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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

डुंकुर बडा जी : व्यंग्य कसो पर पैथर बिटेन   
  कुछ व्यक्तियुं चरित्र संस्मरण ,  लड़ी -1 !
   समळौण - भीष्म कुकरेती


   म्यार चबोड़ या व्यंग्य लिखण अचाणचक नि ह्वे।  यांक पैथर मि मणदु म्यार गाउ जसपुर (ढांगू ) कु  कम से कम सौ साल कु  इतिहास त जुम्मेवार छैं इ च।  म्यार चबोड़ म रूचि इनि सुदी त नि आयी भौत सा व्यक्त्युं हथ च।  हमर गाँव म डुंकुर बडा जी अंग्रेजो के जमाने के राजपूत थे जो अंग्रेजों के जमाने के ब्राह्मणु  गांव म जन्मी छा। एकमात्र राजपूत परिवार।  वु जमन जात पात कु छौ त एक राजपूत परिवार तै सौ  बामणु परिवार इ नि सम्भळण छौ बल्कणम पचासेक  शिल्पकार परिवार बि।  डुंकुर बडा जीक कूड़ हमर कूड़क एक पुंगड़ तौळ छौ तो भौत सा माने म हम एकी थोक म इ आइ जांद छा (जात से न ) . म्यार बडा जी आर्य समाजी छा तो हिन्दू पूजन संस्कृति से म्यार जु बि भिड़ंत ह्वे स्यु डुंकुर बडा जिक इख हुयां पूजनों से ही ह्वे।  डुंकुर बडा जी जागरी छा। 
मलेसिया जंग्या , मलेसिया कुर्ता , सुडौल सरैल , थांत जन खुट (कृषि कार्य की निसानी ) आज बि याद च।  मलेसिया सुलार सिरफ ब्यौ काजम या जागरी काम से दुसर गांव जाणम पैरदा छा वो बडा जी।
   बामणु गांवम पांच छै साखी से एक राजपूत परिवार याने सामजस्य आवश्यक रै होलु।  एक परिवार याने कैपर सीधा हमला से बचण।  डुंकुर बडा जी से मीन यी सीख बल सीधा हमला क बजाय अपरोक्ष हमला ज्यादा कामगार हूंद।  म्यार समज आण वल आयु -एज तक डुंकुर बडा जीन एक हास्य -व्यंग्य शैली उपजै ऐली छे अर वा शैली छे चबोड़ , हँसी से कै तै झपोडो , पीटो किन्तु अपरोक्ष रूप से।  या शैली छे डुंकुर बडा जी की।
  जन कि  क्वी नौनु पढ़णो समय खिलणु हो तो डुंकुर बडा जी सीधा नि डांटदा छा बल्कणम बुल्दा छा बल ," ब्यटा ! कतै नि पढ़न , किताब नि खुलण कखि तू पास ह्वे गे अर फोकटम त्यार बुबा  तैं  भिल्ली खर्च जि करण पोड़ल !"
कैक नॉन -नौनी क नाक बगणी हो तो नौनु -नौनी ब्वे कुण सलाह हूंदी छे ," बुबा नि पुंजण नाक।  बिचारा माख कनै पुटुक  भौरल ?"
डुंकुर बडा जी तुलना करणम बि उस्ताद छा।  एक दै लयड़ भदवाड़ , ग्वाठम मीन फ़तेराम जखमोला भैजी , हृदयराम आर्य भैजी अर डुंकुर बडा जी मध्य विचित्र तुलना सूण छौ किन्तु तब मि दस साल से छुटू ही छौ
  इनि भौत सा डायलॉग हूंद छा डुंकुर बडा जी का जो चबोड़ व व्यंग्य का उमदा उदाहरण छया।  काश मि सब याद रखी सकदो !
Copyright @ Bhishma Kukreti , April 2019
     

Bhishma Kukreti

 नेहरू आलोचना पर प्रियंका बाड्रा को उत्तर


विमर्श   : भीष्म कुकरेती


चिर सुंदरी भुंदरा बौ - हैल्लो ! हैल्लो ! भीषम !
मैं - हेलो बौ जी , भाभी जी नमस्कार
भुं. बौ - हैं ये मरतण्या , मरी आवाज में रामारूमी क्यों देवर जी ? क्या देवरानी ने बेलनास्त्र   या  जिह्वास्त्र चला दिया क्या सुबै सुबै ?
मैं - नई बौजी।  मैं  फिरोज जहांगीर गांधी की पोती प्रियंका बाड्रा  के दुःख से अति दुखी हूँ।
भुं. बौ - वोये झूठे ! तू तो आपातकाल से इंदिरा कॉंग्रेस का निप्पत्त विरोधी रहा है और तुझे प्रियंका पर कळकळी , फिरोज पोती पर दया करुणा उमड़ रही है ? ऐसा फरेब क्यों देवर जी ?
मैं - तेरी सौं , सौरी आपकी बहिन की सौं , मुझे मिसेज बाड्रा   पर सच्ची मुच्ची दया आ रही है।  उसका  दुःख सहा नहीं जा रहा।
भुं. बौ - अरे फिरोज पोती ने कर के दिया कह क्या दिया जो तुझ निप्पट इंदिरा कॉंग्रेस विरोधी को किसी कॉंग्रेसी और वह भी फिरोज गाँधी के परिवार सदस्य  पर दया आ रही है ?
मैं - आज उसने अपने भाषण में दुःख जताया बल कॉंग्रेस विरोधी नेहरू जी की आलोचना करते हैं। अपरोक्ष रूप से फिरोज जहांगीर पोती रो रही हैं कि नेहरू विरासत , जवाहर लाल लीगेसी खत्म की जा रही है।
भुं. बौ - मी तईं फिरोज जहांगीर पोती के रोने पर तरस नहीं अपितु उसके भारतीय संस्कृति के बारे में जानकारी न होने पर क्रोध आ रिया है बल।
मैं -हैं प्रिंयंका जैसी भद्र महिला पर क्रोध ?
भुं. बौ - राजनीती में कोई भद्र या अभद्र नहीं होते जनाब।  फिरोज जहांगीर गाँधी पोती ने सम्भवतया  अपने पड़ नाना की पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इण्डिया नहीं बाँची।
मैं -भाभी जी ! प्रियंका के रोदन से नेहरू रचित डिस्कवरी ऑफ इण्डिया का क्या संबंध ?
भुं. बौ - देवर जी ! पूरा संबंध है यदि फिरोज जहांगीर पोती ने अपने पड़ नाना नेहरू जी की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ  इण्डिया बंचि होती ना , तो पता चल जाता कि गैर कॉंग्रेसी नेहरू बिरासत को धूल  में मिला कर सही राजनैतिक कार्य कर रहे हैं।
मैं - क्या बात कर रहीं है बौ जी आप ? क्या भंगुल जमा रही हैं ?
भुं. बौ - अरे जिसे भी भारत के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ है उसे पता है गैर कॉंग्रेसियों को सर्व प्रथम नेहरूवाद को भारत वासियों के दिमाग से उगटाना , निपटाना होगा।  और यह दो हजार साल पहले भी हुआ , सात सौ साल पहले भी हुआ और आज भी हो रहा है और कल भी होता रहेगा।
मैं - दो हजार वर्ष पहले भी नेहरूवाद... 
भुं. बौ - तू भी न पिंडालू , घुँइया खाके बात करता रहता है।
मैं - क्यों ?
भुं. बौ -नेहरूवाद नहीं प् र...
मैं -पर क्या ?
भुं. बौ - देखो देवर जी ! बौद्ध धर्मियों ने जातक कथाएं या बौद्ध साहित्य में बुद्ध को महान दिखने हेतु क्या किया ?
मैं - बौद्ध साहित्य में बुद्ध के सामने सनातन धर्म के मुख्य प्रतीकों को बुद्ध के सामने घुटने टिकाये गए दिखलाया गया
भुं. बौ - बिलकुल सही बुद्ध के सामने ब्राह्मण , राजपूत व धनी बैश्यों को  बुद्ध के सामने बौने दिखाए गए वास्तव में उनकी बेज्जती ही की गयी और इसे कहते हैं ब्राह्मणवादी सनातन धर्म की बिरासत को बुद्ध के सामने समाप्त करना।  और यह साहित्य जनता के बीच प्रचारित भी किया गया , बौद्ध भिक्षुओं द्वारा। 
मैं - हाँ  एक वाद द्वारा दूसरे याने प्राचीन वाद को नष्टीकरण का रकार्य बौद्ध धर्मियों ने किया कि नहीं ?
भुं. बौ - अरे वाह देवर तो भाभी को बिल्कुल समज गे। बधाई।
मैं - चेला आपका
भुं. बौ - फिर  ज़रा याद कर , वैष्णव धर्मी श्रीमद भगवत को इसमें भी तो
मैं -इसमें क्या ?
भुं. बौ -  हैं बिचारा तू वैष्णवी होकर भी नहीं समझा।
मैं -क्या
भुं. बौ - श्रीमद भागवत याने वैष्णव धर्मी पोथी।  इसमें वेदों  के देव राज इंद्र की बेज्जती की गयी और इंद्र से उप्पर विष्णु या विष्णु अवतार को स्थान दिलवाया गया कि नहीं ?
मैं - हाँ हाँ महभारत व तमाम वैष्णवी साहित्य में इंद्र की बेज्जती ऐसी की गयी कि इंद्र के मंदिर ही नहीं निर्मित हुए यहाँ तक कि राजाओं के सिक्कों में इन्द्र को सफाचट गुम कर दिया गया।  यह था वैष्णवी करता धर्ताओं का वेदों के प्रतीकों को ध्वस्त करने की कथा। 
भुं. बौ - ब्वा भई  ब्वा।
मैं -हूँ हूँ
भुं. बौ - फिर इस्लामिक राजा आये तो उन्होंने क्या किया ?
मैं - इस्लामिक राजाओं ने हिन्दू धर्म या सनातन या बौद्ध, जैन  धर्मी प्रतीकों को नस्ट किया व अपने प्रतीकों को आगे लाये।
भुं. बौ - सही वे सही थे क्योंकि शासन में धनद से अधिक प्रतीकों का महत्व होता है।  किसी के भी आस्था प्रतीकों को ध्वस्त कर दो और शासन कर लो यह है शासन की रीति।
मैं - हाँ हाँ
भुं. बौ -अंग्रेजों ने भी भारतीय प्रतीकों की बुनयाद हिलायी और शासन किया कि नहीं ?
मैं -हाँ हमारे प्रतीकों का इतना नष्टीकरण किसी काल में नहीं हुआ अब  भी वर्तमान में  हम अपने प्रतीकों को स्वयं नष्ट करने पर तुले हैं।
भुं. बौ - जरा कार्ल मार्क्स का धर्म संबंधित सिद्धांत तो टटोलो।
मैं -मार्क्स ने कहा था बल धर्म एक अफीमची का नशा है।
भुं. बौ -मार्क्स ने भी धर्म पर आघात किया याने धर्म की बिरासत को मटियामेट करने की चेस्टा की तभी मार्क्स प्रसिद्ध हुआ कि नहीं ?
मैं - हाँ धर्म व कैपिटलिज्म की चूल हिलायीं तो ही मार्क्स प्रसिद्ध हुआ।
भुं. बौ - जरा तमिल नाडु में द्रविड़ दलों का इतिहास टटोलो तो सही ?
मैं - हाँ सभी द्रविड़ दलों ने नेहरू विरासत को समाप्ति पर जोर दिया।
भुं. बौ - और आंध्र में ?
मैं - तेलगु देशम याने नेहरू विरासत को नेपथ्य में धकेलना
भुं. बौ - और मुलायम सिंह , चारा  श्री लालू यादव ने क्या किया ?
मैं - लोहिया काल से ही नेहरू वाद की नींव खपचयी जा रही थी इन यादवों ने आखरी कील ठोकीं नेहरूवाद पर।   इन लोहियावादी  राजनीतिज्ञों ने भी नेहरू विरासत को ध्वस्त करने की पूरी चेस्टा की अब कॉंग्रेस के साथ हैं। ..
भुं बौ -होने को तो अब डीएमके भी फिरोज गाँधी पोते पोतियों के संग है पर एक सत्य है द्रविड़ आंदोलन वास्तव में नेहरू वाद के खिलाफ ही था।  नेहरू के सामने ही चुनौती दी गयी थी। इसी तरह भारत में बामपंथी तो नेहरू वाद क्या मोहन दस करमचंद गाँधी वाद को ही नष्ट करने को संलग्न थे
मैं - हैं गाँधीवाद  की जगह मोहन दस करमचंद गाँधीवाद बोल रही हैं ?
भंु  क्योंकि फिरोज जहांगीर गाँधी के परिवार वास्तव में गाँधी वादी हैं ही नहीं अपितु नेहरूवादी है इसलिए आज से मैं गांधीवाद की जगह सदा मोहन दस करमचंद गाँधीवाद कहूंगी।
मैं - तो ?प्रियंका का रोना गलत है क्या ?
भुंदरा बौ - बिलकुल ! अरे जिस नेहरू खानदान  ने महात्मा गाँधी की बिरासत को ही मिट्टी में मिला दिया हो उसे नेहरू की आलोचकों  की आलोचना का  क्या अधिकार ?  उल्टा नेहरू , फिरोज जहांगीर परिवार को  धिक्कार जिन्होंने  महात्मा गांधीवाद को नेहरूवाद से समाप्त किया
मैं मतलब कॉंग्रेस को हटाना है तो विरोधियों को नेहरू लिगेसी समाप्त करनी ही होगी ?
भुंदरा बौ - द्रविड़ आंदोलन, तेलगु देशम आंदोलन , ,  बामपंथ आंदोलन , जनसंघ आंदोलन , ममता आंदोलन , यादवो द्वारा तथाकथित समाजवादी आंदोलन ,  केजरीवाल आंदोलन , मायावती आंदोलन तो यही शिक्षा दे रहा है कि कॉंग्रेस विरोधियों को कॉंग्रेस की जड़े हिलानी  हैं तो नेहरू की विरासत को जनता के मन से उतारो। 
मैं बिचारि प्रियंका बाड्रा  !
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती 24 अप्रैल 2019
कृपया इस लेख को दलगत राजनीती दृष्टि से न देखकर प्रतीकों का पर्टकों का नष्टीकरण कैसे किया जाता है  दृष्टि से देखें

Bhishma Kukreti

 
सुरजेवाला का खम्बा नोचना,अपना सर फोड़ना और राहुल जी लहूलुहान !
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व्यंग्य - भीष्म कुकरेती
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कैपणि  बोल हैं बल जब असहाय फील करें  तो बिल्लियों को खम्बे को नोचना चाहिए।  आजकल कॉंग्रेस को देखकर एक नई कहावत आ चली है बल  राजनैतिक विरोधी कोई अभिनव काम करे तो  उस माध्यम , उस उद्द्येश्य को ही गाली दो जो माध्यम विरोधी अपना रहा है।
  24 अप्रैल के दिन भारत में पोलटिकल मार्केटिंग में एक बिलकुल नया प्रयोग हुआ कि अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार सारे टीवी चैनल दिखा रहे थे।  मार्केटिंग का प्रोफेसनल होने के नाते मैं तो इस प्रयोग को इक्कीसवीं सदी का विपणन में एक अभिनव प्रयोग ही मानूंगा।  सभी टीवी चैनलों ने इस साक्षात्कार को सारे दिन भर कई बार दिखाया।  इन टीवी चैनलों ने इस साक्षात्कार को इसलिए सरे दिन भर नहीं दिखाया कि यह मोदी जी का या अक्षय कुमार का  इंटरव्यू है बल्कण में टीवी चैनलों को इंटरव्यू  प्रसारण के समय ही पता लग रहा था कि दर्शक चॅनेल से हुक हो गए बंध गए हैं।  यहाँ तक कि हिंदूवादी विचारधारा धुर विरोधी चैनल NDTV को भी इंटरव्यू दिखाना पड़ा व इस इंटरव्यू पर नकारात्मक ही सही बहस तो चलानी ही पड़ी क्योंकि यह इंटरव्यू टीआरपी खिंचाऊ इंटरव्यू जो था , दर्शक पिड़ -पिड़ टीवी चैनल देख रहे थे।
कॉंग्रेस के महान विचारक सुरजेवाला का महान विचार भी दर्शकों को सुनने को मिला बल मोदी अक्षय कुमार से बड़े नाटककार या फेल नेता आदि आदि।  बेचारे  सुरजेवाला ने  गुस्से में , खुन्नसमें , निराशा में  खम्बा इतने जोर से नोचा कि बेचारे राहुल जी क्या प्रियंका ही लहू लहान हो गए।  खम्बा नोचु प्रवक्ता सुरजेवाला ने प्रयोग (नए तरह का इंटरव्यू ) को ही गली दे डाली , प्रयोग की ही ऐसी तैसी कर डाली।  सुरजेवाला को वरोध अवश्य ही करना चाहिए इसमें कोई बेवकूफ पप्पू सप्पू भी प्रश्न नहीं करेगा कि सुरजेवाला बिलाव  खम्बा क्यों नोच रहा है किन्तु सुरजेवाला के शब्द तीखे थे प्रभावशाली न थे कि दर्शक इंटरव्यू से घृणा करते उलटा कॉंग्रेसी दर्शक भी टीवी के पास आ धमके और टीआरपी बढ़वा गए।  बेचारे सुरजेवाला गए थे राहुल जी के लिए पीने के लिए  घी लेने  और मोदी पर इतना गुस्स हुए कि  राहुल जी के लिए मिट्टी तेल ले आये । कॉंग्रेस विरोधी पार्टी है और कॉंग्रेस का काम है भाजपा या मोदी के कमजोर पक्ष पर भयानक से भयानक   आघात करना।  'राफेल घोटाला ' या 'चौकीदार चोर' वास्तव में मार्केटिंग दृष्टि से प्रशंसनीय  आघात है किंतु  आघात हेतु कॉंग्रेस को नए अभिनव प्रयोग करने चाहिए था।  राजनैतिक संचार संवाद में समाचार बनना सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है किन्तु 2019 चुनाव में कोन्ग्रेस ने कोई नया प्रयोग न कर दिखा दिया कि कॉंग्रेस में सोच बुढ़ा गयी है, बृद्ध सोच कॉंग्रेस की कमजोरी बन गयी है ।  कॉंग्रेस को तीर व धनुष भी नए लाने चाहिए थे जैसे नए एग्रेसिव स्पोक्सपर्सन लाये। 
  पोलिटिकल मार्केटिंग में सरकारी दल या बड़ा दल अपने पर ही आघात करता है याने नए नए माध्यम या न्यूज बनता है। अक्षय कुमार पीएम का इंटरव्यू ले रहा है यही बड़ी न्यूज थी। विरोधियों द्वारा  इंटरव्यू बेकार था , इंटरव्यू में भूसा था , बकवास इंटरव्यू या अब मोदी को बादी , बादण , नचनिया  (फिल्म वाले )  का सहारा लेना पड़  रहा है जैसे व्यक्तव्य कुछ नहीं खम्बे नोचकर अपने को ही लहूलुहान करने वाले व्यक्तव्य थे।  पोलिटिकल मार्केटिंग में मोदी तो जीत ही गए ना !
   'अक्षय - मोदी साक्षात्कार' पर विरोधी प्रवक्ता इतने गुस्सिया रहे थे इतना बौरा रहे थे  जैसे कोई इनकी कोई धरोहर भगा कर ले गया हो।  वास्तव में इन विरोधियों का रोष ऐसा ही था जैसे पड़ोसियों की मकई खूब हुयी हो और ये महाराज अपने दादा पड़ दादा को गाली देता हो बल हमारे लिए अच्छे उपजाऊ खेत क्यों नहीं छांटे !   
 
  सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती , 26 अप्रैल 2019
जसपुर ढांगू गढ़वाल से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य , गढ़वाल से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , उत्तराखंड से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , मुंबई से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य ; महाराष्ट्र से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , कोंकण से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य ; गैर हिंदी क्षेत्र से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य
   

Bhishma Kukreti

  प्रियंका बाड्रा का बनारस चुनाव से वापस पैर  खींचने का असली सच्च

चिकोटी , चक्कलस , मसखरी : भीष्म कुकरेती

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भारत का हर  , ननो , छोटा बड़ा अख़बार नबीस , टीवी चैनलों के खुर्दबीनी पत्रकार जोर लगा रहे हैं बल पता चले कि  फिरोज जहांगीर  पौत्री की होने वाली महान नेत्री प्रियंका बाड्रा ने बनारस से मोदी विरुद्ध चुनाव लड़ने से क्यों इंकार किया व किसके कहने पर मिसेज राबर्ट बाड्रा तैयार हुयी और किसकी सलाह पर मिसेज बाड्रा ने लड़ने से पहले ही हथियार छोड़ दिए , बनारस से हार स्वीकार कर ही नहीं ली अपितु अन्य भाजपा विपक्षियों हेतु भी हार के दरवाजे खुलवा दिए।  बहुत से मुंहफट ,मुखर ,  छिछोरे लोग मिसेज प्रियंका को मिसेज खेत छोड़ू बाड्रा कह  रहे हैं।  बहुत से पत्रकार मुंडी खुजा रहे हैं बल वो कौन सी बैठक भयी हुयी होगी फिरोज  जहांगीर परिवार मध्य कि नपी नुपी तेज कुल्हाड़ी को खुंडी , धार कम की गयी।   
  मैंने सोचा और बहुत सोचा बल क्या हुआ होगा कि मिसेज प्रियंका रॉबर्ट को लड़ने से पहले ही हार माननी पड़ी।  मुझे लगता है कि फिरोज जहांगीर गांधी के वारिसों मध्य इस प्रकार वार्तालाप हुआ होगा -
राहुल - मम्मी ! मम्मी ! ओह मादरे !
सोनिया - कारो फ्रिग्लिओ ! डियर सन कुछ तो सुधर जा।   जब भी तुझे निर्णय लेने पड़ते हैं तू चीखने चिल्लाने, किराने  लगता है और कभी क्या हर बार गले पड़  जाता है।
राहुल - कारो मादरे ! क्या करूँ मुझसे निर्णय लिए ही नहीं जाते।
रॉबर्ट बाड्रा - गर्र -गर्र -घर्र
राहुल - मम्मी ! जब भी मैं परेशानी में होता हूँ रौबर्  ट जीजा शेर जैसी आवाज निकालने लगते हैं।
रॉबर्ट बाड्रा - मैं तो जोर जोर की सांस ले रहा हूँ।
प्रियंका बाड्रा - डियर रौबर्  ट ! यह राजस्थान हरियाणा की खाली जमीन नहीं जिसे देख तुम खुसी में गुर्राओ प्लीज।  इट्स वेरी वेरी सीरियस डिसीजन वी हैव  टु टेक।
सोनिया - सि सि ! (यस ) अमे  गंबीर  डिसीजन ले ना ऐ तो रॉबर् ट ! टुम बी गंबीर  ओ जाओ।
रॉबर्ट बाड्रा - बट मॉम  मै तो जस्ट जोर जोर से सांस ले रहा हूँ।
प्रियंका बाड्रा - डियर रॉबर् ट ! सांस लो पर शेर जैसे नहीं लोमड़ी जैसी  सांस लो , शेर की आवाज से भय्या  डर जाते हैं।
प्रियंका - भय्या ! मैं बनारस से चुनाव लड़ूँ कि नहीं ?
राहुल - मम्मी ! मम्मी  मादरे ! दीदी भी।
सोनिया - प्रियंका डोंट पुश हिम हार्ड ऑलरेडी ही इज डुइंग मोर  दैन हिज कैपेबिलिटी।  उसे निर्णय लेने के लिए ऐसे बाध्य मत करो।
प्रियंका बाड्रा - बट मॉम  भय्या के सलाहकारों ने ही सलाह दी बल मैं बात फैलाऊं बल प्रियंका बाड्रा बनारस से चुनाव लड़ेंगी।
सोनिया - मोदी के सामने हार तो निश्चित है।
रॉबर्ट - गर्र गर्र घर्र
प्रियंका - डियर रॉबर् ट ! ये क्या फिर से ?
रॉबर्ट बाड्रा - डियर तुम्हे बलि का बकरा बनाया जा रहा है। गहलोत अंकल व हुड्डा अंकल दोनों कह रहे थे बल बनारस से तुम्हारी हार निश्चित है।
सोनिया - तो अब क्या करें।  अरे डिक्की मतलब दिग विजय जी का फोन। .
सोनिया - हाँ बोलो दिग्गी बाबू ! क्या प्रियंका ही नहीं तुम्हारी भी हार पक्की है , हंड्रेड परसेंट ?
दिग्गी  (फोन पर ) - मैडम महाभारत पुराणों से सीख लेनी चाहिए कि अभिमन्यु को मरवाया जाता है और युधिष्ठिर , अर्जुन , भीम को मारक , मृत्यु दायी चक्रव्यूह से बचाया जाता है। 
सोनिया - तो क्या करें ?सैम पित्रोदा तो सलाह दे रहा है प्रियंका को बनारस से चुनाव लड़ना चाहिए
दिग्गी - किसी ऐरे  गैरे , निट्ठले  को बलि का बकरा बनाइये सेनापति को क्यों बलि का बकरा बना रहे हो।
सोनिया - टीक ऐ  , टीक ऐ।  समज समज गया  मै
सोनिया - हैँ मोती लाल बोरा जी का पोन ? आं  आँ बोरा जी ?
मोती लाल बोरा - मैडम पोपला मुंह छोटी बात ! मैडम मिसेज बाड्रा को कर्ण याने मोदी जी के सामने खुले आम बीच चौक में मत पिटवाईये  मिसेज बाड्रा को घटोतकच्छ मत बनवाइए।
सोनिया - ए क्या ऐ ? दिग्गी बाबू कअ रये ऐं  प्रियंका को अभिमन्यु मत बनाओ और बोरा  जी कअ रये ऐं घटोतकच्छ मत बनाओ। प्रियंका अभिमन्यु , घटोतकच्छ का मीनिंग क्या ऐ ?
प्रियंका बाड्रा - मॉम मुझे भी इतना पता नहीं।  लेट अस आस्क अवर स्प्पोर्टर द्वारिका पीठ के शंकराचार्य जी।
सोनिया - हाँ हाँ ! पोन लगाती ऊं।
सोनिया - ऐलो ऐलो ! शंकराचार्य जी ! ये अभिमन्यु और घटोतकच्छ बला ऐ क्या ? क्या  खिचरोड़ ऐ ये ?
शंकराचार्य - जब किसी बड़े शौर्यवान की किसी शक्ति को समाप्त करवानी हो तो  पुत्रों की बलि चढ़ाई जाती है जैसे महाभारत में सात योद्धाओं की शक्ति डिफ्यूज करने के लिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में भिजवाना , कर्ण की अमोध शक्ति को समाप्त करने घटोतकच्छ का इस्तेमाल , अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र समाप्त करने या शक्ति कम करने के लिए पांडव पुत्रों को मरवाया गया जिससे पांडव ज़िंदा रहें।
सोनिया - मतलब  अभिमन्युओं , घटोतकच्छों की मृत्यु निश्चित होती है ?
शंकराचार्य - बिलकुल इन्हे ही बलि का बकरा बोला  जाता है। जैसे आपके सामने कभी सुषमा स्वराज को उतरा गया था या , राहुल के सामने स्मृति ईरानी को खड़ा किया गया है
सोनिया = ग्रेजी मिले ग्रेजी मिले मतलब थैंक यू संकरा जी।
प्रियंका - यस मॉम ?
सोनिया - नो वे ऐट ऑल।
राहुल - क्या मॉम ?
सोनिया - फिरोज जहांगीर के वारिस बलि के बकरे बनने के लिए पैदा नई ओते। फिरोज जहांगीर के वारिस  जीतने के लिए , राज करने के लिए बर्थ लेते हैं हारने के लिए नईं।  प्रियंका बनारस से चुनाव नहीं लड़ेगी बस।  दिस इज फाइनल डिसीजन।
राहुल - ओह मॉम आइ ऐम रिलैक्स्ड नाऊ ।  थैंक्स यू टुक डिसीजन। 

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती 27 अप्रैल 2019
(यदि किसी  कारण से उपरोक्त बातें सहीं हों तो मुझे नहीं मेरी कल्पना को दोष दीजियेगा )

पश्चिम भारत से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; गैर हिंदी क्षेत्र से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; महाराष्ट्र से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; मुंबई से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; मुंबई से गढ़वाली व्यंग्यकार का हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; मुंबई से उत्तराखंडी व्यंग्यकार का हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ; मुंबई से उत्तर भारतीय व्यंग्यकार का हिंदी राजनैतिक व्यंग्य ;










Bhishma Kukreti

Deen  Dayal Banduni : A Garhwali Poet illustrating multi emotions and multi subjects 

(Chronological History of Garhwali Poetries series -281)

Poetry Historian: Bhishma Kukreti

  Deen Dayal Banduni had been an important signature in Garhwali poetries in Delhi and had been reading Garhwali poetries along with Garhwali poets as Abodh Bandhu Bahguna, Nirmohi , Lalit Keshwan, Raghuvir Singh 'Ayal', Netra Singh Aswal and many more. Born in 1976 in village Bhiansora, Savali Patti of Pauri Garhwal , Uttarakhand , Din Dayal Banduni had been publishing his Garhwali poetries from 1975.
  Din Dayal Banduni published his Garhwali poetries and lyrics in following famous Garhwali poetry collections –
Himala Ku Desh (1975)
Dhai( 1975)
Ghanghtol (1980)
Jankjod (2007)
Kutgali
Hmara Devta
   The poems by Banduni are of various mood and various subjects related to Garhwal . The editorial board of Garh Kesari monthly magazine (February 2019 page 74)  that Din Dayal Banduni talks about the reality ogf rural Garhwal , he emphasises more on self respects and his poems are philosophical , inspirational too.
  His dailects are of South Garhwal or Salan and well understable or near Standard Garhwali.  Attacking on wrongs in society , Banduni does not hesitate using Hindi words in his Garhwali poetries.
   

कवि नाम --  दीन दयाल बंदूणी    (जन्म  1956 , vill.भैसोड़ा , पट्टी साबळी , पौड़ी    गढ़वाल  )
Poetry  by -  Deen Dayal Banduni 
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला - 28 1  )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
   सुख :दुःख
बढ़दा सुख सागर देखी
सोच ले आज मनखी
जतगा जतगा सुख  बढ़द
दुःख तैं गाज  दींद
x xx
सुख की सौ घड़ि   
दुःख की एकी घड़ि
याद दिलांद बड़ी बड़ी 
सुख भुलांद
दुःख बौड़ांद
लगद कौंकाळ घड़ी घड़ी
xxx
सुख कु मोह छोड़ि देली
भारी नि पड़दी दुःख की गाज
ढ़दा सुख सागर देखी
सोच ले आज मनखी
जतगा जतगा सुख  बढ़द
दुःख तैं गाज  दींद
(साभार गढ़ केसरी , मुंबई फरवरी 2019 पृष्ठ 74 )
Copyright@ Bhishma Kukreti , April 2019


Bhishma Kukreti

       
संबंध कारक  (का , कु , की  ) पर स्व .भगवती  प्रसाद नौटियालै सौ सल्ला

s = आधी अ
प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती


(मैं मानकीकरण के माना  क्योंकि  मानना था बल श्रीनगरया गढ़वाली में ही क्या जो इसे मानकीकृत गढ़वाली माना जाय।  आज तक किसी विचारक ने उत्तर नहीं दिया बल लो जी श्रीनगर्या  गढ़वाली का यह चरित्र है और इसलिए श्रीनग र्या को मानकीकृत गढ़वाली मान लिया जाय।  ना ही मानकीकरण के किसी संरहक ने विशुद्ध  श्रीनगर्या  गढ़वाली व्याकरण (जबकि व्याकरण के दोनों संकलनकर्ता  अबोध जी व श्रीमती रजनी ध्यानी कुकरेती दोनों श्रीनगर के लग्गे बग्गे के ही हैं ) या नियम धियम बटाकर्ण मानकीकृत की दिशा में आगे  बढ़े।  यहां  तक कि मेरे मानकीकरण लेखों के विरुद्ध लेख लिखने वाले व मानकीकरण के सबल समर्थक विद्वान् स्व भगवती प्रसाद नौटियाल ने शब्दकोश (संयोजक भगवती प्रसाद नौटियाल सम्पादन डा अचला नंद जखमोला ) में भी कोई ऐसा सशक्त कार्य नहीं  दिखाया जो मानकीकृत गढ़वाली का मार्ग प्रसस्त कर सकता।  मानकीकरण किसी एक विद्वान् के बूते की बात नहीं अपितु सभी के चर्चा से ही संभव है।
इसी क्रम में स्व नौटियाल ने गढ़वाली में संबंध कारक प्रयोग पर चर्चा अवश्य छेड़ी किन्तु फिर यह चर्चा आगे नहीं बढ़ी )
  पत्रिका - चिट्ठी पत्री ( सं -मदन डुकलाण ), अंक जुलाई -दिसंबर 2002 , पृष्ठ 8
पाठक टिप्पणी /तुमारी बात
पाठक /बंचनेर - स्व भगवती प्रसाद नौटियाल
राष्ट्र भाषा का साथ साथ
मैं तैं अपणी  मातृभाषा भी प्यारी छ
   चिट्ठी पत्री का अंक जनवरी मार्च 2002  का अंक मा  'आपै चिट्ठी ' शीर्षक अंतर्गत भाई  राजकुमार कोटनाला विचार जाणी अत्यधिक प्रसन्नता ह्वे।  काफी समय से मैं एक इना विद्वान्ै प्रतीक्षा मा छया जु गढ़वळि भाषा तैं भाषायी संवाद का मानकीकरण का मार्ग तैं प्रशस्त कन्नै दिशा मा अपणो योगदान दे सको।
  भाई राजकुमार जी , मैं आपा विचारों को हृदय से स्वागत कर्दो  पर मिन आज तक कब्बि नि बोले  लेखी कि हम तैं 'क ' वर्गों प्रयोग नि कन्नो चयेंद।  मिन हमेशा ईs बोले /लिखि कि जख तक ह्वै सको हमतैं क ' वर्गा प्रयोग से बचण चयेंद।  आप द्यखणा  ह्वेला कि उपरोक्त चार - पांच पंक्तियों मा मिन कत्ति जगों पर 'क ' वर्गजब प्रयोग कर कि वु लेखन तैं गति देण मा सहायक च पर क्या हम एक अनावश्यक प्रयोग से नि बच सकदा ?
   पृष्ठ नौ पर आपा उपरोक्त विचारों मा ही आप देखी न कि - गढ़वळि -कुमाऊंनी  भाषाओँ का मानक स्वरूप स्थापित करण का वास्ता   ..... ।   ये वाक्य मा क्वी व्यवधान नि पड़नू  च।  इन्नी - श्री नौटियाल का उक्त दिशा निर्देश का स्वागत च।  ये वाक्य  मा बि यदि दिशा निर्देशों स्वागत लिखे जान्दो त क्या वाक्य मा क्वी कमी आणी छै ? इत्यादि।
    मिन कत्ति दा  लेखी बि च कि गढ़वळि भाषै एक विचित्रता या बि च कि लेखन मा शब्दों उच्चारण बि काम कर्द।   अतः लिखादिं दा  हम तै यी बात पर विशेष ध्यान देण चैन्द।  उदाहरणार्थ   -  - अब आप गंगा सिंह चौहान की आवाज मा   गढ़वळि गीत सूणा - ये वाक्य तैं यदि इन लिखे जावा - अब आप गंगा सिंह चौहानै आवाज मा एक गढ़वळि गीत सूणा त क्य व्याकरणै दृष्टि से यु वक्त अर्थ सम्मत नि च ?
( मेरी बात - मैंने उपरोक्त टिप्पणी को आधार बनाकर स्व नौटियाल की कटु व बुरी भाषा में आलोचना भी की थी।  किन्तु वह  विषय अलग था।  हाँ 'क वर्ग के बारे में स्व नौटियाल की बात की चर्चा आगे बढ़नी चाहिए।  )

Bhishma Kukreti

श्री प्रसाद गैरोला की जिकुड़ी जळाणे वालीं गढ़वाली कविताएं

कवि नाम --  श्री प्रसाद गैरोला    )
Poetry  by -  Shri Prasad Gairola
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला - 28 2   )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती

केवल पहाड़
मैत जाणा कु अब
दिनबार नी द्यखण पड़दु।
ब्वारी अफ्फी चल जांद
बरसों  बटि कि अरसौं स्वाद नी  चाखि
ब्वारी लड्डू ल्हेकि ऐ जांद
नया जमाना कु यो छ खोट
क्वी क्वी बणांदु अब रोट
छछीं डो  अर बाड़ी कब बिटि नि खायी
ब्यो म मांगळ कैन नि गायी
नि देखि मिन पैला कु घराट
पाथा का ब्ल्ड ऐ गेनि  बाट
देखणु गै छौ मी अपणो पहाड़
पर अब रैगे वो केवल पहाड़
---
  चिंता
पहाड़ों मा
कूड़ि खंद्वार
देशों मा भाषा
क्य रै जालि भोळ
गढ़वाळी की परिभाषा
(आभार  -चिट्ठी पत्री जुलाई -दिसंबर 2002 , पृष्ठ 25 )

Bhishma Kukreti

 Shri Prasad Gairola: A Garhwali Poet illustrating 180 degree changes in hills of Uttarakhand

(Critical, Chronological History of Modern Garhwali Poetries – 282)
Poetry Historian: Bhishma Kukreti
  Shri Prasad Gairola published a couple of poems in Chitthi Patri . Till date this author could not get his contact number for getting about his personal details.
   By studying his tow following poems it is clear that Shri Prasad Gairola illustrates the changes happening in hills of Uttarakhand. Gairola is mostly worried for changes in culture and new culture is finishing hundred years of old customs as food habits, social relationship between two generations, even weighing style is changing.
  Shri Prasad Gairola is worried too for the Garhwali language as Garhwalis are leaving speaking their own languages .


कवि नाम --  श्री प्रसाद गैरोला    )
Poetry  by -  Shri Prasad Gairola
s = आधी अ

केवल पहाड़
-
मैत जाणा कु अब
दिनबार नी द्यखण पड़दु।
ब्वारी अफ्फी चल जांद
बरसों  बटि कि अरसौं स्वाद नी  चाखि
ब्वारी लड्डू ल्हेकि ऐ जांद
नया जमाना कु यो छ खोट
क्वी क्वी बणांदु अब रोट
छछीं डो  अर बाड़ी कब बिटि नि खायी
ब्यो म मांगळ कैन नि गायी
नि देखि मिन पैला कु घराट
पाथा का ब्ल्ड ऐ गेनि  बाट
देखणु गै छौ मी अपणो पहाड़
पर अब रैगे वो केवल पहाड़
---
  चिंता
पहाड़ों मा
कूड़ि खंद्वार
देशों मा भाषा
क्य रै जालि भोळ
गढ़वाळी की परिभाषा
(आभार  -चिट्ठी पत्री जुलाई -दिसंबर 2002 , पृष्ठ 25 )

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Bhishma Kukreti

बिसिरि  न रे

कवि नाम :    विजयलक्ष्मी  बमोला   
Poetry by : Vijayalakshmi  Bamola

(Chronological History of Garhwali Poem, verses)
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला -   )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
-
  बिसिरि  न रे
जनि वोट मंगणौ  बगत
शरू ह्वेगे नेतौं चमरट
येकी  जि सूणा कि वेकी  जि
ळम खुणै जि ह्वेगे  रगर्यट
-
बड़ा बड़ा नेता आणा छन गौं मा
छ्वटा बड़ाs  टप प्वड़ना खुटों मा
हौरि दिन त हिट नि सकदा
अबारि सड़म उगड़ना भीटों मा। 
-
उंदार नि द्यखणा उकाळ
हाथ जोड़ी रिंगणा धार खाळ
इन्नो  करला हम उन्नो सरला हम
बस बोली कै चली जांदि  हर साल
-
वोट त  दीणा  छवां त्वे
पर सूणी ल्हे  अंक्वै
गौं  -गाळों   बिसरि न रै
हैंका दा  आणो हक्क नि ख्वे।
( आभार - चिट्ठी पत्री , जुलाई दिसंबर 2002 ,  पृष्ठ 29








Bhishma Kukreti


Vijayalakshmi  Bamola : A Garhwali Poetess Combining Realism and Inspiration togethe
r
कवि नाम :     विजयलक्ष्मी  बमोला   
Poetry by : Vijayalakshmi  Bamola
(Chronological History of Garhwali Poem, verses)
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला -  283  )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
-
    This author could not contact the poetess Vijayalakshmi Bamola that she published a couple of Garhwali poems. The following poem shows that Vijayalakshmi is talented poet and has tremendous potentiality for being effective poetess in illustrating reality, wrong happenings, accusing to wrong doers  and simultaneously inspiring the society too in the same verse 
  बिसिरि  न रे
जनि वोट मंगणौ  बगत
शरू ह्वेगे नेतौं चमरट
येकी  जि सूणा कि वेकी  जि
ळम खुणै जि ह्वेगे  रगर्यट
-
बड़ा बड़ा नेता आणा छन गौं मा
छ्वटा बड़ाs  टप प्वड़ना खुटों मा
हौरि दिन त हिट नि सकदा
अबारि सड़म उगड़ना भीटों मा। 
-
उंदार नि द्यखणा उकाळ
हाथ जोड़ी रिंगणा धार खाळ
इन्नो  करला हम उन्नो सरला हम
बस बोली कै चली जांदि  हर साल
-
वोट त  दीणा  छवां त्वे
पर सूणी ल्हे  अंक्वै
गौं  -गाळों   बिसरि न रै
हैंका दा  आणो हक्क नि ख्वे।
( Curtsey : Chitthi Patri , July –December 2002, page 29 )