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Mangal Chaupaiyan From Ramcharit Manas - मंगल चौपाइयां (श्री रामचरित मानस से)

Started by हलिया, April 29, 2008, 06:42:37 PM

हलिया

मंगल चौपाइयां

बचपन में, गांव में, हम श्री रामचरित मानस का खूब सस्वर पाठ करते थे।  कुछ चौपाइयां रह रह कर जुबान में आ जाती हैं।  कुछ प्रचलित चौपाइयौं को यहां लिखने का प्रयास करता हूं।  उम्मीद है आप सज्जन भी इसमें भाग अवश्य भागीदारी करेंगे।


मंगल भवन अमंगल हारी ।  द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी॥


मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथ राजू ॥


हरि अनंत हरि कथा अनंता ।  कहहि सुनहि बहु बिधि संता ॥


रामहि केवल प्रेम पियारा ।  जानि लेहु जो जाननि हारा ॥

हलिया

मंगल चौपाइयां



कोमल चित अति दीनदयाला ।  कारन बिनु रघुनाथ कॄपाला ॥



अजर अमर गुननिधि सुत होहू । करहुं बहुत रघुनायक छोहूं ॥



दीन दयाल बिरिदु संभारी ।  हरहु नाथ मम संकट भारी ॥



प्रभु की कॄपा भयहु सब काजू ।  जन्म हमार सुफ़ल भा आजू ॥

पंकज सिंह महर

शिवजी की महिमा का वर्णन किया श्री राम ने

आशुतोष तुम औढ़रदानी, आरती हरहुं दीनु जनु जानी।

पंकज सिंह महर

कीन्हि प्रसन्न जेहि भाँति भवानी, जेहि बिधि शंकर कहा बखानी।


hem

बिनु सतसंग विवेक न होई | राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ||   (बाल कांड)

सीय राममय सब जग जानी |  करऊँ प्रनाम जोरि जुग पानी ||  (बाल कांड)

मंगल भवन अमंगल हारी | उमा सहित जेहि जपत पुरारी ||  (बाल कांड)

महावीर बिनवउ हनुमाना | राम जासु जस आप बखाना || (बल कांड)


hem

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू | राम नाम अवलंबन एकू || (बाल कांड)

समरथ कहुँ नहिं दोष गोसाईं  | रवि पावक सुरसरि की नाईं || (बाल कांड)

गुरु के बचन प्रतीति न जेही | सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही || (बाल कांड)

जो नहिं करइ राम गुन गाना | जीह सो दादुर जीह समाना || (बाल कांड)

रामकथा सुंदर कर तारी | संसय बिहग उडावनिहारी || (बाल कांड ) 

हलिया

मंगल चौपाइयां


जय जय गिरिबर राज किशोरी । जय महेश मुख चंद्र चकोरी ॥


उल्टा नामु जपत जग जाना ।  बालमिकि भए ब्रह्म समाना ॥


उमा कहेहु मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना  ॥



अब मोहि भा भरोस हनुमंता ।  बिनु हरि कॄपा मिलहिं नहि संता ॥


सियाबर रामचन्द्र की जै पद शरणम

Lalit Mohan Pandey

बहुत खूब राजु दा, पहाड़ मैं वैसे भी knowledge वाले पंडीतु का अभाव हो रहा है

hem

हरि अनंत हरि कथा अनंता | कहहिं सुनहिं बहु बिधि सब संता || (बाल काण्ड)

अति प्रचंड रघुपति कै माया | जेहि न मोह अस को जग जाया || (बाल काण्ड)

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा | करहु सो बेगि दास मैं तोरा || (बाल काण्ड)

बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं | गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं || (बाल काण्ड)

जाके हृदयँ भगति जस प्रीती | प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीति || (बाल काण्ड)         

Rajen

धीरज धर्म मित्र अरू नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी ॥