साथ होते हैं, उन्हें 'बाखली' कहते हैं। छत के ऊपर घास के 'लूटे' या कद्द रखे रहते हैं।


हेम पन्त

Read full article here-

http://www.telegraphindia.com/1080922/jsp/frontpage/story_9869079.jsp

The earthquake-resistant buildings in Rajgarhi in Uttarakhand 

Dehra Dun, Sept. 21: People in one of India's most earthquake-prone zones had mastered the art of building multi-level buildings resistant to seismic movement about a thousand years ago, an engineering study of the structures has revealed.

Researchers have found that ancient four-storey and five-storey buildings in Rajgarhi district of Uttarkashi in Uttarakhand reflect a distinct and elaborate style of architecture that allowed them to survive devastating quakes.

Scientists believe the Koti Banal architecture — named after a village in the district — relied on stone-filled solid platforms and judicious use of wood, which offered special advantages over other materials during earthquakes.

The designers appeared to have had "a fairly good idea about the forces likely to act upon the structures during an earthquake", Piyoosh Rautela and Girish Chandra Joshi of Uttarakhand's department of disaster mitigation and management said in a report.


हेम पन्त

उत्तराखण्ड में पुराने घरों के दरवाजों और किवाङों पर उकेरी गई आकृतियां काष्टकला की उत्कृष्ट निधि हैं.


पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर





One of these two sculptured figures on the 17th century Nanda Devi temple at Almora, Uttarakhand holds the trident symbol of Shiva