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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

Shaheed Shridev Suman : A Prose-Lyrical Garhwali Drama
(Chronological History and Review of Modern Garhwali Dramas series)
(Review of Garhwal Drama 'Shaheed Shridev Suman ')
(Review of   Garhwali Dramas created by Dr Ranvir Singh Chauhan )
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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  Learned Garhwal historian Ranvir Singh Chauhan published 6 Garhwali dramas and all are included in collection 'Hantya Pujai' (2003). His most of Garhwali drmas are based on famous personality as Shakuntala, Teelu Rauteli, Kalidas etc. One of such dramas Shahhed Shridev Suman is based on the life of myrte Shridev Suman who died in jail against movement for freeing Tehri Riyasat from Tehri Riyasat King Rule.  Shridev Suman died after 84 days long fast.
   There are 9scenes in that one act drama.
  Ranvir Singh used prose and lyrical dialogues for speeding the dramas and is successful in speeding the speed.
  The drama is of general standard and can't be called class drama
Drama-Shahhed Shridev Suman
From Drama collections 'Hnatya Pujai '(2003)  by Dr.Ranvir Singh Chauhan
Publisher -Rahdika Nivas Kotdwara ,Garhwal
Copyright@ Bhishma Kukreti
Garhwali Dramas from Garhwal, South Asia; Garhwali Dramas from Garhwal, Uttarakhand South Asia; Garhwali Dramas from Garhwal, Himalaya South Asia; Garhwali Dramas from Garhwal, North  India South Asia;





Bhishma Kukreti

   
                नि बिसरण वळ ढांगूs  पाण्युं समळौण - 1

           जसपुर , ग्वील , सौड़ , बड़ेथ का कुछ जल स्रोत्र -1
(उन  पंद्यर /जल सोतों को नमन जो तब प्यास बुझाते थे )
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   ढांगू सांस्कृतिक इतिहास - भीष्म कुकरेती
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आजै साखी तै जल स्रोतों , जल सोतों या पाणि छोयों महत्व पता नि किलै आज पाणी बोतल ऐ गेन , घर घर गाऊं म नळ ऐ गेन।  किन्तु 1975 तक यात्रा या गोर चराण व अन्य कृषि काम म प्राकृतिक जल स्रोतों या जल सोत या छोवा , नौल्यूं आवश्यकता भौति अधिक छे। 
    जसपुर , ग्वील , बड़ेथ का कुछ पाणी सोत
हमर गाँव का मुख्य द्वी धरड़ , मुड़ी पाणी अर मथि पाणी तो हर तरां की तीस बुझांदा छा  ।  जन हौर गां का पंद्यर।  डिस्ट्रिक्ट बोर्ड सड़क पर अर  महादेव चट्टी -सिंगटाळी मार्ग पर यु पाणी छौ तो यात्रियों का वास्ता अमृत दायी छौ।  मैल पाणी म  पानी कूल से आंद तो अर ऊंचाई खूब छे।  इन बुले जांद बल मगर स्व लोकमणी बहुगुणा जी न दान दे थौ।  एक छुटु  शिलालेख बि थौ पर मीन नाम नि बाँची।  मोटर सड़क आण से यु पाणी खंड मंड ह्वे गे अर 9 " x 9 " को शिलालेख कख गे यु भगवान तै बि नी पता।  हम अपण इतिहास की क्या कीमत समजदां यु जसपुरौ मथि पाणी धार मगर को शिलालेख की तौहीन से पता चलद।  जब धन नि छौ अर पत्थरौ मगर  निर्मित करण मकान निर्माण बरोबर ही छौ तब लोकमणी ताऊ जीन मगर दान दे तो बहुत बड़ी बात छे और आज हमम यु शिलालेख हूण से हम तब की जातीय आर्थिक दशा , हमर पुरखों द्वारा ग्राम समाज का प्रति अपण भागीदारी , पर प्रकाश पड़ सकद छौ किन्तु सब खंड मंड।  स्व लोकमणी बहुगुणा (जन्म 1900 का करीब ) अपण बगता बड़ा ज्योतिषाचार्य छा मतबल त्रिविज्ञ छा।  ज्योतिष गणित म ऊंक मुकाबला म अमाल्डु डबराल स्यूं का स्व जयराम उनियाल ही छा।  याने ऊं तै मगर कखन लाण अर कन लाण को ज्ञान बि छौ।  फिर शिलालेख पर लेख गुदणो काम जसपुर म ह्वे या भैर ह्वे ईपर बि जसपुरौ इतिहास मौन च।   इनि नासमझी म झणि कथगा ऐतिहास गवाह वस्तु खतम करि दिनी धौं।  ये जल स्रोत्र से जसपुर वळ धन , प्याज की खेती करदा छा अर इख्मी जसपुरम मुख्य पणचर जमीन छे बस ।
ये मुख्य पंद्यर का मथि  द्वी जल स्रोत्र हौर छा एक स्रोत्र तौळ त हौज बि बण छौ जु कुल्याणो काम आंद छौ।  पलायन का कारण यूँ  स्रोत्रों पर ध्यान नि दिए गेन तो सूख गे छ अर अब केवल एक स्रोत्र बच्यूं च जख से नळ अयाँ छन किन्तु एक समस्या जु मि दिखणु छौं बल ये पाणीन सुखण च।  ये स्रोत्र का ऊपर कुळैं जंगळ ऐ गे याने ये जल  स्रोत्र की बेसमय मौत निश्चित च।  यदि जसपुर वाळ मिथाळ अर बांजै  जंगळ नि लगाल  समझो कुछ  समय  बाद यु स्रोत्र इतिहास बण जाल।  चूँकि अब गढ़वाली कहावतें नई साखी का पास नि रै गेन तो जल बचाव का कोई पारम्परिक ज्ञान नी च तो जल स्रोत्रन समाप्त हूणी च
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भोळ पढ़ो - जसपुरम  बिट्ठ -शिल्पकार का वास्ता अलग अलग धरड़ुं कथा

Bhishma Kukreti

 क्षत -विक्षत , घायल विपक्ष EVM पर भगार क्यों लगा रहा है ?

(एक्जिट पोल या असलियत भांप कर ! )
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हिंदी घपरोळ : भीष्म कुकरेती
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जैसे ही 19 मई संध्या से टीवी चैनलों में एक्जिट पोल रिजल्ट आये मोदी विरोधी खेमों व उनके ठकुड़खोरों के मुंह से EVM पर लांछन , अभियोग व भगार के तीर चलने लगे।  21 मई को सभी क्षत  विक्षत दलों  के नेता लुहू लुहान स्थिति में चुनाव आयुक्त के पास क्या करने गए पता नहीं किन्तु प्रेस कॉन्फ्रेंस से पता चला बल EVM पर लांछन लगाने गए थे।
   विपक्ष वास्तव में EVM को माध्यम बनाकर अपनी नाकमयाबियों को लुकाने छुपाने का  असफल कार्य कर रहा है।
   भरत से भागता वामपंथ सबसे पहला कारण है।  प्रत्येक विपक्षी दल में शातिर , शैतान वामपंथी थिंक टैंक बैठा है और वह जनता है भारतीय जनता वामपंथ को बिना हिंसा के सात समुद्र पर डुबाने तैयार है। शातिर वामपंथी  थिंक टैंक नहीं चाहता कि सभी भारतियों को पता चले कि विपक्ष की हार याने शातिर  वामपंथी थिंक टैंक की असफलता।  इसलिए EVM पर लांछन लगाकर बामपंथी थिंक टैंक जिन्दा रहना चाहता है।
  कर्नाटक में जेडीएस -कॉंग्रेस सरकार गठन पर विपक्ष ने एकता दर्शन का फोटो सेसन किया जो बाद में कोलकत्ता में ममता बनर्जी की एक रैली में भी फोटो सेसन चला।  किन्तु चुनाव एकता के इन  पुरोधाओं की पोल खुल गयी।  केरल -बंगाल में बामपंथ व कॉंग्रेस का गठबंधन हुआ ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी बुआ बबुआ ने शहजादे को बैठने को दर्री तक नहीं दी ,  कजीरवाल -शहजादे गठबंधन के नकली समाचार चलवाते रहे किन्तु खटास कैसे जाती ? दिल्ली में भी कजीरवाळ व शहजादे में गठबंधन नहीं हुआ।  ममता बनर्जी ने शहजादे को बैठने हेतु दर्री तो छोडो एक तिनका भी नहीं दिया।  बिहार में लालू नहीं चाहते थे बल उनके राजकुमार तेजश्वनी के समानांतर राष्ट्रीय स्तर पर कन्हय्या नेता चुनाव जीते अतः बिहार में भी विपक्षियों का बड़ा गठबंधन न बन स्का।  उल्टा लालू ने कन्हय्या को हरवाने के लिए कई प्रपंच्च लड़े।  चंद्र बाबू नायडू जो टीवी चैनलों में बिपक्ष गठबंधन का सर्वे सर्वा बन कर ऐंठ रहा था उसने भी दुर्योधन बन फिरोज जहांगीर गांधी के पौत्र की पारिवारिक पार्टी को पांच गाँव भी नहीं दिए आंध्र में भी फिरोज गांधी की पारिवारिक पार्टी व चंद्र बाबू नायडू की पारिवारिक पार्टी में भी दिखने को ठग बंधन नहीं हुआ।  महाराष्ट्र व तमिलनाडु को छोड़ कहीं भी फिरोज जहांगीर परिवार की  पार्टी व अन्य परिवारों की पार्टियों में कोई गठबंधन न हुआ।  अब जब विपक्ष को आशंका हो गयी कि वे चुनाव हार रहे हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न जनता पूछने वाली है - मूर्खो ! जब गठबंधन आवश्यक था तो तुमने गठबंधन क्यों नहीं किया ? और जनता इस प्रश्न पूछने में भरमा जाय हेतु विपक्ष द्वारा EVM  का सहारा लिया जा रहा है।
      इसके अतिरिक्त फिरोज जहांगीर गांधी परिवार की जागीर पार्टी जो राष्ट्रिय स्तर पर सबसे बड़ी पार्टी थी ने मोदी आक्रमण में मोदी छोड़ बाकी विषयों में ढुल  मुल नीति अपनायी।  फिरोज पौत्र या फिरोज पौत्री किसी एक नारे पर केंद्रित नहीं रहे कि जनता मध्य कोई हव्वा बनती। 
  माया अखिलेश, ममता , तेजश्वनी  , तृण मूलियों, बामपंथियों ने या उनके टुकड़खोरों ने बहुत बार क्या हर बयान में बेरोजगारी की बात उठायी किन्तु बेशर्मों की बेशर्मी देखिये  सन 1977 से सयुंक्त उत्तर प्रदेश , सयुंक्त बिहार, बंगाल में इन्ही दलों का राज रहा और आज भी इन्ही प्रदेशों से बेरोजगारी के कारण सर्वाधिक पलायन हो रहा है ।  बेरोजगारी तर्क जनता मध्य मोदी विरोध में तीर न बन सका क्योंकि बेरोजगारी मिटाने हेतु इन बेशर्म पार्टियों के पास कोई विकल्प न था , ना ही आज है ।  अब अपनी बेशर्मी लुकाने हेतु EVM को बलि का बकरा बनाया जा रहा है
     मोदी का राष्ट्रवाद बुरा है या भला इस पर बहस हो सकती है किन्तु सभी प्रजातांत्रिक पारिवारिक जमींदारों के पास राष्ट्रवाद के विरुद्ध या समांतर कोई विकल्प न था कि मोदी को हरा सकें
  विकास विकास वास्तव में मोदी निर्मित मुद्दा  है ही नहीं हर भारतीय गाहे बेगाहे विकास विकास बरड़ाता रहता है।  विपक्षी दलों विशेषतः फिरोज जहांगीर गांधी परिवार की प्राइवेट प्रॉपर्टी कॉंग्रेस  नव विकास हेतु कोई विकल्प न दे  सकी। 
    फिरोज गांधी के पौत्र व पौत्री किसानों के दुखों पर मगर मच्छी  आंसू बहाने में अवश्य सफल हुए किन्तु इन दोनों मूर्खों ने जनता को कभी यह नहीं बताया कि वे कौन से उपाय हैं जो किसानों की दशा सुधरने में सफल होंगे।  उपायविहीन रोदन करना अब फिरोज गांधी पौत्र -पौत्री का धर्म बन गया है।
         एक्जिट पोल सही निकलता है गलत यह तो 23 मई के 12 बजे ही पता चलेगा।  किन्तु विपक्ष डरा है और अपनी कई नीतिगत नाकमयाबियों छुपाने लुकाने हेतु EVM हथकंडा अपनाने को मजबूर है।
23 मई के बाद कई नए खेल होंगे जो हमे देखने को मिलेंगे। 

Copyright @ Bhishma Kukreti मई 2019
विपक्ष क्यों ईवीएम पर ठीकरा फोड़ रहा है पर लेख

Bhishma Kukreti


ये राउल गांदी को अकल कब आयेंगी ?
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आलेख : भीष्म कुकरेती
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  कुछ दिनों से अस्वस्थ होने व घर स्थानांतर के कारण मेरा घूमना ही कम नहीं हुआ अपितु जोगेश्वरी के चिरपरिचित रिक्शेवालों , चर्मकार , भाजी फल बिक्रेता, दूध विक्रेता ,  सिगरेट बिक्रेता, छूटकर दुकानदारों , इडली बड़ा साम्भर बेचने वालोंक के ग्राहक   से नाता टूट गया।  इस समाज से  मुझे समाज में चलने वाली विचारधारा व विचार का जायजा लेना सरल था।  कांदिवली स्थानांतर होने से अब मुझे नए सिरे से अपने को  इस समाज से परिचय करना है।  किन्तु मैंने तोड़ निकल लिया है।  रिक्शा तो दर रोज लेना ही पड़ता है तो रिक्शेवालों के मन में क्या चल रहा है का ज्ञान मिल ही जाता है। हाँ गढ़वाल दर्शन के वासिंदे जो इनपुट देते थे वह इनपुट अब नहीं मिल पाटा क्योंकि सोसाइटी नई है और अधिसंख्य फॉर्मल या औपचारिक हैं।
  मैं सुबह सुबह  6 बजे सिगरेट पीने निकल जाता हूँ जहां चाय पीने  और बीड़ी सिगरेट पीने रिक्शे वाले खड़े होते हैं।  इस चाय सिगरेट की दूकान के पास खड़ा हो कई इनसाइट मिल जाती है।
      सुबह भी सिगरेट चाय दूकान पर चार पांच रिक्शवाले चुनाव प्रणाम पर चर्चा ठिठोली कर रहे थे।  मैं खड़ा निर्लिप्त सुन रहा था।
एक बोलै - ये राउल गांदी को कब अकल  आयेंगी ?
दूसरा बोलै - अबे उसे अकल की जरूरत क्या है ? कौन से उसने रिक्शा चलाना ऐ ?
पहला - अबे हार रआ ऐ तो  हार मान ले क्यों इतना बड़ा लफड़ा कर रआ ऐ।  बोलते ऐं कि कमिश्नर और कोर्ट जा रआ ऐ।
तीसरा - ये प्रियंका बी एड़ी लगती ऐ कुछ नयी कर सकती लगता ऐ। 
चर्चा बिंदु था कि कॉंग्रेस चुनाव फल आने से पहले इतना रोदन व हाय तोबा क्यों मचा रही है।  वास्तव में सभी विरोधी पार्टियों की सामूहिक सकड़ पकड़ से सभी दल एवं विरोध कोर्ट गए व चुनाव आयुक्त पंहुचे , किन्तु नाम बदनाम हुआ राहुल गांधी का। खावन प्यावन औरूं का मार खावन गौरूं  का।
  सन 2014 से कॉंग्रेस के थिंक टैंक में सन्निपात फैला है जो जनता की नब्ज पहचानने में सर्वथा असफल रही है। 
जब डिमॉनीटाइजेसन से जनता भयंकर रूप से मोदीमय हो गयी तो राहुल गांधी व चेले अनावश्यक रूप से आलोचना कर अपने को बेवकूफ साबित कर रहे थे।  इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक की आलोचना ,  स्ट्राइक की आलोचना करना , अपने को याने कांग्रेस को पाकिस्तान सेना के निकट दिखलाने की भयंकर गलती करना राजनैतिक पंडितो को कभी समझ में नहीं आया /  बहुत से वक्त कोई टिप्पणी न करना या राजनैतिक प्रतिक्रिया न देना ही राजनैतिक परिपक्वता मानी जाती है और बेवकूफ अंधे सांप जैसा किसी पर भी काटने झपटना कोई राजनैतिक बुद्धिमता तो न मांई जाएगी।   जिस दिन मोदी की केदारनाथ यात्रा का प्रचार हो रहा था और कॉनर्स व विरोधी मोदी को नाटकबाज  धर्मभ्रष्ट  की संज्ञा दे रहे थे  तो दूसरी सुबह मुझे रिक्शेवाले , मच्छी बेचने वाले हॉकर्स आदि मोदी की प्रशंसा करते दिखे - देखो 17 घंटे अकेला गुफा में ये बाप रे बाप , जय हो शिव शम्भु।
       विपक्ष को आलोचना का पूरा अधिकार है किन्तु ऐसी आलोचना भी क्या काम की जो आलोचना अपने को ही भस्म कर दे ? सेल्फ गोल कोई रणनीति नहीं होती है।   महाभारत में एक अध्याय है जब कौरवों ने नारायण शस्त्र का प्रयोग किया और उसमे सबको भष्म होना ही था।  रणनीतिकार कृष्ण ने सबको आगाह किया कि सर नीचे करो और नारायण पूजा करो जब तक शस्त्र की  आग ताप  कम न हो जाय।  सन 2002 से मोदी नामक नारायण शस्त्र कार्यरत है अतः सीधी आलोचना के स्थान पर मोदी के मंत्रियों की आलोचना श्रेयकर होती पर मेरी कौन सुनेगा क्योंकि  जो बच्चा जन सकता था वह तो जोगी बन गया है। 

   

Bhishma Kukreti

   भारीतयवाद का हरामजादा  मार्क्सवाद  पर झन-झन्नाटेदार झापड़

      (  आम चुनाव चुनाव विश्लेषण   )
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विश्लेषक : भीष्म कुकरेती
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   2019 के लोक सभा चुनाव में राजनैतिक युद्ध में कई मिथ टूटे और कई नए मिथों का जन्म हुआ या मिथ रचे गए जिस पर क्षेत्रीय स्तर व राष्ट्रिय स्तर पर बहुत कुछ लिखा जायेगा।  पोलिटिकल मार्केटिंग विद्यार्थियों या अन्वेषकों हेतु कई सार्वभौमिक या अमर  नियमों की पुनर्वृति मिलना अवश्यम्भावी है।  सामजिक वैज्ञानिकों के लिए तो 2019  का आम चुनाव भारत का इतिहास टटोलने का स्वर्णिम अवसर है।
         मोदी के नेतृत्व में NDA द्वारा लोकसभा की 543 में से 353  सीटें जीतने के कई अर्थ है किन्तु जो सबसे अधिक प्रभावकारी फल है वह  है वर्णषकर वाद बामपंथ का निरमूलीकरण  में एक बड़ी सीढ़ी हासिल करना।   मै 2019 के आम चुनाव को  भारतीय संस्कृति का बामपंथ पर झन झन्नाटेदार झापड़ द्वारा क्षत विक्षत या विक्षिप्त करना कहना अधिक पसंद करूंगा।
            बामपंथ याने शिशुपाल माँ  सिद्धांत का धराशायी होना
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महाभारत में एक कथा है कि जब शिशुपाल (श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र ) का जन्म हुआ तो शिशुपाल की माँ ने श्री कृष्ण से पूछा कि शिशुपाल की मृत्यु कब होगी।  श्रीकृष्ण ने शिशुपाल मृत्यु का समय बताते हुए कहा कि बच्चे के जन्म समय मृत्यु नहीं समृद्धि के प्रश्न पूछे जाते हैं।  बामपंथ जो सर्वथा अभारतीय सिद्धांतों व अमानवीय सिद्धांतों पर आधारित  है ने भारतीय संस्कृति की सर्वथा अवहेलना की जैसे बामपंथ करता रहा  है।  सन 2013 में जैसे ही भाजपा ने तब गुजरात मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति का सर्वेसर्वा घोषित किया सबसे अधिक 'पूठे पर डाम ' वर्णशंकर बामपथी बुद्धिजीवियों  पर  पड़े और उनकी चिल्लाहट संयुक्त राज्य अमेरिका , ब्रिटेन व ऑस्ट्रेलिया व पाकिस्तान में सुनाई देने  लगा।  भारत के हर माध्यम में भारत अनिष्ट की कथाएं प्रचारित होने लगी।  झूठ बोल रहा हूँ तो अरुंधति रॉय , जॉन दयाल या फेसबुक पर मंगलेश डबराल  के उस समय के  संचार माध्यमों में सड़े गले बामपंथियों के व्यक्तव्य या लेख बांच लीजिये सभी भारतीय संस्कृति विरोधी बामपंथी लुच्चों ने गर्भावस्था में पलते बच्चे  के बारे में भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी बल भारत में 'विष  बालक' पैदा हो रहा है।  भारतीय संस्कृति में बच्चा पैदा होने में सकारात्मक सोच से सुखद , समृद्ध भविष्य  की कामना की जाती है किन्तु इन कार्ल मार्क्स के बचे खुचे ' हरामजादों '( मार्क्स के वर्णशंकर औलादों  )  ने नकारात्मक सोच भारतीय मनों में घुसानी शुरू कर दी। नकारात्मक सोच मृत्यु से भी खतरनाक होती है किन्तु  मार्क्स के हरामजादों  (वर्णशंकर औलाद ) ने  भारत में  मृत्युदायी नकारात्मक सोच फैलानी शुरू कर दी जो आज भी बंद नहीं हुयी तभी तो मार्क्स की हरामजादी (मार्क्स की वर्णशंकर बुद्धिवादी पुत्री ) अरुंधति राय ने 12 मई को PEN अमेरिका लेक्चर में फिर व्ही विष वमन किया कि भारत में फासिज्म आ गया है।  बामपंथी हरामजादे (मार्क्स के वर्णशंकर  बुद्धिजीवी )
      2019  चुनाव में भारतीयों भारतीवाद को पुनर्जीवित किया और  हरामजादा  बामपंथ (वर्णशंकर ) को अटलांटिक महासागर में चुलाने गाड़ने  का प्रथम कदम उठाया और कसम खायी कि हम भारतीय अब  उधार लिया गया  हरामजादा बामपंथ सिद्धांत या वर्णशंकर सिद्धांत के बजाय विशुद्ध भारतीय सिद्धांतों से भारत को पुनः विश्व सिरमौर निर्मित करेंगे।
          2014 -2018 तक नकारात्मक सड्याण गंध फैलाना
  मई 2014 में मोदी की ताजपोशी के पश्चात ही मार्क्स के हरामजादे  (वर्णशंकर )  हर पल भारत में गंध फैलाते रहे कि  अनिष्ट हो रहा है अनिष्ट हो रहा है भारत रसातल को जा रहा है।  सर्वप्रथम इन मार्क्स के हरामजादों ( वर्णशंकरों ) ने राजकीय उपाधियों को वापस (अवार्ड वापसी ) वापस करना शुरू किया और विदेशों में भारत की छवि बर्बाद करना शुरू किया।  मार्क्स के इन हरामजादों (वर्णशंकर ) ने फिर टुकड़े टुकड़े गैंग धरना को हरिस्त पोस्ट करना शुरू किया।  जबकि भारतीय जनता इन वरसंशंकर समर्थित हर राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने में लगी रही।  जब टुकड़े टुकड़े गैंग से काम नहीं चला तो इन विदेशों के टुक्कड़खोरों ने झूठ फैलना शुरू किया कि भारत में दलितों पर अत्त्याचार हो रहा है।  बहुत बार क्या अधिकतर शिल्पकारों व स्वर्ण मध्य मानवीय झगड़े होते रहते हैं किन्तु इन हरामजादों (वर्णशंकरों ) ने मोदी ब्रैंड को बदनाम करने कैंडल मार्च निकाला कि दलितों पर हमले हो रहे हैं किन्तु जब गैर भाजपा शासित राज्य में अलवर जैसे दलित संग गैंग रेप हो तो ये हरामजादे (वर्णशंकर ) चुप रहे।  इसी तरह किनारे पर बैठे समज हेतु शासकीय स्कीम/योजनाएं  जैसे शौचालय , उज्ज्वला , हर गांव में सड़क, अयोध्या को विश्व पटल पर पर्यटक स्थल , कशी में सड़क हेतु मकानों को तोड़ने की आवश्यकता , गंगा सफाई अभियान , गरीबों को सुलभ मकान , सोलर ऊर्जा योजना आदि योजनाओं जिसमे धर्म की कोई अहमियत न थी को भी हिन्दू /फासिज्म -गैर हिंदी रंग देने में इन मार्क्स के हरामजादों (वर्णशंकरों ) ने कोई कसर  न छोड़ी हर दिन ये हरामजादे (मार्क्स के वर्णशंकर ) भारत व भारतीयता को बदनाम करते गए।  ये हरामजादे (मार्क्स के इल्लीगल औलादें ) महिला आरक्षण का तो समर्थन करते पाए गए किन्तु तीन तलाक जैसे अति अमानवीय सिस्टम के समर्थन में ऐसे ह्यळी  गाडते रहे जैसे इन हरामजादों का  पड़  दादा मार्क्स अभी अभी मरा हो। 
   इन वर्णशंकरों ने पांच साल भारतीयवाद को नेस्ताबूद करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाये और भारतीयवाद को बदनाम करने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के माध्यम जैसे इकोनॉमिस्ट पत्रिका का भी सहारा लिया गया कि मोदी को सामने रख भारतीयवाद को नेस्ताबूद किया जाय। 
        2019 के चुनाव ने साबित किया कि भारतीय कुछ युग तक चुप बैठ सकता है किन्तु भारतीयवाद को मरते नहीं देख सकता और जब सही समय हो तो भारतीय समाज भरतीयवाद को फिर से पुनर्जीवित कर लेगा. भारतीय संस्कृति व समाज हेतु बामपंथ एक हरामजादा (वर्णशंकर ) वाद था जिसकी चूल हिलाने का काय शुरू हो चूका है।  अगले दो या तीन दशक भारतीयवाद द्वारा हरमजादा (वर्णशंकर ) सिद्धांत बामपंथ के मध्य युद्ध के दशक होंगे।  युद्ध अवश्यम्भावी है यदि भारतीयवादियों ने हरामजादे (वर्णषकर ) सिद्धांत को हराना है तो कई कठोर निर्णय भी लेने होंगे जिसमे सर्वपर्थम छुवाछुत का मटियामेट करना है। 
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कल पढ़ें - नरायनण शस्त्र याने मोदी आंधी में नवीन पटनायक , यब्वाइ यस  रेडी , स्टालिन करुणानिधि कैसे बच पाए और तमिलनाडु से हरमजादा सिदहन्त बामपंथ को कैसे हटाया जा सकता है पर लेख पढ़िए

Bhishma Kukreti

 भारतीयतावाद  का अर्थ केवल मनुवाद  ही क्यों  ?
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भीष्म कुकरेती
( परसों मैंने एक पोस्ट डाली 'भारीतयवाद का हरामजादा मार्क्सवाद पर झन-झन्नाटेदार झापड़' जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा समर्थकों की प्रशंसा संभवित ही थी।  विरोध भी होना ही था क्योंकि राजनीती प्रेरित लेख था।  गाली शब्द पर ऐतराज होना ही था किन्तु मैंने सोच समझ कर गाली युक्त शब्द प्रयोग किये जो मैं बहुत बार यह टोटका करता ही आया हूँ। मैं बड़ा या महान सौम्य  लेखक उपाधि हेतु  कभी भी नहीं लिखता।  वैसे मेरे विपणन सहयोगी गवाही देंगे कि आम दिनचर्या में मैं कॉन्ट्रोवर्सी व गालियों से बचता  हूँ या कहें तो वीक ही हूँ।  एक विद्वान् मित्र ने मनुवाद को प्रोत्साहित कहें या पुनर्जीवित करने की तोहमत ही लगा दी।  यह लेख  भारतीयवाद शब्द में  केवल  मनुवाद देखने वाली मानसिकता की प्रतिक्रिया स्वरूप है )
       मेरी उपरोक्त पोस्ट की प्रतिक्रिया में विद्वान् लेखक श्री महेश नंद जी की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण लगी -और मनुवाद का गुप्त ऐजेंडा, पौराणिक विचारधारा की पुनर्स्थापना, ब्राह्मण वाद का चरम्, कमजोर वर्ग को कुचलने की सोची-समझी रणनीति।
  चूँकि मैं  जाति से ब्राह्मण हूँ तो यदि मैं हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति की वकालात करूं तो न जाने क्यों मैं मनुवादी हो जाता हूँ और जब मैं 'जसपुर के शिल्पकार कुकरेती थे ' लोक कथा पोस्ट करता हूँ तो यही भीष्म कुकरेती  कुकरेतियों  की आँखों में करकने लगता है कि मैं ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व  को विध्वंस कर रहा हूँ।  मुद्दा यह है कि क्योंकर अधिकतर भारतीय संस्कृति  प्रचारक व हिन्दू शब्द प्रसारक को मनुवादी कहा जाता है।  मेरे कुछ प्रश्न श्री महेशा नंद जी से हैं -
   क्या बौद्ध धर्म नियम भारतीयवादी नहीं हैं ? भगार लगाना एक बात है और गहन चिंतन अलहदा तथ्य है।  अशोक युग , गुप्तकालीन ,  मध्य युगीन  हिन्दू  क्या बौद्ध धर्म से प्रेरित न थे ? क्या उन्होंने कई नियम बुद्ध से नहीं लिए या अशोक से नहीं लिए।  महाभारत का दक्षिण अयान (जो उत्तराखंड में रचित प्रतीत होता है) में तो अहिंसा या भौतिकवाद या चार्वक वाद तो बौद्ध धर्म से ही प्रेरित है।  महाभारत में राजा के मंत्रिमंडल में शिल्पकारों हेतु आरक्षण का पुरजोर समर्थन किया गया है तो क्या महाभारत को मनुवाद तक ही सीमित रखना सही है ? महाभारत अंत  के अध्याय तो अंहिसा शिक्षण ही है जो सर्वथा बौद्ध धर्म व जैन धर्म से ही प्रेरित हैं।
क्या जैन  धर्म नियम भारतीय वाद के अंग नहीं हैं ?  क्या भारतीय वाद में केवल मुनवाद है और भारतीय वाद में जैन धर्म का कोई महत्व या रोल नहीं है ?
   क्या कबीर भारतीवाद के अंग नहीं हैं ? भक्त कबीर को तो  आम कट्टर  सवर्ण   उसी तरह सम्मान देता है जैसे वे विष्णु को सम्मान देते हैं।  सुबह सुबह ब्राह्मणों के घरों में कबीर वाणी के कैसेट सुनना क्या मनुवाद  कहलाया जाएगा ? गढ़वाल में तो जो जागर /मंत्र जिनमे कबीर व रैदास वाणी है शिल्पकारों या गोरखनाथी संतों ने रचे उन्हें पूज्य ही माना जाता है।  क्या ये जागृ या संत भारतीयवाद में नहीं आते ?
क्या रैदास /रविदास भारतीयवाद के संवाहक नहीं हैं ? क्या हम भारतीय वाद को मनुवाद तक सीमित कर रैदास को लघु मानव सिद्ध करने की चेस्टा नहीं कर रहे हैं ? क्या बुद्ध , जैन मुनियों , कबीर या रैदास ने मार्क्स पढ़ा था ?
  महात्मा फुले को क्यों नहीं भारतीयवाद में समाहित करना चाहिए ?
क्या भीम राव रामजी  आंबेडकर ऐसे ही अम्बेडकर बन गए थे ?  भारत में बुद्ध के बाद भीमराव  रामजी  आंबेडकर ही ऐसे क्रांतिकारी समाज सुधारक हुए हैं जिन्होंने बंचित समाज को प्रबल आवाज उठाने को प्रेरित किया।  किन्तु भीमराव  रामजी  अम्बेडकर विचारधारा एक दिन में तो पैदा नहीं होते अपितु हजारों साल से मौन ही सही बंचित  समाज में चल रहे.चर्चित हो रहे  क्रांतिकारी विचारों का ही प्रतिफल है।  बंचित समाज में जब यह मौन चर्चा , सुगबुहाट  हजारों साल तक चली  होगी तभी तो अम्बेडकर विचार धारा पैदा हुयी होगी कि नहीं ? क्या यह छुवाछूत  से लड़ने की मौन चर्चा  भारतीवाद का अंग नहीं है ?  भीम राव  रामजी  अम्बेडकर विचार मार्क्स वाद की देन  है या भारतीयवाद की देन है ?
क्या महात्मा गांधी भारतीयवाद के अंग न थे ?
महेशा नंद जी से प्रश्न है - यदि भारत में मार्क्स वाद न आता तो क्या क्या आप डड्वार कथा नहीं सोच सकते थे ?

भारतीय वाद या हिन्दू शब्द में जब तक मनुवाद ही खोजा  या गुप्त एजेंडा  जाएगा तब तक मुझे नहीं लगता छुवाछूत को ध्वंस किया जा सकता है।  छुवाछूत एक नासूर है जिसे काट फेंकना हर हिन्दू का परम कर्तव्य है। 
मई 2019

Bhishma Kukreti

 भारत में श्रमिक अधिकार व सुरक्षा चिंता 'हिंसावादी, हत्त्यावादी , अत्त्याचारी   मार्क्सवाद  ' से कहीं पहले से होती  आ  रही है
  (भारतीयवाद समर्थन  श्रृंखला -3 )
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भीष्म कुकरेती
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  मेरे तीन दिन पहले के लेख पोस्ट ' हरामजादा बामपंथ  .. '  की प्रतिक्रिया में कुछ सचेत विद्वानों की प्रतिक्रिया आयी जिससे लगता है जिअसे भारत में श्रमिक चिंतन का पिरोधा हिंसावादी मार्क्स ही रहा है।  जबकि भारत में श्रमिक अधिकारों व श्रमिक अधिकारों की चर्चा होती आ रही है।  छुवाछूत ग्रसित समाज में इस चर्चा को दबा दिया गया अन्यथा प्राचीन स्मृतियों , शास्त्रों में श्रमिक चिंता पर गहन चिंतन हुआ है। मेरा मानना है बल  मार्क्सग्यवाद और अत्याचारवाद -हिंसावाद एक दूसरे  के पर्याय हैं।

          शुक्र नीति शास्त्र में श्रमिक अधिकार चिंतन
शुक्रनीति राजनीती शास्त्र का एक महत्वपूर्ण गरनथ है जिसका उल्लेख महाभारत के शांतिपर्व के 57 -15  खंड में  इस प्रकार लिखा गया है की सर्वपर्थम शिव द्वारा 10000 श्लोकों में वैशालाक्ष नीर्तिशास्त्र   की रचना हुयी , इस शास्त्र को इंद्र ने लघु कर 5000 श्लोकों में संक्षिप्तीकरण कर बाहुदंतक ग्रंथ की रचना की फिर इस ग्रंथ को और संक्षिप्त कर शुक्र ने 2200 श्लोकों में सीमित किया।  इस ग्रंथ को ही आज शुक्र नीति कहा जाता है।
   शुक्र नीति की रचना 3000 वर्ष पहले हो  हो किन्तु लगता है इस ग्रंथ का संकलन व सम्पादन भी गुप्त  काल में ही हुआ होगा।   
शुक्रनीति के 'युवराज लक्षण ' खंड में श्लोक 394 से 402 श्लोकों में श्रमिक अधिकार सूत्र हैं जिनमे श्रमिक अधिकार व उनके जीवन यापन  का उत्तरदायित्व राजा को ही दिया गया है। 
शुक्र नीति  (उपरोक्त खंड ,394-397 ,  )में  सर्वपर्थम  कार्य व फिर पारश्रमिक अनुसार श्रमिक वर्गीकरण किया गया है।  फिर वेतन पर चर्चा हुयी है -
  न कुर्याद भृतिलोपम तु भृति विलंबनम (398 ) 
  अवश्यपोष्य भरणा तथा भृति: मध्य प्रकीर्तिता
परिपोष्या भृति: श्रेष्ठा समान्नाच्छादर्न्थिका 399
भवदेकस्य भरणं यया सा हीन संज्ञाका
  राजा या स्वामी को निर्धारित समय पर वेतन देने में बिलम्ब नहीं करना चाहिए।  साथ ही माता पिता या परिजनों के भरण पोषण के निम्मित भृति सदैव देते रहना चाहिए जिस भृति से माता पिता का पोषण हो वह 'मध्या , जिससे अन्य लोगों का भी पोषण हो उसे 'श्रेष्ठा' व अन्न वस्त्र हेतु दी जानी वाली भृति 'समा' व केवल श्रमिक का ही भरण पोषण हो उसे हीना भृति कहते हैं।
श्लोक 400  में समय समय पर वेतन वृद्धि पर जोर दिया गया है
श्लोक 401 में माता पिता व संबंधियों हेतु भरण पोषण की व्यवस्था की आवश्यकता व लाभ की चर्चा हुयी है।
शुक्रनीति ने श्रमिक शोषण पर लिखा है बल -
ये भृत्या हीनभृतिका: शत्रवस्ते स्वयंकृता:
परस्य साधकास्ते तु छिद्रकोशप्रजाहरा: (युवराज  ल , 402 )
अर्थात राजा भृत्य को अत्यल्प वेतन देकर स्वयं का शत्रु बना लेता है क्योंकि अलप वेतन से श्रमिक का भरण पोषण न होने से वह अन्य राजा का कार्य करके भी आवश्यकता पूर्ती करता है तथा राजा या स्वामी की निंदा करता है साथ ही राजकोष हरण व प्रजा को कष्ट पंहुचता है। 
इसी अध्याय में अंतराल  अवकाश व वेतन युक्त वार्षिक , मासिक अवकाश की भी चर्चा की गयी है )404 श्लोक से 409 तक ) . 
ग्रेच्युइटी की भी चर्चा की गयी है कि  राजा को वेतनभोगी को 15 दिन का वतन बिना श्रम के ही दी जाय (411 )
  शुक्रनीति में पेंशन चर्चा
शुक्रनीति के युवराज लक्षण खंड के श्लोक 412 से 416  श्लोकों में पेंशन, प्रॉविडेंट फंड  व ग्रेच्युइटी चिंतन है
    जिस राजकर्मी ने राजा की 40 वर्ष तक सेवा की हो उसे आधे वेतन रूप में  निवृति सेवा (पेंशन ) मिलना चाहिय्र व श्रेष्ठ चरित्र वाली स्त्री कन्या को वेतन का आठवां भाग  प्रतिवर्ष मिलना चाहिए।  यदि कार्य करते समय भृत की मृत्यु हो जाय तो उसके पुत्र को पेंशन व बाद में कार्य दिया जाना चाहिए।
राजा को श्रमिक हेतु प्रोविडेंट फंड या पूर्वोपायी कोष  की भी चर्चा की गयी है (416 )
417 श्लोक से 434 तक आधुनिक मानव संसाधन प्रबंधन जैसे  ही श्रमिकों से उचित व्यवहार, मोटिवेशन  व स्वामी की श्रमिक प्रति कार्य शैली आदि की चर्चा है।
  भारतीय शास्त्रों में श्रमिक चिंता हुयी है और भली भांति हुयी है। चाणक्य, मनुस्मृति  व महाभारत में भी श्रमिक चिंतन हुआ है और श्रमिक अधिकारों प् खुला समर्थन मिला है।
मनुस्मृति में श्रमिक हेतु निम्न वाक्य द्योत्तक हैं कि पवित्र भारतीयवाद में श्रमिक हिट की बात राखी गयी हैं -
नित्य शुद्ध: कारुहस्त: पण्ये यच परसरितम
ब्रह्मचारिगतम भैक्ष्यम नित्यम मेध्यमिति स्थिति:
अर्थात श्रमिक हाथ , ब्रह्मचारी को दी गयी भिक्षा व बाजार में बिक्री वस्तु सदा वित्र होते हैं
यह कहना कि  भारत में श्रमिक चिंता केवल हिंसावादी -हत्त्यावादी - अत्त्याचारी मार्क्सवाद  के बाद ही हुयी है सर्वथा गलत, आधारहीन  व भारतीयवाद को बदनाम करने की साजिश है ।  भारत में श्रमिक चिंतन सैकड़ों सालों से होता आया है। 

 

Bhishma Kukreti

       सावधान!  खंजर भोकू बामपंथ द्वारा भारतीयवाद को बदनाम करने की साजिश जारी है !
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  भीष्म कुकरेती
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जब 2014 नरेंद्र मोदी का नाम भाजपा ने  प्रधान मंत्री पद हेतु  प्रस्तावित किया तो बामपंथ का शिशुपाल माँ सिद्धांत आगे आ गया और शुभ सपनों के स्थान पर प्रजातंत्र की चूल हिलाने वाला खंजर भोंकू बामपंथ जहर फैलाने लगा कि अब भारत में अशुभ ही अशुभ होने लगेगा।  नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनते ही बामपंथ के नाम पर सरकारी टुक्कड़खोर याने अवार्ड वापसी गैंग ने  चापलूसी के ऐवज में मिले /मिला अवार्ड वापस कर विदेशों में भारतीयवाद को बदनाम करने की साजिश रची।  इसी प्रजातंत्र की पीठ पर खंजर भोंकू  बामपंथ ने भारतीयवाद के विरुद्ध न जाने कितनी  भ्रांतियां फैलाई और भारतीय वाद को बदनाम करने हेतु हर दिन कोई ना कोई साजिस रची। कभी फासिज्म के नाम पर भारतीयवाद को बदनाम किया गया , कभी किसान विरोधी विचारधारा के नाम पर भारतीयवाद को नीचा दिखाया गया , कभी मोदी को दलित विरोधी सिद्ध करने की कोशिस की गयी तो अरुंधति रॉय सरीखी बामपंथियों ने विदेशी धरती में भारतीयवाद को बदनाम किया। 
  भारतीय जनता ने खंजर हितैसी बामपंथ को 2019 के आम चुनाव में नकार क्या दिया सर्वथा बामपंथ को मड़घट पंहुचा दिया , भारतविरोधी बामपंथ की चिता सजा ही दी और आग भी लगा दिया तो आशा  थी कि बामपंथ हितैसी या बामपंथ के नाम पर रोटी सेकने वाले कुछ समय भारतीयवाद  विरुद्ध शायद चुप रहेंगे।  किन्तु विभिन्न माध्यमों में इन बामपंथी व समर्थकों के बयानों से लगता है बामपंथियों का जहर उगलना बंद नहीं हुआ। उलटा जहर उगलने की गति में तीब्रता आने वाली है। 
       बामपंथ के आखरी चिराग अमीर  हैदर जैदी ने तो 2019 के आम   चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया दी कि इस  चुनाव में जाहिलों ने मोदी को पुनः चुन कर सत्तासीन किया।  अधिसंख्य बामपंथी या बामपंथ समर्थक धुर्या /धूर्त  यही राग अलाप रहे हैं कि भारतीय जनता मूर्ख है या मूर्ख  जैसी बर्ताव कर रही है।  इन धूर्तों /धुर्याओं को भारतीय  जनता मूर्ख या जाहिल दिख रही है किन्तु चीन की जनता जो बामपंथी अधिनायकवाद को झेल रही है सीढ़ी गाय दिखती है। 
     नरेंद्र मोदी को जब NDA सांसदों ने उन्हें प्रधान मंत्री चुना तो मोदी ने धन्यवाद प्रस्ताव में अल्प प संख्यकों को विश्वास में लेने की बात दोहराई जो प्रत्येक प्रधान मंत्री का संवैधानिक कर्तव्य भी है।  किन्तु बामपंथी व बामपंथ के धुर्या /धूर्त समर्थक तो अनर्गल मिथ्या प्रचार में लग गए और प्रचार करने लगे कि मोदी झूठ बोल रहा है।  बामपंथ के मखमली गद्दे पर बैठा  असादुद्दीन ओवेसी तो बयान  देते रहे हैं बल मुसलमानों को मोदी से बड़ा खतरा है।  जैसे मोदी मुसलमानो हेतु आइटम बम्ब हो !
     कल 29 मई के हिंदी टीवी चैनलों में जब मोदी के विश्वास जीतो विषय पर बहस हो रही थी तो दसियों मरते खपते  बामपंथ को ढोने वाले समर्थक मोदी के विश्वास को ढकोसला बता रहे थे।  ये बामपंथ के अंधे  चाटुकार  अभी भी विश्वास में अविश्वास खोज रहे हैं याने भारतीयवाद को  बदनाम करने की बड़ी साजिश की भनक दे रहे हैं।  अपुष्ट समाचारों से पता चलता है कि भारतीयवाद विरुद्ध अवार्ड वापसी गैंग व भारत तेरे टुकड़े टुकड़े गैंग फिर से सक्रिय हो गया है और भारतीयवाद को बदनाम करने हेतु नक्सलियों व अन्य अपराधी समूहों से गुपचुप साजिश में जुट गया है।
     भारत में निराशा , आशंका , भय होने की आशंका प्रचारित करने हेतु बामपंथ व उसके चापलूस समर्थक किसी भी स्तर तक जा सकते हैं और विदेशों से सहायता लेने से भी नहीं हिचकेंगे।
      साफ़ है कि आने वाले निकटवर्ती दिनों में भारतीयवाद को राजनैतिक लड़ाई ही नहीं  बामपंथियों व उनके समर्थक चापलूसों की साजिश को भी धराशायी करने की रणनीति बनानी होगी और उसे क्रियावनित करनी होगी।  सावधान ! घायल बामपंथ भारतीयवाद के विरुद्ध कई नए साजिशी  अस्त्र शास्त्र लेकर मैदान में उतरेगा।  भारतीयवादियो ! सावधान। 
30 मई 2019

   

Bhishma Kukreti

           ममता बनर्जी  का जै श्रीराम से चिढ़
                           और
          उसका 'ठाले ठाले'  से चिढ़

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  हंसी हंसी में - भीष्म कुकरेती

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हरेक की एक चिढ़ होती है।  किसी को पळयो खायेगा से चिढ़ होती है किसी को नंग दिखाने को कहो  तो वह अगविताळ  हो जाता है और बंगाल की ममता बनर्जी जै श्रीराम सुनकर क्वीला  की काली कोठरी बन जाती हैं। राहुल भले हैं मूर्ख शब्द पप्पू से भी नहीं खीजते।  पर  फिरोज गांधी परिवार जंवाई रॉबर्ट बाड्रा  को  सूदखोर कहो तो नहीं चिढ़ता पर जमीन चोर कहो तो गुस्से से लाल पीला हो चिढ़ जाता है।  लालू यादव पुत्र व पुत्री अब चारा चोर परिवार शब्द से नहीं चिढ़ते पर यदुरप्पा जमीन दिखाओ शब्द से चिढ़ता ही है।    विपिन चंद्र खंडूरी को पूछो बल कोटद्वार में कितने मिले तो आज भी चिढ जाते हैं। 
      सन 1973 -74 देहरादून की की छ्वीं हैं , खुड़बुड़ा मुहल्ला देहरादून में एक थे जिन्हे बच्चे क्या कुंड में लिजाते  मुर्दे भी 'ठा ले , ठा ले ' शब्द बोल क्र चिढ़ाते थे और वे 'ठाले  ठाले ' शब्द सुन कर चिढ कर माँ बहिन की गाली देने लगते थे।  बेच्रे का जीना मुश्किल ही था और दिन में खुले आम सड़क पर नहीं दीखते थे क्योंकि छतों से कवारोळी जैसे आवाज में 'ठाले  ठाले ' आने लगती थी।  एक दिन वे सुबह सुबह चार बजे सड़क पर निकल गए कि एक छतों से आवाज आ ही गयी ' ठाले ठाले ' एक आवाज आयी नहीं कि अन्य छतों से भी कव्वारोळी मच गयी 'ठाले ठाले ' .  उसने जबाब दिया ' अपने ब्वे के मैसियो ! सुबह सुबह भी अपने बाप को नहीं छोड़ते। ."  फिर जब 'ठाले ठाले 'की आवाज कम नहीं हुयी तो जोर से बिलने लगे ' हराम के जनो ! अब तो मैंने तुम्हारी माँ भीं को उठाना बंद कर दिया फिर भी  ... । "  असल में ये सज्जन पहले सड़क में कोई लकड़ी दिखी नहीं कि उसे उठा लेते थे और यहां तक कि किसी के घर में बाद से भी लकड़ी उठा लेते थे।  मुहल्ले वालों ने इनका नाम ही उठा ले उठा ले रख दिया था और बाद में ठाले इनकी चिढ हो गयी।
बकरा किस्तों में मुख्य किरदार को बुड्ढा घर में है ? शब्द से ही चिढ़ थी।  महमूद की कई हिंदी फिल्मों में किसी शब्द से चिढ होती थी और उस शब्द के इर्द गिर्द कथा से हास्य पैदा किया जाता था। 
  ममता बनर्जी के कई वीडिओ वाइरल हो रहे हैं जिसमे वह  जै श्रीराम सुनकर खदुळ /कठ्खने कुत्ता जैसे व्यवहार करने लगती हैं।  ममता बनर्जी हेतु जै श्रीराम वास्तव में चिढ है या नहीं मुझे शक है क्योंकि राजनीतिज्ञ बिना बात के चिटा में भी गुस्सा नहीं होते।  घाघ , घुटी हुयी ममता बनर्जी क्या इतनी बात पर क्वीला बन जायेगी ? लगता नहीं।  ममता जै श्रीराम शब्द को बंगाल विरोधी दिखाकर अपने टारगेट ऑडिएंस तक सूचना पंहुचा रही है कि भाजपा याने जयश्रीराम बंगाल विरोधी हैं। चिढ में भी संदेश।
कॉंग्रेसियों को बाथरूम में रेनकोट शब्द बोलो नहीं कि वे खदुळ कुत्ता बन जाते हैं।  भाजपा वालों को मुस्लिम गोल टोपी से चिढ़ है तो ओवेसी को जनेऊ से जन्मजात चिढ़ है। 
    राजनीति में यह आम बात है।  बामपंथी को चिढ़ाना हो तो कह डालो - भाजपा के यहां कब  भोजन पर जा रहे हो ? वह  जलभुन  जाएगा।  लालू यादव को कमल फूल से इतनी चिढ थी कि एक बार उनके मंच में कमल फूल लगे थे कि उन्होंने अगविताळ हो उन कमल फूलों को फिंकवा दिया और फिंकवाने से पहले बड़ा नाटक किया व उस गुस्से नाटक की  फोटोग्राफी ही नहीं की गयी अपितु मीडिया में खूब प्रचारित किया गया।  लालू को कमल से कोई चिढ़ नहीं रही होगी पर नाटक कर अपने वोटरसों तक संदेश पंहुचना था सो पंहुचा दिया।  इसीलिए मैं कहता हूँ ममता बनर्जी का जय श्रीराम शब्द से चिढ़ उतनी नहीं दिखती जितना कि वह  अपनी इस चिढ़ से कोई संदेश पंहुचना चाहती है।  राजनीतिज्ञ हगने मूतने का भी नाटक करते हैं। 
आपकी चिढ़  क्या है ?
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती , 1जून 2019

Bhishma Kukreti

   गुजरात में पौंक (ऊम ) पार्टी व महाराष्ट्र में हुर्डा (ज्वार  ऊम ) पार्टी भोजन पर्यटन का उम्दा उदाहरण
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  भोजन पर्यटन विकास -11 
Food /Culinary  Tourism Development -11 
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 388 

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -388 



आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती   

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ऊमी याने कच्चे अनाज को भूनकर मिला दाना।  ऊमी बुकना उत्तराखंड में ही नहीं भारत के सभी क्षेत्रों में प्रचलित व भोजन संस्कृति का एक हिस्सा रहा है।  उत्तराखंड में गेहूं या कोदे की ऊमी भूनी जाती हैं तो अन्य क्षेत्र जैसे गुजरात और महाराष्ट्र में जवार (जुंडळ ) की ऊमी  अति प्रसिद्ध है।  जैसे उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन दौरान ऊमी संस्कृति में अवसान आया उसी तरह भारत में भी ब्रिटिश शासन में ऊमी भोजन संस्कृति में अवसान आया किन्तु अब धीरे धीरे इन क्षेत्रों में ऊमी संस्कृति वापस आ रही है और नव अवतार में अवतरित हो रही है।


गुजरात में सड़क किनारे बिकते पौंक या जवार ऊमी
ओक्टोबर नवंबर में वापी से लेकर बड़ोदा तक हाइ वे पर किसान  या अन्य मजदूर टोकरियों में  जवार की ऊमी में नमकीन मिलाकर बेचते मिल जाएंगे।  हाइ वे या स्टेट  हाइ वे किनारे पौंक /नमकीन या बूंदी सह बिक्रेताओं के पौंक खरीदने बहुत से शहरी कार लेकर  घूमने  हैं और जगह जगहों से पौंक खरीदकर क्षुधा कम स्वाद शान्ति करते जाते हैं।  आंतरिक पर्यटन वृद्धि का पौंक एक नायब जरिया है। 


महाराष्ट्र में हुरडा पार्टी

महाराष्ट्र में  दिसंबर या आसपास जवार की ऊमी के साथ अन्य भोज्य पदार्थ पकाकर रिश्तेदारों को न्योता दे कर खिलाने का प्राचीन रिवाज था पर कुछ समय यह कमजोर हुआ।  महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक नागपुर में हुरडा पार्टी आयोजित करते थे व राजनैतिकों व अन्य लोगों को पार्टी में बुलाते थे।  इससे वे कई राजनैतिक लाभ भी लेते थे याने जनसम्पर्क साधन साधते थे।

वीडिओकोन के निदेशक व राज्य सभा सदस्य श्री आर एन धूत भी औरंगाबाद में हुरडा पार्टी देते थे व बैंकर्स, राजनीतिज्ञों , सामजिक कार्यकर्ताओं को न्योता देते थे।  औरंगाबाद से बाहर के मेहमान भी हुरडा पार्टी में शामिल होते थे।  इसी तरह महाराष्ट्र में हुरडा पार्टी हुआ करती हैं।

         नागपुर के निकट तेलकामठी गाँव हुरडा पार्टी आयोजित कर ग्रामीण पर्यटन विकसित करने हेतु प्रसिद्ध है। गाँव में जवार की ऊमि के कई पकवान बनाये जाते हैं और शहरी पर्यटकों को खिलाया जाता है व उन्हें खेतों में भी घुमाया जाता है। 

              उत्तराखंड में भी ऊम को पर्यटन आकर्षण  माध्यम बनाया जा सकता है

ऋषिकेश निकट माळा बिजनी , नरेंद्र नगर , गुलरगाड , कौडियाला, धारी , गैंडखाल हल्द्वानी नैनीताल  आदि स्थानों पर ऊमी त्यौहार आयोजित कर उत्तराखंड में फ़ूड टूरिज्म को विकसित किया जा सकता है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti 2 /6 /2019

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