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Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत

Started by पंकज सिंह महर, January 04, 2008, 02:44:23 PM

Risky Pathak


हेम पन्त

ये लीजिये महाराज... Starting के 10 Second को Ignore कर दिजियेगा
http://www.youtube.com/watch?v=YEcMCfTjRHY

पंकज सिंह महर

काकेश भाई ने कुछ संकलन तैयार किया है, सेवा में प्रस्तुत है

होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला त्यौहार है. इसके साथ जो एक और चीज जुड़ी है वह है संगीत. बिना संगीत के कुमांऊनी होली की कल्पना करना भी मुश्किल है. संगीत के साथ साथ होली से जुड़े गीतों में कथ्य का भी बहुत महत्व है. होली यहाँ सिर्फ होली ही नहीं बल्कि एक सामुहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है. इसमें सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दे भी हैं और तात्कालिक परिस्थितियों का चित्रण भी है.

कुमांऊनी होली एक पर्व ही नहीं है बल्कि इसकी एक सांस्कृतिक विशेषता है. यहाँ की होली मुख्यत: तीन तरह की होती है. 1. बैठी होली 2. महिला होली 3. खड़ी होली. इसके अलावा खड़ी होली का ही एक हिस्सा बंजारा होली कहलाता है. इन सब होलियों की चर्चा विस्तार से इस लेख के आगे के हिस्सों में की जायेगी.

मुख्य होली की शुरुआत फाल्गुन मास की एकादसी से होती है. जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं. होली के लिये विशेष कपड़े बनवाये जाते हैं जो मुख्यत: सफेद रंग के होते हैं. पुरुष सफेद रंग के कुर्ता पायजामा पहनते हैं और कुछ लोग सर पर गान्धी टोपी पहनते हैं .महिलाऎं सफेद धोती या सफेद सलवार कमीज पहनती हैं. एकादशी के दिन जब रंग पड़ता है तो इन्ही कपड़ो में रंग डाल दिया जाता है. यह कपड़े अब मुख्य होली के दिन तक बिना धोये पहने जाते हैं. जिस दिन देश-दुनिया के अन्य जगहों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमाऊं में पानी और रंगो से होली खेली जाती है. इस दिन को "छरड़ी" या "छलड़ी" कहा जाता है.

एकादशी के ही दिन चीर बंधन होता है. इस दिन व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से एक जगह चीर बांधा जाता है. इसके लिये "पद्म" की टहनी (इसे पहाड़ में "पैय्यां" या "पईंया" कहा जाता है) पर रंग बिरंगे कपडों की चीर बांधी जाती है. इसके अलावा सामुहिक रूप से जो चीर बांधी जाती है वह बांस के डंडे में बांधी जाती है लेकिन उसमें पद्म की एक टहनी, जौं की कुछ बालीयां और खीशे का फूल होना जरूरी होता है.पुराने जमाने में इस तरह की सामुहिक चीर को बांधने की अनुमति कुछ ही गांवों को होती थी.जिस गांव के लोग इस चीर को बांधते थे वो लोग रात भर इस चीर का पहरा भी करते थे ताकि कोई इस चीर को चुरा ना पाये. यदि किसी साल यह चीर किसी अन्य गांव के लोगों ने चोरी कर ली तो इस गांव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था.फिर से इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये गांव वालों को किसी अन्य गांव की चीर चुराना जरूरी होता था. इसी का सन्दर्भ होली के गानों में भी आता है कि "चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो, यो छो ऐसो मतवालो". यह शायद इसी ओर इंगित करता है.         

अगले भागों में गीतों के कथ्य की भी चर्चा करेंगे अभी एक गाना जो मुझे याद आ रहा है उसके बोल आप को बता दूँ.यह मुख्यत: महिलाओं की होली है,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

ठाड़े भरूं राजा राम देखत हैं,

बैठी  भरूं  भीजे  चुनरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

धीरे चलूं घर सास बुरी है,   

धमकि चलूं छ्लके गगरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

गोदी में बालक सर पर गागर,

परवत से उतरी गोरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

साभार - http://kakesh.com/?p=353


पंकज सिंह महर

खड़ी होली या गीत बैठकी उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल की सरोवर नगरी नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में होली के अवसर पर आयोजित की जाती हैं। यहाँ नियत तिथि से काफी पहले ही होली की मस्ती और रंग छाने लगते हैं। इस रंग में सिर्फ अबीर-गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है। बरसाने की लठमार होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है। वसंत के आगमन पर हर ओर खिले फूलों के रंगों और संगीत की तानों का ये अनोखा संगम दर्शनीय होता है। शाम के समय कुमाऊं के घर घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती है। गीत बैठकी में होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं। गीत बैठकी में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है और अगर साथ में भांग का रस भी छाया तो ये सिलसिला कभी कभी आधी रात तक तो कभी सुबह की पहली किरण फूटने तक चलता रहता है। होली की ये परंपरा मात्र संगीत सम्मेलन नहीं बल्कि एक संस्कार भी है। ये बैठकें आशीर्वाद के साथ संपूर्ण होती हैं जिसमें मुबारक हो मंजरी फूलों भरी...या ऐसी होली खेले जनाब अली...जैसी ठुमरियाँ गई जाती हैं। गीत बैठकी की महिला महफ़िलें भी होती हैं। पुरूष महफिलों में जहाँ ठुमरी और ख़याल गाए जाते हैं वहीं महिलाओं की महफिलों का रुझान लोक गीतों की ओर होता है। इनमें नृत्य संगीत तो होता ही है, वे स्वांग भी रचती हैं और हास्य की फुहारों, हंसी के ठहाकों और सुर लहरियों के साथ संस्कृति की इस विशिष्टता में नए रोचक और दिलकश रंग भरे जाते हैं। देवर भाभी के हंसी मज़ाक से जुड़े गी तो होते ही हैं राजनीति और प्रशासन पर व्यंग्य भी होता है। होली गाने की ये परंपरा सिर्फ कुमाऊं अंचल में ही देखने को मिलती है।"

पंकज सिंह महर

कुमाऊं की होली का अपना एक अलग रंग है। यहां होली एक-दो दिन का नहीं बल्कि महीने भर का गायकी का त्यौहार होता है। महिलाओं व पुरूषों की अलग-अलग होने वाली होलियों की गायन शैली में भी अलग होती हैं। पक्के रागों पर आधारित श्रृगांरिक गीतों वाली होली बैठकें रात-रात भर चलती हैं। होली के दिनों में युगमंच भी होलीमय होता है। होली की एक बैठक का आयोजन युगमंच के द्वारा किया जाता है जिसमें शहर के गणमान्य बुजुर्ग होल्यारों के साथ-साथ होली गाने वालों की नई पौध भी पूरे रंग में शामिल होती है। अबीर-गुलाल का टीका लगाने के बाद शुरू होता है आरोह-अवरोह के पेंचो-खम से भरा होली गायकी का दौर। उन होलियों की यादें अब तक कई बार ठंडी आहें भरने को मजबूर कर देती हैं।

पंकज सिंह महर

प्रभु ने धारो वामन रूप , राजा बली के दुआरे हरी
राजा बली को अरज सुना दो , तेरे दुआरे अतिथि हरी
मांग रे वमणा जो मन ईच्छा , सो मन ईच्छा में देऊं हरी

हमको दे राजा तीन पग धरती, काँसे की कुटिया बनाऊं हरी
मांग रे बमणा मांगी नी ज्याण , के करमो को तू हीना हरी
दू पग नापो सकल संसारा , तिसरौ पग को धारो हरी
राजा बलि ने शीश दियो है, शीश गयो पाताल हरी

पांचाला देश की द्रोपदी कन्या, कन्या स्वयंबर रचायो हरी
तेल की चासनी रूप की मांछी, खम्बा का टूका पर बांधो हरी
मांछी की आंख जो भेदी जाले, द्रोपदी जीत लिजालो हरी
दुर्योधनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , अन्धो पिता को तू चेलो हरी
कर्णज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , मैत घरौ को तू चेलो हरी
अर्जुनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख को भेदो हरी
अर्जुनज्यू उठें द्रौपदी लै उठी, जयमालै पहनायो हरी

पैली शब्द ओमकारा भयो है, पीछे विष्णु अवतार हरी
बिष्णु की नाभी से कमलक फूला, फूला में ब्रह्मा जी बैठे हरी
ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची है , तीनों लोक बनायो हरी
पाताल लोक में नाग बसो है , मृत्युलोक में मनुया हरी
स्वर्गालोक में देव बसे हैं , आप बसे बैकुंठ हरी

पंकज सिंह महर

सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई लिये हाथ पिचकारी,कोई लिये फसल की डारी
घर घर में धूम मचाय,होली खेल रहे नर नारी
सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई नाच रहा कोई गाये कोई ताल मृदंग बजाये
घर घर में धूम मचाय, होली खेल रहे नर नारी.

पंकज सिंह महर

झुकि आयो शहर में ब्यौपारी, झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को भूख बहुत है,पुरियां पकाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को प्यास बहुत है,पनिया पिलाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को नींद बहुत है,पलेंग बिछाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी

पंकज सिंह महर

काकेश जी के ब्लाग से
पिछ्ले अंक में हमने होली के तीन प्रमुख रूपों की चर्चा की थी. आज हम उसी में से एक रूप खड़ी होली की चर्चा 'छालड़ी' के संबंध में करेंगे.जिस दिन देश, दुनिया के अन्य भागों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमांऊ में मुख्य होली होती है जिसे "छरड़ी" या "छालड़ी" कहते हैं. यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनायी जाती है. इस दिन पानी और रंगों से होली खेली जाती है.

सुबह होते ही घरों में इस होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं.एक थाली में अबीर गुलाल रखा जाता है.घर के सदस्यों के लिये आमतौर पर पूरी और आलू के गुटके (आलू की सूखी सब्जी) बनाये जाते हैं. होली में अबीर लगाने वाले लोगों के लिये कुछ चिप्स,पापड़ तले जाते हैं. कुछ लोग आलू,चने या छोले,पकोड़ी आदि भी बनाते हैं. भांग की पकोड़ी भी कुछ जगह बनायी जाती है. पूरी-आलू खाने के बाद घर के पुरुष पहले अबीर लगाने के लिये निकलने की तैयारी करते हैं. अपने होली के कपड़े पहनते हैं. रुमाल की एक पोटली में सूखा अबीर गुलाल रखते हैं. आजकल रुमाल की जगह पॉलीथीन के पैकेट का इस्तेमाल भी लोग करते हैं. जो लोग गीला रंग लगाना चाहते हैं वो एक रुमाल में कोई गाढ़ा रंग रख कर उसे हल्के पानी से भिगा देते हैं और उसे भी एक पॉलीथीन के पैकेट में रख अपनी जेब में डाल लेते हैं.जब भी किसी को गीला रंग लगाना हो तो रुमाल को थोड़ा गीला किया और चुपड़ दिया मुंह में रंग.       

होली की पोशाक पहनने के बाद सबसे पहले द्य्प्ताथान (घर का मंदिर) में भगवान को अबीर-गुलाल लगाया जाता है. फिर घर के सभी सदस्य एक दूसरे को अबीर-गुलाल का टीका लगाते हैं. अपने से बड़े लोगों को पांव छूके या हाथ जोड़ कर नमस्कार किया जाता है. समवयस्क पुरुष और महिलाएं एक दूसरे के गले मिलते हैं.उसके बाद घर के पुरुष अपने अपने दोस्तों के साथ पूरे गांव, मोहल्ले या अपने नाते-रिश्तेदारों के यहाँ अबीर का टीका करने के लिये निकलते हैं.

सुबह दस - साढ़े दस बजे तक सब गांव या मोहल्ले के प्रमुख शिव मन्दिर पर एकत्र होते हैं.यह शिव मंदिर वही होता है जहां सामुहिक चीर बांधी गयी थी. 'छलड़ी' के पहले दिन इसी स्थान पर चीर दहन होता है."छलड़ी' के दिन होल्यार सबसे पहले चीर दहन की राख का टीका करते हैं और फिर  कोई ढोलक पकड़ता है, कोई मजीरा, कोई झांझर,तो कोई ढपली. होली खेलने वालों को होल्यार कहा जाता है. यह सभी होल्यार शिवमंदिर में शिव की होली से शुरुआत करते हैं.

" अरे हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला,
अच्छा हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
ब्रह्मा जी खेलें , बिष्णु जी खेलें. खेलें गणपति देव
शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला. "

फिर अन्य होलियां गायी जाती हैं जैसे.

"अरे अंबारी एक जोगी आया लाल झुमैला वाला वे
ओहो लाल झुमैला वाला वे "

होल्यार अपने जुलूस का एक मुखिया चुन लेते हैं जो पूरी होली को नियंत्रित करता है. इसके बाद गांव/मोहल्ले के हर घर में होल्यार जाते हैं जहाँ उनके लिये पहले से दरियां बिछायी गयी होती हैं.सभी होल्यार पहले बैठ के होली गाते हैं. घर के लोग होल्यारों का स्वागत करते हैं. घर का मुखिया सभी होल्यारों को अबीर का टीका लगाता है. उनका स्वागत चिप्स,पापड़,कटे हुए फल, गुझिया, सौप,सुपारी, गरी आदि से किया जाता है कुछ लोग चाय भी पिलाते हैं. घर का मुखिया जुलूस के मुखिया को कुछ पैसे भी देता है. हर घर से कुछ कुछ पैसे लिये जाते हैं. इन पैसों से या तो सामुहिक भंडारा होता है या पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी जाती है या फिर सामुहिक महत्व की चीजें जैसे ढोलक,मजीरा आदि खरीद लिया जाता है.

अंत में होल्यार दरी से उठ कर खड़े होकर होली गाते हैं...घर के सदस्य घर के खिड़कियों जिन्हे पहाड़ में छाजा कहा जाता है उससे रंग वाला पानी डालते हैं. तब बढ़े बूढ़े आगे पीछे हो जाते हैं और युवा लोग मोर्चा संभालते हैं और भीगते भीगते चिढ़ाने के लिये होली गाते रहते हैं.इसमें थोड़ी अश्लीलता का पुट भी कभी कभी आ जाता है जैसे

"कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे,
कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
उलटि पलट करि जायें  गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
कहो तो यहीं रम जायें गोरी तबले तुम्हारे कसे हुए "

या फिर

"सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां ,
सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां "
जबहि सिपय्या ने ..... भरतपुर लुट गयो रात मोरे सय्यां " 

कुछ दिनों पहले इस गाने को किसी फिल्म में भी लिया गया था लेकिन मैने यह गाना फिल्म से बहुत पहले होलियों में सुना व गाया था.


साभार : http://kakesh.com/?p=357

पंकज सिंह महर

मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रो छ ...

मेरो लाडलो देवर घर ऐ रो छ..

के हुनी साड़ी के हुनी झम्पर,

कै हुनी बिछुवा लै रो छ....

सास हुनी साड़ी ,

ननद हुनी झम्पर,

मैं हुनी बिछुवा लै रो छ ...

मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रो छ . . .

मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रो छ . . .

मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रो छ . . .