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Chaitra Navratras - चैत्र नवरात्र : नौर्त- मां दुर्गा के नौ रुपों

Started by हलिया, April 04, 2008, 12:55:44 PM

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पंकज सिंह महर

प्रथम शैलपुत्री

भगवती दुर्गा का प्रथम स्वरूप भगवती शैलपुत्रीके रूप में है। हिमालय के यहां जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्रीकहा गया। भगवती का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का पुष्प है। इस स्वरूप का पूजन आज के दिन किया जाएगा।

आवाहन, स्थापना और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे। किसी एकांत स्थल पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं, बोयें। उस पर कलश स्थापित करें। कलश पर मूर्ति स्थापित करें, भगवती की मूर्ति किसी भी धातु अथवा मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिकऔर उसके युग्म पा‌र्श्व में त्रिशूल बनायें। जिस कक्ष में भगवती की स्थापना करें, उस कक्ष के उत्तर और दक्षिण दिशा में दो-दो स्वास्तिकपिरामिड लगा दें।

ध्यान:-वन्दे वांछितलाभायाचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्।

पूणेन्दुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा।

पटाम्बरपरिधानांरत्नकिरीठांनानालंकारभूषिता।

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधंराकातंकपोलांतुगकुचाम्।

कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितम्बनीम्।

स्तोत्र:-प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर तारणीम्।

धन ऐश्वर्य दायनींशैलपुत्रीप्रणमाम्हम्।

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाम्यहम्।

कवच:-ओमकार: मेशिर: पातुमूलाधार निवासिनी

हींकारपातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी।

श्रींकारपातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी।

हुंकार पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा।

शैलपुत्रीके पूजन से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है, जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां होती हैं।
 

पंकज सिंह महर

नवरात्र के अनुसार आज सातवां नवरात्र है, लेकिन आज अष्टमी भी दोपहर १.३० से प्रारंम्भ हो रही है, जो कल सुबह ९.३० तक ही है, उसके बाद नवमी लग जायेगी।
इसलिये अष्टमी का व्रत आज ही है, वैसे भी हमारे पहाड़ों में अष्टमी दो होती हैं- १- उज्याली २- अन्यारी,
जो लोग अन्यारी अष्टमी की पूजा करते हैं, वे सप्तमी को ही व्रत करते हैं।
नवमी को बलि नहीं होती है, इसलिये पहाड़ों में आज हे बलि दी जा रही है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


नव रात्रियों के शुभ अवसर पर, माँ भवानी की यह वंदना! गोपाल बाबु गोस्वामी के यह भजन
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तू ही दुर्गा, तू तू ही काली
महिमा तेरी अपार

    हे जग जननी
    हे महा माया

आयो मे तेरो द्वार

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जय मैया दुर्गा भवानी
जय मैया ...२...

शेर सिंह माता सवारी
हाथ चक्र, सुरदर्शन धारी
       
     डाना काना मे है रेछो वास
     द्रोणागिरी में जली रे ज्योत

जय मैया दुर्गा भवानी
जय मैया ...२...

पंकज सिंह महर

स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी की आवाज में मां भगवती का एक भजन

http://www.youtube.com/watch?v=0Oi7qOPa69o

जै मैय्याऽऽऽऽऽऽऽ
जै मैय्या दुर्गा भवानी, जै मैय्याऽऽऽऽऽ
तेरी सिंह की माता सवारी, हाथ चक्र सुदर्शन धारी,
डाणा-काना में है रौछ वास, पुन्यागिरी में जलि रे जोतऽऽऽऽऽ
जै मैय्या दुर्गा भवानी, जै मैय्याऽऽऽऽऽ

तेरी जैकार माता उपटा, तेरी जै-जै हो देवी का धुरा,
तेरी जैकार माता गंगोली, तेरी जैकार मायधार काली,
जै मैय्या दुर्गा भवानी, जै मैय्याऽऽऽऽऽ

पुन्यागिरी की सिंह वाहिनी, तेरी जैकार शंख वादिनी,
तेरी जैकार हे माता नन्दा, तेरी जैकार देवी मानिला,
तेरो गोपाल जोडछू हाथ, धरी दिये मां सबु की तू लाज,
जै मैय्या दुर्गा भवानी, जै मैय्याऽऽऽऽऽ

Lalit Mohan Pandey

Himanshu bhai, is sal ke संवत्सर ke bare mai bhi kuch batao,kya nam hai.. kaisa rahega sabke liye.. Meri rashi Mesh hai...
Quote from: Himanshu Pathak on April 04, 2008, 02:11:07 PM
होय होय राजू दा.... संवत्सर फल ले बतुन  ७ तारीक कै .... तम सब आपुन राशि बते दिया पेलिये|  ;D ;D :P



इस साल के  संवत्सर का नाम प्लव है| पूरे ६० संवत्सर होते है| जिनमे से प्लव ३५वा संवत्सर है|



Rajen

श्रीराम ने किया नवरात्र व्रत


मान्यता है कि शारदीय नवरात्रमें महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई। इसलिए इस समय आदिशक्तिकी आराधना पर विशेष बल दिया गया है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, दुर्गा सप्तशती में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। किष्किंधामें चिंतित श्रीराम रावण ने सीता का हरण कर लिया, जिससे श्रीराम दुखी और चिंतित थे। किष्किंधापर्वत पर वे लक्ष्मण के साथ रावण को पराजित करने की योजना बना रहे थे। उनकी सहायता के लिए उसी समय देवर्षिनारद वहां पहुंचे। श्रीराम को दुखी देखकर देवर्षिबोले, राघव! आप साधारण लोगों की भांति दुखी क्यों हैं? दुष्ट रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है, क्योंकि वह अपने सिर पर मंडराती हुई मृत्यु के प्रति अनजान है। देवर्षिनारद का परामर्श रावण के वध का उपाय बताते हुए देवर्षिनारद ने श्रीराम को यह परामर्श दिया, आश्विन मास के नवरात्र-व्रतका श्रद्धापूर्वकअनुष्ठान करें। नवरात्रमें उपवास, भगवती-पूजन, मंत्र का जप और हवन मनोवांछित सिद्धि प्रदान करता है। पूर्वकाल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देवराज इंद्र भी इसका अनुष्ठान कर चुके हैं। किसी विपत्ति या कठिन समस्या से घिर जाने पर मनुष्य को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। महाशक्ति का परिचय

नारद ने संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाली उस महाशक्ति का परिचय राम को देते हुए बताया कि वे सभी जगह विराजमान रहती हैं। उनकी कृपा से ही समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं। आराधना किए जाने पर भक्तों के दुखों को दूर करना उनका स्वाभाविक गुण है। त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु, महेश उनकी दी गई शक्ति से सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार करते हैं। नवरात्रपूजा का विधान देवर्षिनारद ने राम को नवरात्रपूजा की विधि बताई कि समतल भूमि पर एक सिंहासन रखकर उस पर भगवती जगदंबा को विराजमान कर दें। नौ दिनों तक उपवास रखते हुए उनकी आराधना करें। पूजा विधिपूर्वक होनी चाहिए। आप के इस अनुष्ठान का मैं आचार्य बनूंगा।

राम ने नारद के निर्देश पर एक उत्तम सिंहासन बनवाया और उस पर कल्याणमयीभगवती जगदंबा की मूर्ति विराजमान की। श्रीराम ने नौ दिनों तक उपवास करते हुए देवी-पूजा के सभी नियमों का पालन भी किया। जगदंबा का वरदान मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात में श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष भगवती महाशक्ति प्रकट हो गई। देवी उस समय सिंह पर बैठी हुई थीं। भगवती ने प्रसन्न-मुद्रा में कहा- श्रीराम! मैं आपके व्रत से संतुष्ट हूं।

जो आपके मन में है, वह मुझसे मांग लें। सभी जानते हैं कि रावण-वध के लिए ही आपने पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। आप भगवान विष्णु के अंश से प्रकट हुए हैं और लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं। सभी वानर देवताओं के ही अंश हैं, जो युद्ध में आपके सहायक होंगे। इन सबमेंमेरी शक्ति निहित है। आप अवश्य रावण का वध कर सकेंगे। अवतार का प्रयोजन पूर्ण हो जाने के बाद आप अपने परमधाम चले जाएंगे। इस प्रकार श्रीराम के शारदीय नवरात्र-व्रतसे प्रसन्न भगवती उन्हें मनोवांछित वर देकर अंतर्धान हो गई।
-[डा. अतुल टण्डन]
Source: Dainik Jagran


Rajen

 



ॐजयंती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधानमोऽस्तुते॥

देहिसौभाग्यमारोग्यंदेहिमेपरमंसुखम्॥
रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि।