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Uttarakhand Ramleela - उत्तराखंड की रामलीला

Started by मेरा पहाड़ / Mera Pahad, September 17, 2008, 02:50:47 PM

हेम पन्त

गंगोलीहाट(पिथौरागढ़)। महाकाली रामलीला कमेटी द्वारा इस वर्ष रामलीला मंचन को भव्य बनाने के लिये तैयारियां जोरों पर है। चयनित पात्रों को महाकाली रोड स्थित तालीम कक्ष में शंकर सिंह रावल, चन्द्रशेखर पंत, हरीश लाल, श्याम लाल और श्यामाचरण उप्रेती द्वारा तालीम दी जा रही है। कमेटी के अध्यक्ष ललित पाठक ने इच्छुक कलाकारों से तालीम कक्ष में पहुंचने का आह्वान किया है।

हेम पन्त

साउथ दिल्ली में रामलीला का एक दृश्य...


हेम पन्त


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


100 साल पुराना है बागेश्वर की रामलीला का इतिहासSep 20, 11:49 pm



बागेश्वर। विगत 100 साल से नुमाइश मैदान में हो रही रामलीला का गौरवशाली इतिहास रहा है। आजादी की लड़ाई के दौरान कुछ समय के लिए रामलीला मंचन में व्यवधान आया लेकिन आजादी के बाद से लगातार इस परंपरा को नगर के उत्साही युवाओं ने जिंदा रखा है। बागेश्वर की रामलीला आज भी दूर दराज क्षेत्रों तक लोकप्रिय है। रामलीलाओं के मंचन का दौर बागेश्वर में विगत 100 सालों से चला आ रहा है। दीपावली व उत्तरायणी से पूर्व लगने वाले मेले की तरह ही इसे ख्याति मिली थी। दूर दराज से दर्शक कई दिन पूर्व ही बागेश्वर में डेरा डालकर बागेश्वर की रामलीलाओं का इंतजार करते थे। रामलीला कमेटी के निदेशक मंडल के सदस्य शंकर लाल साह बताते है कि रामलीलाओं का तब का दौर बेहद आकर्षक था। लोग साल भर पूर्व से ही रामलीलाओं का बेसब्री से इंतजार करते थे। महिलाओें व पुरुषों की टोलियां दूर दराज से बागेश्वर के नुमाइश मैदान आती थी। उन्होंने बताया कि आजादी की लड़ाई के दौरान कुछ सालों के लिए रामलीला मंचन बाधित हुआ लेकिन वर्ष 1947 के बाद मंचन का दौर फिर शुरू हुआ जो कि युवाओं के समर्पण व उत्साह के कारण आज भी बरकरार है। आजादी के बाद इस परंपरा को नगर के प्रतिष्ठित जगदीश लाल साह, शंकर लाल साह, स्व राम किशन लाल साह, स्व उदय लाल साह, स्व नाथ लाल साह, स्व राम लाल साह आदि ने इस परंपरा को जिंदा रखा। शकर लाल साह बताते हैं कि कई साल बाद दोबारा शुरू हुए रामलीला मंचन को शुरू करना साहस का काम था। सभी संसाधन जुटाने में एक साल लग गया। वर्ष 1947 में पहले साल सिर्फ एक दिन के लिए रामलीला का आयोजन किया गया जिसमें सिर्फ भरत मिलाप के मंचन के बाद अगले साल के लिए विसर्जित कर दिया गया। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष कंचन साह व पूर्व अध्यक्ष दीपक साह गंगोला ने कहा कि हर वर्ष रामलीला को लोकप्रिय बनाने के प्रयास किये जाते है। बागेश्वर की रामलीला आज भी शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद लोकप्रिय है। लेकिन सुरक्षा कारणों से ग्रामीण महिलाएं रामलीला देखने के लिए आने से कतराती है। कमेटी को पुलिस प्रशासन से सामंजस्य बिठाते हुए लोगों को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करना होगा। हाल के वर्षों में कमेटी द्वारा की जा रही व्यवस्था ने दर्शकों को मंच की ओर आकर्षित किया है।


पंकज सिंह महर


Devbhoomi,Uttarakhand


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Bhopal Singh Mehta


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दोस्तो जैसे आप सभी लोगों को पता है की रामलीला और अन्य धार्मिक, सामाजिक नाटक जिनका मंचन हमारे देश, गॉव और शहरौं मैं बहुत प्राचीन समय से होता चला आ रहा है और हम सभी लोग इनका आनंद बड़े चाव से लेते है . हमारे उतराखंड मे राम लीला का एक अलग ही महत्व है और इसकी एक अलग ही पहिचान है. वैसे तो राम लीला का मंचन देश के हर भाग मे होता होगा लेकिन जो राम लीला हमारे गॉव या कहे की उतराखंड मे होती है, उसकी एक अलग ही पहिचान और एक अलग ही स्वाद है. अभी तक आप लोगों ने केवल हिन्दी काब्या और गद्य मे ही राम लीला देखी होगी और सुनी होगी लेकिन क्या कभी आपने अपनी बोली मे राम लीला का स्वाद लिया? हमारे उतराखंड की अपनी बोली मे कभी आपने राम लीला का मंचन होते हुए देखा? जहा तक मे समझता हू किसी ने भी अभी तक अपनी बोली मे इसका स्वाद नही लिया होगा, लेकिन दोस्तो मे अपने को बड़ा भाग्यवान मानता हू की मैंने अपनी बोली मे इसका स्वाद लिया हुआ है और कई बार हम लोग इसका मंचन अपने गॉव मे कर चुके है.

मैं सीधे शब्दों मे आप लोगों से कहना चाहता हू की हमारे गॉव मे एक ऐसा ब्याक्तित्व है जिन्होंने इसके बारे मैं सोचा और इसको अपनी बोली मे लिखने का प्रयास किया और अपने कार्य मे सफल भी हुए. उनका नाम है "श्री सर्वेश्वर दत्त कान्डपाल". उन्होंने लव कुश काण्ड का अपनी बोली मे बड़ा ही सज्जीव और मधुर वर्णन किया है. मुझे पूरा विश्वास है की जब आप लोग एक बार इसको देखेंगे और सुनेंगे तो जरूर आप लोग इसको पसंद करेंगे और तारीफ करेंगे.