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Chaitra Navratras - चैत्र नवरात्र : नौर्त- मां दुर्गा के नौ रुपों

Started by हलिया, April 04, 2008, 12:55:44 PM

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Rajen

चतुर्थ कूष्माण्डा


सुरासम्पूर्णकलशंरुधिप्लूतमेवच।

दधानाहस्तपदमाभयांकूष्माण्डाशुभदास्तुमे॥


भगवती दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप का नाम कूष्माण्डाहै। अपनी मंद हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डादेवी के नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार परिव्याप्त था तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। अत:यही सृष्टि की आदि स्वरूपाआदि शक्ति हैं। इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व था ही नहीं। इनकी आठ भुजाएं हैं। अत:ये अष्टभुजा देवी के नाम से विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमश:कमण्डल, धनुष बाण, कमल, पुष्प, अमृतपूर्णकलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमालाहै। इनका वाहन सिंह है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डाकुम्हडेको कहते हैं। बलियों में कुम्हडेकी बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी यह कूष्माण्डाकही जाती हैं। ध्यान:-वन्दे वांछित कामर्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

सिंहरूढाअष्टभुजा कुष्माण्डायशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभांअनाहत स्थितांचतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।

कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलशचक्र गदा जपवटीधराम्॥

पटाम्बरपरिधानांकमनीयाकृदुहगस्यानानालंकारभूषिताम्।

मंजीर हार केयूर किंकिणरत्‍‌नकुण्डलमण्डिताम्।

प्रफुल्ल वदनांनारू चिकुकांकांत कपोलांतुंग कूचाम्।

कोलांगीस्मेरमुखींक्षीणकटिनिम्ननाभिनितम्बनीम्॥

स्त्रोत:-दुर्गतिनाशिनी त्वंहिदारिद्रादिविनाशिनीम्।

जयंदाधनदांकूष्माण्डेप्रणमाम्यहम्॥

जगन्माता जगतकत्रीजगदाधाररूपणीम्।

चराचरेश्वरीकूष्माण्डेप्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुंदरीत्वंहिदु:ख शोक निवारिणाम्।

परमानंदमयीकूष्माण्डेप्रणमाम्यहम्॥

कवच:-हसरै मेशिर: पातुकूष्माण्डेभवनाशिनीम्।

हसलकरींनेत्रथ,हसरौश्चललाटकम्॥

कौमारी पातुसर्वगात्रेवाराहीउत्तरेतथा।

पूर्वे पातुवैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणेमम।

दिग्दिधसर्वत्रैवकूंबीजंसर्वदावतु॥

भगवती कूष्माण्डाका ध्यान, स्त्रोत, कवच का पाठ करने से अनाहत चक्र जाग्रत हो जाता है, जिससे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।

Rajen

श्री दुर्गाचालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
ससि ललाट मुख महा बिसाला। नेत्र लाल भृकुटी बिकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरस करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लय कीन्हा। पालन हेतु अन्न धन दीन्हा॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नासन हारी। तुम गौरी शिव शङ्कर प्यारी॥
शिवजोगी तुम्हरे गुन गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वति को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन्ह उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा। परगट भई फाड कर खंबा॥
रच्छा करि प्रह्लाद बचाओ। हिरनाकुस को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥
छीर सिन्धु में करत बिलासा। दया सिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
मातंगी धूमावति माता। भुवनेस्वरि बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिनि। छिन्नभाल भव दु:ख निवारिनि॥
केहरि बाहन सोह भवानी। लांगुर बीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खडग बिराजै। जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और तिरसूला। जाते उठत शत्रु हिय सूला॥
नगरकोट में तुम्ही बिराजत। तिहूँ लोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्त बीज संखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल काली को धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ संतन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अमर पुरी औरों सब लोका। तव महिमा सब रहै असोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो जस गावै। दुख दारिद्र निकट नहि आवै॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म मरन ताको छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। जोग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शङ्कर आचारज तप कीन्हो। काम क्रोध जीति सब लीन्हो॥
निसिदिन ध्यान धरो शङ्कर को। काहु काल नहि सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥
सरनागत ह्वै कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदंब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई शक्ति नहि कीन्ह बिलंबा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुख मेरो॥
आसा तृस्ना निपट सतावै। रिपु मूरख मोहि अति डरपावै॥
शत्रु नास कीजै महरानी। सुमिरौं एकचित तुमहि भवानी॥
करौ कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला॥
जब लगि जियौं दयाफल पाऊँ। तुम्हरौ जस मैं सदा सुनाऊँ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परम पद पावै॥
देवीदास सरन निज जानी। करहु कृपा जगदंब भवानी॥


पंकज सिंह महर

माँ दुर्गा की आरती.......

ॐ जय अम्बे  गौरी  मैया, जय श्यामा  गौरी
निशादिन  तुमको  ध्यावत, हरी  ब्रम्हा शिवहरि,
ॐ जय अम्बे गौरी..........

मांग  सिंदूर  विराजत, टिको  मृगमदको
उज्ज्वाल से दुऊ नैना, चंद्रवदन नीको
ॐ जय अम्बे गौरी..........

कनक  समाना कलेवर, रक्ताम्बरा  राजे
रक्तापुष्प गलमाला, कन्ठन पर  साजे
ॐ जय अम्बे गौरी.........

केहरी  वाहन  राजत, खडग खप्पर  धारी
सुर नर मुनि जन  सेवत, तिनके दुख हारी
ॐ जय अम्बे गौरी......

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे  मोती
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम  राजत ज्योती
ॐ जय अम्बे गौरी......

शुम्भा निशुम्भा बिदारे, महिषासुर धाती
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती
ॐ जय अम्बे गौरी......

चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंगा, और बाजत डमरू
ॐ जय अम्बे गौरी......

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी
मनावान्चित फल पावत, सेवत नर नारी
ॐ जय अम्बे गौरी.......

कंचना थाल विराजत, अगर कपूर बाती
श्रीमालकेतु में राजत, कोटिरतान ज्योति
ॐ जय अम्बे गौरी........

तुम हो जग की माता , तुम ही हो भरता
भक्ताना की दुख हरता , सुख सम्पति करता
ॐ जय अम्बे गौरी......

ब्रह्माणी रुद्रानी , तुम कमला रानी
आगम -निगम  बखानी , तुम शिव पटरानी
ॐ जय अम्बे गौरी......

श्री अम्बे जी की आरती,जो कोई जन गाता,
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पाता
ॐ जय अम्बे गौरी........

ॐ जय अम्बे  गौरी  मैया, जय श्यामा  गौरी
निशादिन  तुमको  ध्यावत, हरी  ब्रम्हा शिवजी
ॐ जय अम्बे गौरी..........

पंकज सिंह महर

माता वैष्णों के दरबार में दोनों समय होने वाली आरती

हे मात मेरी...........हे मात मेरी
कैसे ये देर लगाई है दुर्गे, हे मात मेरी हे मात मेरी ।
भवसागर में गिरा पड़ाहूँ, काम आदि गह में घिरा पड़ा हूँ
मोह आदि जाल में जकड़ा हँ
हे मात मेरी, हे मात मेरी................

न मुझमें बल है न मुझमें विघा
न मुझमें भक्ति न मुझमें शक्ति
शरण तुम्हारी गिरा पड़ा हूँ । । हे मात मेरी ।। 2 ।।

न कोई मेरा कुटुम्बी साथी, ना ही मेरा शरीर साथी
चरण कमल की नौका बनाकर,
मैं पार हूँगा खुशी मनाकर
यमदूतों को मार भगाकर ।। 2 ।।

सदा ही तेरे गुणो को गाऊँ, सदा ही तेरे स्वरुप को ध्याऊँ
नित्य प्रति तेरे गुणों को गाऊँ ।। हे मात मेरी ।। 2।।

न मैं किसी का न कोई मेरा, छाया है चारों तरफ अँधेरा
पकड़ के ज्योति दिखा दो रास्ता हे मात मेरी ।।
शरण में पड़े है हम तुम्हारी, करो ये नैया पार हमारी
कैसे से देर लगाई है दुर्गे हे मात मेरी..........


हलिया

पंचम स्कंदमाता

सिंहासनगतानित्यंपद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तुसदा देवी स्कन्दमातायशस्विनीम्॥


भगवती दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाताके रूप में जाना जाता है। स्कन्द कुमार अर्थात् काíतकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कन्दमाताकहते हैं। इनका वाहन मयूर है। मंगलवार के दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थितहोता है। इनके विग्रह में भगवान स्कन्दजीबाल रूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं। स्कन्द मातुस्वरूपणीदेवी की चार भुजाएं हैं। ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द्रको गोद में पकडे हुए हैं और दाहिने तरफ की नीचे वाली भुजा वरमुद्रामें तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर उठी हुई है, इसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णत:शुभ है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण से इन्हें पद्मासनादेवी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।

ध्यान:-वन्दे वांछित कामर्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
सिंहारूढाचतुर्भुजास्कन्धमातायशस्वनीम्॥
धवलवर्णाविशुद्ध चक्रस्थितांपंचम दुर्गा त्रिनेत्राम।
अभय पदमयुग्म करांदक्षिण उरूपुत्रधरामभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानाकृदुहज्ञसयानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर हार केयूर किंकिणिरत्नकुण्डलधारिणीम।।
प्रभुल्लवंदनापल्लवाधरांकांत कपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांजारूत्रिवलींनितम्बनीम्॥
स्तोत्र:-नमामि स्कन्धमातास्कन्धधारिणीम्।
समग्रतत्वसागरमपारपारगहराम्॥
शिप्रभांसमुल्वलांस्फुरच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्‍‌नभास्कराजगतप्रदीप्तभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपाíचतांसनत्कुमारसंस्तुताम्।
सुरासेरेन्द्रवन्दितांयथार्थनिर्मलादभुताम्॥
मुमुक्षुभिíवचिन्तितांविशेषतत्वमूचिताम्।
नानालंकारभूषितांकृगेन्द्रवाहनाग्रताम्।।
सुशुद्धतत्वातोषणांत्रिवेदमारभषणाम्।
सुधाíमककौपकारिणीसुरेन्द्रवैरिघातिनीम्॥
शुभांपुष्पमालिनीसुवर्णकल्पशाखिनीम्।
तमोअन्कारयामिनीशिवस्वभावकामिनीम्॥
सहस्त्रसूर्यराजिकांधनज्जयोग्रकारिकाम्।
सुशुद्धकाल कन्दलांसुभृडकृन्दमज्जुलाम्॥
प्रजायिनीप्रजावती नमामिमातरंसतीम्।
स्वकर्मधारणेगतिंहरिप्रयच्छपार्वतीम्॥
इनन्तशक्तिकान्तिदांयशोथमुक्तिदाम्।
पुन:पुनर्जगद्धितांनमाम्यहंसुराíचताम॥
जयेश्वरित्रिलाचनेप्रसीददेवि पाहिमाम्॥
कवच:-ऐं बीजालिंकादेवी पदयुग्मधरापरा।
हृदयंपातुसा देवी कातिकययुता॥
श्रींहीं हुं ऐं देवी पूर्वस्यांपातुसर्वदा।
सर्वाग में सदा पातुस्कन्धमातापुत्रप्रदा॥
वाणवाणामृतेहुं फट् बीज समन्विता।
उत्तरस्यातथाग्नेचवारूणेनेत्रतेअवतु॥
इन्द्राणी भैरवी चैवासितांगीचसंहारिणी।
सर्वदापातुमां देवी चान्यान्यासुहि दिक्षवै॥


भगवती स्कन्दमाताका ध्यान स्तोत्र व कवच का पाठ करने से विशुद्ध चक्र जागृत होता है। इससे मनुष्य की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है। परम शांति व सुख का अनुभव होने लगता है।




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