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Delicious Recepies Of Uttarakhand - उत्तराखंड के पकवान

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 15, 2007, 09:54:18 AM

Bhishma Kukreti

अमलेट परौंठा।

उषा बिज्लवाण - देहरादून।
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समै- १५ मिनट। सामग्री- अण्डा ३, प्याज १ बड़ू, हरीं मर्च २, लोण स्वादानुसार,अधपकी रोठी २, हरू धणियां थोड़ा सा , मैगी मसाला १ पैकेट, तेल ३ चम्मच।
विधी-
एक डौंगा पर अण्डा तोड़ीक डाल द्या वैम तेल और रोठी छोड़ीक सब सामग्री मिलै द्या खूब फेंटा जबतक झाग न बण जौ तवा गैस मा रखा तेल डाला फैला गरम होण पर आधा फेंट्यूं अंडा डाला थोड़ा पकण पर एक रोठी निकालीक अण्डा ऐंच फैलै द्या अब एक तरफ पकण का बाद दूसरी तरफ पलट द्या थोड़ा तेल डाला रोठी तैं करारा होण तक सेकीक निकाल द्या यनी दूसरी रोठी बणा तैयार छ अमलेट परौंठा
ऑमलेटपरोठा  पकाने की गढवाली विधि , गढवाली रेसिपी – ऑमलेट परोठा

Bhishma Kukreti

वड़ा पाव इतिहास
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सरोज शर्मा ( भोजन इतिहास शोधार्थी)
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वड़ा पाव जतगा सवदि च उतगा जल्दि तैयार भि ह्वै जांद
मुंबई क लोग स्नैक्स क रूप म इस्तेमाल करदिन, उन भि मुंबई की भागदौड भरि जिन्दगी म किफायति स्नैक्स कि भौत जरूरत च, जैथैं लोग काम करदा करदा मजा म खाई सकदीं वै कि कमि वड़ा पाव न पूरी कैर दयाई,
वड़ा पाव कि खोज महाराष्ट्र कि राजनीतिक पार्टी शिवसेना क एक वर्कर न कैर, नाम च अशोक बैध, 1966 मा पार्टी क संस्थापक बालठाकरे न अपणा कार्यकर्ताओ से आग्रह कार कि वु पार्टी क साथ अपण घौर भि चलाण म मदद कारो, ये से प्रेरित ह्वैक अशोक बैध न दादर रेलवे स्टेशन क भैर वड़ा बेचणा कि शुरुआत कौर, पैल सिर्फ बेसण अल्लु से बणयू वड़ा बेचदा छा, फिर कुछ नया करण कि स्वाच पास क दुकान से पाव लीं वै क बीच मा वड़ा धैरिक बेचण शुरू कार, हैर मर्च, नारियल, मूंगफली ,कि तीखि चटणि सर्व कार सबयू थैं स्वाद पसंद ऐ गै मुंबई मा प्रसिद्ध ह्वै गै, अब पूरा देश मा वड़ा पाव कखि भि खै सकदो, उन त वड़ा पाव भारतीय डिश च पर ऐ का द्वी महत्वपूर्ण हिस्सा पाव और अल्लु भारतीय नि छन, यूं थैं पुर्तगाली यूरोप से भारत लेकि अंई, हां बेसण से बणयू वड़ा भारतीय च, 90 क दशक मा मैकडोनाल्ड न वड़ा पाव क टक्कर दीण कि कोशिश कैर पर सफल नि ह्वै सक।


Bhishma Kukreti

आलू , चणा कटोरी चाट

उषा बिज्लवाण देहरादून
समै- २० मिनट।
सामग्री- १/२ कटोरी मैदा, अजवैन एक चुटकी, घी मोइन तैं १/२ चम्मच,हल्दी चुटकी भर , लोण १ चुटकी, आलू १ छोटू उबल्यूं, काला या सफेद चणा २ चम्मच ,दैइ १/२ कटोरी मिठी, कालू लोण १ चुटकी, जीरा पौडर १ चुटकी, इमली की मीठी चटणी १ चम्मच, कार्न फ्लोर तेल तलनक,चाट मसाला।
विधी-
मैदा मा लोण, हल्दी, घी अर कार्न फ्लोर मिलै तैं गूंद ल्या गैस मा कढै रखा तेल गरम करनक रख द्या गूंद्या मैदा की गोली बणैक बेल ल्या अब अपणा पसन्द से कटोरी ल्या और वै पर तेल लगै द्या अब बेलीं रोटी का बीचौं बीच रखीक रोटी वै पर लप्टै द्या अर गुलाबी होण तक तल ल्या एक प्लेट पर निकाला वै का भितर उबल्यां आलू का टुकड़ा और उबल्यां चणा भर द्या अब ऐंच बिटी दैइ फैलै द्या अब ऐंच बिटी इमली की चटणी, कालू लोण , चाट मसाला और जीरा पौडर बुरक द्या तैयार छ आलू ,चणा कटोरी चाट।



Bhishma Kukreti

राइस कुकर कु इतिहास।
Usha Bijlwan
एटोमैटिक राइस कुकर से पैली जू कुकर इस्तेमाल किये जांदू थौ वै पर उतना बढिया भात नि बणदू थौ। १९५० मा जापान इलैक्ट्रोनिक ब्रांड न लगातार बढिय़ा कुकर बणोणा की तरफ प्रयास जारी रखी जै पर भात बढिया से बण जौ।वै टैम पर युद्ध का कारण साधन भो सीमित थान । फिर भी इंजीनियरों और उत्पादक का अथक प्रयास से एटोमिक राइस कुकर सम्भव वै पाइ जैसे जिन्दगी आसान ह्वैगी।आज यू पूरी दुनिया म इस्तेमाल किये जांदू।

Bhishma Kukreti

चा पीणकु इतिहास
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सरोज शर्मा ( भोजन शोधार्थी)
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चा कु इतिहास 750 ईसा पूर्व च, आमतौर पर भारत मा चा उत्तर पूर्वी भागों मा और नीलगिरि कि पहाड़ियों मा उगये जांद भारत दुनिया कु सबसे बडु चा उत्तपादक च, हजारों साल पैल बौद्ध भिक्षुओ न चा कु इस्तेमाल औषधि क प्रयोजन से कार, ऐ क पिछनै दिलचस्प कहानि च भारत मा चा पीणक इतिहास 2000 साल पैल एक भिक्षुक क साथ से शुरू ह्वाई बाद मा ई बौद्ध भिक्षुक बौद्ध धर्म का संस्थापक बणिन, यून सात साल कि नींद त्याग कैरिक जीवन सत्य थैं जाण और बुद्ध कि शिक्षा पर विचार करण कु फैसला कार, चितंन क पांचवा साल मा यूंन कुछ पत्ता चबाण शुरू कर यूं पत्तो न ऊं थैं पुनर्जीवित कैर दयाई और जगणा मा भि सक्षम बणाई, जब ऊं थैं नींद महसूस हूंदी त ई प्रक्रिया दोहरांनदा छाई, इन्नी ऊन सात साल कि तपस्या पूर्ण कैर, ई और कुछ न जंगली चा क पत्ति छै, इनकैकि भारत म चा प्रसिद्ध ह्वै, स्थानीय लोगो न चा पत्ति चबाण शुरू कैर दयाई, भारत मा चा कु उत्पादन ईस्ट इंडिया कंपनी न शुरू कार, 19 वीं सदी क आखिर मा असम मा चा कि खेति कु पदभार संभालण क बाद पैल चा कु बगान भि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी न ही शुरू कैर, 16वीं सदी मा देखे ग्या कि चा कु उपयोग भारत मा लोग सब्जी पकाण म भि कना छाई, उबलीं चा पत्ति से भि पेय तैयार कैरिक इस्तेमाल करण लगयां छा, 1823-1831 मा ईस्ट इंडिया क एक वर्कर राबर्ट ब्रूस और ऊं का भाई न पुष्टि कार कि चा कु पौधा असम क्षेत्र मा हूंद, वै क बाद कोलकत्ता मा भि बाटनिकल गार्डन मा एकु बीज क नमूना भेज, लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी क पास चीन क दगड़ चा कू व्यापार कनकु अधिकार छाई इलै ऊन चा उगाण कि प्रक्रिया इस्तेमाल नि कैर, जब कंपनी न अपण एकाधिकार खवै दयाई तब चार्ल्स ब्रूस न चा कि पैदावार बणाण कि स्वाच, चीन बटिक 80 हजार चा क बीज इकठ्ठा कैरिक बाॅटनिकल गार्डन म लगये ग्या, असम मा भि पेड़ो कि छटैंकटैं कैरिक बागानो थैं तैयार किए ग्या, देशी झाड़ियो कि पत्तियो से कालि चा कु निर्माण क साहस किए ग्या, चीन क द्वी चा निर्माताओ कि भर्ती किये ग्या ऊं कि मदद से तेजी से चा उत्पादन क रहस्यों थैं भि सीख, 19वीं सदी मा एक अंग्रेज न गौर क्याई असम का लोग कालु तरल पदार्थ पिनदिन जु एक जंगलि पौधा से पीसिक बणद, इन कैरिक चा आम आदमियो मा भि प्रचलित ह्वै ग्या, आप लोग हर जगा देख सकदो रेलवे प्लेटफार्म, चा कि दुकानो मा असानी से उपलब्ध च।


Bhishma Kukreti

सांभर कु महाराष्ट्र से लेकि दक्षिण तक कु रोचक सफर
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सरोज शर्मा ( भोजन इतिहास शोधार्थी)
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इडलि डोसा और वड़ा क दगड़ परोसे जाण वल सांभर बेशक दक्षिण भारत कि पैछाण च, सवदि और सेहत मंद हूण क वजह से सबया जगह ऐ कु स्वाद ले सकदां,
लेकिन कम लोग जणदन कि सांभर असल मा महाराष्ट्र कि देन च,
सांभर क महाराष्ट्र से दक्षिण तक कु रोचक सफर
दाल सब्जी से मिलैक बणण वल सांभर मा इमलि स्वाद बणाण कु काम कर द,वन त सांभर क बारा म भौत कहानि छन, जै मा एक च मराठा शासक छत्रपति शिवाजी क पुत्र सांभाजी थैं भूख लगि ऊंक रसोइया वख नि छाई, सांभा जी थै खाण बणाण कु शौक भि छाई त ऊन दाल बणाण क सोचि गलति से वै मा इमली डाल दयाई जैसे वे क स्वाद बड़ ग्या ऐ थैं सांभर नाम दिए ग्या खाण पान का इतिहासकार मणदन कि मराठा काल से पैल सांभर क अस्तित्व नि छाई

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Bhishma Kukreti

बिरयानि कु इतिहास
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सरोज शर्मा (भोजन शोधार्थी)
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पर्शिया से ह्वै कि बिरयानि भारत पौंच, फिर यखखि बस ग्या, जतगा सवदि हूंद उतगा ही इतिहास भि उतगा हि मजेदार च,आज हम निकलला बिरयानि कु ऐतिहासिक सफर मा, जख हम ऐ कु इतिहास क साथ साथ अलग अलग किस्मों क बारमा म भि जणला,
बेगम मुमताज महल से जुडयूं च ऐ क इतिहास,
बड़ा चाव से खयै जांण वलि बिरयानि पर्शिया से सरया दुनियाभर फैल, पर्शियन शब्द बिरियन जैक मतलब बणाण से पैल फ्राइ और बिरिंज यानि कि चौंल से निकल,
भारत मा बोलै जांद मुगल अपण डगढ़ भारत मा लैं, शाही मुगल रसोढ़ मा भि या बेहतर से बेहतर हूंद ग्या, एक कहावत क अनुसार बिरियानि बणाण कु क्रेडिट मुमताज महल थैं जांद, बोले जांद कि एक दा बेगम सैनिक बैरक मा ग्या वीन दयाख सबय सैनिक कमजोर दिखेणा छा, तब बावर्चीयों कु आदेश दयाई कि सैनिको खुण संतुलित आहार वल खाण बणये जा ,बेगम ल बावर्ची थैं आदेश दयाई चौंल और मीट क अहार बणये जा जै से सैनिको कू भरपूर पोषण ह्वा, ऐका बाद कई मसलों केसर मिलै कि बिरयानि कु जन्म ह्वाई, इन भि मनै जांद कि 1398 क आसपास तुर्क मंगोल विजेता तैमूर भारत मा बिरयानि ल्याई, हैदराबाद का निजामु मा या भौत प्रसिद्ध छै ।


Bhishma Kukreti

तांबा भांडा साफ करणै आसान तरीका
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Anita Dhoundiyal Kotdwara
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बा क भांडा हर घर मा हूंदी पर यूं तैं साफ रखण एक चुनौती च
तांबा भांडा साफ करणै आसान तरीका
सामान
निम्बू
लोण
बिमबार
निम्बू तैं काटिकि लोण लगैकि धीरे धीरे तांबा भांडा पर रगड़ा
दाग धब्बा साफ ह्वे जाला
अब तुरंत बिमबारन जन भांडा मजदन उनी मजावा
पाणी साफ छलै द्या


Bhishma Kukreti

फलूदा कु दिलचस्प इतिहास

भोजन इतिहास श्रृंखला-5
सरोज शर्मा ( भोजन इतिहास शोधार्थी )
फलूदा इन मिष्ठान च जु भारत ही न बल्कि दुनिया क कई हिस्सो मा चाव से खयै जांद ऐ क परोसणा क तरीका भि अलग ही हूंद, खासकर भारत और मध्यपूर्व एशिया मा फलूदा भौत प्रसिद्ध च,
फलूदा कि शुरुआत
मने जांद कि फलूदा क उदय पर्शिया म ह्वाई, पर्शिया म ये थैं फलूदेह भि बवलदिन, यि एक पारंपरिक पर्शियन डिश च,विश्व क सबसे पुरण मिष्ठानो म मनै जांद यू, 400 ईसा पूर्व भि यि खयै जांद छाई यू साधारणतया मक्का क आटू से तैयार नूडल्स,गुलाब जल ,चाशनी से तैयार हूंद।
फलूदा कि भारत यात्रा
कुछ इतिहास कारो क बोलण च कि फलूदा मुगल बादशाह जहांगीर क समय मा आई, कुछ क मनण च नादिर शाह क दगड आई, कैक समय मा भि आय हो पर भारत क खाण मा ये ल अपणि पैठ बणयाल फिलीपींस मा हालो-हालो, मारीशस मा आलूदा,फालूदा जनी ही पारम्परिक डिश मिलदन, सिंगापुर म बर्फ नारियल और दूध,तुलसी क बीज स्ट्राबेरी और वेनिला सिरप डालिक बणै जांद, बंग्लादेश म पैडन नामक पौधा क फल सेऔर साबूदाना पिस्ता, आम क्रीम युक्त नारियल, दूध बर्मी सिली से बणयू फलूदा प्रसिद्ध च।


Bhishma Kukreti

खिचड़ी इतिहास का  पन्नो मा
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सरोज शर्मा ( भोजन मूल शोधार्थी)
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चौंल,दाल ,और सब्जियों ल मिलैक बणयै जाण वलि खिचड़ी भारत क हर घौर म काफि प्रसिद्ध च,अधिकांश लोगु थैं कहावत याद ए गै होलि- खिचड़ी क चार यार दही, पापड़, घी ,अचार।
खिचड़ी भारतीय उपमहाद्वीप क एक व्यंजन च जु दाल चौंल मिलैक बणद, लेकिन बाजरा मूंग दाल क खिचड़ी भि बणयै जांद, भारत म बच्चों थै ठोस पदार्थ क रूप म खिचड़ी खिलये जांद, हिंदू उपवास म जु अन्न नि खंदिन वु साबुदाणा कि खिचड़ी खंदिन, खिचड़ी क नाम संस्कृत शब्द खिचचा क नाम से ऐ, जैक मतलब च दाल चौंल क व्यंजन ये क प्रारंभिक उल्लेख वैदिक साहित्य म क्रूसरन्न क रूप म च
खिचड़ि क उल्लेख पुरण लोगु द्वारा भि किए ग्या, सेल्युकस न भारत म अपड़ अभियान क दौरान (305-303 ईसा पूर्व) खिचड़ी क वर्णन कार ,मोरक्को क एक यात्री इब्न बतूता न 1350 क आसपास भारत म प्रवास क समय मा मूंग दाल और चौंल से बणयू व्यंजन क उल्लेख कार, 15 वीं शताब्दी एक रूसी यात्री अफानासी क लेखना मा खिचड़ी क वर्णन मिलद, मुगलो क मन भि खिचड़ि भा ग्या, और मध्यकालीन भारत क शाही भोजन मा महत्वपूर्ण स्थान दिये ग्या, खिचड़ि क प्रति अकबर प्रेम कई ऐतिहासिक संदर्भो मा किए जांद, अबूफजल क ऐन-ए- अकबरी मा शाही रसोई म तैयार खिचड़ि कु वर्णन किए ग्या जै म तेज मसला ,केसर ,सुखयां मेवा वलि विधि शामिल च,खिचड़ि थैं लोकप्रिय बणाण म जहांगीर न महत्वपूर्ण भूमिका निभै,
सीमापार देशो मा भि खिचड़ी काफि प्रसिद्ध च,मिश्र मा राष्ट्रीय भोजन क रूप म खिचड़ी स्वीकार किए ग्या, मिश्र कि खिचड़ी कोषारी या कुशारी नाम से जणे जांद ब्रिटिश कब्जे क मिश्र मा खिचड़ि क प्रवेश ह्वाई पैलि सैनिको फिर नागरिको म विकसित ह्वाई।