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Rudraprayag: Gateway Of Mahadev - रुद्रप्रयाग: रुद्र (शिव) क्षेत्र का द्वार

Started by पंकज सिंह महर, June 25, 2008, 11:29:15 AM

पंकज सिंह महर

रूद्रप्रयाग उत्तराखण्ड के सर्वाधिक नए जिले रूद्रप्रयाग का मुख्यालय है जो कठोर एवं दुर्गम क्षेत्रों को पार करते हुए केदारनाथ एवं बद्रीनाथ मंदिर की ओर जाते हुए प्राचीन तीर्थयात्रियों के लिये विश्रामस्थल रहा है। अलकनंदा एवं मंदाकिनी का संगम अलंकनंदा नदी पर बसे पवित्र पांच प्रयागों में से एक है। फिर भी यह केवल एक संगम ही नहीं है बल्कि भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का मिलनस्थल भी है क्योंकि मंदाकिनी केदारनाथ पहाड़ से निकलकर भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करती है तों अलकनंदा भगवान विष्णु का। यह एवं कई श्रद्धालु मंदिर रूद्रप्रयाग को पवित्र स्थान बनाते है।

पंकज सिंह महर

हिंदु दर्शन के अनुसार रूद्रप्रयाग पांच धार्मिक क्षेत्रों में से एक माना जाता है। रूद्र क्षेत्र रूद्रप्रयाग से शुरू होता है तथा केदारनाथ एवं बद्रीनाथ इसमें शामिल हैं। रूद्र भगवान शिव का क्षेत्र है। रूद्रप्रयाग को एक पवित्र एवं धार्मिक स्थान इसलिये भी माना जाता है कि बद्रीनाथ पर्वत से उदित अलकनंदा तथा केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी का मिलन यहीं पर होता है।
(रुद्रेश्वर महादेव मंदिर)
कहा जाता है कि आज जहां रूद्रेश्वर मंदिर स्थित है वहीं एक बार नारद मुनि ने भगवान शिव से संगीत का ज्ञानार्जन के लिये प्रार्थना किया। उन्होंने 100 देव वर्षों तक तप किया। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती एवं गणों के साथ नारद मुनि के सामने प्रकट हुए। उन्होंने नारदजी को संगीत का पूर्ण ज्ञान दिया जो सामवेद के रूप में था। माना जाता है कि उस समय संगीत की अन्य अनिवार्यताओं के साथ 36 राग-रागिनियों का जन्म हुआ। जब नारद मुनि ने भगवान शिव से प्रसाद मांगी तो उन्होंने उन्हें (नारद को) महती वीणा दी जो तीनों लोकों में भ्रमण के समय उनके संग की पहचान हुई। नारद मुनि भगवान शिव से एक और वर प्राप्त करने में सफल हुए कि भगवान शिव सपरिवार रूद्रेश्वर में वास करें। भगवान शिव ने इसे मान लिया और तब से ही वे यहां है।

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रूद्रप्रयाग से संबद्ध एक और रहस्य (किंबदन्ती) है। यहां से चार किलोमीटर दूर कोटेश्वर में एक कोटि राक्षसों ने भगवान शिव की आराधना की कि वे उनके बुरे एवं संकटपूर्ण जीवन से मुक्ति प्रदान करें। भगवान शिव ने प्रकट होकर उनकी इच्छा पूरी कर दी। दानवों ने यह भी इच्छा प्रकट किया कि अनंतकाल तक उनका नाम याद किया जाय। भगवान शिव ने कहा कि उस जगह का नाम कोटेश्वर होगा और वे स्वयं वहां वास करेंगे।



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रुद्रप्रयाग संगम पर केदारनाथ से आई हरी मंदाकिनी तथा बद्रीनाथ से आई मटमैली अलकनंदा का जल आपस में  मिलता है और अलकनन्दा नाम से आगे प्रस्थान करती है।

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अलकनंदा नदी पर स्थित पंच प्रयागों के पांच पवित्र संगमों में से एक तथा केदारनाथ एवं बद्रीनाथ के दोनों पवित्र तीर्थों के तीर्थ पथ पर रहने के कारण रूद्रप्रयाग का स्थान सुनिश्चित हो गया है जहां इन पवित्र स्थलों की यात्रा शुरू होने के समय से ही यह साधुओं, संतों, ऋषियों, मुनियों एवं भक्तजनों के लिये महत्त्वपूर्ण विश्रामस्थल रहा है। रूद्रप्रयाग को स्वयं ही एक धार्मिक स्थल माना जाता है तथा सदियों से यहां के मंदाकिनी एवं अलकनंदा नदी के संगम पर स्नान कर प्राचीन रूद्रेश्वर मंदिर में पूजा करना पवित्र अनुभव माना जाता रहा है।

वर्तमान 1000 सदी से वर्ष 1803 तक रूद्रप्रयाग गढ़वाल के शेष भाग की तरह पाल वंश से शासित होता आया है जो बाद में शाह वंश कहलाया। वर्ष 1803 में आये भयानक भूकंप से एक तिहाई आबादी तबाह होने के बाद उसका लाभ उठाकर गोरखों ने गढ़वाल की ओर कूच किया। उस समय वहां के शासक प्रद्युम्न शाह थे तथा वे युद्ध में मारे गये। गोरखों ने गढ़वाल पर कब्जा कर लिया। वर्ष 1815 में प्रद्युम्न शाह के वंशज सुदर्शन शाह ने किसी प्रकार अंग्रेजों की सहायता से अपना राज्य गोरखों से छीन लिया। मार्च 4, 1815 को अंग्रेजों ने रवाईन एवं देहरादून को छोड़कर अलकनंदा नदी के पश्चिम का सारा क्षेत्र सुदर्शन शाह को सौप दिया। उसके बाद उसने टिहरी में अपनी राजधानी बनायी क्योंकि श्रीनगर की भूमि अंग्रेजों के पास चली गयी थी। रूद्रप्रयाग ब्रिटिश गढ़वाल का एक भाग बन गया।

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  अलकनंदा नदी पर स्थित पंच प्रयागों के पांच पवित्र संगमों में से एक तथा केदारनाथ एवं बद्रीनाथ के दोनों पवित्र तीर्थों के तीर्थ पथ पर रहने के कारण रूद्रप्रयाग का स्थान सुनिश्चित हो गया है जहां इन पवित्र स्थलों की यात्रा शुरू होने के समय से ही यह साधुओं, संतों, ऋषियों, मुनियों एवं भक्तजनों के लिये महत्त्वपूर्ण विश्रामस्थल रहा है। रूद्रप्रयाग को स्वयं ही एक धार्मिक स्थल माना जाता है तथा सदियों से यहां के मंदाकिनी एवं अलकनंदा नदी के संगम पर स्नान कर प्राचीन रूद्रेश्वर मंदिर में पूजा करना पवित्र अनुभव माना जाता रहा है।
वर्तमान 1000 सदी से वर्ष 1803 तक रूद्रप्रयाग गढ़वाल के शेष भाग की तरह पाल वंश से शासित होता आया है जो बाद में शाह वंश कहलाया। वर्ष 1803 में आये भयानक भूकंप से एक तिहाई आबादी तबाह होने के बाद उसका लाभ उठाकर गोरखों ने गढ़वाल की ओर कूच किया। उस समय वहां के शासक प्रद्युम्न शाह थे तथा वे युद्ध में मारे गये। गोरखों ने गढ़वाल पर कब्जा कर लिया। वर्ष 1815 में प्रद्युम्न शाह के वंशज सुदर्शन शाह ने किसी प्रकार अंग्रेजों की सहायता से अपना राज्य गोरखों से छीन लिया। मार्च 4, 1815 को अंग्रेजों ने रवाईन एवं देहरादून को छोड़कर अलकनंदा नदी के पश्चिम का सारा क्षेत्र सुदर्शन शाह को सौप दिया। उसके बाद उसने टिहरी में अपनी राजधानी बनायी क्योंकि श्रीनगर की भूमि अंग्रेजों के पास चली गयी थी।

वर्ष 1960 के दशक में पक्की सड़क बनने से पहले रूद्रप्रयाग कठिन चारधाम यात्रा पर निकले हजारों-हजार तीर्थयात्रियों की मेजबानी करता
था। यहां मात्र कुछ दुकानें ही थी तथा तीर्थयात्री मंदिर पर ही विश्राम करते थे। रूद्रेश्वर मंदिर से संबद्ध जाने-माने एवं सम्मानीय विद्वान स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने इस संप्रदाय को कुछ सेवाएं अर्पित की। कहा जाता है कि जब वे पहली बार यहां आये थे तो अंधे थे पर भगवान शिव की आराधना के बाद वे ठीक हो गये। मंदिर के लिये आये चंदे तथा अपने उपदेशों से प्राप्त आय से उन्होंने यहां एक अस्पताल, एक स्कूल तथा एक आश्रम बनवाया जो आज भी मौजूद हैं, पर अब सरकार ने इन्हें अधिगृहीत कर लिया है।

वर्ष 1949 में जब गढ़वाल का विलय भारतीय संघ में हुआ तब रूद्रप्रयाग उत्तरप्रदेश राज्य का एक भाग हुआ। सितंबर 16, 197 को अगस्तमुनि एवं ऊखीमठ ब्लाकों के भाग चमोली के कामप्रयाग एवं पोकरी का एकमात्र टिहरी के जखोली एवं कीर्तिनगर का एकभाग तथा पौड़ी के खिरसू ब्लाक के एक भाग को काटकर रूद्रप्रयाग जिला बनाया गया। इसका जिला मुख्यालय यहीं रूद्रप्रयाग में बनाया गया तथा स्वयं जिला उत्तराखण्ड राज्य का एक भाग हुआ जो वर्ष 2000 में बना।



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इस छोटे शहर रूद्रप्रयाग की संस्कृति का निर्माण इस तथ्य से हुआ है कि यह बद्रीनाथ-केदारनाथ पथ पर एक महत्त्वपूर्ण मिलनस्थल है तथा इसकी इतिहास है। सदियों तक यह इन धार्मिक स्थलों को जानेवाले तीर्थयात्रियों, साधुओं एवं संतों का विश्रामस्थल रहा है। एक पवित्र एवं धार्मिक स्थान तथा पांच संगमों में से एक होने के कारण ऐसे कई लोगों ने यहीं अपना घर बसा लिया। तीर्थयात्रियों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिये भी लोग इस जगह से आकर्षित हुए।

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रूद्रप्रयाग में यात्रियों के लिये बहुत कुछ है। प्रथम और अग्रणी है यहां का संगम जहां आप नदी एवं इसके इर्द-गिर्द पत्थरीले कगारों को देखते हुए घंटो गुजार सकते है। शाम के समय की गंगा आरती दर्शनीय है। यहां कई धार्मिक स्थल हैं खासकर मंदिर जो दर्शनीय होने के साथ ही आपको पुरानी संस्कृति से साक्षात्कार करते हैं।
     रूद्रप्रयाग का प्रमुख बाजार अलकनंदा के किनारे है। संगम पर पहुंचने के लिये यहां पर स्थित सड़क से बाये मुड़कर एक पक्के पुल को पार करना पड़ता है। संगम से आगे सड़क मंदाकिनी तक एक सुरंग द्वारा जाकर केदारनाथ की ओर जाते है तथा बाजार की सड़क से जाते हुए बद्रीनाथ पहुंचते है।

रूद्रप्रयाग एक छोटा शहर है तथा कार्यकलापों का प्रमुख केंद्र खासकर संगम के निकट नगरपालिका द्वारा निर्मित कई स्नान घाट हैं। मौसम के दौरान यहां हजारों-हजार भक्तजन स्नानकर शुद्ध होते हैं तथा शहर के प्राचीन मंदिरों में जाते हैं जो संगम के इर्द-गिर्द ही स्थित हैं। संगम तथा मनइस पर प्रभावी घाटियां जिन्हें नदियों ने बनाया है, शहर में प्रधानता रखती हैं तथा हर जगह आपको कल-कल की ध्वनि सुनाई पड़ती है।

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रूद्रेश्वर महादेव मंदिर


रूद्रेश्वर मंदिर संगम के निकट स्थित है तथा कभी यह बद्रीनाथ तथा केदारनाथ के प्राचीन पथ पर था। इन दो मंदिरों तक जाने से पहले साधुओं और विद्वानों द्वारा इसका इस्तेमाल विश्राम के लिये होता था। वह यही मंदिर था जहां 19वीं सदी के प्रारंभ में जानेमाने एवं सम्माननीय स्वामी सच्चिदानंद जी महारज भी ठहरे थे। कहा जाता है कि जब वे प्रथम बार रूद्रप्रयाग आये थे तो अंधे थे पर भगवान शिव से प्रार्थना करने पर वे पूरी तरह ठीक हो गये। अपने प्रवचनों एवं धार्मिक भाषणों से प्राप्त चंदों से उन्होंने रूद्रप्रयाग में अस्पताल, एक स्कूल तथा एक आश्रम बनवाया जो आज भी मौजूद हैं, यद्यपि अब इन्हें सरकार चलाती है।

कहा जाता है कि आज जहां रूद्रेश्वर मंदिर है, वहां नारद मुनि ने संगीत का ज्ञान प्राप्त करने के लिये भगवान शिव की पूजा की थी। उन्होंने 100 देव वर्षो तक तप किया। उनकी प्रार्थना सफल हुई तथा भगवान शिव अपनी पत्नी एवं गणों के साथ प्रकट हुए। उन्होंने सामवेद के रूप में नारद को संगीत का संपूर्ण ज्ञान दिया। माना जाता है कि संगीत की अन्य विधाओं के साथ उस समय 36 राग-रागिनियों का जन्म हुआ। जब नारद मुनि ने प्रसाद मांगा तो भगवान शिव ने उन्हें महती वीणा प्रदान किया जो तीनों लोकों में भ्रमण करते नारद की पहचान है। नारद मुनि ने भगवान शिव से एक वचन भी प्राप्त किया कि वे सपरिवार रूद्रेश्वर में रहें। भगवान शिव ने इसका पालन किया और जब से ही वे यहां वास करते हैं। मंदिर के अंदर एक प्राचीन शिवलिंग एवं पार्वती की एक छोटी प्रतिमा है। इस मंदिर के महंत गुरू-शिष्य परंपरा का पालन करते हैं।

पंकज सिंह महर

रूद्रप्रयाग का संगम अद्भुत इस माने में है कि इसके चारों ओर दो विशाल पथरीली पहाड़ियां है जो मंदाकिनी एवं अलकनंदा द्वारा निर्मित हैं। एक साथ मिलने से पहले मटमैले अलकनंदा के जल से मंदाकिनी का हरा-गहरा जल अलग दिखाई देता है।

आलंकारिक रूप से यह केवल दो नदियों का मात्र एक संगम ही नहीं है बल्कि यही वह जगह है जहां भगवान शिव एवं भगवान विष्णु मिलते हैं क्योंकि केदारनाथ से आती मंदाकिनी भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करती है तो बद्रीनाथ पर्वत से निकली अलकनंदा भगवान विष्णु घाट पर बैठकर आप घंटों गुजार सकते है या फिर संगम की सीढ़ियों पर जा सकते हैं अन्य जगहों की तरह जल की धारा तीव्र नहीं होती है। प्रवाहित जल की आवाज सुनते हुए सच में आपको शांति मिलती है।