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Natural Disaster:Cloud Burst in Uttarkashi Chamoli & Other parts of Uttarakhand

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 04, 2012, 03:50:17 PM

Mahi Mehta



Tilak Soni


the place where an iron bridge stood at Gangauri (Uttarkash) which was blown away by floods.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720












Tilak Soni






the other side of Gangauri.. here was a fire brigade which no where exists now..





विनोद सिंह गढ़िया

छेड़छाड़ ने दिलाया असी को गुस्सा

असी को देखने से सिहरन पैदा होती है। लगता है बेहद गुस्से में है। असी को गुस्सा भी उन लोगों ने दिलाया जो सारे मानकों को दरकिनार कर इससे छेड़छाड़ से बाज नहीं आए। यही छेड़छाड़ कहर बनकर उन लोगों पर टूटी जो इसकी गोद में कई सालों से रह रहे थे।
असी पर एक नहीं बल्कि तीन-तीन जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन थीं। दबी जुबान का सच यह भी है कि रन ऑफ द रिवर का नाम देकर बनाई जा रही इन सभी परियोजनाओं में मलबा नदी के किनारे ही डंप किया जा रहा था। तीनों ही परियोजनाओं के लिए वन भूमि का अधिग्रहण किया गया। नौ मेगावाट की कालदीगाड, 4.5 मेगावाट की असी गंगा फस्ट और 4.5 मेगावाट की ही अस्सी गंगा दो परियोजना में कई पेड़ कटे पर इन पेड़ों को साइट पर ही डंप कर दिया गया। वन विकास निगम के ही एक कर्मी के मुताबिक वन विकास निगम ने 65 पेड़ काटने की अनुमति दी थी पर आसपास के गांव के लोगों ने कह दिया था कि उनके पास इतना पैसा नही है कि इन पेड़ों की कीमत अदा कर सके। लिहाजा वन विभाग ने इन 65 पेड़ों की कीमत के रुप में 1.80 लाख रुपया वन निगम को दिया और संबंधित कंपनी ने इन पेड़ों को वहीं डंप कर दिया।

पचास साल में नहीं आया इतना पानी

जरा इन तथ्यों पर भी गौर करें। उत्तरों के गंगोरी में जो खेत बहे हैं, वे नदी तट से करीब आठ मीटर ऊपर थे। उत्तरों के ही मोहन सिंह राणा के मुताबिक पिछले पचास सालों में पानी कभी इतना ऊपर आया ही नहीं। गंगोरी का पुल 1962 में बना था और तीन अगस्त तक सुरक्षित रहा। गंगोरी में भी जो लोग रह रहे थे, वे भी वहां पिछले 25 सालों से तो थे ही। नदी में बहकर आए हुए पेड़ों की भरमार है। कई चीड़ के पेड़ हैं जो साफ दिख रहे हैं कि काटे गए थे।

बहे पेड़ों ने झील बनाने में मदद की

नुकसान का कारण साफ है कि नदी में इतनी मिट्टी आई कि नदी का तल ऊंचा उठ गया। नदी में बहकर आए सैकड़ों पेड़ों ने इस कुछ-कुछ दूरी पर नदी में झील बनाने में मदद की।
झीलें टूटी और इसने पानी को एक ऐसी ताकत में बदला जो नदी के किनारों को तोड़ती हुई गई। यह साफ-साफ दिख रहा है कि गंगोरी से लेकर जल विद्युत परियोजनाओं की पहली साइट तक का क्षेत्र है जहां नदी किनारों पर सबसे अधिक नुकसान हुआ है। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना में नदी में मलबा डालने की शिकायत तो पकड़ में आ गई थी, लिहाजा शोर भी मचा। खुद कैग की ओर से की गई समीक्षा में भी यह बात उभर कर सामने आई थी कि निर्माणाधीन परियोजनाओं में मलबा नदियों में डाला जा रहा है। अस्सी का गुस्सा भी शायद इसी मलबे ने बढ़ाया।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सदमे ने महेंद्र को पहुंचाया अस्पताल
Story Update : Monday, August 20, 2012    12:01 AM

उत्तरकाशी। बाढ़ में सबकुछ बह गया, लेकिन सहायता मिलना तो दूर प्रभावितों की सूची में नाम तक नहीं। सूची देखी तो ऐसा सदमा लगा कि आंख अस्पताल में जाकर खुली। यह दुख भरी कहानी है जन्म से गूंगे महेंद्र सिंह की।
उत्तरों गांव के कैर सिंह के दो बेटे हैं। एक भारतीय सेना में और दूसरा महेंद्र घर पर ही रहता है। खेती करने वाले महेंद्र ने अपनी मेहनत के बल पर भाई के साथ मिलकर गंगोरी में दो हिस्सों में तीन मंजिला मकान तथा दो दुकानें बनाई। तीन अगस्त की रात दोनों भाइयों के परिवार कहीं और होने से बच गए, लेकिन सामान व मकान बह गया। राजस्व विभाग ने जब प्रभावितों की सूची तैयार की तो पिता कैर सिंह व फौजी बेटे विरेंद्र सिंह के नाम एक लाख रुपये गृह अनुदान का संयुक्त चेक थमा दिया। महेंद्र सिंह का इस सूची में उल्लेख ही नहीं है। उन्हें गृह अनुदान तो दूर किराएदारों को बांटी जा रही अहेतुक सहायता तक नहीं दी गई। अब इस सदमे में बीमार हुए महेंद्र सिंह का अस्पताल में इलाज चल रहा है। राजस्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राहत की गाइड लाइन में पिता के साथ साझी संपत्ति एक ही मानी जाएगी।

Source Amar ujala

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I feel Govt is not taking care of these victims properly.


जख्मों पर नमक छिड़क रहे 'मानक'
Story Update : Tuesday, August 21, 2012    12:01 AM

ढहने के कगार पर पहुंचे मकानों के बदले मिल रहे 1900 रुपये
उत्तरकाशी। जीवन भर की कमाई बाढ़ में बह गई, लेकिन मुआवजे के नाम पर सिर्फ 1900 रुपये। जी हां, प्रशासन के ऐसे ही उल्टे सीधे मानक आपदा पीड़ितों के जख्म कुरेद रहे हैं। गंगोरी और उत्तरकाशी में तटवर्ती क्षेत्र में मिट्टी के टीलों पर बने मकान किसी भी क्षण ढह सकते हैं। इन दर्जनों घरों को खाली करवा कर प्रशासन ने लोगों को सुरक्षित ठिकानाें पर आश्रय तो दिया, लेकिन इन मकानों
को क्षतिग्रस्त नहीं माना। इन मकानों को आंशिक क्षतिग्रस्त की श्रेणी
में रख प्रभावितों को 1900
रुपये पकड़ा कर बेसहारा छोड़ दिया गया है।
भारतीय सेना में 22 साल की सेवा के बाद गोविंद सिंह ने तीन साल पहले गंगोरी में जमीन खरीद कर मकान बनाया था। उत्तरों गांव में उनके पास सिर छिपाने का ठिकाना है, लेकिन बच्चों की अच्छी शिक्षा के सपने के साथ उन्होंने इस मकान को बनाने में जीवन भर की कमाई लगा दी। 24 जुलाई हो हुई अतिवृष्टि में
असी गंगा उनके मकान के आगे की जमीन बहा ले गई। तीन अगस्त की बाढ़ में आसपास की छह
नाली जमीन बहने के बाद उनका मकान 20 मीटर ऊंचे टीले पर खड़ा रह गया।
नदी के कटाव से बुनियाद लगातार खाली हो रही है। प्रशासन ने घर खाली कराकर उन्हेें निगम कालोनी में बने कैंप में शरण तो दी, लेकिन मकान को आंशिक क्षतिग्रस्त दिखा उन्हें 1900 रुपये पकड़ा दिए। जबकि स्थिति यह
है कि घर तक पहुंचने के लिए रास्ता भी नहीं बचा है, जिससे वे कुछ सामान निकाल सकें। यही स्थिति हर्षिल से आए शिक्षक सतेंद्र नेगी व पाटा से आए जयेंद्र चौहान की भी है।
यह है असलियत
स्वयंसेवियों और वरिष्ठ नागरिकों के सर्वे के अनुसार सिर्फ गंगोरी नगर पालिका क्षेत्र में 13 मकान बाढ़ में बह गए थे। इनमें कई बहुमंजिला भवन भी शामिल हैं। 14 भवन ढहने की कगार पर हैं। इनके अलावा 37 मकानों में भारी मलबा और कुछ में तो साबुत पेड़ दीवार तोड़ कर घुसे हुए हैं। राजस्व विभाग ने इनमें से अधिकांश को तो आंशिक क्षतिग्रस्त की श्रेणी में भी नहीं रखा।
ये हैं प्रशासन के आंकड़े
उत्तरकाशी। राजस्व विभाग की सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर जिला प्रशासन गंगोरी में 11 मकान पूर्ण ध्वस्त, 10 तीक्ष्ण और 11 आंशिक क्षतिग्रस्त की श्रेणी में रखकर राहत राशि बांट रहा है।

Source -Amar Ujala