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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

 Common Fear of Common Indians

South Asian Humour: Bhishma Kukreti

Every weak, an agency or institution publishes survey on fears of Indians. There are many types of fear and Indians are suffering various types of phobia.
   I wanted to know those fear by first hand and I started questioning people.
  The vegetable seller on the footpath was afraid that even after paying increased Hafta(Monthly payment)  to local Bhai (Don Type) Municipal Police  will come on Van and will take her vegetables and will fine her every week.
A regular buyer is afraid that there will be adulterated Milk supply and he or she will get ill.
   A regular TV watcher is afraid that no TV news channel will be neutral and he or she will get bias news from all news channels. TV news watchers are afraid that the standard of debates on those channels will deteriorate further.
The common men those spit regularly on the road without thinking are afraid that in immediate future,  Government will increase Fines on spitting as Transport department increased fine and their spitting will be disturbed drastically.
An investigating reporter was afraid that he will submit get real information but editor will not publish.
A reporter was afraid that she will shoot a real video showing malpractices in hotels and restaurants of Uttar Pradesh and Uttar Pradesh government will book him for fake and malicious news.
  Vegetable and fruits buyers are afraid that they are getting chemical injected lauki, vegetables and fruits.
   The regular train travellers are afraid that mail trains might come on time and they might miss the train.
Old people are afraid that by new Ayushman Bharat scheme the private hospitals will increase medical charges and it will be difficult for uninsured patients for medical treatment.
My villagers are afraid that Gram Panhcayat election will divide them and villagers will lose sleep
I am afraid that if I write satire on Modi, Modi supporters will level me a  Desh ka Gaddar or trait.

Copyright@ Bhishma Kukreti

Bhishma Kukreti

उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन विकास की संभावनाएं

Education Tourism Development in Uttarakhand -1
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  404
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 404
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
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   जब कोई विशेष शिक्षा , प्रशिक्षण हेतु अपना घर छोड़ता है तो उस यात्रा को शिक्षा या शिक्षण पर्यटन कहा जाता है।  शिक्षा पर्यटन की परिभाषा जटिल भी है और बहु क्षेत्रीय भी है क्योंकि विद्यार्थी बहुत सी बातें सीखने भी घर छोड़ता है जैसे स्कूली छात्रों का किसी विशेष ज्ञान हेतु भी यात्रा करते हैं।   किन्तु यहां पर पारम्परिक शिक्षा या नव शिक्षा केन्द्रो के विकास ध्यान केंद्रित किया जायेगा जो उत्तराखंड या किसी भी क्षेत्र विशेष के बाहर के छात्रों को आकर्षित करे।       उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति  में कृषि  से नहीं हो सकती है और ना ही उत्तराखंड में पारम्परिक उद्यम विकसित किये जा सकते हैं जो कि आम मैदानों में विकसित होते हैं।  अतः उत्तराखंड में सेवा या सर्विस उद्यम ही आर्थिक स्थिति विकसित करने के विकल्प हैं।
पर्यटन विकास वास्तव में उत्तराखंड का सबसे मजबूत पक्ष है जिसमे शिक्षा पर्यटन एक खंड है जो विकसित होना आवश्यक है।
उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन की आवश्यकता -उत्तराखंड में चूँकि पारम्परिक उद्यम नहीं लग सकते अतः शिक्षा उद्यम ही ऐसा उद्यम है जो पर्यटन को विकसित कर सकता है।  उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति स्वास्थ्यकारी है अतः उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन भली भांति फल फूल सकता है।  ग्रामीण आर्थिक  विकास हेतु  शिक्षा पर्यटन सर्वोत्तम उद्यम है जो पलायन रोकने में सक्षम उद्यम भी है।   शिक्षा पर्यटन विकास से स्थानीय शिक्षा स्तर भी विकसित होता है जो क्षेत्र हेतु अति लाभकारी है।    शिक्षा पर्यटन से कई प्रकार के इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पड़ते हैं जो अन्य उद्यमों को भी आकर्षित करते हैं। शिक्षा पर्यटन विकास से स्थानीय लोगों को कई प्रकार के रोजगार मिलते हैं।  शिक्षा पर्यटन से व्यापर बढ़ता है व स्थानीय व्यापरी पैदा होते हैं। शिक्षा पर्यटन से स्त्री रोजगार को अधिक लाभ मिलता है।
शिक्षा पर्यटन याने अंतरास्ट्रीय स्तर की शिक्षा हेतु इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना जिससे स्थानीय छात्रों की प्रतियोगिता शक्ति भी विकसित होता है।
आगे पढ़ें - उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन : इतिहास के झरोखे से शिक्षा पर्यटन से लाभ  Benefits of  Education Tourism
उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं - 2 Education Tourism  Development in Uttarakhand -2 उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  405
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 405
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
- वास्तव में शिक्षा पर्यटन एकतरफा पर्यटन नहीं है कुछ कुछ  है कारण कि शिक्षा या ज्ञान हेतु विद्यालयों में छात्रों द्वारा पढ़ाई हेतु आब्रजन  और किसी  विशेष ज्ञान प्राप्ति हेतु पर्यटन दोनों शिक्षा पर्यटन में आते हैं।  हम इस शृखंला में विद्यालयों में छात्रों द्वारा पढ़ाई हेतु घर से बाहर यात्रा को ही लेंगे।   छात्रों द्वारा घर से  बाहर यात्रा /  क्षेत्रों ठहरने के क्षेत्र को कई लाभ मिलते हैं - 1 - निवेश - शिक्षा पर्यटन से क्षेत्र को कई नए निवेश मिलते हैं।  शिक्षा पर्यटन विकास हेतु कई आवश्यकताएं पूर्ती आवश्यक है और यह आवश्यकता पूर्ती निवेश लाता है जैसे क्षेत्र में छात्रों हेतु भोजनालय , होटल , बुक सेलर्स की आवश्यकता पड़ती है और इन आवश्यकता पूर्ति हेतु निवेशकर्ता निवेश करते हैं। 2 - छात्रों हेतु कई प्रकार के संसाधन /इंफ्रास्ट्रक्चर जोड़ने पड़ते हैं जैसे विद्यालय खोलना , परिहवन, मनोरंजन , खेल मैदान  आदि एवं ये इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रीय जनता को भी लाभ पंहुचते हैं। रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज से रुड़की स्कूटर को कई नए इंफ्रास्ट्रक्चर मिले। 3 -छात्रों के अभिभावक व रिस्तेदार भी संग संग पर्यटन करते हैं अतएव कई तरह के पर्यटन प्रोडक्ट तैयार करने पड़ते हैं जैसे देहरादून में IMA के कैडिट्स व परिजनों हेतु कई तरह के पर्यटक प्रोडक्ट्स नर्माण हुए हैं।
4 - शिक्षण संस्थाओं के खुलने व इन शिक्षण संस्थाओं हेतु आवश्यकता पूर्ति हेतु बजार आदि निर्माण करना पड़ता है तो रोजगार के कई अवसर पैदा होते हैं।  देहरादून के विकास जो भी हुआ वह शिक्षा पर्यटन के कारण हुआ।  मल्ला ढांगू में सिलोगी एक सिल्ल पहाड़ी जंगल था किन्तु सन 1923 में स्कूल खुलने व फिर हाई  स्कूल व अब इंटर कॉलेज होने से सिलोगी एक बजार पैदा हो गया है और रोजगार के कई अवसर सिलोगी में निर्मित हो गए हैं।  जहरीखाल व दुग्गडा अन्य उदाहरण हैं। 
5 - शिक्षा पर्यटन से अन्य उद्यम फलते है  जिन्हे चलने हेतु स्किल मैनपावर की आवश्यकता  होती है पहले पहल स्किल मैनपावर बाहर से आयात करना पड़ता है किन्तु ततपश्चात क्षेत्र में ही स्किल मैनपावर पैदा किये जाने लगते हैं। उदाहरणार्थ शिक्षा पर्यटन के कारण देहरादून में गोयल फोटो कम्पनी चली और गोयल फोटो कम्पनी देहरादून में पहले फोटग्राफर पहले पहल आयात हुए किन्तु बाद में गोयल फोटो कम्पनी के कारण कई फोटोग्राफर देहरादून में ही पैदा होते गए। 6 -शिक्षा पर्यटन से कई नए प्रकार के पर्यटक स्थल विकसित हुए जो अन्य प्रकार के पर्यटक स्थल में परिवर्तित हो गए जैसे देहरादून में टपकेश्वर मंदिर , नाला पानी का विकास आदि 7 - शिक्षा पर्यटन से सामजिक विकास को नई डिसा मिलती है जिसका उदाहरण देहरादून व नैनीताल है। 8 - शिक्षा पर्यटन से संस्कृति आदान प्रदान को गति मिलती है। 9 - शिक्षा पर्यटन राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों को आकर्षित करता है। दून  स्कूल का इतिहास इसका उदाहरण है। 10 - पर्यटक स्थलों का ग्लोब्लाइजेसन - शिक्षा पर्यटन क्षेत्र को ग्लोबल नक्से में स्थापित करने में सफल होता है।  श्रीनगर गढ़वाल इसका उम्दा उदाहरण है। 11 - शिक्षा पर्यटन विकास से क्षेत्र विशेष की विशेष छवि निर्मित होती है जैसे कोटा राजस्थान की IAS निर्मित करने की छवि निर्मित हो गयी है।  दूँ स्कुल वेल्हम स्कूलों से देहरादून को अंतरास्ट्रीय छवि प्राप्त हुयी। 


Copyright@ Bhishma Kukreti 2019
शिक्षा पर्यटन का वर्गीकरण Classification of  Education  Tourism उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन  - 3Education Tourism  Development in Uttarakhand -3उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  406
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 406
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
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  शिक्षा पर्यटन की व्याख्या जटिल होने के कारण शिक्षा पर्यटन वर्गीकरण भी जटिल है और कई प्रकार से विपणन आचार्यों ने अलग अलग प्रकार से वर्गीकरण किया है। मुख्यतया दो प्रकार से शिक्षा भ्रमण होता है अ - लघु समायिक शिक्षा भ्रमण आ - दीर्घ कालीन शिक्षा भ्रमण या पलायन एक वर्गीकरण अनुसार शिक्षा पर्यटन का  निम्न वर्गीकरण हुआ है -१- युवा भ्रमण - युवा भ्रमण में युअ कुछ विशेष ज्ञान हेतु भ्रमण पर निकलते हैं यह भ्रमण लघु कालीन शिक्षा भ्रमण का हिस्सा होता है। २- प्राइमरी या हाई स्कूल तक शिक्षा भ्रमण - इस प्रकार में बच्चे मुख्यतया हॉस्टल में वास करते हैं जैसे वेल्हम ब्वाइज या गर्ल्स स्कूल देहरादून या दून स्कूल देहरादून जहाँ बच्चे हॉस्टल में वास करते हैं ३- उच्च शिक्षा हेतु पलायन - टेक्निकल या उच्च शिक्षा हेतु जब विद्यार्थी घर से बाहर दूसरे देश या दुसरे शेरोन में वास करता है पलायन करता है उसे उच्च शिक्षा पर्यटन कहा जाता है। ४- अन्वेषण शिक्षा हेतु पर्यटन - पीएचडी , मास्टर डिग्री आदि हेतु शिक्षा पर्यटन इस प्रकार में आते हैं ५- अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा हेतु पर्यटन या पलायन - इस प्रकार के पर्यटन में छात्र /विद्यार्थी विशेष देश या स्थल में पर्यटन करता है जैसे  छात्रों द्वारा अंतरास्ट्रीय स्तर का हॉस्पिलिटी मैनेजमेंट शिक्षा हेतु स्विटजर लैंड जाना ६-  विद्यार्थियों का आदान प्रदान हेतु शिक्षा पर्यटन - दो देशों के मध्य करार के नाते जब छात्र एक दुसरे देश में शिक्षा प्राप्ति हेतु पर्यटन करते हैं ७- सेमीनार पर्यटन - कॉंफिडेंसेज या सेमिनारों हेतु अन्वेषक पर्यटन करते हैं और ऐसा पर्यटन लघु कालीन शिक्षा पर्यटन का हिस्सा होता है। ८- भाषा पर्यटन - आज  ग्लोबलाइज़ेशन के चलते दुसरे देश की भाषा सीखनी आवश्यक हो गयी है अतः विदेशी भाषा सीखने हेतु भी शिक्षा पर्यटन आवश्यक है ९- भूगोल जानने हेतु पर्यटन - किसी विशेष स्थल के भूगोल , भूगर्भ , संस्कृति या वनस्पति , जीव जंतु के  ज्ञान हेतु भी पर्यटन किया जाता है और यह पर्यटन लघु कालीन अथवा दीर्घ कालीन पर्यटन हो सकता है।


Copyright@ Bhishma Kukreti 2019वन अनुशंधान संस्थान : शिक्षा पर्यटन का एक उम्दा उदाहरण
Forest Research Institute : Very Appropriate Example of Education Tourism
उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 4 Education Tourism  Development in Uttarakhand -4 उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  407
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 407
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
- शिक्षण व प्रशिक्षण संस्थान किसी भी क्षेत्र के विकास हेतु आवश्यक कड़ियाँ होते हैं।  देहरादून का फारेस्ट इंस्टीट्यूट (FRI ) ने उत्तराखंड पर्यटन व उत्तराखंड छवि निर्मित करने में अमित योगदान दिया है और आज भी वन अनुसंधान संस्थान देहरादून पर्यटन को संबल देने में पूरी तरह सक्षम है    देहरादून पहले गढ़वाल देश का प्रमुख हिस्सा रहा है।  1815 में ब्रिटिश ने नेपाल को हराया और देहरादून को ब्रिटिश राज में मिलाया गया।  देखा जाय तो आधुनिक देहरादून को प्रसिद्ध शिक्षा पर्यटक स्थल बनाने में सर्वपर्थम योगदान वन अनुसंधान संस्थान का ही है।  ब्रिटिश काल में ही वन अनुसंधान संस्थान का नाम सारे संसार में वन अन्वेषकों में प्रसिद्ध हो चुका  था और एफआरआई ने देहरादून की छवि प्रसिद्धिकरण में योगदान दिया।             वन अनुसंधान संस्थान FRI   का संक्षिप्त इतिहास   -ब्रिटिश शशकों  को  भारतीय जंगलों से खूब कमाई होती थी।  वनो लाभ  को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने 1878 में देहरादून में डिटरीच ब्रैंडिस द्वारा इम्पीरियल फारेस्ट इंस्टीट्यूट नाम से एक संस्थान की स्थापना की जिसमे वन संबंधी खजान को प्रमुखता दी जानी थी।  1906 में ब्रिटिश इम्पीरियल फॉरेस्टरी सर्विस के तहत इस संस्थान का नाम फारेस्ट इंस्टीट्यूट परिवर्तित किया  गया।  इसके पश्चात् बहरत में FRI के तहत कई वन संस्थान खोले गए।  सन 1991 में वन अनुशंधान संस्थान को विश्व विद्यालय का दर्जा मिला।  वन अनुसंधान संस्थान कौलागढ़ निकट टोंस नदी के किनारे है वन अनुशंधान संस्थान के अंदर कई संस्थान भी हैं जैसे इंदिरा गाँधी नेशनल फारेस्ट अकैडमी , वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट , भारत सरकार का वन विभाग अदि आदि।    वन अनुसंधान में  कई कोर्स पढ़ाये जाते हैं व रिसर्च किये जाते है जहाँ देश विदेश से कई ज्ञानी रिसर्च हेतु आते हैं व कई कॉंफिडेंसेज भी आयोजित होते हैं।        फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में निम्न म्यूजियम भी है - पैथोलॉजी म्यूजियम , सोसल  फारेस्ट म्यूजियम , सिल्वीकल्चर म्यूजियम , टिंबर म्यूजियम , नॉन वुड फारेस्ट प्रोडक्ट म्यूजियम , एंटोमोलोजी म्यूजियम। इन म्यूजियम देखने सैकड़ों पर्यटक देहरादून भ्रमण करते हैं।      फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का बड़ा अहाता है जो पर्यटकों ही नहीं फिल्म  निर्माताओं को फिंल्मांकन हेतु आकर्षित करता है और वन अनुसंधान के आहते  में  कई फिल्मों का फिल्मांकन हुआ है जो पर्यटन विकास का एक अंग होता है    वन अनुसंधान की कई खोजों के प्रकाशन से देहरादून  का नाम ऊँचा होता रहता है।     वन अनुसंधान के छात्र डीएफओ बनते है जो देहरादून का नाम प्रसिद्ध करते रहते हैं।  वन अनुसंधान में आने वाले छात्रों, शिक्षकों  व अन्वेषकों हेतु कई तरह के साधनों की आवश्यकता पड़ती रहती है जिसकी पूर्ती हेतु होटल , बाजार निर्मित होते हैं।  वन अनुसंधान में प्रवेश शुक्ल दस रुपया है व गाइड फीस पचास रुपया है।      वास्तव में वन अनुसंधान देहरादून ही नहीं उत्तराखंड का गर्व है। 

Copyright@ Bhishma Kukreti 2019
वुडस्टॉक बोर्डिंग स्कूल मसूरी : देहरादून  शिक्षा पर्यटन जनक
Woosstock Boarding  School Mussoorie The pioneer in Education Tourism उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 5 Education Tourism  Development in Uttarakhand -5 उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  408
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 408
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
-  देहरादून का नाम शिक्षा पर्यटन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऊँचा है।  सन 2016 में देहरदून के  कुछ  बोर्डिंग स्कूल अंतरास्ट्रीय स्कूलों का  रैंकिंग में पहले 10 में स्थान था और यह रैंकिंग उत्तराखंड शिक्षा पर्यटन हेतु एक सकारात्मक पहलू माना जायेगा।     स्कूलों के उच्च श्रेणी में गणना से क्षेत्र की सकारात्मक छवि बढ़ती है और पर्यटन के कई अन्य आयाम भी खोलती है।     इन्ही स्कूलों में मसूरी का वुडस्टॉक स्कूल भी है जिसकी गणना संसार के उच्च श्रेणी के स्कूलन में गिनती होती है और वुडस्टॉक स्कूल की गुणवत्ता व प्रसिद्धि देहरादून उत्तराखंड का नाम ऊँचा रखने में सफलतम भूमिका अदा कर रहा है।   वुडस्टॉक स्कूल लंढौर मसूरी (देहरादून उत्तराखंड ) एशिया का सबसे पुराना आधुनिक स्कूल है।  वुडस्टॉक स्कूल की स्थापन क्रिश्चियन मिसनरी ने सन 1854 में की व 1856 के कैम्पस में बदला जो अभी तक चल रहा है। वुडस्टॉक स्कूल का प्रबंधन अमेरिकीकरते थे।  उत्तरी भारत में अंग्रेजों व यूरोपीय सदस्यों हेतु अमेरिकन सेलब्स व अमेरिकी स्कूलों द्वारा अनुमोदित स्कूलों की मनाग हुयी तो मिशिनरी ने अमेरिकी सैलेबस व अमेरिकी कॉलेज शिक्षा हेतु  वुडस्टॉक गर्ल्स स्कूल की स्थापन की।  तभी से वुडस्टॉक स्कूल की गणना अंतरास्ट्रीय स्तर के स्कूलों में होती रही है और मसूरी का नाम प्रसिद्ध होता आ  रहा है ।  वुडस्टॉक बोर्डिंग स्कूल एक नॉन प्रॉफिट प्राइवेट स्कूल है व अल्पसंख्यक करसीचियाँ वर्ग के तहत  आता है। 1928 में वुडस्टॉक में पूर्णकालीन अमेरिकन कोऐज्यूकासनल प्रोग्रैम  शिक्षा परबडंह होने लगा व 1959  में वुडस्टॉक को अमेरिकी ऐज्युकेसन विभाग से मान्यता मिली। शुरू में वुडस्टॉक का नाम प्रोटेस्टिएंट  गर्ल्स स्कूल था जिसे सन 1856 में वुडस्टॉक नाम दिया गया। कई देशों के विद्यार्थी वुडस्टॉक में विद्यार्जन हेतु आते हैं।       2004 में भारत  वुडस्टॉक स्कूल के सम्मान में पोस्टल अटेम्प जारी किया।1911 में स्कूल ने वुडस्टॉक ओल्ड स्टूडेंट ऐसोसियेसन की स्थापना की जिसकी कई देशों में शाखाएं खुलीं।   वुडस्टॉक स्कूल के कुछ छात्रों  में किस ऐंडरसन , टॉम  आलटर अमेरिका में जॉर्जिया के  चीफ जज  जॉर्ज केरी , जीत सिंह आदि हुए हैं जिन्होंने अंतरास्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की और मसूरी शिक्षा का नाम प्रसिद्ध किया।  वुडस्टॉक  ब्रॉडिंग स्कूल से उत्तराखंड को पर्यटन लाभ तो मिला ही साथ में उत्तराखंड की सकारात्मक छवि वृद्धि में भी वुडस्टॉक बोर्डिंग स्कूल ने योगदान दिया। ,Copyright@ Bhishma Kukreti 2019
देहरादून में शिक्षा पर्यटन विकास के कारण व भविष्य Dehradun developing Education Tourist District (Factors for Developing Education tourism) उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 6 Education Tourism  Development in Uttarakhand -6 उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  409
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 409
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
-  उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन प्राचीन कल से ही प्रसिद्ध रहा है किन्तु देहरादून ब्रिटिश काल से शिक्षा पर्यटन में सदा ही कमजोर रहा है।   ब्रिटिश राज आने से देहरादून शिक्षा पर्यटन में जग प्रसिद्ध स्थल निर्मित हुआ।  मसूरी ब्रिटिश  व यूरोपीय अधिकारियों के लिए इच्छापूर्ण स्थान होने के कारण देहरादून को महत्व मिला और ब्रिटिश व यूरोपीय व भारतीय नागरिकों ने देहरादून में आधारिक शिक्षा के अतिरिक्त कई प्रशिक्षण व शिक्षण संस्थान खोले जिससे देहरादून शिक्षा दायक शहर बन गया।  आज उत्तरी भारत में देहरादून अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि वाला शिक्षा पर्यटक जनपद है और कहा जा सकता है कि देहरादून का शिक्षा पर्यटन में भविष्य उज्जवल है।   देहरादून का शिक्षा पर्यटन विकास के वही कारण है जो कारक किसी भी स्थल को अंतरास्ट्रीय छवि प्रदान करता है:-   भौगोलिक कारण - मसूरी निकट होने से ब्रिटिश राज ने कई शिक्षण संस्थान खोले जैसे वन अनुसंधान संस्थान , सर्वे ऑफ इण्डिया व साथ में  कई व्यक्तयों ने भी शिक्षण संस्थान खोले जैसे डीएवी संस्थान , गुरु राम राय  संस्थान आदि. स्वतन्त्रता पश्चात  भी सरकार व गैरसरकारी संस्थानों ने शिक्षण संस्थान खोले  . आज देहरादून को School Capital of India  का ख़िताब मिला है।   मानव हेतु आरामदायक व स्वस्थ जलवायु - देहरादून की जलवायु  मानव हेतु स्वस्थ व आरामदायक होने से देहरादून ने शिक्षकों व विद्यार्थियों को आकर्षित किया।  शिक्षा आधारिक संरचना या Infrastructure निर्माण - देहरादून में ब्रिटिश राज से सरकार व व्यक्तिगत रूप से समाज ने शिक्षा हत्य आधारभूत संरचना का निर्माण किया याने संस्थान व बोर्डिंग हॉउस व वास भोजन की व्यवस्था।  अंतरास्ट्रीय स्तर के शिक्षकों की उपलब्धता -  शुरू से ही ब्रिटिश राज में  अंतरास्ट्रीय स्तर के शिक्षक व प्रशिक्षक देहरादून को उपलब्ध होते रहे और वर्तमान में भी देहरादून कंपीटेंट शिक्षकों व प्रशिक्षकों को आकर्षित करता रहता है.  इंफ्रास्ट्रक्चर - विद्यार्थियों व शिक्षकों हेतु समाज ने भी रहने व भोजन व्यवस्था में योगदान दिया ( किराये पर मकान मिलना व  भोजनालय खुलना )    म्युनिस्पैलिटी -  औपचारिक तौर पर देहरादून म्युनिस्पैलिटी 18 67 में स्थापित हो चूका था जिससे शिक्षा ही नहीं वस् हेतु म्युनिस्पैलिटी ने कई इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण किये जो शिक्षा पर्यटन हेतु आवश्यक होते है   परिहवन - देहरादून 1900 से रेल व मोटर मार्ग से जुड़ चूका था तो विद्यार्थियों व अभिभावकों को आने जाने की सुविधा उपलब्ध थी। अंग्रेजी  भाषा शिक्षण उपलब्धता :  देहरादून में ब्रिटिश राज (1857 ) शुरू होते ही अंग्रेजी माध्यम में शिक्षण व प्रशिक्षण उपलब्ध होता गया  जो अंतरास्ट्रीय व गैर हिंदी भाषी छात्रों हेतु एक आवश्यक अवयव था। बहुआयामी विषय - ब्रिटिश काल से ही देहरादून में बहु आयामी विषयों का शिक्षण व प्रशिक्षण उपलब्ध रहा है और आज भी यह गति मिरंतर चल रही है। शांत व सभ्य समाज - देहरादून की  शुरू से शांत  शहरों में गिनती की जाती है और आज भी शांत शहरों में उच्चता प्राप्त किये है।   भौगोलिक व ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल - देहरादून में विद्यार्थियों व गैर विद्यार्थियों  के लिए दर्शनीय स्थल सुलभ हैं।    सभी मिख्य श्र्मावलम्बियों हेतु प्रार्थना स्थल  उपलब्धता - देहरादून में  लगभग सभी धर्मावलम्बियों हेतु प्रार्थना स्थल उपलब्ध हैं    उपरोक्त मुख्य कारणों ने देहरादून को  School Capital of India  की उपाधि से नवाजा।



Copyright@ Bhishma Kukreti 2019

Bhishma Kukreti

सिलोगी बजार विकास : ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा पर्यटन उदाहरण 

Silogi Market : Example of  Development of Education Tourism in  Rural Uttarakhand

उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 7
Education Tourism  Development in Uttarakhand -7
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  410
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 410

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती

- सिलोगी मल्ला ढांगू पौड़ी गढ़वाल  का एक महत्वपूर्ण स्थान है जो लंगूर, डबरालस्यूं , बिछला  ढांगू व मल्ला ढांगू पत्तियों का मिलन स्थल भी कहा जा सकता है।  सिलोगी नाम कैसे पड़ा कोई नहीं बता सकता है किन्तु सिल्ल याने ठंडा व छायादार जगह का गुण सिलोगी के नाम पड़ने के पीछे अवश्य है।  सिलोगी एक 5000  फ़ीट ऊँची पहाड़ी  है जहाँ से  उत्तर में चौखम्भा पहाड़ियां , मसूरी  , व दक्षिण में माबगढ़ आदि पहाड़ियां दिखती है।  पहाड़ी पर कुछ चौरास भी है और दर्शनीय स्थल है।   सन 1923 तक सिलोगी जल्ली (आज कड़ती कांडे ) ग्राम सभा के अंतर्गत खेत वाली जगह थी और गेंहू व दालों हेतु प्रसिद्ध स्थल था।  शायद कड़ती -कांडे वालों के बूसड़ व गौशाला रहे होंगे।     ग्वील मल्ला ढांगू के संत सदानंद कुकरेती जी को ब्रिटिश अत्याचार के कारण विशाल करती का सम्पादन छोड़ना पड़ा और वे चैलूसैण  (डबरालस्यूं ) में एक मिसनरी स्कूल में पढ़ने आ गए।  किन्तु पादरी द्वारा हिन्दू शिल्पकारों का धर्मान्तर करवाने से संत सदानंद कुकरेती ने स्कूल छोड़ दिया और डबरालस्यूं के बिष्ट जी , डबराल जी , लंगूर के पसबोला जी , बदलपुर के हरिराम जखमोला के साथ उन्होंने सिलोगी में मिडल स्कूल (5 वीं से 7 वीं तक ) खोला।  स्कुल के भवन हेतु मल्ला ढांगू के शिल्पकारों ने दान में स्कूल चिना व अन्य लोगों ने कई तरह के दान दिया।  स्कूल को कड़ती -कांडे वालों ने खेत व वन दे दिए।    संत सदानंद जी का कुछ समय बाद इंतकाल हो गया और धनाभाव के कारण स्कूल बंद हो गया।  बाद में ग्वील के ही स्व नंदा  दत्त कुकरेती ने स्कूल को पुनर्जीवित किया और सन 1952 में इसे हाई स्कूल की मान्यता दिलाई।  नंदा दत्त कुकरेती याने 'मैनेजर साब ' ने सिलोगी में एक टेक्निकल स्कूल भी खोला था जो चल न स्का।  सं 80 के बाद सरकार ने स्कूल को अपने हाथ में लिया व इंटर कॉलेज में उच्चीकृत किया।  लंगूर , डबरालस्यूं , ढांगू , उदयपुर में मिडल स्कूल न होने के कारण इन  पत्तियों के छात्र सिलोगी स्कूल में पढ़ने आते थे व विद्यार्थी छात्रावास में रहते थे। जब तक सिलोगी स्कूल सरकार के हाथ में नहीं गया क्षेत्र के लोग चुनाव द्वारा निर्मित कमेटी से स्कूल संचालन करते थे।     स्कूल खुलने से सिलाई पर्यटक स्थल बनता गया।  निकटवर्ती गाँवों बागों , बड़ेथ , कड़ती , जसपुर , घनसाली , पाली आदि गाँव वालों ने दुकाने निर्मित कीं  व मकान बनाये जहां छात्र व शिक्षक वास कर  सकें।  बागों के सुर्रा लाला , कड़ती के सूबेदार गोबरधन प्रसाद सिल्सवाल , जसपुर के सेठ विष्णु दत्त जखमोला , बड़ेथ के खेम सिंह  आदि ने दूकान व वास हेतु मकान निर्मित किये इसी तरह पाली के सुनारों ने भी दूकान ही नहीं अपितु मकान भी निर्मित किये।  घनसाली के दुकानदारों ने बजार को नया आयाम दिया।  जसपुर के तीन भाइयों ने सुनार की दूकान निर्मित किये , मल्ल के जोगेश्वर कुकरेती ने भी दूकान निर्माण किया।  बागों के कई लोगों ने दुकाने व मकान निर्मित किये।    दूकान खुलने से सिलोगी क्षेत्रीय मंडी बनता गया व मकानों में छात्र विशेषतः शिल्पकार (इनके लिए छात्रावास न था ) व शिक्षक सपरिवार रहने लगे।     दुकानों के खुलने से दुग्गड़ा से सेल्समैन घोड़ों पर बिक्री हेतु सिलोगी आने लगे रात भी बिताने लगे।     छात्रों , छात्रों के अभिभावक व अन्य पर्यटकों /खरीददारों हेतु चाय , नास्ता , भोजनालय व कई महत्वपूर्ण वस्तुएं सुलभ होने से ढांगू के लोग बार बार सिलोगी आने लगे और धीरे गांवों से छोटे दूकानदार भी यहाँ से होलसेल में सामन खरीदने लगे और बड़ा बजार बनता गया।  आज भी बड़ा बजार है। सिलोगी की सबसे बड़ी कमी हिअ की यहाँ जल की भरी कमी है। हमारे समय हम छात्र सुबह सुबह एक मील नीचे कांड वालों के धारे में  नित्य क्रम हेतु जाते थे।  सभी इसी धारे से जल लाते थे।  अब आधा मील दूर छप्या से पानी सुलभ है.
   यदि जल सुलभ हो जाय तो सिलोगी में कई अन्य तकनीक संस्थान भी खुल सकते हैं क्योंकि जलवायु व भौगोलिक स्थिति स्वास्थ्यपूर्ण है बस जल संकट दूर होना चाहिए। जगह की कोई कमी है है स्थल विस्तार हेतु। उपरोक्त सूचना से हम निम्न निष्कर्ष निकल सकते हैं कि ग्रामीण स्थल में शिक्षा पर्यटन कैसे विकसित हो सकतेा है -        आधारभूत संरचना का सुलभ होना - शिक्षण संस्था जो क्षत्र में न उपलब्ध हो। जैसे सदा नंद कुकरेती ने स्कूल स्थापित किया व अन्य शिक्षितों ने फ्री में अध्यापक बनना स्वीकार किया   छात्रों हेतु छात्रालय छात्रों हेतु खान पान व मकान की व्यवस्था छात्रों के अभिभावकों हेतु बजार का निर्माण समाज द्वारा दुकान व रहवास का निर्माण समाज द्वारा शिक्षण संस्था खोलने में पूरा सहयोग जैसे कड़ती वालों ने खेत दान व अन्य लोगों द्वारा दान सहयोग   समाज द्वारा शिक्षण संस्थान का विकास जैसे नंदा दत्त कुकरेती ने स्कूल को पुनर्जीवित किया व हाई स्कूल में परिवर्तित किया समाज द्वारा स्कूल प्रबंधन संचालन - समाज का योगदान सरकार का सहयोग याने समय समय पर स्कूल का विकास (उच्चीकरण आदेश व सरकारीकरण )
Copyright@ Bhishma Kukreti 2019Developing Education Tourism in Pauri Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Haridwar Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Dehradun Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Uttarkashi Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Tehri Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Chamoli Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Rudraprayag Garhwal , Uttarakhand; Developing Education Tourism in  Udham Singh Nagar Kumaon , Uttarakhand; Developing Education Tourism in  Nainital Kumaon , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Almora  Kumaon , Uttarakhand; Developing Education Tourism in Pithoragarh  Kumaon , Uttarakhand; गढ़वाल में शिक्षा पर्यटन विकास ; कुमाऊं में शिक्षा पर्यटन विकास , हरिद्वार में शिक्षा पर्यटन विकास ; देहरादून में शिक्षा पर्यटन विकास , उत्तरी भारत में  शिक्षा पर्यटन विकास की स्म्भावनाएँ ; हिमालय , भारत में शिक्षा पर्यटन की संभावनाएं , Development of Education tourism in rural Uttarakhand , Development of Education Tourism in Silogi , Malla Dhangu Pauri Garhwal

Bhishma Kukreti

Parya: A bad story style from a learned literature analyst

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection 'Udrol' (Stories written by Sandeep Rawat -1  )
(Review of 'Parya' a
Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat  )
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
-
Parya a Garhwali story  is as "There was a king and Queen and both died and that is the end of story".  There are worse than this story in Garhwali and I never criticized badly those stories. However, when a literature analyst as Sandeep Rawat publishes 'Parya' type story it is painful for me and for the whole Garhwali literature community.
Garhwali literature creative have more responsibilities than Hindi writers that their literature create more readers and make Garhwalis habitual of reading Garhwali prose. However, the' Parya' story by Sandeep frustrates me. The story is real one that a young woman loses her husband and she nurtures her two sons by raising buffalos and agriculture.  The potentiality is very high in the plot for showing struggle, pain and brave heart of the young widow but Sandeep fails on taking advantages of the potential plot.
   
Garhwali short Story – Parya
By Sandeep Rawat
From 'Udrol' a Garhwali Short Stories  Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


Bhishma Kukreti

प्रवासियों का उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन विकास में योगदान

Contribution of Migrated Uttarakhandis for Education Tourism Development
उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 8
Education Tourism  Development in Uttarakhand -8
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  411
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 411
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती
-   उत्तराखंड भाग्यशाली है कि इस क्षेत्र में शिक्षा विकास में प्रवासियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई।  कुमाऊं व गढ़वाल विश्व विद्यालय खुलवाने में स्व हेमवती नंदन बहुगुणा का योगदान कौन भुला सकता है और हेमवती नंदन बहुगुणा स्वयं एक प्रवासी ही थे।     शिक्षा पर्यटन हेतु निम्न मुख्य संरचनत्मक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है (Infrastructure for Education Tourism )-*
क्षेत्र व छात्रों अनुसार शिक्षण संस्थान खुलना
* विविध व मांग अनुसार विषय शिक्षण
*  निपुण शिक्षकों की उपलब्धि
* छात्रों , शिक्षकों , अभिभावकों , अन्य यात्रियों हेतु वास , रहवास व मनोरंजन की उपलब्धि
* छात्रों हेतु भोजन व अन्य आवश्यकता पूर्ति की उपलब्धि याने बाजार 
* पुस्तक उपलब्धि याने बुक सेलर्स *
अभिभावकों आदि हेतु दर्शनीय स्थल   

उत्तराखंडी प्रवासियों ने ब्रिटिश काल में शुरू से ही शिक्षा प्रसार में  धन व शारीरिक व अन्य तरह से योगदान दिया।   मल्ला ढांगू के सिलोगी  स्कूल खुलवाने में प्रवासियों का अप्रतिम योगदान रहा है।  स्व सदा नंद कुकरेती को  क्षेत्र के प्रवासी  सिलोगी स्कूल हेतु दान दिया करते थे।  स्व नंदा दत्त कुकरेती 'मैनेजर साब ' हर वर्ष भारत के अन्य शहरों में रहने वाले क्षेत्रीय प्रवासियों से मिलने जाते थे और सिलोगी स्कूल हेतु  सहयोग राशि प्राप्त करते थे।  जसपुर के स्व विष्णु दत्त जखमोला व कड़ती के स्व सूबेदार गोबरधन प्रसाद सिल्सवाल ने सिलोगी में दूकान व मकान चिनवाए थे जो शिक्षा पर्यटन हेतु इंफ्रास्ट्रक्चर ही थे। गैंडखाल में मिडल स्कूल खोलने व चलाने में तल्ला ढांगू  के दसियों प्रवासियों ने कई तरह से योगदान दिया।  किंसूर या पुळ बौण  मिडल स्कूल खुलने व चलाने में बिछला ढांगू के  दसियों प्रवासियों ने धन व अन्य प्रकार से योगदान दिया।  भृगुखाल कॉलेज उदयपुर पट्टी , पौड़ी गढ़वाल की स्थापना व चलवाने में भी कई प्रवासी जैसे ढांगळ  के स्व टीका राम कुकरेती का कई तरह से योगदान  रहा है।    कई प्रवासियों के पुत्र -पुत्री शिक्षक बनकर उत्तराखंड में रहने लगे।  जैसे सिलोगी स्कूल में ग्वील के युवा प्रवासी स्व जानकी प्रसाद कुकरेती लखनऊ छोड़कर सिलोगी बसे    आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों के अध्यापक प्रवासियों के निर्मित मकानों में रहते हैं जो एक तरह का योगदान ही तो है।  इसी तरह लगभग सभी क्षेत्रों  के प्रवासियों ने अपने अपने क्षेत्रों में शिक्षा प्रसारण में अप्रतिम योगदान दिया व आंतरिक शिक्षा पर्यटन को विकसित किया।   गुरु राम ऐज्युकेसन ट्रस्ट के महंत स्व इंदिरेश चरण दास भी प्रवासी ही थे जिन्होंने उत्तराखंड, हिमाचल  व पंजाब में शिक्षा प्रसार हेतु अविश्मरणीय योगदान दिया  । 
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Bhishma Kukreti

Band Kara Polythene: An Inspiring drama for stopping Polythene Bags Uses

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Stage Plays)
Review of Garhwali Stage Play collection 'Bandyo ki Chitthi (Plays by Dr. Umesh Chamola -1 )
(Review of Children Stage Play 'Band Kara Polythene) ' the Stage play created by Dr. Umesh Chamola    )
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian and Critic)
-
   Dr. Umesh Chamola is a versatile Garhwali language literature creative that created short stories, novel, dramas and collected folk stories too. 'Bandyo ki Chitthi (letter from Forest Godess) is 10 children Garhwali dramas collection by Umesh Chamola. 'Band Kara Polythene' is first stage drama from the said collection.
           The drama 'Band Kara Polythene' is about the wrongs of polythene and very harmful for the earth and for the animals health too. The drama is short but purposeful and inspiring too.
The language, the dialogues, are simple for children and the twist is proper for inspiring children for not using polythene bags.
  The education department should instruct teachers for playing the said  drama in every  school.

Copyright@ Bhishma Kukreti
Garhwali Children Stage plays /dramas from Block, Pauri Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Chamoli Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Tehri Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Garhwali Children Stage plays /dramas from Dehradun Garhwal, South Asia;


Bhishma Kukreti

Shukracharya: The first management Guru of the Earth

(Guidelines for Chief Executive Officers (CEO) series -1

By : Bhishma Kukreti (The management Historian)

Today, management authors cite examples of many Management Gurus. However, the first management Guru had been Shukracharya.
Mahabharata is the first recorded book that deals first time on King managing the kingdom.  Mahabharata is the first recorded book that refers first time the Neeti or policy or code of conduct or management (mostly King or Kingdom officers or mangers). 
    In 59th Chapter of Mahabharata of Shanti Parva (After the death of Bhishma and Bhishma offering Management lessons to Yudhishthara) , there is discussion on Neeti or Policy or management science  In that chapter, the narrator states that when in the earth there was loss for righteous deeds , Gods reached to Prajapati and requested him to bring back the Dharma (righteous deeds) . Prajapati create a Shastra that is Neeti Shastra (Policy, morality management) or Dandneeti.
  It is stated in  Shukraneeti book (1) that initially, Shiva created Vaishalaksha Neetishastra comprising 10000 shlokas. Indra condensed that Grantha and created Bahudantak shastra comprising 5000 shlokas. After that, Gods  Guru Brihaspati condensed Bahudantak and created Baharspatya Grantha comprising 3000 sholkas. Later on Shukracharya ( Guru of Devils) condensed Baharspatya Grantha and created Shukraneeti comprising of 2200 shlokas.
  Shukraneeti was essential for Kings to manage the Kingdom.  From that time , other Kingdom management gurus as Vidur , Prahsar, Bhishma , Chanakya folloed Shukraneeti too. Today too, Shukraneeti is essential for chief executive officers , prime ministers, ministers, managers at various levels to follow Shukraneeti for managing the institution.
Shukraneeti deals with the rights and duties of the King (CEO); Rights and Duties of prince (second in command); Characteristics of Nation and King (Institution and CEO); Characteristics of friend and enemy; Resource management; Relationship between the King and the citizens (Relationship between CEO-staff- customers); Art and Knowledge; Common policies; King characteristics; defence mechanism ; army management (strategies) etc. All the above subjects of Shukraneeti are relevant today for all managers and CEOs .
  In the following chapters, this author will offer teaching of Shukraneeti relevant to politicians, administrators, managers and policy makers at all levels in all institutions including UNO.
  References
1-Shukraneeti (Neeti Vishayak ek Shreshtha granth) , Manoj Pocket books, Delhi , page Vishay pravesh 1-3)
     
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
Guidelines for Chief Executive Officers; Guidelines for Managing Directors; Guidelines for Chief Operating officers (CEO); Guidelines for  General Mangers; Guidelines for Chief Financial Officers (CFO) ; Guidelines for Executive Directors ; Guidelines for ; Refreshing Guidelines for  CEO; Refreshing Guidelines for COO ; Refreshing Guidelines for CFO ; Refreshing Guidelines for  Managers; Refreshing Guidelines for  Executive Directors; Refreshing Guidelines for MD ; Relevancy of Shukraneeti for CEOs

Bhishma Kukreti

Jhees: A Garhwali Story discussing pros and cons of Inter-Caste Marriage

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection 'Udrol' (Stories written by Sandeep Rawat -3)
(Review of 'Jhees' a Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat)

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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Jhees story by Sandeep Rawat raises the discussion on inter-caste marriage. Two [air fell in love from the childhood and they desire to marry with each other too. However, society rules, culture and future do not allow for inter –caste marriage.
  The story narration is simple and having common proverbs as Machhi Pani jan Jyu Paran. Sandeep followed the story telling style of folk story telling style that is simplest way. The story lacks romance that was a must in such plot. However, Sandeep leaves a question for the readers and up to certain extent , that makes story impressive.
Garhwali short Story – Jhees 
By Sandeep Rawat
From 'Udrol' a Garhwali Short Stories Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


Bhishma Kukreti

शिक्षा पर्यटन के प्रेरक कारक

Motivational factors for Education Tourism Development

उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  - 8
Education Tourism  Development in Uttarakhand -8

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  411

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 411

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती

-  शिक्षा पर्यटन के मुख्य प्रेरक कारक मुख्य हैं - स्थान की छवि ( जात -पांत ; भेदभाव आदि ) -कम रिस्क
विदेशी भाषा ज्ञान प्राप्ति
भौगोलिक सुगमता या सुलभता
सांस्कृतिक सुगमता
उच्च शिक्षा में उच्च छवि अथवा विशेष शिक्षा जो देस में उपलब्ध न हो सुरक्षा अंतरास्ट्रीय संस्कृति तक पंहुच
देस में विशेष शिक्षा का आभाव
रोजगार प्राप्ति में सुगमता या अधिक लाभ
प्रवेश व वीसा आदि की सुगमता
शिक्षा व रहवास की कीमत
शिक्षा स्थल में  शिक्षा के साथ कमाई के साधन
शिक्षा उपरान्त विदेश में वसने की सुविधा
समाज का प्रभाव
   

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Bhishma Kukreti

Chief Executive Officer should know about Code of Ethics

(Guidelines for Chief Executive Officers (CEO) series -2

By: Bhishma Kukreti (The management Historian)
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  सर्वाभीष्टकरं  नीतिशास्त्रं  स्यात सर्वसम्मतम I
अत्यावश्यं नृपस्यापि स सर्वेषां प्रभुर्यत: .I 12 I  (शुक्रनीति )
Srvabhishtkarn neetishastra syaat sarvsammtam
  Atyavshyam nripsyapi s sarvesham prabhuryta: 12 (Shukraneeti
The knowledge of Neetishastra (Code of Ethics or Knowledge of Ethics) helps in achieving the target .
The knowledge of Neetishastra is essential for chief executive officers, directors, chairmen, and managers. 
  Apart from business laws, the chief executives face various ethical obligations those are beyond constitutional laws.  Chief Executive Officer is responsible for all the staff of his organization, the staff of associates and for carrying on those responsibilities.
    The study of ethics is nothing but the study of values, principles standards within the organizational environments.
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
Guidelines for Chief Executive Officers; Guidelines for Managing Directors; Guidelines for Chief Operating officers (CEO); Guidelines for  General Mangers; Guidelines for Chief Financial Officers (CFO) ; Guidelines for Executive Directors ; Guidelines for ; Refreshing Guidelines for  CEO; Refreshing Guidelines for COO ; Refreshing Guidelines for CFO ; Refreshing Guidelines for  Managers; Refreshing Guidelines for  Executive Directors; Refreshing Guidelines for MD ; Refreshing Guidelines for Chairman ;  Ned of Knowledge of ethics by CEO, Chairman, MD, Directors