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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

अथ 'प्री वेडिंग फोटोग्राफी' संस्कार महिमा
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मूल लिख्वार - छायाचित्रानंद विवाहाचार्य

टीका , अनुवाद - भीष्म कुकरेती चबोड़ाचार्य
 
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प्रथम मूविंग फोटोग्राफीस्य फ़ादरो एडवार्ड मारब्रिज: नम:  . तदुपरांत ग्लोब्लाइजेसन पितामह   नरसिम्हाराव: नमः। तदनुसार ग्लोबल इकॉनोमिस्य पिताः  मनमोहनाय नमः।  अंतमा  फोकटस्य इन्कमाय नमः। 
  जजमान टक  लगैक सूण ल्यावो यु नव संस्कार प्री वेडिंग फोटोग्राफी आधुनिक कालौ इनि  महत्वपूर्ण संस्कार च जन गुप्त कालौ सत्य नारायण व्रत कथा।  विद्वानों म प्री वेडिंग फोटोग्राफी संस्कारै संख्या नंबर पर इनि मतभेद छन जन फिरोज जहांगीर गांदी का पौत्र राहुल गांधी का गोत्र  हेतु  मतभेद छन।   कुछ बिद्वान बुलदन   बल यु हिन्दू संस्कारौ   अड़तालीसवां संस्कार च त  क्वी  मनुस्मृति की कसम खांदन  बल सनातन धर्म शास्त्र अनुसार यु सत्रहवाँ संस्कार च अर विवाह से बि  महत्वपूर्ण संस्कार च बल।  कोर्टसंहिता म बि अब  प्री वेडिंग संस्कार एक गवाही सूत्र च बल। 
     प्री वेडिंग पूजन विधि से पैल कुछ महत्वपूर्ण नाटक आवश्यक छन निथर ये संस्कार को लाभ असम्भव च।
सर्व प्रथम  मैरिज हाल बुकिंग का बाद मैरिज डेट फिक्स हूणो उपरान्त  यु संस्कार आवश्यक च निथर दिब्ता त  ना किन्तु अतिथि देव हंसी उड़ांदन  बल अरे प्री वेडिंग संस्कारै  औकात नि  छे , विवाह पूर्व छायाचित्रांकन की हैसियत नि छे तो किलै ब्यौ बरात सजाई।  अतः गेस्टुं मजाक निवारणार्थ विवाह पूर्व छायाचित्रांकन संस्कार या कर्मकांड अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार च बल।
       विवाह पूर्व छायाचित्रांकन संस्कार सुफल ह्वावो कुण कुछ नाटक स्वांग या सोशल  ड्रामाज  अति आवश्यक छन।
   ब्वे हो या बाब हो दुयुं  तैं अपण भाई बन्धुं , रिस्तेदार , सगा संबंध्यूं  तै छुट दिखाणो , जळाणो  मौका विवाह पूर्व छायाचित्रांकन संस्कार से बड़ो मौका नि ह्वे  सक्दो।
   ब्वे तै  अपण  जिठाण , द्यूराण, कक्या -बड्या सासु या सहेली  (जैं तैं जळाण  हो ) तै  फोन करण  चयेंद बल ये जी या दीदी या सहेली ! ह्यां तू कै प्री वेडिंग फोटोग्राफर तै बि जणदी।  अरे क्या करे जावो कांड लगीं छन ये जमानो पर बल अब प्री वेडिंग फोटोग्राफी आवश्यक जि ह्वे गे।  अर हां  ध्यान रखण बल फोन ऊंकुण इ करण जौं तै जळाण हो नीचा दिखाण हो।  गति मारिक अंठ म धोरी ल्यावो ऊं तैं फोन नि करण जौंक बच्चों ब्यौ म प्री वेडिंग फोटोग्राफी ह्वे  ह्वावो।  तुम तै फोटोग्राफर की जरूरत क्या वो तो नौनु या नौनी अफि इंतजाम कर  लीन्दन।  तुमन तो केवल रिश्तेदारों तै जळाणो बान पूछणो नाटक करण।
   चूँकि फोटोग्राफर तो दूसरों तैं  जळाणो  बहाना हूंद  तो सवाल बि  जळाणो  प्रकार मुताबिक़ ही हूण  चयेंदन  . तीन प्रकार से रिश्तेदारों तै जळये जांद -
कमअसल जळाणो  सवाल   - क्वी प्री वेडिंग फोटोग्राफर बि  च तुमर नजर म सस्तो सुंदर अर टिकाऊ
असल जळाणो सवाल - जरा क्वी प्री वेडिंग फोटोग्राफर तो बथाओ बल ना ना बजट की क्वी चिंता ननी  , ब्योली ममा सरा खर्च उठाणा  छन।
रिस्तेदारुं  तैं  ईर्ष्या से भड़याण वळ सवाल - जरा क्वी प्रोफेसनल फोटोग्राफर बथावदि जो अम्बानी या अडानी का छोरी छोरों प्री वेडिंग फोटोग्राफी म जयुं  हो।

  इनि  बेटा या बेटी को धर्म च बल अपण ऊं हरेक दगड़्या या सहेली तै फोन करण जौं तै नीचा दिखाण या जळाण  हो।  प्रश्न ? प्रश्न सब तैं एकी पुछण बल - जरा प्री वेडिंग फोटोग्राफी वास्ता सही लोकेसन तो बताओ।  आई ऍम गोइंग फॉर प्रीवेडिंग फोटोग्राफी। यु नाटक केवल अपणो तै जळाणो  ध्येय से करण बस ,  निथर  ब्योला ब्योली  त लोकेशन पैली डिसाइड कर लीन्दन कि ना ?   
   फोटोग्राफी म तिलकधार्यूं  कुछ काम नी।  हाँ यदि जजमान लुटाणो तैयार ही  हो तो वै दिन कैमरा पर पिठै सुठै लगाणो पंडित जै सकदन। 
    रिसेप्सन का बगत बि ब्योला अर ब्योली ब्वे बाबुं  महत्ती कर्तव्य च बल जब प्री वेडिंग फोटोग्राफी वाइड   टीवी स्क्रीनम  दिखाए जाय तो ब्योली ब्वे अर  ब्योली बूबा व दूल्हा का फादर व दूल्हा की मदर  तै हरेक पौणम , , मेमानम या गेस्टम जै  जैक बथाण बल दूल्हा दुल्हन फोटोग्राफी बान कै कै जंगळ , कै कै किला म गेन अर कैं कैं नदी या तालाव म नयाणो गेन।  ब्योला अर ब्योली ब्वे बुबौं तै यु  कर्मकांड अवश्य सम्पन  करण चयेंद।  निथर लाख द्वी लाख खर्चा करीक क्या लाभ ? अरे  जब अब शादी कर्मकांड संस्कार पूजन से अधिक दिखावा मात्र रै गे त किलै ना लोगुं तै जळाये जावो बल हमन फोटोग्राफी पर कथगा लाख लगैन भइ।  चूँकि ब्या काज म कर्मकांड अर्थहीन ह्वे जावो तो  रिस्तेदारुं  तैं   जळाण जरूरी ही च इलै यु संस्कार कर्मकांडी नाटक भी अति महत्वपूर्ण कर्मकांड च बंधु व भगनी। 
   
   -
16 /1 2/ 2018, Copyright@ chabodachaarya  Bhishma Kukreti , Mumbai India ,

*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

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Bhishma Kukreti


Bhishma Kukreti

   क्या नेहरु विरासत   धरासायी  की जा रही  है ?
( अति लघु नाटक )

    कृति : भीष्म कुकरेती 'चबोड़ाचार्य '

s =का , को , कु , क
युग -   आठवीं से दसवीं सदी मध्य समय
थान - माणा गाँव मत्थि उड़्यार
-
माणाs व्यास - हैं हैं ! क्या भै कंदूर्या ! सुबेर सुबेर ! बरफ बण्यु पाळु  बि नि  गौळ अर तु  इथैं  ? क्या बौद्ध सेना पैथर तिब्बत से आणि च ?
कंदूर्या - ब्राह्मण श्रेष्ठ ! ये ना ना गुरु श्रेष्ठ ! तुम बामणु बि ना ! पुड़क्या बामण तै बामण बोलि भट्याओ त  तिड़क जांदन बल ब्राह्मण श्रेष्ठ  कौरिs भट्याओ।  अर तुम सरीखों तै ब्राह्मण श्रेष्ठ बोलि भट्याओ तो तुमर चुप्पा क्या जंद्यो पर अग्यो लग जांद बल गुरु श्रेष्ठ ब्वालो।   
माणा s व्यास - नारद को कलजुगी रूप कंदूर्या त्यार हास परिहास को अर्थ च तिब्बत से क्वी भय नी च आज।  बोल क्या समाचार छन जु तू बामण गाँव से बौद्ध गाँव माणा अर फिर इथैं उड़्यार म ऐ ?
कंदूर्या -  कत्यूर गढ़ पांडव स्थल से समाचार छन बल द्वी ब्राह्मण श्रेष्ठ या गुरु श्रेष्ठ बाट लग्यां छन।  अपुस्ट समाचार छन।  इन पता नी बल यी  ब्राह्मण भेष म बौद्ध योद्धा त नीन जु बद्रिकाश्रम तै अशोक स्तम्भ म परिवर्तन हेतु अयाँ होला ।  बात त बल संस्कृत या खस भाषा म करणा छन , कोर कोशिस  कार पर यूं दुयूंन पाली बोली म बात नि कार बल। 
माणाs व्यास - ओहो ओहो क्षमा तात ! मि महाभारत की सम्पूर्णता अर गुप्त सम्राटों सहायता से बेहंत प्रचार  पश्चात  चार सदी उपरान्त श्रीमद भागवत पुराण की सम्पूर्ण हूणै पुळ्याटम त्वै तै बथांद बिसरि गे थौ बल म्यार द्वी प्रिय शिष्य बणेली व्यास याने नयार  -गंगा संगम आश्रम का बणेली व्यास अर हिंवल -गंगा संगम फूल चट्टी  से पल्ली पार गूलर गाड आश्रम का गूलरगाडी व्यास मी तै मिलणो आणा छन। 
कंदूर्या - हाँ तबी बल ऊं म कुछ बोझ बि च बल।
माणाs व्यास - हाँ वत्स ! दुयुंम श्रीमद भागवत का भोज पत्रों म ऊंका रचित स्कन्द छन।
कंदूर्या - स्कन्द ?
माणाs व्यास - पुस्तक या भाग
कंदूर्या - पुस्तक  या भाग ?
माणाs व्यास - हाँ श्रीमद भागवत म कुल 12 स्कन्द छन अर चार स्कन्द  मीन रचिन , चार चार स्कन्द ऊं प्रत्येक व्यासन रचिन।
कंदूर्या - औ त  या बात च।  कथगा शोक होला भगवत पुराण मा ? !
माणाs व्यास  (रोष म ) - बत्स ! आज से कभी भी बगैर श्रीमद लगैक भागवत नि बोली हाँ।  कारण हम सब व्यास श्री विष्णु वाद प्रचारित प्रसारित करण वाळ छां।  तो जब तलक विष्णु विषय से पैल श्री या श्रीमद नि लगल आम मानव ये वाद तै पवित्र नि मानल।  विष्णु वाद तब ही आम मानवों मध्य प्रसारित होलु जब यु पवित्र की गणत म आलू अर यांकुण श्री विष्णु या श्रीमद भागवत पुराण नाम से उच्चारित हूण आवश्य्क च। 
कंदूर्या - औ औ ! बींगी ग्यों।  तभी तुम गुरु श्रेष्ठोंन माणा ग्राम का आस पास पर्वतो नया नया नाम धार श्री नर पर्वत श्रृंखला व श्री नारायण पर्वत श्रृंखला। 
माणाs व्यास - हाँ  अर श्री विष्णु वाद तै संबल दीणो वास्ता कथा बणये गे बल यी नारद  नर रूप म च व श्री कृष्ण  श्री नारायण रूप म छन ।
कंदूर्या - तुम ब्राह्मणों बुद्धि से तो सच्ची भगवान श्री  बि मात खै  जाल  माणा s व्यास श्री !
माणाs व्यास -  बत्स ! यो इ त समस्या च।  तुम कुछ समय बौद्ध भिक्षुऊं मध्य रै तो अभि बि चार्वक  सिद्धांत याने नास्तिकता की गंध बचीं च।  स्वयं कुछ समय उपरान्त श्री विष्णु को अस्तित्व तै मनण लग जैल।
कंदूर्या - गुरु श्रेष्ठ ! जब द्वी व्यास श्री अर ऊंक संग श्रमिक बि छन तो भोजन , सीणो व्यवस्था आदि  ?
माणाs व्यास -   हाँ नारद रूप कंदूर्या ! धन्यवाद।  करतिरी गढ़ राजा म रैबार भिज्यूं   बौद्ध आक्रांताओं से रक्षा वास्ता।  द्वी व्यास कम से कम एक मास तक राल , तो वै अनुसार भोजन व्यवथा।  भोजन बणानो सुमाड़ी का काळा  ब्राह्मणो कुण रैबार भेजी दे।  तदोपरांत एक मास उपरान्त म्यार पुत्र शुकदेव व दुयुं क शुकदेव शुकदेव पुत्र बि आला  वो बि रात दिन ये उड़्यार म इ राला। 
कंदूर्या -  एक शंसय निदान गुरु श्रेष्ठ ?
माणाs व्यास - क्या बत्स ?
कंदूर्या - तुम सब अपर असली नाम समाप्त करीक व्यास धरी लींदा।  इख तलक कि अपण नौनु नाम बि तुमन शुकदेव धरीं  छन किलै ? 
माणाs व्यास -  बत्स ! जो भी पुराण कंठस्थ कारल व रचल वैक नाम व्यास ही  होलु  . ये ही समर्पण से श्री विष्णु वाद प्रसारित होलु।  हम रचनाकारों पहचान जब नि राली तभी तो श्री विष्णु की पहचान बणली।  इनि जो भी भारत भर म श्री विष्णु वाद कु प्रचार प्रसार कारल वै तै शुकदेव बोले जाल।  रचयिता अर प्रचारक  अनाम ही रालो तो ही श्री विष्णु वाद की पकड़ पक्की होली। 
कंदूर्या -  वाह वाह श्री।  समर्पण की जय हो।
माणाs व्यास - श्री विष्णु की जय हो।
कंदूर्या -  तो मि चलदो छौं।  मध्य मध्य म अंतराल पश्चात आणु रौल।
माणाs व्यास -  भलो भलो।  हाँ कुछ भोज पत्रों को प्रबंध कर दे संभवतया श्री मद भागवत म कुछ सुधार की आवश्यकता पड़ जावो।
कंदूर्या -   अवश्य मि नीति ओर जाणु छौं त भोज पत्र बि लै औलु।
  प्रथम अंक समाप्त
  द्वितीय  अंक
थान - माणा ग्राम मथि उड़्यार
समय - कुछ अंतराल पश्चात
माणाs  व्यास मध्य म व समिण  द्वी व्यास बैठ्यां  छन।  तिन्युन समिण  भोजपत्र ग्रंथ छन।  तिन्युं हथ म गरुड़ पंख कलम।  काठक दवात।  आठ तरफ बड़ो माटो द्यू जळणा छन।
माणाs व्यास - तो बंधु ! हम हरेक  कन चार चार स्कंध रचिक  कुल  12 स्कंध रची आलीन। मीन यूँ चार दिवसों म सब श्लोक बाँची ऐन।
गूलर गाडी व्यास -हाँ अर 18000 श्लोक भी सम्पूर्ण ह्वे गेन।
बणेली व्यास - तो उत्स्व मनाये जाय आज।  अर शुकदेवों तैं भट्येक श्रीमद भागवत कु प्रचार कार्य सौंपे जाय।  प्रत्येक शुकदेव स्थान स्थान म जैक श्रीमद भागवत कथाओं प्रवचन  कारल।

माणाs व्यास - बंधु 18000 श्लोक से उत्स्व नि मनाये जै सक्यांद।
द्वी व्यास एक संग - क्या अर्थ  अब जब श्री मद भागवत कथा पुराण सम्पूर्ण ह्वे गे तो उत्स्व किलै ना 
माणा व्यास - बंधुओ ! सर्व तो कुशल च   श्री मद भागवत पुराण मा किन्तु कुछ बात अपूर्ण रै गेन।
द्वी व्यास - अपूर्ण  ? हमन तो एक सम्पूर्ण  वर्ष  विचार कार कि कै विषय अनुसार कु संकंध रचे जाल , कै सन्कध म क्वा क्वा कथा होली अर कैक कथा होली।
गूलरगाडs व्यास - हाँ हमन क्या तुमन बि प्रभु विष्णु तै देव नाम व पहचान म अग्रिम पंक्ति म बिठाणो बान वेद व वेद प्रतीकों तैं नेपथ्य म धकेल।  वेद देव व दिवतौं  तैं द्वितीय  क्या चतुर्थ श्रेणी म धौर फिर किलै श्रीमद भागवत अपूर्ण च ?
बणेली घाटs  व्यास - बंधु गूलरगड्या व्यास सही बुलणा छन , हमन नाम पहचान मनोविज्ञान का सभी नियम पालन करीन  अर  भूतकाल का देव जन वायु , अग्नि , अश्वनी कुमार   देव देवियों ही ना  खस , किरात वीरों तैं बि खल पुरुष या खल महिला सिद्ध करी।  इखम वेदुं क्रमशः यता तै बि संयचित  राख।  अर वेद भावना , वेद सद्भावना तै या वर्तमान प्रसिद्ध देव देवियों तैं नेपथ्य म रखणो ध्येय से ब्रह्मा व सरस्वती सरीखों तै श्री विष्णु का समिण निम्न कोटि का देव देवी सिद्ध कर दे।
   माणाs  व्यास - हाँ नाम व नाम पहचान का मनोवैज्ञानिक नियमों पूरो पालन हम सब व्यासों न कार अर श्रीमद भागवत रचणो म कणाद कृत वैशषिकी को पूरो ख़याल राख व गौतम रचित न्याय दर्शन को भी पूरो ध्यान कार।  इखम तक तो ठीक च किन्तु एक बात फिर बि ध्यान म आण से रै इ गे।
  द्वी - तो कमी  पर प्रकाश डाळो
माणाs व्यास - लक्षणसंनिवेश , छवि , छविकरण  , अथवा लक्षणसंनिपात नियमों से वेद देवाधिदेव तैं श्री विष्णु का समिण  अति निम्न कोटि कु  देव सिद्ध करण आवश्यक छौ।  मि  वेद प्रमुख देव इंद्र की छ्वीं करणु  छौं।
गूलरगाडी व्यास - हाँ सत्य कि लक्षणसंनिवेश , लक्षणसंनिपात अथवा छवि -छविकरण नियमों से तो  वेद प्रमुख देव इंद्र तैं  निम्न से निम् कोटि देव सिद्ध करण  आवश्यक च।  हाँ पर भौत सा स्थानों म इंद्र तैं पद अभिलाषी , देव राज का अभिलाषी , स्वार्थी , इंद्र पद लालची व पद का खातिर निम्न से निम्न स्तर तक जाण वल दिबता सिद्ध हुयुं च श्री मद भागवत म
बणेली घाटs व्यास - श्रीमद भागवत की भौत सी कथाओं म इंद्र खस , किरातों याने राक्षसों से बि निम्न स्तर को कुकर्म करदो तो स्वयं ही इंद्र श्री विष्णु समिण  गौण देव सिद्ध ह्वे जांद।
माणाs  व्यास - संभवतया हम चार्वक गुरु वृहस्पति कु प्रतियोगिता व लक्षणसंनिवेश ,  लक्षणसंनिपात सिद्धांत अर्थात छवि व छविकरण नियमुं  तैं हम बिसर गेवां।
द्वी व्यास - कु सिद्धांत
माणाs  व्यास - चार्वक गुरु वृहस्पति कु सिद्धांत च कि यदि कै नयो नाम तै अति प्रसिद्ध करण तो पुराणों नाम तैं नया नाम से हरवाओ।  हमन श्रीमद भागवत म  कखिम बि श्री विष्णु द्वारा इंद्र तै पराजित नि करवाई। अर पराजित बि जन सेवार्थ  ही हूण चयेंद , अहम , स्वार्थ या पद हेतु पराजित कराण से इंद्र कु महत्व श्री विष्णु समिण निम्न  नि होलु।  जब श्री विष्णु जन सेवार्थ इंद्र तै पराजित कारल तो ही इंद्र निम्न स्तर कु देव माने  जाल।  जन मानस  म इंद्र की छवि कम करवाण आवश्यक च।  लक्षणसंनिवेश सब छवि को ही त खेल च।
बणेली घाट कु व्यास - हूँ ! हूँ !  तथ्यात्क सिद्धांत , सर्व सिद्ध सिद्धांत
गूलर गाडs  व्यास - हूँ ! हूँ ! विचारणीय कथ्य !  पुनः विचार आवश्यक च
बणेली घाट कु  व्यास - कुछ  योग याने जुड़न अति आवश्यक च।  श्री विष्णु  द्वारा इंद्र तै जन सेवार्थ पराजित करण आवश्यक च।
माणाs व्यास - हाँ तो क्या करे जावो ?
बणेली घाट कु  व्यास - इंद्र तै जन विरोधी व विलंच , कामुक संबंधी द्वी लोक कथा प्रचलित तो छैं इ  छन। 
माणाs व्यास - कु कु ?
बणेली व्यास - मध्य देश की लोक कथा कि इंद्र न गौतम मुनि की पत्नी से व्यभिचार हेतु खटकर्म करि छौ। 
गूलर गाडs  व्यास - अति सुंदर , अति सुंदर ! प्रसंसनीय विचार ! व्यभिचार से इंद्र की छवि बहुत ही निम्न स्तर की छवि बण जाली। 
माणा - अर दूसरी लोक कथा ?
बणेली व्यास - मथुरा म प्रसिद्ध लोक कथा जब इंद्र न बृन्दावन वासियों तै तंग करणो बान अति वर्षा करवाई अर श्री विष्णु अवतार श्री कृष्ण न वृन्दावन पर्वत से वृंदावन वासियों रक्षा कार व वृन्दावन वासियों तै सुख दे।
गूलर गाडs व्यास - हर्ष !  हर्ष ! अति हर्ष श्री विष्णु द्वारा इंद्र की जनहित हेतु पराजित करण  यानी छवि सिद्धांत को पूरो अनुसरण।
माणा s  व्यास - हाँ हाँ ! वैशषिकी व गुरु वृहस्पति का छवि सिद्धांत अनुसार  द्वी कथा श्री विष्णु समिण इंद्र तैं म्लेच्छ जन देव सिद्ध करदन।  यूं द्वी कथाओं तै श्रीमद भागवत म योग करण आवश्यक च।  द्वी कथा इथगा  नाटकीय हूण चएंदन कि जन मांस म इंद्र की छवि म्लेछों से बि निम्न स्तर कि बण जाय ।
द्वी व्यास - हाँ हाँ नाटकीयता लाण आवश्यक च।
गूलर गाड कु  व्यास - किन्तु हमन त  18000 श्लोक रची ऐन।
माणाs व्यास - चिंता नि कारो द्वी कथा कम कारो अर श्रीमद भागवत म वृन्दावन प्रकरण व गौतम -अहिल्या प्रकरण जोड़ द्यावो।  हाँ अंत म 18000 श्लोक ही रौण चएंदन। द्वी प्रकरण म इंद्र निम्न स्तर कु सिद्ध हूण चयेंद अर ह्री विष्णु अति उदार , जन हित  कारी व स्त्री कल्याणकारी सिद्ध हूण चएंदन।  श्री राम द्वारा अहिल्या उद्धार व श्री कृष्ण द्वारा वृन्दावन म इंद्र गर्व मर्दन यथेष्ट पर्याप्त ह्वे जाल।
द्वी व्यास - साधु !  साधु ! सर्वोचित ।
माणाs व्यास - तो अब इन कारो बल
द्वी -क्या ?
माणाs व्यास - गूलरगड्या व्यास तुम मध्य देश की लोक कथाओं विशेषज्ञ छंवां त तुम गौतम -अहिल्या -इंद्र प्रकरण रचो।  अर बणेल घाट का व्यास श्री  तुम मथुरा विशेषज्ञ छंवां त तुम वृन्दावन प्रकरण रचो अर ध्यान रहे बल कुल श्लोक 18000 ही रावन अर संग संग इंद्र की छवि म्लेच्छों से बि निम्न बणन चयेंद अर श्रोता क मन म श्री विष्णु की निर्विकार ईश्वर की छवि उतपन्न ही नी हो अपितु सदियों तक सर्वेश्वर छवि ही रावो। कथाओं म नाटकीयता को सम्पूर्ण ध्यान रखण आवश्यक च। 
द्वी - भलो भलो
माणाs  व्यास - लगभग कति दिवसम यी द्वी अध्याय पूर ह्वे जाल ?
गूलरगाडs व्यास - लगभग एक सप्ताह
बणेली व्यास - म्यार अध्याय बि एक सप्ताह।
माणा व्यास - लिपिक गणेश की क्वी आवश्यकता  ?
द्वी - न न बिलकुल ना
माणाs व्यास - साधू साधू ! भोजपत्र , मसि : , मसिकूपी , रिंगाळ लेखनी , लेख मार्जक , कु पूरो प्रबंध च।  मि एक सप्ताह कुण तौळ जोशी आश्रम तक जाणु छौं।  वैष्णवी आचार्य से कुछ कार्य च।  भोजन आदि सब प्रबंध काळा ब्राह्मणों म सौंप्युं च तो क्वी समस्या नि  होली।  करतीपुर का सैनिक तिब्बती बौद्ध आक्रांताओं का ध्यान राखल।  शुभ हो शुभ हो।
द्वी व्यास - तुम्हारी यात्रा शुभ हो
तृतीय अंक
माणा व्यास उड़्यार
तीन व्यास व तीन शुकदेव
कंदूर्या  बि उपस्थित
माणाs व्यास - तो तिनि शुकदेवो ! समय पर पौंची गेंवा हैं ? पथ म क्वी समस्या त नि छे जांक निदान आवश्यक हो
सब शुकदेव - ना ना
माणाs व्यास - तो  तिनि शुकदेवो ! ध्यान लगैक सुणो।  प्रभु श्री विष्णु का आशीर्वाद से श्रीमद भागवत तैयार च।  तुम तै ध्यान से 18000 श्लोकुं तै स्मरण  करण अर सम्पूर्ण भारत भ्रमण पर जाण।  प्रत्येक शुकदेव तै   श्रुति शैली म अन्य शुकदेव तैयार करणन।  प्रत्येक शुकदेव तै ग्राम ग्राम जैक प्रवचन सुणान।  अर प्रवचन से ध्यान दीण कि इंद्र की छवि भूमिगत हो जाय।
सब शुकदेव - तुमारी आज्ञा सविनय पालन होलु।
माणा व्यास - शुभ यात्रा श्री विष्णु की जय हो
सब - जय हो जय हो विजय हो।
माणा व्यास - नारद रूप कंदूर्या ! यूं  सब्युं रक्षा प्रबंध , अर दूरगामी सूचना पौंछाणो प्रबंध कारो।  अब यी सब सम्पूर्ण भारत म श्री मद भागवत की सहायता से श्री विष्णु पंथ का प्रचार कारल।  अपण संसाधनुं पूरो सहायता द्यावो।
कंदूर्या - चिंता नि कारो सम्पूर्ण जम्बूद्वीप म म्यार धर्म सूचना जाळ  च तो जालचक्र का प्रयोग  से सब शुकदेवों की सहायता करुल।
सब - शुभ हो शुभ हो।  श्री विष्णु की कीर्ति उज्वल हो , उज्जवल हो , उज्ज्वल हो।
चतुर्थ अंक
समय 2014 , जुलाई महीना 
स्थान - एक एयर कंडीशंड कॉनफेरेन्स हाल
कम्प्युटरीय बोर्ड पर बैनर पट्टिका च - मीटिंग ऑफ थिंक  टैंक ऑफ इंडियन पीपल्स   पार्टी
मुख्य सलाहकार वक्ता - तो इंडियन पीपल्स  पार्टी का मुख्य थिंकर्स या प्रचारक इन ओल्ड लैंग्वेज , मॉडर्न शुकदेव ! तुमन आबि विष्णु धर्म छवि करण की फिल्म द्याख।  तो बताओ ब्रैंडिंग का हिसाब से कन लग
सब - एक्सेलेंट  एक्सेलेंट ओनली एक्सेलेंट !
सलाहकार - तो अब तुम क्या काम च ?
एक प्रचारक - सबसे प्रथम जवाहर लाल नेहरू की छवि मर्दन आवश्यक च। नेहरू इज्म शुड बि  वाईप्ड  आउट
सलाहकार - वेरी गुड।  इट इज अटमोस्ट फॉर डिग्रेडिंग  नेहरू इज्म।  नेहरूवाद की समाप्ति ही इंडियन पीपल्स पार्टी  की जीत च । टोटल वाइपिंग ऑफ़ नेहरूइज्म इज मस्ट।  साथ साथ एक कार्य हैंक बि अनिवार्य च।
दुसर प्रचारक - यस सर ! मनमोहन इज्म तैं  नेपथ्य म रखण आवश्यक च
सलाहकार - एक्ससीलेंट एक्ससीलेंट ! मनमोहन इज्म पर आधार रखिक अळग चढ़न  आवश्यक च किन्तु दगड़ म मनमोहन इज्म तै नेपथ्य म पौंचाण बि  आवश्यक च।  मनमोहन इज्म की नींव म खड़ ह्वेका नेहरू इज्म का छत्या नास आवश्यक च।  जन वेद आधारित श्रीमद भागवत म वेदो मुख्य  देव इंद्र की तौहीन करे गे उनी मनमोहन इज्म का उदाहरणों से ही नेहरू की  छवि समाप्ति आवश्यक च। समझ म आयी कि ना ?
सब - जी जी नेहरू इज्म की मट्टी पलीत इनि हूण चयेंद जन श्रीमद भागवत मा विष्णु क समिण  इंद्र की मिटटी पलीत करे  गे.अर मनमोहन या नरसिम्हा राव तै नेपथ्य म डाळन  बी अत्त्यावष्यक च।
सलाहकार - वेरी गुड।  अब तुम सब प्रचारक अपण अपण उप प्रचारक तैयार कारो अर मनमोहन इज्म या नरसिम्हा राव इज्म तै नेपथ्य म डाळो अर महत्वपूर्ण च नेहरू छवि समाप्त करण या निम्न स्तर की छवि क्रिएट करण।  प्रत्येक माध्यमों से नेहरू छवि खराब कारो।  ऑल द बेस्ट फॉर डिमिनिशिंग एंड एडल्ट्रिंग नेहरू इमेज !

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती , 2018 bjkukreti@gmail. com ,

** नाटक का पात्र , कथा सर्वथा काल्पनिक छन ।  यदि कखि  समानता हो तो मि उत्तरदायी नि   छौं।

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Bhishma Kukreti


   बन बनिक किस्मौ स्याळि : किसम किसम की सालियां

चबोड्या , चखन्यौर्या , नटखट : भीष्म कुकरेती


s =आधी अ
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उन मि आदतन चुनौती , ललकार , चैलेंज स्वीकार नि करदु बल्कण  मी बि केजरीवालौ श्रेष्ठ च्याला राहुल गांधी तरां चुनौती स्वीकार नि करदु उल्टां हौरुं तै इ जि  चुनौती दीणु रौंद।  झूठ बुलणु हों त फिरोज जहांगीर गांदी का सगा नाती से इ पूछ ल्यावो।  राहुल सरा  दुन्या म मोदी तै दनकाणु रौंद बल जबाब दे जबाब दे पर अफु आज तक जबाब नि दे बल जब फिरोज जहांगीर गांदी छा तो तुमर कुनबा गांधी कन ह्वे भै ? हाँ त मि बुनु छौ बल मि चुनौती दींदु चुनौती स्वीकार नि करदु पण जब चुनौती ख़ास अपणी पर दूssरै स्याळि चुनौती दे द्यावो तो।  दूरै मतलब मेरी वाइफ अर स्याळि बीच छै सात भाई बैणि छन तो स्वयमेव वा दूsssरै  स्याळि  ह्वे कि ना ? तो मेरी अपणी ख़ास दूरै स्याळिन ब्याळी ललकार दे , चुनौती दे दे , चैलेन्ज कर दे जिज्जू जु यदि तुमन पॉउडरौ दूध पियूं च त फेसबुक म बथाओ बल स्याळी  कथगा किस्मौ हूंदन।  मि जनान्युं पर अर अपण भूतपूर्व प्रेमिकाओं पर लिखण से बचणै कोशिस करदु।  पण जब ब्याळि स्याळिन खुलेआम पल्ला पसारिक चैलेंज कर दे तो कु जीजा होलु जु चैलेन्ज नई स्वीकारल भै।  चैलैंज्याण लग जावो तो लोग लुगाई कि बि नि सुणदन बल।  मीन बि चैलैंज्याण , चैलैंज्याण म स्याळियूं किसम खोजी दीनी। 
   सबसे पैल चैलैंज  छे बल कै हिसाब से स्याळइयूं तै विभाजित करे जाव।  सुंदरता हिसाब से स्याळियूं विभाजन कर बि द्यावो तो नरेंद्र सिंह नेगी जी , जीत सिंह नेगी जी अर गिरीश सुन्दरियालौ कवितौं म बनि बनि प्रेमिकाओं समिण म्यार विभाजन क्या टिकद ! तो मीन स्याळियूं विभाजन कार्यकलापों या ब्यौहार से कार।  गद्य म यी सौंग बि च।
पहल करेंदरि , अग्रसक्रिय स्याळि याने प्रोऐक्टिक सीस इन लौ -  जौं तै गाँव क पुरण दिनों ब्यौ अनुभव हो उ इन स्याळियूं बारा म  जणदा इ छन।  यी कै बि जीजा की छेड़खानी या मजाक की प्रतीक्षा नि करदन बल्कणम मजाक मस्करी की शुरुवात जीजाओं से पैल करदन।  तब संचार व्यवस्था नि हूंदी छे तो इन सुंदरियुं ऊर्जा ब्यौ बगत ही भैर आंद छौ।  अब इन प्रोऐक्टिव स्याळी मिलण कठण च किलैकि अब इन ऐक्टिव जीव फेसबुक , व्हट्सप या अन्य सोशल मीडिया म इथगा ऐक्टिव रौंदन कि ब्यौ काज म यूंकि ऐक्टीवपन समाप्त ही रौंद।  सोशल मीडिया यूंकि ऊर्जा खै गे। 
नेत्याणि -इन स्याळि गिरोह बणैक इ मजाक मसखरी म भाग लींदन। 
रिएक्टिव याने प्रतिक्रियावादी स्याळी - उन इन स्याळी बि मजाक , मस्करी अर ब्यौ काजम हूंदा था।  अब बि होला।  इन किस्मौ  स्याळी असलम इनिसिएटिव नि ले सकदन यी जग्वाळम रौंदन बल क्वी जीजा यूंक दगड़ चबोड़ शुरू कारो अर एक दैं मजाक , मसखरी,  चखन्यौ शुरू ह्वावो ना यी चकचुंदरी प्रोऐक्टिवुं बि बौ सिद्ध ह्वै जांदन। 
पैथर बिटेन छुस छुस करंदेरि - यि बस भीड़ म पैथर बिटेन मजाक पसंद करदन।  समिण पर आणम यूंक बौ तै करास लग जांद। इन स्याळी प्रतीकों सम ही बातचीत अधिक करदन। 
नासमज - इन स्याळी ह्वावो या नि ह्वावो कुछ फरक नि पड़द।  यू तै  प्रतीक समज म इ  नि आंदन।  तुम फ्यूंळि नाम ल्यावो तो इ बुलण मिसे जांदन -नरभै फ्यूंळि न चखणम भला न घासौ  कुण  भला।  घुघति बात कारो तो यि कव्वा अर घुघति झगड़ा की छ्वीं से  तुमर मूड खराब कर द्याल।  चिपळ कपाळ , चकोर , चाँद  , फाइव स्टार चॉकलेट क्या युंकुंण सब बोस हूंद।
गौल जन याने सिमसाण स्याळी - इन स्याळियूं तै भौत देर बाद पता चलद बल तुम यूं पर लाइन मारणा छां।  यी राहुल गांधी तरां हूंदन जै तै अब पंदरा साल बाद कुछ कुछ समज आयी बल नेता की क्वी जुम्मेवारी बि हूंद बल।  इन स्याळियूं दगड़ चुहुलबाजी वास्ता वेट ऐंड वाच पॉलिसी ही ठीक हूंदी।
अर्ध्ग्रामेश्वर स्याळी - या जाति प्रवासी गढ़वळियूं म मिलदी।  यदि तुम गढ़वाली जीजा छा अर मजाक करण शुरू करिल्या तो यि अर्ध ग्रामेश्वर्याणि तुम तै निम्न कोटि मनुष्य समजदी या यूंको हिसाब से मजाक मसखरी निम्न स्तर का लोगुं आदत हूंदी।  पर यदि क्वी पंजाबी या यूपी का जीजा मजाक कारो तो यी वीं मजाक तै सभ्य समाज की संस्कृति नाम दे दींदी। 
  उन हौर किस्मौ स्याळी बि पाए जांदन जन कि जिकुड़ेळी , फड़कुळी , कुरस्यळी , भड़कीली , शर्मीली , आदि आदि।  किन्तु आज इथगा इ काफी च।जरा तुम बि बताओ बल हौर कै किस्मौ स्याळी हूंदन ?

भोळ - जब स्याळी नराज हो तो पुळयाणो तरीका ...

 


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2019
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Bhishma Kukreti

  चिर सुंदरी भुंदरा बौ क्यांक बान व्यस्त च ?

  खिचल्यूं द्यूर : भीष्म कुकरेती
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मि - हैलो
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -
मि -हैलो
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - हल्लो
मि -हैलो मि बुलणु छौं
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -पता च।
मि -ये बौ सूण !
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - सुणा !
मि -चलती है क्या खंडाला ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -अपणी फूफू तैं लीजा खंडाला बंडाला
मि - उंह उंह
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - बोल
मि -ये बौ मेरी याद बि आंदी ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ हाँ किलै ना ?
मि -झूठ सफा झूठ
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - त्यारी सौं जब बि म्यार भाई फोन आंद पता नी तेरी याद भौत आंद धौं
मि - ठीक च ठीक फोन धरणु छौं।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -अच्छा अच्छा बोल।  रुसे ना तू त म्यार प्रिय द्युरों मादे एक द्यूर छे।  बोल  बोल। 
मि - अरे फिर झूठ।  मि प्रिय हूंद त फोन नि करदी ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - त्यार सौं जु झूट बुलणु हों धौं।
मि -त फिर फोन फोन किलै ना ? उनी बि अचकाल ह्यूंदम काम कमि रौंद। 
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - हाँ पर मि जरा व्यस्त छौं।
मि - व्यस्त अर माघ अ मैना ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ हाँ मि वेरी वेरी बिजी छौं।
मि - हैं ? क्वी हैंक द्यूर त नि ऐ गे गां मा ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - चल बद्तमीज छ्वारा फोन धौर।  म्यार बारा म इन धारणा ? फोन काटूं क्या ?
मि -ओ सौरी सौरी !
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - सौरी का बच्चा।
मि - अरे पर माघम क्वी जनानी व्यस्त राओ तो ? द्यूर गलत ही  स्वाचल ना ? क्यांक व्यस्त ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - मि बसंत पंचमी तयारी करणु छौं।
मि -हैं ? बसंत पंचमी तयारि ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ बसंत पंचमी तयारी।
मि - पण बसंत पंचमी ले क्या तयारी ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -बिसर गे सैत तू बसंत पंचमी त्यौहार ?
मि -नै नै मैं सौब याद च बसंत पंचमी त्यौहार।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -तो क्या क्या हूंद छौ बसंत पंचमी कुण ?
मि -क्या सुबेर सुबेर रतखुल्यां मा ल्वार बाडा या ल्वारण बोडी हमर पुंगड़ बिटेन स्यूं जलड़ जौ उखाड़ि लांद छा अर हमर हरेक म्वार पर चिपकाइ जांद छा।  सन्नी क म्वारों पर बि जौ हरयळि चिपकै दींद छा।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - फिर ?
मि - फिर क्या ? फिर दुफरा म हम सब बसंती रंग की हुळळि खिल्दा छा।  तब तक स्वाळ पक्वड़ बि बण जांद छा।  जैक इख बरजात ह्वावो उख स्वाळ पक्वड़ बंटद छा। 
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -अर ?
मि -अर क्या स्याम दैं नाच गीत लगांद छा।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - यी त परेशानी च द्यूर जी।
मि -क्यांक परेशानी ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -तुमर ले क्या तुम त मुंबई म मजा करणा छा , क्वी डिल्ली , क्वी  ड्यारा डूण।  परेशानी त हमकुण च।
मि -केकी
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -अरे सबसे बड़ी परेशानी च जौ बूण अर बसंत पंचमी तक बचैक रखण।  क्वी त गाँव म नि रै गे त हरेक मवासक म्वारों कुण इथगा जौ बूण अर बसंत पंचमी तक बचाण।
मि -हाँ स्या  त समस्या बड़ी च।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - वां से बड़ी समस्या च ल्वार बि त परदेस भाजी गेन।  आठ दस गाऊं म एकाद ल्वार रयां छन।  सी बि अब हर्यळी लगाणो तयार  नि छन।  बुल्दन बल संस्कृति बचाणो ठ्यका हमर इ लियुं क्या ?
मि -बात त सही च।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ त हम कुछुन ल्वार ज्योर तै पुळयायी बल जु आठ दस गांवुं म जैक सबि म्वारों पर हर्यळि लगाल ये साल।  आठ दस दिन तो ल्वार ज्योर तै मनाणम लग गेन।
मि - चलो हर्यळ लग गे त बसंती रंग बि लग इ जाल।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - ये साल अब हम सौब फिर से गीत लगौला।
मि -नाच गीत नाटक ?
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ आठ दस गाँव वळ दिन म एक जगा आल अर नाच -गीत नाटक स्वांग लगैक चल जाल। 
मि -भौत सुंदर भौत सुंदर !
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -अरे लोगुं  तै मनांद मनांद मेरी टक  टूटी गे।
मि -वधाई हो वधाई।
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ - अर सूण ये साल आठ दस गाँवम मिळवाक म  मिलिक बच्चों तै सामूहिक पाटी बि दिए जाल
मि -याने सामूहिक सरस्वती पूजा
चिरसुन्दरी भुंदरा बौ -हाँ जु बि नाम दे देली।
मि - ब्वा ये बौ बड़ो काम च यु तो मि त पदम् श्री देलु तुम सब तैं।
भुंदरा बौ - रण दे बिंदी बड़ैं न कौर। फोन रख।   मि जरा जौ दिखणो जाणु छौं।
मि - हर हर हर्यळी जौकी खुद लगीं बौ की
 
सर्वाधिकार भीष्म कुकरेती 2019

Bhishma Kukreti

गंध चिकित्सा से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Aromatherapy for Medical Tourism Development -1
चिकित्सा सेवा निर्यात रणनीति -71

Medical Service Export Strategy - 71

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 254

Medical Tourism development Strategies -254

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 375

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -375



आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती

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मनुष्य विकास के कारण मनुष्य में अन्य जानवरों के गुण पाए जाने से गंध , सुगंध का अति महत्व है।
हमारे पांच इन्द्रियों में सबसे अधिक महत्व गंध का है।  हम जो पढ़ते हैं या देखते हैं वह कुछ दिनों में भूल जाते हैं , जिसे छूते  हैं उसका स्मरण कुछ माह तक होता है जो सुनते हैं कुछ समय तक याद रखा जा सकता है किन्तु जो सूंघते हैं (भोजन स्वाद भी सूंघने से पैदा होता है ) व सबसे अधिक समय तक याद रहता है।  हमारे कम्युनिकेशन में 45 % कार्य सुगंध या गंध का हाथ होता है। हमारी किसी के प्रति चाहत , प्रेम , उदासीनता , घृणा में गंध इन्द्रिय का सर्वाधिक हाथ होता है।
हम अन्य इन्द्रिय प्रबह्व को परिभासित कर सकते हैं किन्तु गंध का विवरण देना नामुमकिन ही सा है।  किड़ाण या खिकराण को परिभाषित करना कठिन है। 
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     गंध पर्यटन का मुख्यांग है
सामन्य पर्यटन में सुगंध या  महत्वपूर्ण स्थान है।  भोजन , बगीचों , नदियों के कीचड़ , नदी किनारे , यात्रा माध्यम जैसे बस , कार , सड़क आदि में जब पर्यटक चलता है तो सबसे अधिक कार्य उसकी घ्राणेन्द्रियां  कार्य करती है और अंत में पर्यटक स्थल या पर्यटन माध्यम (परिहवन ) के प्रति छवि बनाने में सबसे अधिक प्रभावकारी गंध ही होती है क्योंकि गंध ही सबसे अधिक भावनाओं को प्रभावित करती है।  पर्यटन में गंध अपनी भूमिका चुपचाप अदा करती रहती है।  फास्ट फ़ूड के ठेले के आस पास मूत्रालय या शौचालय में दृश्य इंद्री या श्रवण या स्पर्श इंद्री उतना प्रभाव नहीं डालती जितना कि घ्राणेन्द्रिय  प्रभावित करती है।  वेडिंग प्वॉन्टस अच्छा या बुरा आकलन या छवि बनाने में भी गंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।  बहुत साल पहले मेरे व्यापारी मित्र बद्रीनाथ यात्रा पर जाते थे और मंदिर के नीचे मूत्रालय से आती दुर्गंध का ब्यौरा देते नहीं भूलते थे। 
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गंध व गंध निर्माण माध्यम का घाल माल
भारत गंध पर्यटन में विकसित है।  उत्तराखंड में भी गंध पर्यटन विकसित है व उत्तराखंड राज्य ने ऐरोमा पर्यटन को गंभीरता से लिया है।  किन्तु गंध पर्यटन व पुष्प पर्यटन में घालमेल है।  यूरोप में फ़्रांस इत्र /परफ्यूम फैक्ट्रियों के दर्शन को गंध पर्यटन मानता है तो उत्तराखंड बुग्याळों , बगीचों व सुगंध बिखेरने वाले पेड़ पौधों की यात्रा को ऐरोमा टूरिज्म कहता है।  बुल्गारिया गुलाब विक्री को दृश्य व गंध पर्यटन नाम देता है।  बुल्गारिया में गुलाब के बगीचा भ्रमण व गुलाब जल विक्री /खरीदी वास्तव में दृश्य व गंध पर्यटन का मिश्रित रूप है। किन्तु परफ्यूम फैक्ट्री टूर केवल गंध टूर है। 
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         गंध पर्यटन व गंध चिकित्सा पर्यटन एक दूसरे  के पूरक भी हैं
देखा जाय तो गंध पर्यटन वास्तव में सुगंध चिकित्सा को प्रभावित करता है और इन्हे अलग करना काफी कठिन है।
गंध पर्यटन व गंध चिकित्सा पर्यटन दोनों बड़ी तेजी से विकसित हो रहे हैं और उन्नति के पथ पर हैं।
   फूलों की घाटी टूर पुष्प (दृश्य), गंध टूर है किंतु ठंठोली (मल्ला ढांगू ) में  किसी  जुकाम ग्रसित  पर्यटक द्वारा भुने भट्ट , भुने टांटी का भाप लेना वास्तव में गंध चिकित्सा पर्यटन होगा।  जुकाम या नया रोग में बहुत बार वैद्य या पारम्परिक चिकिस्तक किसी पत्ती , जड़ का रस या गंध नाक में चुआता है तो वह गंध या रस चिकित्सा कहलाया जाएगा।  जब यदि कोई प्रवासी ऊमी (कच्चे गेंहू का भूनना ) बुकाने गाँव जाय तो वह भोजन या गंध पर्यटन कहलाया जायेगा किन्तु वही प्रवासी जब  भट्ट , टांटी आदि बीज भाप लेने गाँव जाय तो व गंध चिकित्सा पर्यटन कहलाया जायेगा।  नागपुर में कोई पर्यटक संतरे लेने जाय तो वह फल टूरिज्म हुआ किन्तु जब संतरे के तेल /गंध से रोग निदान हेतु जाय  तो व गंध चिकित्सा पर्यटन कहलाया जायेगा।

होटलों , दुकानों /मॉल्स में  सुगंधित सुगंध छोड़ी जाती   है यह व्यापर का अंग है जिसमे सुगंध ग्राहकों के भावनाओं से लाभ उठाने हेतु किया जाता है।
प्राकृतिक चिकित्सा में कई जड़ी बूटियों का भाप दिया जाता है यह गंध चिकित्सा प्राकृतिक चिकित्सा पर्यटन का अभिन्न अंग है। 
भनग बीजों को ग्राम कर भाप लेना भी गंध चिकित्सा है और यदि प्रोटान होता है तो ऐसे पर्यटन को गंध चिकित्सा पर्यटन नाम दिया जाता है।
भूत भगाने मिर्च को जलाकर रोगी को धुंवा सुंघवाना भी गंध चिकित्सा है इसी तरह कई तरह के धुंवा सुंघवाना भी गंध चिकित्सा के प्रकार हैं । 

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पौड़ी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ;  चमोली गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास  ; नैनीताल कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास  ; टिहरी   गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; चम्पावत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ;  उत्तरकाशी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास;  देहरादून गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; रानीखेत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास; हरिद्वार  गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ; डीडीहाट  कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास ;   नैनीताल  कुमाऊं मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु ऐरोमाथिरैपी विकास :

Bhishma Kukreti

 भुंदरा बौ घर पर हैं  ?

(भुंदरा भाभी जी घर पर छन ?, श्रृंखला -1  )

चबोड़ , चखन्यौ , मसखरी:  भीष्म कुकरेती
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या बात तबाकि ह्वेलि जब मि तै जवानी मतबल समज म नि आंदि छे पर जवानी छैं त छे।  मि बि भुंदरा बौ दिखणो बान भुंदरा बौ ड्यार जिना नजर फिरै इ लींद थौ।
भुंदरा बौ गां म क्या आयी कि गांवक जवान हि ना अदबुडेड़ुं ल्वे उन्द उब हूण लग गे।  भुंदरा बौ नाम सूणी क अदबुडेड़ इ ना कबि कबि मड़घट जाण जोग बुड्या बि पक्यां तिमल फुड़नो रगर्याट करण मिसे जांद छा।  बुड्यों चिपक्यां गल्वड़ पळ पळ करण लग जांद छा।  भुंदरा बौ प्रोग्रेसिव छे , फ्रेंडली छे अर सबसे बड़ी बात बल वा मॉडर्न छे।  आकर्षण की गुंदकी ना आकर्षण की खांडी छे भुंदरा बौ !
हां त भुंदरा बौ क आण से सबसे अधिक परेशान छे किर्तुली बॉडी।  उं ! किर्तुली बॉडी यां भुंदरा बौक सासु क चा पाणी अर तमाकु खर्च जि बढ़ गे छौ।
सरा गाँव म धुप्प अन्ध्यर ह्वावो पर क्वी न क्वी किर्तुली बोडी चौक म पौंछि जावो अर जोर से धै लगावो - बल भाई साब ! क्या बात अबि तक सियां इ छा ?
किर्तुली बोडी अदबिज इ भैर आवो अर पूछ - ये निर्भागी संतू ! कनो तेरी ब्वे नि रै गे जु सुबेर सुबेर शंख बजाणो ऐ गे ?
अब दुधाळ गौड़ लात बि सौण पड़द त भुंदरा बौ दिखणो बिगरौमा  सन्तु इ ना हौर छ्वारा बि किर्तुली बोडी गाळी बुर नि माणदा छा।
संतू क जबाब हूंद थौ - ह्यां मीन समज भाई साब सुबेर सुबेर रतखुलदी  बेड टी पींदा होला तो भाई साबक दगड़ चाय पीणो बिगरौ से सुबेर सुबेर ऐ ग्यों।  भैजी दगड चा पीणो आनंद हि कुछ हौर च।
अब मन मारिक किर्तुली बोडी चा बणाओ , संतू चौकक दीवाल म बैठ्युं रावो अर जबरदस्ती भैजी तैं बेड टी छज्जा म पीण पड़द छे।
चाय खतम हूंद संतू भितर बिटेन इन इन चीज मंगावो कि किर्तुली बोडी अर भैजी ज्यू बोल्याओ बल गाँव हि छोड़ दिए जाव।  असलम संतू तैं कै चीज की जरूरत हूंदी नि छे वो तो यांक जग्वाळ म रौंद छौ बल कनि बि भुंदरा बौ भैर आवो अर भुंदरा बौ क झळकां इ दर्शन ह्वे जाव।  चाय आदि तो बहाना हूंद छौ असली अर एकमेव उद्देश्य तो भुंदरा बौ दर्शन छौ। पर भुंदरा बौक दर्शन नि हूंद था।
जब संतू निरसै अपण सि मुख लेक चल जावो तो भंतू बेड टी पीणो ऐ जावो। भंतू बि निरसैक बिन भुंदरा बौ दर्शन का चल जावो तो घंतू ब्रेक फास्ट को बहाना से ऐ जावो।
ब्रेकफास्ट का बाद गप सप मारणो बाना बणैक छ्वारा ऐ जांद छा।  कुछ तो बिदेशी शराब की बि मांग करदा छा।  इन मा किर्तुली बोडी क गाळी आकाशवाणी तरां बंद नि हूंद छा।
  लंच टैम पर बि छ्वारा आवन  अर भैजी खोज खबर लेकि चल जावन।  भैजी खोज खबर महत्वपूर्ण नि छौ अपितु चिर सुंदरी भुंदरा बौ दर्शन महत्वपूर्ण छौ।
  इनि स्यामक टी टाइम या डिनर टाइम पर बि युवा इ ना बुड्या बि भैजी पूछ ताछ करणो ऐ जांद छा।
भैजी नौकरी पर चल गेन किन्तु भैजी खबरच्यूं आण बंद नि ह्वे।
   एक दिन ब्रेकफास्टक टाइम पर इंदरु आयी अर चौक माँगन इ धै लगाण मिसे गे बल - भाई साब भाई साब ! ब्रेकफास्ट ह्वे गे ?
किर्तुली बोडी भैर आयी खदुळ कुत्ता तरां बुलण लग गे - ये रांडक छ्वारा ! वैदिन त्वी बि  त वै तै छुड़णो धार म तक गे छे अब क्या छे ब्रेकफास्ट की बात पुछणि ?
बिचारो इंदरु अपर सि मुक लेक ऐ गे।
अब युवा वर्ग भाई जी की खोज खबर ना किर्तुली बोडी क खबर लीणो भुंदरा बौक दयार आण लग गे छा।  पर अबि तलक पता नि चौल बल कै कैन भुंदरा बौ द्याख। 
दिखला अगली श्रृंखला माँ भुंदरा बौ को हम सब लोग आप भी !


   Copyright @ Bhishma Kukreti  , January 2019

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Bhishma Kukreti

सुगंध चिकित्सा के  लाभ

Benefits of Aromatherapy

चिकित्सा पर्यटन विकास हेतु गंध चिकित्सा विकास -2
Aromatherapy for Medical Tourism Development -2


उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 255

Medical Tourism development Strategies -255

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 376

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -376



आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती

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सुगंध अथवा गंध चिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा है जिसमे व्यापार में दिन प्रतिदिन विकास हो रहा है और बज़ार भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणी है कि 2025 तक यह व्यापर दुगना हो जायेगा।
  गंध चिकित्सा से निम्न मुख्य लाभ हैं जो पर्यटनगामी हैं -
१- तनाव दूर करने में सहायक - सुगंध में वनस्पति टेल मुख्य कारक है और कई वनस्पति टेल तनाव दूर करने में सफल होते हैं।
२- विषाद , उदासी निवारण  - बहुत से तैल  सुगंध उर्जाकारक होते हैं जो दबाब , विषाद व उदासी दूर करने में लाभकारी होते हैं।
३- कई तैल या सुगंध स्मरण शक्ति वृद्धिकारक हैं और बुढ़ापे में लाभकारी होते हैं डिमेंटिया या अल्जिमेर जैसी बीमारियों को भगाने में कामगार सिद्ध होते हैं।  विद्यार्थियों हेतु भी लाभकारी होते हैं।
४- यौवन भावना जागरण या यौवन अनुभव हेतु गंध शरीर में उत्तेजना या ऊर्जा भरने में  कामयाब नुस्खा है। इसीलिए इत्र तेल फुलेल की इतनी बिक्री होती है 
५- कई तेल व तेल सुगंध घाव भरने व घाव छाप भरने में लाभकारी हैं।
६-सरदर्द व अधकपाळी दूर करने में तेल प्रयोग होते हैं।
७-निद्रा नियंत्रण - कई तेल निद्रा नियंत्रण में लाभकारी होते हैं।
८-कई तेल शरीर की प्रतिरोधक शक्ति वृद्धिकारक हैं
९- कई प्रकार के दर्द भगाने में सहायक
१०- भारतीय आयुर्वेद अनुसार कई तेल या सुगंध पाचन शक्ति वृद्धिकारक होते हैं इसीलिए भारत में प्राचीन काल से ही मसालों के उपयोग पर बल दिया गया है।


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पौड़ी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; उधम सिंह नगर कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ;  चमोली गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ   ; नैनीताल कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ;  रुद्रप्रयाग गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; अल्मोड़ा कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ   ; टिहरी   गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; चम्पावत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ;  उत्तरकाशी गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; पिथौरागढ़ कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ ;  देहरादून गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; रानीखेत कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ ; हरिद्वार  गढ़वाल मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ; डीडीहाट  कुमाऊं  मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  ;   नैनीताल  कुमाऊं मेडिकल टूरिज्म विकास और सुगंध चिकित्सा से लाभ  :

Bhishma Kukreti


Dreadful Conditions of Roads in tehri and Uttarkashi Garhwal

History of King Sudarshan Shah of Tehri Riyasat – 90
History of Tehri Kingdom (Tehri and Uttarkashi Garhwal) from 1815 –1948- 90
  History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) – 1318
  By:  Acharya Bhishma Kukreti (History Student)
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When Sudarshan Shah took charge of regime the rods in Theri and Uttarkashi were in very bad shapes and conditions. The so called highways were not suitable for even goats or sheep. From Dehradun to Mangal ka Than via Mugara and Sahstradhara , in many places, the width of road was one feet only. The valleys were steep and dangerous. The road for from Chimaliganv to  Uttarkashi was so dangerous that travelers could not dare to see left and right. The slate slope roads were  slippery . On those stone slopes, travelers had to walk on bare feet and without shoes. (2)
    The roads around Bhatwari or Yamunotri valleys were in very bad shape (1) . Gorkha never took interest in maintaining those roads (1). It was essential for Sudarshan Shah for repairing those important roads.
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References –
1-Dabral, Shiv Prasad, (1975), Uttarakhand ka Itihas bhag 6, Veer Gatha Press, Garhwal India, page 123
2-Phillimore , Historical records of survey of India Vol.2, page 78
Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, bjukreti@gmail.com
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Bhishma Kukreti


हरिद्वार ,बिजनौर  पर पर्वताकार  पौरव  शासन काल  (647 से 725 लगभग तक )

Rule Period of Paurava of Parvatakar   over  Haridwar and Bijnor 
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास 6

Dark  Age of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur after Harsha Vardhan death -6

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  283                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  283               


                  इतिहास विद्यार्थी :::  भीष्म कुकरेती
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  पौरव शासकों का शासन काल विवेचना -
लिपि अध्ययन के पश्चात् इतिहासकार गुप्ते ने पौरव ताम्रा शासनों का काल छटी सदी  से आठवीं सदी का माना (2 )
तालेश्वर ताम्रपत्रों में पांच शासकों का उल्लेख है जो 725 से 752 ईश्वी तक मन गया है। 
   जाली ताम्रपत्रों  की चर्चा
इतिहासकार गुप्ते ने जाली ताम्र शासन उल्लेख किया और 8 तर्क दिए (2 , 3  )
डा डबराल ने डा गुप्ते के सभी तर्कों को तर्कों से ही पूरी तरह ध्वस्त किया (1 )
साथ में भारत के प्रमुख अभिलेखागार डा डी सी सरकार ने भी गुप्ते को खारिज किया और लिखा कि गुप्ते (तालेश्वर ताम्र शासन के सम्पादक ) के जाली ठहराने के तर्क काफी  और वे तर्क युक्तिपूर्ण भी नहीं हैं कि इन तमरशषनों को जाली ठहराया जा सके (4  )
          नरेशों के नाम (एपिग्राफिया इंडिका जल्द 13 पृष्ठ 113 )
संख्या --------    नरेश नाम --- ---पूर्व नरेश से संबंध----उपाधि
१-   ----------    विष्णु वर्मन I ----------------   --------------------
२-  ---------------वृष वर्मन    -----------
३- ---------अग्नि वर्मन ------------ तत्पुत्र -----------परम भट्टारक महाराजधिराज
४- --------द्युतिवर्मन   -----------तत्पुत्र ---------परम भट्टारक महाराजधिराज
५ -  ----विष्णु वर्मन II  ----------तत्पुत्र ---------परम भट्टारक महाराजधिराज
डबराल ने इंगित किया कि  इन इन पौरव वंशी लेखों में हर्ष या कत्यूरी के  अभिलेखों जैसे  राजमहिषी नाम नहीं दिए गए हैं।   
   
सन्दर्भ :

1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 410 -411
२- एपिग्राफिया इंडिका जिल्द 13 पृष्ठ 109
3 -एपिग्राफिया इंडिका जिल्द 13 पृष्ठ 150
4 -एज ऑफ इम्पीरियल कनौज पृष्ठ 131

Copyright@  Bhishma Kukreti , 2018

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