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Nanda Raj Jat Story - नंदा राज जात की कहानी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, April 25, 2008, 03:46:03 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

वसंत पंचमी पर राजजात यात्रा कार्यक्रम की होगी घोषणा
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कर्णप्रयाग: 2012 में हिमालयी महाकुंभ की ऐतिहासिक राजजात का प्रमुख अनुष्ठान दो दिवसीय मनौती महोत्सव वसंत पंचमी के अवसर पर सिद्धपीठ नौटी में होगा, जिसकी तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं।

राजजात महामंत्री भुवन नौटियाल ने बताया कि 7 फरवरी सांय नौटी में मनौती पूजा का विधिवत आगाज कांसुवा गांव के राजकुंवरों की ओर से पवित्र राजछंतौली नंदाधाम नौटी में पहुंचते ही शुरू होगा, जिनका भव्य स्वागत पय्या, नौना, रिठोली, मलेठी, ऐरोली, देवल के ग्रामीण मार्ग में किया जाएगा। अगले दिन पंचमी पर्वपर राजगुरू नौटियाल व विद्वान च्योतिषविदें द्वारा पंचांग गणना व शुभ मर्हूत के अनुसार राजजात यात्रा कार्यक्रम की घोषणा की जायेगी। जबकि इसी दिन राजकुंवर कांसुवा के लिए विदा होंगें और यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले धार्मिक स्थलों शिव मंदिर शैलेश्वर व भैलेश्वर तथा नैणी में स्वागत किया जायेगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए मनौती समिति की ओर से मंदिर एवं धार्मिक स्थलों के सौन्दर्यकरण कर अन्य सुविधायें जुटानी प्रारंभ कर दी है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7273418.html

Devbhoomi,Uttarakhand

नंदादेवी राजजात को पर्यटन सर्किट से जुड़ने पर मिलेगा लाभ
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कर्णप्रयाग: नंदादेवी राजजात समिति ने नंदादेवी राजजात को पर्यटन सर्किट से जोड़ ईको, हैरिटेज व टूरिज्म के क्षेत्र में विकसित करने की स्वीकृति को केन्द्र व राज्य सरकार का सराहनीय कदम बताया।

यात्रा के मुख्य पड़ाव ईडाबधाणी, कोटी, भगोती, कुलसारी, सुतोल, घाट व बधाण की नंदा के मूल स्थान देवराउ़ा को भी इस पर्यटन सर्किट से जोड़ने जाने मांग की गयी है। समिति के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ.राकेश सिंह व महामंत्री भुवन नौटियाल ने कहा कि सर्किट में इन गांवों के जुड़ने के साथ साथ कुमाऊं-अल्मोड़ा से नंदकेशरी व लाता-वांण को भी सर्किट योजना से जुड़कर सूबे पर्यटन के क्षेत्र में सुधार आयेगा, जिससे लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7302341.html

Devbhoomi,Uttarakhand

नंदा देवी जात के आयोजन पर चर्चा
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राज राजेश्वरी नंदा देवी की जात वर्ष 2012 में आयोजित करने को लेकर कुरूड़ के ग्रामीणों की बैठक में निर्णय लिया गया कि बड़ी जात तय समय पर होगी इसके लिए आगामी 6 मार्च को नंदा देवी मंदिर कुरूड़ में सभी क्षेत्रों के लोगों की बैठक बुलाई जाएगी।

विकास खंड घाट के कुरूड़ गांव में हुई बैठक में ग्रामीणों ने राज राजेश्वरी नंदा देवी की जात यात्रा में फैलायी जा रही भ्रम की स्थिति को समाप्त करने के साथ-साथ शासन प्रशासन को भी जानकारी देने के लिए आगामी 6 मार्च को कुरूड़ मंदिर प्रागंण में बैठक बुलाई गई है। स्थानीय कमेटी के अध्यक्ष मंशाराम गौड़ व मुंशी चंद्र गौड़ ने कहा कि 6 मार्च को होने वाली बैठक में 6 विकास खंडों के प्रतिनिधियों 14 सयानों समेत सभी लोगों को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 में ही निर्धारित तिथि पर ही परंपरा के अनुसार देवी की जात यात्रा आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि मलमास के पश्चात नंदा देवी राज राजेश्वरी की डोलियां परंपरा के अनुसार जात यात्रा में जाएंगी। बैठक में ग्राम प्रधान नंदी देवी, केदारदत्त गौड़, रमेश गौड़, राजेश गौड़, भवानी दत्त आदि पुजारियों समेत पूर्व प्रधान योगेश्वर प्रसाद, देवेंद्र गौड़ सहित क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि व ग्रामीण शामिल रहे।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7382447.html

Anil Arya / अनिल आर्य

नंदा देवी राजजात यात्रा 2013 में ही
अमर उजाला ब्यूरो
कर्णप्रयाग। नंदा राजजात यात्रा की तिथि को लेकर चल रहा विवाद शनिवार को हुई नंदा राजजात यात्रा समिति और जिला यात्रा आयोजन समिति की बैठक में समाप्त हो गया। बैठक में दोनों समितियों के सदस्यों ने राजजात यात्रा को 2013 में ही आयोजित करने का निर्णय लिया।
जीएमवीएन में आयोजित बैठक में नंदा राजजात यात्रा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष डा. राकेश कुंवर ने कहा कि वर्ष 2012 में मलमास होने के चलते सभी तीज-त्योहार और पर्व पीछे हैं। नंदा अष्टमी और नवमी का पर्व 23 सितंबर 2012 को पड़ रहा है। जबकि उक्त समय पर 17500 फिट की ऊंचाई पर स्थित ज्यूंरा गली धार पर बर्फ के ग्लेशियरों के बीच यात्रा संपन्न करना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। इसलिए समिति ने 2013 में नंदा देवी राजजात यात्रा को संपन्न कराने का निर्णय लिया है। जिला यात्रा नियोजन समिति के अध्यक्ष सुशील रावत ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि राजजात यात्रा को लेकर गत एक माह से चल रहा विवाद इस बैठक के साथ समाप्त हो गया है।
गौरतलब है कि गत एक माह से घाट के सिद्धपीठ कुरुड़ और कुछ अन्य लोग राजजात यात्रा को 2012 में आयोजित करने की मांग कर रहे थे। जबकि, राजकुंवरों द्वारा यात्रा को 2013 में आयोजित करने की मनौती की गई थी।
http://epaper.amarujala.com//svww_index.php

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नन्दा देवी मेला, अलमोड़ा

यह लेख अल्मोड़ा के मेले  के बारे में है। अन्य प्रयोग हेतु, नन्दा देवी (बहुविकल्पी) देखें।
कुमाऊँ मंड़ल के अतिरिक्त भी नन्दादेवी समूचे गढ़वाल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं। नन्दा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नन्दा भी एक है। नन्दा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नन्दा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नन्दा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है । शक्ति के रुप में नन्दा ही सारे हिमालय में पूजित हैं।

नन्दा के इस शक्ति रुप की पूजा गढ़वाल में करुली, कसोली, नरोना, हिंडोली, तल्ली दसोली, सिमली, तल्ली धूरी, नौटी, चांदपुर, गैड़लोहवा आदि स्थानों में होती है । गढ़वाल में राज जात यात्रा का आयोजन भी नन्दा के सम्मान में होता है ।

कुमाऊँ में अल्मोड़ा, रणचूला, डंगोली, बदियाकोट, सोराग, कर्मी, पौथी, चिल्ठा, सरमूल आदि में नन्दा के मंदिर हैं ।अनेक स्थानों पर नन्दा के सम्मान में मेलों के रुप में समारोह आयोजित होते हैं । नन्दाष्टमी को कोट की माई का मेला और नैतीताल में नन्दादेवी मेला अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण कुछ अलग ही छटा लिये होते हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिकता नन्दादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग है ।

अल्मोड़ा में नन्दादेवी के मेले का इतिहास यद्यपि अधिक ज्ञात नहीं है तथापि माना जाता है कि राजा बाज बहादुर चंद (सन् १६३८-७८) ही नन्दा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाये थे । इस विग्रह को वर्तमान में कचहरी स्थित मल्ला महल में स्थापित किया गया । बाद में कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने नन्दा की प्रतिमा को वर्तमान से दीप चंदेश्वर मंदिर में स्थापित करवाया था ।

अल्मोड़ा शहर सोलहवीं शती के छटे दशक के आसपास चंद राजाओं की राजधानी के रुप में विकसित किया गया था । यह मेला चंद वंश की राज परम्पराओं से सम्बन्ध रखता है तथा लोक जगत के विविध पक्षों से जुड़ने में भी हिस्सेदारी करता है ।

पंचमी तिथि से प्रारम्भ मेले के अवसर पर दो भव्य देवी प्रतिमायें बनायी जाती हैं । पंचमी की रात्रि से ही जागर भी प्रारंभ होती है । यह प्रतिमायें कदली स्तम्भ से निर्मित की जाती हैं । नन्दा की प्रतिमा का स्वरुप उत्तराखंड की सबसे ऊँची चोटी नन्दादेवी के सद्वश बनाया जाता है । स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया गया है कि नन्दा पर्वत के शीर्ष पर नन्दादेवी का वास है । कुछ लोग यह भी मानते हैं कि नन्दादेवी प्रतिमाओं का निर्माण कहीं न कहीं तंत्र जैसी जटिल प्रक्रियाओं से सम्बन्ध रखता है । भगवती नन्दा की पूजा तारा शक्ति के रुप में षोडशोपचार, पूजन, यज्ञ और बलिदान से की जाती है । सम्भवत: यह मातृ-शक्ति के प्रति आभार प्रदर्शन है जिसकी कृपा से राजा बाज बहादुर चंद को युद्ध में विजयी होने का गौरव प्राप्त हुआ । षष्ठी के दिन गोधूली बेला में केले के पोड़ों का चयन विशिष्ट प्रक्रिया और विधि-विधान के साथ किया जाता है ।

षष्ठी के दिन पुजारी गोधूली के समय चन्दन, अक्षत, पूजन का सामान तथा लाल एवं श्वेत वस्र लेकर केले के झुरमुटों के पास जाता है । धूप-दीप जलाकर पूजन के बाद अक्षत मुट्ठी में लेकर कदली स्तम्भ की और फेंके जाते हैं । जो स्तम्भ पहले हिलता है उससे नन्दा बनायी जाती है । जो दूसरा हिलता है उससे सुनन्दा तथा तीसरे से देवी शक्तियों के हाथ पैर बनाये जाते हैं । कुछ विद्धान मानते हैं कि युगल नन्दा प्रतिमायें नील सरस्वती एवं अनिरुद्ध सरस्वती की हैं । पूजन के अवसर पर नन्दा का आह्मवान 'महिषासुर मर्दिनी' के रुप में किया जाता है । सप्तमी के दिन झुंड से स्तम्भों को काटकर लाया जाता है । इसी दिन कदली स्तम्भों की पहले चंदवंशीय कुँवर या उनके प्रतिनिधि पूजन करते है । उसके बाद मंदिर के अन्दर प्रतिमाओं का निर्माण होता है । प्रतिमा निर्माण मध्य रात्रि से पूर्व तक पूरा हो जाता है । मध्य रात्रि में इन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा व तत्सम्बन्धी पूजा सम्पन्न होती है ।

मुख्य मेला अष्टमी को प्रारंभ होता है । इस दिन ब्रह्ममुहूर्त से ही मांगलिक परिधानों में सजी संवरी महिलायें भगवती पूजन के लिए मंदिर में आना प्रारंभ कर देती हैं । दिन भर भगवती पूजन और बलिदान चलते रहते हैं । अष्टमी की रात्रि को परम्परागत चली आ रही मुख्य पूजा चंदवंशीय प्रतिनिधियों द्वारा सम्पन्न कर बलिदान किये जाते हैं । मेले के अन्तिम दिन परम्परागत पूजन के बाद भैंसे की भी बलि दी जाती है । अन्त में डोला उठता है जिसमें दोनों देवी विग्रह रखे जाते हैं । नगर भ्रमण के समय पुराने महल ड्योढ़ी पोखर से भी महिलायें डोले का पूजन करती हैं । अन्त में नगर के समीप स्थित एक कुँड में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है ।

मेले के अवसर पर कुमाऊँ की लोक गाथाओं को लय देकर गाने वाले गायक 'जगरिये' मंदिर में आकर नन्दा की गाथा का गायन करते हैं । मेला तीन दिन या अधिक भी चलता है । इस दौरान लोक गायकों और लोक नर्तको की अनगिनत टोलियाँ नन्दा देवी मंदिर प्राँगन और बाजार में आसन जमा लेती हैं । झोड़े, छपेली, छोलिया जैसे नृत्य हुड़के की थाप पर सम्मोहन की सीमा तक ले जाते हैं । कहा जाता है कि कुमाऊँ की संस्कृति को समझने के लिए नन्दादेवी मेला देखना जरुरी है । मेले का एक अन्य आकर्षण परम्परागत गायकी में प्रश्नोत्तर करने वाले गायक हैं, जिन्हें बैरिये कहते हैं । वे काफी सँख्या में इस मेले में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । अब मेले में सरकारी स्टॉल भी लगने लगे हैं ।

(Source - wikepedia)

Devbhoomi,Uttarakhand

पवित्र ब्रह्मा कमल से हुई मां नंदा की पूजा


मुनस्यारी: सीमांत क्षेत्र के दर्जनों गांवों में आयोजित होने वाली मां नंदा की पूजा अर्चना संपन्न हो गई है। मां नंदा की पूजा सत्रह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हीरामणि कुंड से लाए पवित्र ब्रह्मा कमल से की गई। यहां के कई गांवों में मां नंदा की पूजा की जाती है। इसके लिए दर्जनों ग्रामीण हीरामणि कुंड के बुग्याल क्षेत्र में पाये जाने वाले पवित्र ब्रह्मा कमल लाते हैं। इस वर्ष भी डेढ़ सौ ग्रामीण इस पुष्प को लेने के लिए 35 किमी की पैदल दूरी तय कर बुग्यालों तक गए। अष्टमी की प्रात: से ही श्रद्धालुओं का मंदिर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था।




डांडाधार, होकरा, गिरगांव, समकोट, सैंणराथी, बला, क्वीरीजिमियां, सुरिंग, रांथी आदि गांवों में स्थित नंदा देवी के मंदिरों में मेलों का आयोजन भी हुआ। सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने मां नंदा की पूजा अर्चना की। डांडाधार में सर्वाधिक श्रद्धालु पहुंचे। मौसम साफ रहने से देर शाम तक मेलार्थी देवी मंदिरों में मौजूद रहे। मुनस्यारी के डांडाधार स्थित देवी मंदिर में पर्यटकों ने भी मां नंदा की पूजा अर्चना और मेले का आयोजन देखा।



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