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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

 
भाजपा का हमबग पब्लिसिटी, बर्नम विज्ञापन  शैली या  हाइपर मार्केटिंग 
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आलेख : भीष्म कुकरेती

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  मैं  1985 व उससे बहुत पहले से गुजरात घूमता रहा हूँ।  मैंने आज के प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी जी के मुख्य मंत्री काल में कई चुनावों का अनुभव भी लिया है।  एक  बात  सत्य है बल चाहे वह कम्म्युनिस्ट हो , कॉंग्रेसी हो , कड़गम पार्टी का हो या मायावती , ममता या भाजपा की पार्टी का ही क्यों हो नरेंद्र मोदी   प्रचार शैली  के सब कायल हैं और इसीलिए सब मोदी शैली से चिढ़ते भी हैं। 
   मुझे लगता है मोदी में यह प्रचार कला उनके अंदर है और   मोदी अपने प्रचार सलाहकारों को ध्यान से सुनते हैं। 
   विरोधी मोदी के  प्रचार को फेंकू प्रचार कहते हैं या हमबग प्रचार कहते हैं (वास्तव में हमबग प्रचार का अर्थ है डींग भरा किन्तु बिना हानि वाला प्रचार या विज्ञापन ) जिसे अमेरिका के एक बहुत बड़े महान शोमैन (शो, प्रदर्शनी करते  थे ) पी टी बर्नम  (उन्नीसवीं सदी अंत व बीसवीं सदी प्रारम्भ) ने क्रियावनित किया था।  पी टी बर्नम  की विशेषता थी कि बहुत छोटी चीज को वे इस तरह प्रचारित करते थे कि उनके इस  प्रचार में  भ्रम , संसय , आकांक्षाओं , आसा , आश्चर्य , 'असीम हर्ष पाने  हेतु  कुछ करना' सभी कुछ का अजीव सकारात्मक मिश्रण होता था।  उनके आलोचक भी कहते थे कि बर्नम  के प्रचार में भ्रम व संसय भी सकारात्मक होता था।  यह तभी होता था जब बरनम  ने अतिश्योक्ति को भूमि पर उतारा प्रचार में भी और शो (प्रदर्शनी ) में भी। पी टी बर्नम  के विज्ञापन व पब्लिसिटी /प्रचार को आज तक के संसार में बीस प्रभावकारी प्रचारों में सुमार किया जाता है (ट्वेंटी ऐड्वेरिजमेंट्स दोज शुक द वर्ल्ड ) .
   मार्केटिंग कर्ता  हमबग ऐडवर्टीजमेंट, हाइप क्रिटिंग ऐडवर्टाइजमेंट , अतिश्योक्तियुक्त विज्ञापन  को समझते हैं किन्तु आम राजनीतिज्ञ अभी भी नहीं समझ रहा है और भाजपा ने 2014 के अतिश्योक्ति  युक्त प्रचार को आगे सरकाया ,बढ़ाया , विकसित किया  है व इसे हमबग पब्लिसिटी के करीब ला दिया है किन्तु विरोधी केवल विरोध कर रहे हैं या कुछ स्थानों में गठबंधन कर रहे हैं किन्तु  हाइप्ड पब्लिसिटी /प्रचार  , बर्नम  शैली का कोई तोड़  नहीं खोज पाए हैं

        भाजपा द्वारा बंगाल में 22 सीट लाने का दावा व इस दावे का प्रचार

हाइपर या हमबग प्रचार का सबसे उमदा  उदाहरण है भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा  एक वर्ष पूर्व प्रचारित करना कि भाजपा बंगाल में 22 लोकसभा सीटें जीत रहीं हैं।  मीडिया,  भाजपा कार्यकर्ताओं , भाजपा नेताओं व विरोधियों द्वारा '22 लोक सभा सीट ' जीतने के प्रचार को इतना हाइप किया गया कि भाजपा कार्यकर्ता , मीडियाकर्मी , विरोधी मीडियाकर्मी , कॉंग्रेस कार्यकर्ता , कम्म्युनिस्ट कार्यकर्ता ही नहीं  तृणमूल कॉंग्रेस के सभी  नेता व कार्यकर्ता मान के चल रहे हैं कि भाजपा बंगाल में 22 सीटें जीत रही हैं।  तभी तो ममता बनर्जी व उनके सहयोगी अजीब अजीब बयान दे रहे हैं जो उन्होंने 2014 में नहीं दिए थे।  हाइप्ड पब्लिसिटी ,  हमबग पब्लिसिटी या बर्नम पब्लिसिटी  बड़ी प्रभावकारी होती है और 2019 के बंगाल लोक सभा चुनाव तो साबित कर ही रहे हैं बल बर्नम पब्लिसिटी या हमबग पब्लिसटी कारगर पब्लिसिटी है।
          चुनाव कोई भी जीते कोई हारे क्योंकि चुनाव में जीतना कई जटिल घटकों के मिलने से जीता जाता है और प्रचार एक मुख्य घटक है बस प्रचार अन्य कई मुख्य व गौण घटकों को एक करने में सहायक भूमिका निभाता है।  किन्तु इस बार के चुनाव में भाजपा द्वारा प्रयुक्त हमबग पब्लिसिटी , बर्नम पब्लिसिटी या हाइप्ड पब्लिसिटी को याद किया जाएगा व विज्ञापन विद्वानों हेतु खोज का विषय अवश्य होगा कि हमबग , बर्नम शैली के प्रचार ने कितना प्रभाव डाला। 

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती


Bhishma Kukreti

 
जसपुर वळुं  तैं म्यूजियम दिखणम मजा किलै नि आंद ?
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चबोड़ , चखन्यौ , मसखरी : भीष्म कुकरेती
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दिल्ली , मुंबई म जसपुर ढांगू  वळुं  रिस्तेदार जसपुर वळुं पर भगार , लगांदन बल यूं जसपुर वळुं तै कुज्याण किलै म्यूजियम दिखणम क्योंकि औसंद आन्दी  अर किलै पसंद  नि करदन धौं।  इख तलक कि जसपुरा लोक लखनऊ का चकरघिन्नी , मुंबई क फिश म्यूजियम दिखणम बि  मजा नि लीन्दन।  जसपुरा लोक बाग यूं म्यूजियम तै इन दिखदन जन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रधान मंत्री पद तै उदासीन भाव से दिखदान। 
   भौत सालुं तक मि हौर गांव वळुं  भगार , लांछन , अभियोग , उलाहना सुण नु रौं मीन इनि ध्यान नि दे जन  उत्तर प्रदेश , बिहार , उत्तराखंड सरकार पचास सालुं से पलायन एक समस्या पर ध्यान नि दीणा रैन।  पर जनि तीरथ भुलान पलायन आयोग बणायी मेरी बि निंद बिजि गे अर सोच बिचार करि मै समज आयी गे बल  जसपुर वळ म्यूजियम दिखण पसंद किलै नि करदन।  या बिगळीं  छ्वीं छन बल पलायन आयोग अबि बि स्टेटिक्स कट्ठा करणु च।  आयोग सदस्य सब रिटायर छन तो पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स को मजा कम से कम पांच साल तो ल्याला इ बल कि ना ?
   पलायन आयोग रिपोर्ट जब द्याल तब दिखला पर मेरी रिपोर्ट त तयार च।
    अच्छा हम म्यूजियम म क्या दिखदां बल हमर इतिहास क्या च , हमम क्या क्या अनोखी चीज बस्तर छन या क्या प्राकृतिक अनोखा पन  छौ।  जब हमर गाँव म हम बचपन से इ अनोखाइ प्राकृतिक छटा दिखला तो क्या हमतैं नियाग्रा फाल पसंद आल  क्या ? कत्तै नि आंद।  जैन बचपन म होस सम्बाळदा  हि समिणा गाँव ग्वीला अळगौ बखारी छिंछ्वड़ देखि हो अर बरसाती रातों म रोज बखारी डांडो छिंछ्वड़ ै आवाज से डरदो हो वै तै नियाग्रा फाल क्या पसंद ालो।  बरसात बखारी झरना म जु फ्यूण , जो उफान , जु डरावनी ध्वनि पैदा हूंद छौ वांकी याद से ही जसपुर वळुं तै बकै झरना फरना  दिखणम मजा नि आंद।
  फिर जसपुर का बच्चा जनि तीन चार सालौ हूंद छौ गांव म घुमण शुरू हूंद छौ वु राधु ददा जी (अब जगदीश चचा जी अर बंधु ) अर सस्ता ददा जी (अब गोविन्द चचा जी  )  क खड्ड उबर से रुबरु हूंद छौ।  दस बारा साल तक हमर समज म ऐ जान्द छौ बल यी उबर कम से कम , आजा हिसाब से डेढ़ सौ  साल पुरण त रै इ ह्वाल।  खड्ड उबर माने ठंड , ग्राम से बचत /रक्षा।  जै गांव वळुंन यी धरोहर देखि हो वै गां वळुं तै म्यूजियम क्योंकि मजा आल  भै ? तुमि बताओ ?  अब गोविन्द चचा जी अर जगदीश चचा जीन यी खड्ड उबर भरी ऐन अर मकान अब आधुनिक ह्वे गेन तो शायद नई पीढ़ी तै म्यूजियम दिखणम मजा आलो।   इनि जखमोला सौकारुं तिबारी बि उन्नसवीं सदीs  याद दिलांद छे अब वा तिबारी अब ध्वस्त करे गे अर नै मकान आयी गे।  ऊनि बहुगुणो तिबारी छन वो बि ध्वस्त ह्वे गेन अब पर एक जमाना हम जसपुर वळुं कुण यी तिबारी दिखण माने लाल किला दिखण।  इन म मेरी जनरेसन वाळुं से क्वी आसा कारल बल हम म्यूजियम दिखणम इंट्रेस्ट ल्योला तो यु त हमर ऊपर जुलम ही होलु जन सवर्ण आरक्षण तै जुलम मणदन उनी जुलम।
    इनि चार पांच सौ साल पुरण  ग्विल्ल का ठौ (धातु की सांप , बंदळ आकृति आदि ) हो सौ साल पुरण  नागराजा मंदिर दिखयूं हो वो जगन्नाथ  मंदिर म क्या इंट्रेस्ट ल्यालो ?
कुकरेत्युं क्वी पुराणी तिबारी नी छन किले कि हम ोरोजिनल कुकरत्यूं तिबारी तो महा भू स्खलन म बॉगी गे छ शायद अंग्रेज आण से पैली।या 1850 का बाद। बस हम तै यी जरूर याद दिलाये जान्द बल हमर गां म पाणी छौ अर महास्खलन म उ पाणि तौळ चौळ गे अर अब उखम एक नौळी च जु दुसर गाँव सौड़ की हद्द म च।  इतहास से हम रुबरु बचपन से इ ह्वे जांदा त म्यूजियम प्रेम से क्या लीण -दीण ? इनि कबि जसपुर की धरोहर शिवाला आज ग्वील की शान च भी तो इतिहास गवाह ही च इनि ठंठोली हद्द म गोदेश्वर शिवाला बि त जसपुरौ इतिहास गवाह च बल कबि यूं द्वी शिवाला पर जसपुरौ अधिकार छौ अर यूं  द्वी   जगा मड़घट बि छौ। 
    बौद्ध  गया दिखणम बि जसपुर वळुं तै क्वी इंट्रेस्ट नि   आंद अरे जौन अपण गांव, तीन सौ साल पुरानी संस्कृति गवाह याने  डळयों मट्ठ  देखि हो ,  वूं तै कै बि म्यूजियम दिखणम क्या मजा आलो ?
   जौंक गांवम कुकरेती जाति 600 साल पुरण पितर्वड़ हो वूं तै फतेहपुर शीकरी  दिखणम क्या मजा आलु।  जै गांव म तीन सौ साल पुरण हल्डूणो डाळ , चारेक सौ साल पुरण बौड़ौ डाळ हो द्वी सौ सालपुरण सिमळो डाळ (अब एक लखड़ अस्पताल भवन पर छन ) . द्वी सौ साल पुरण कंडारs डाळ (ग्वाळ का उड्यारी से अंदाज लगद ) हो, जै गांवम द्वी सौ साल पुरण  कुंळै डाळ , 1890 का करीब का खड़ीक हो ,  वै गाँव वळ कोलकत्ता का बॉटनिकल गार्डन दिखणम क्या इंट्रेस्ट ल्याला ?
      इनि जौं गां वळुंन 1860 का न्याड़ ध्वारा स्कूल टंकाण स्कूल देखि हो वो नालंदा विश्व विद्यालय का खंडहर म किले इंट्रेस्ट ल्यालो भै ?
    हां इन दिखणम आयी बल जसपुर की नई साख अब म्यूजियम या पर्यटन स्थल भ्रमणम इंट्रेस्ट लीण लग गे बल तो कारण च बल या नई नवाड़ी जनरेसन  म्यूजियम से सिखणी च बल कनै 600 साल से पुरण जसपुर क्षेत्र तैं पर्यटक स्थल प्रसिद्ध करे जावो।  दिख्या क्या हूंद धौं.
   
Copyright @ Bhishma Kukreti , मई 2019
   
       

Bhishma Kukreti

   
           लाटु (मूर्ख ) बणि लाभ उठाण

(राहुल गांधी जी, तेज प्रताप यादव जी  से क्षमा याचना सहित )

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चबोड़ ,चखन्यौ , कंडाळी : भीष्म कुकरेती 
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      मराठी म बुल्दन   एड़ा बणि पेड़ा खाण मतबल लाटु बणि मजा लीण।    मीन मूर्ख बणि लाभ उठाण बाळापन से इ सीखि आल थौ।  मि तै तमाखू से बड़ी चिढ़ छे।  पर गांवम संस्कृति छे बल बच्चों से तमाकू भरवाओ , हुक्का पाणी बदलावों।  पैल पािल मि तै बि काम दिए गे मीन लाटू (मूर्ख ) बणि चिलम पर तमाखू  मथि आग अर आग मथि चगटी धौर।  तमाखू भराण वळ ददा , काका न धमकाई बि च बल 'क्या रे भीषम ! मीन सूण बल पढ़न म टी हुसियार छे फिर चिलम भरण नि आंद ?'
मि मूर्ख जन चुप्पी रौं , कुछ नि ब्वाल। 
   दुसर दैं कै हैंक  बडा जीन हुक्का भरणो दे।  मीन चगटी सजला क दुंळ मथि  धार अर फिर तमाखू अर तब आग।  अर दे दयायी हुक्का बाडा जी तै।  स्वास फूल गे बाडा  जीक पर धुंआ नि आयी।  सजला उफार तो पता चौल बाडा जी तैं ।  बाडा जीन ताबड़ तोड़ ऐज्युकेसन ण की ऐसी तैसी करदा ब्वाल ," हराम का बच्चा मास्टर फोकट की तन्खा खाणा छन बच्चों तैं ठीक से तमाखू भराण बि नि सिखान्दन "
  बस द्वी तीन दैं मूर्ख बणि तमाखू गलत भौर तो फिर कैकि  बि हिम्मत नि ह्वे कि इंडियन एजुकेसन सिस्टम पर तमाखु उछाळन। 
     मूर्ख बणनो बान भौत सा नलटण  करण पोड़दन।  जन कि स्कूल म पाद द्यावो अर मास्टर जी पूछन , ये कैकि पुटकी लग खाड ?  या कैकई पुटकी फट ? बस तुम चुम मुंडी तौळ राखो जन बुल्यां तुमन सूण इ नि हो धौं !
  बसम छोर्युं पर धक्का मारो अर मूर्ख जन व्यवहार कारो तो 100 दफै मांगन  40 दफै छोर्युं चप्पल खाण  से बचणो चांस मिल ही जांदन।  हाँ मूर्ख लगणो का स्वांग जरा ठीक से ही हूण चयेंद।  लाभ का वास्ता मूर्ख बणनो सिद्धांत च गळा लगो पर गळा नि पोड़ो या खुले आम आँख नि मारो।
    रजमर्रा म बि हम मूर्ख बणनो नाटक  करदा इ छा।  घाम ऐ जावो अर तुम बिस्तर पुटुक इ छवो तो पत्नी से मूर्ख बणी इ बच सकदा। बस रेल म कन्फर्म्ड टिकट नि तो मूर्ख बणि जगा या सीट हथ्याणौ कुण सबसे बड़ो हथियार हूंद लाटा या मूर्ख बणनो स्वांग कबि पास कबि फेल।  पास तो ठीक फेल ह्वे जावो तो सब साले चोर हैं भ्रस्ट हैं से गुस्सा निकाळो।
     ओफिस म बॉसक समि दिन म भौत दैं मूर्ख  हूणो नाटक करण इ पड़द अर यांकुण  एकि शब्द हूंद -OMG  ओ माई गौड मि तै आसा नि छे , मि नि समजदो छौ मूर्खता व्यक्त करणो वास्ता
एक रिसर्च से पता लग बल औसतन मनिख दिन म हर घंटा म  तीन दैं मूर्ख बणनो  नाटक स्वांग करदो बल। 
बुल्दन बल हुस्यार तै सलाह की जरूरत नि हूंदी अर मूर्ख सलाह नि लींद किन्तु मूर्ख बणनो स्वांग करणो बान हुस्यार हूण जरूरी च निथर मार पोड़ सकद। परीक्षाओं म बि कत्ती दैं मूर्ख बणि इ त नकल करे जांद।
बुले जांद बल मूर्ख गुस्सा म दुसरा  मुख कटणो जगा अपण नाक काटि दींदो किन्तु मूर्ख बणि लाभ उठाणम दुसराक नाक कटण पोड़द।
मूर्ख बणि नाटक करो पर एक कहावत बड़ी बढ़िया च बल - बुलण नि आवो तो मूर्ख बणि मुख बंद रखण अधिक लाभकारी जि हूंद।
मूर्खता पर बात हूणी त हम सब तै पता च हम  मूर्ख या लाटु पर दया करुणा इलै दिखांदा  वै तै पीट नि सकदा।  अर यी सिद्धांत च मूर्ख बणी लाभ उठाणो।  तुमन बि मूर्ख बणी लाभ उठायी कि ना ?

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती , मई 2009
गढ़वाली व्यंग्य , मूर्खता पर गढ़वाली व्यंग्य , मूर्खता नाटक पर गढ़वाली व्यंग्य , गढ़वाली हास्य व्यंग्य।  उत्तराखंडी हास्य व्यंग्य
 

Bhishma Kukreti

     
   लाल साफा , पंखी /कमुळ अर होलडॉल संस्कृति समळौण
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खिचरोड़ : भीष्म कुकरेती
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                  मि संस्कृति चिन्हों तै बगदी नदी मणदु अर कबि बि बचाणो पैरवी नि करदो।  दिखे जाव त पूरो भारत खासकर सनातन यानी हिन्दू धर्मी तो संस्कृति प्रेमी हून्दन किन्तु संस्कृति से चिपकण पसंद नि करदन अर इलै इ हम हिंदुन जंदेउ , चुप्पा , संध्या सब छोड़ि   आल   बस जात पात संस्कृति नि छोड़ सकणा छन।  गढ़वाळ इ ना पूरो भारत म भौत साल ना कुछ साल पैल तक एक संस्कृति छे लाल साफा/ गमछा , पंखी /कमुळ अर बिस्तरबंद /होलडॉल संस्कृति।
     लाल  साफा , अंगोछा या घुटन्ना केवल गढवालम ी आवश्यक नि छौ दक्षिण अर नार्थ ईस्टम बि  म बि भौत हद्द  तक आवश्यक थौ।  साफा आजौ तौलिया जन प्रयोग हूंद था , साफा भौत दैं जंग्या विकल्प बण जांद थौ , नक् पुंजण से लेकि बदन पुंजण तक साफा की जरूरत हूंदी थै।  भैर दुसर गां जाण हो , पौणे म या ऊनि कंदा उंद साफा जरूरी छौ।  भैर गां म नयाण धुयाणम काम त आंदि छौ साफा अर फिर कैन एकाद  क्याळै फोळी , चारेक अगौ मुंगरी थ्वाथा , अरसा जोळ दे द्याई तो साफा ही तो थैला काम आंद थौ।  साफा आवश्यक छौ तबि त सन 80 तक मुंबई म बि तिरैं  बरखी म मेमानों तै भेंट म लाल साफा दिए जांद था।  अब लाल साफा जगा  छूट हैंड टावलन लि  आल। 
      इनि पंखी या कमुळ बि आवश्यक छौ।  दुसर गां , शहर जाण हो त पंखी या कमुळ कंदा उन्द टांगि लिजाण बि जरुरातौ हिस्सा छौ।  बरात पौणै  या मेमानदारीम दुसर गां जाण हो अर बीच म बरखा ऐ जावो तो कमुळ या पंखी क झुम्पा बणै बरखा , बरफ़बारी से बचणो बड़ो आसान तरीका छौ।  फिर हैंक गाँवम ढिक्याण बिस्तरो इंतजाम नि हो त अपणी पंखी या कमुळ काम आंद था।  पैल भौत सा नेता पंखी लेक भाषण करदा छा अब तो केवल  हमर कोशियारी जी ही संसद म पंखी लेक दिख्यांदन।  असल म अब पैसा पाणी ऐ ग्यायी तो सभी जगा बिस्तर -ढिक्याण की व्यवस्ता होइ जांद।
          एक हैंक संस्कृति छे सरा संसार म अर वा संस्कृति छे होल्डॉल या बिस्तरबंद संस्कृति।  दुसर शहर जावो  त दगड़म बिस्तरबंद एक बड़ी आवश्यकता छे।  अंग्रेजी हकूमतन अपण सैनिकों बान होल्डॉल निर्मित करीन वो हमर संस्कृति बण गे।  ट्रेन , बस म सफर करदा दैं या ब्यौ बरात म धर्म शालाम ठहरदा दैं बिस्तर बंद की भारी आवश्यकता पड़दी छे अब बिलकुल ना किलैकि ट्रेन , बस म बिस्तर मिल जांद , धर्म शालाओं म अब किराया पर बिस्तर बंद मिल जांद तो बिस्तर बंद या होल्डॉल संस्कृति समाप्त ह्वे गे।  होल्डॉल कु अर्थ हूंद छौ सौब सामान का वास्ता  एक थैला या इंतजाम।  अब होल्डॉल की जगा कंदा म टांगण वळ बनि बनी डिजाइन म थैला ऐ गेन  त बिस्तरबंद अब कंदाबंद ह्वे गे।   

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती , मई 2019

Bhishma Kukreti

   

कैन अफवा सरायी , फैलाई बल मी कम्प्यूटर व्यसनी  छौं ?

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मजाक ,मसखरी , मुलमुल हंसी : भीष्म कुकरेती
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                   कैन  अफवा फैला  दे  बल भीषम त कम्प्यूटर व्यसनी च याने कम्प्यूटर गुलाम च , बल भीषम बगैर कम्प्यूटर का रै इ  नि सकुद।  ऑवर लोगुंन त सच नि मानी पर मेरी ध्याणि , घरवळि , अर्धांगनीन  न सच मानि दे  जन हरीश जुयाल कुटज की वाइफन गिरीश सुन्दरियाल की उदायिन अफवा तै सच्च मानी दे बल हरीशन फिर से पव्वा , दारु , नौटांग शुरू कर दे।
  अब बथाओ यु ठीक च जब मे तैं नातणि गू पुंजण छौ तब मि ई मेल चेक करदो कि कखि कैं सामाजिक संस्थान क्वी  अवार्ड , इनाम किताब दीणो फैसला त नि कौर हो।  अब साहित्यकारै आस त बुडेंद तक ही ना मड़घट जाण तक हूंदी च बल कि एकाद अवार्ड सवार्ड मिल जाव !
मि अर  कम्प्यूटर ऐडिक्ट , ढब्युं , व्यसनी ?  मीन बड़ो ऐना म अफु तैं ठीक से टक्क लगैक घूर क्या द्याख त पायी कि मी बि आम मनिख खासकर आम  मिडल क्लास भारतीयौ तरां माल न्यूट्रशन , कुपोषण का शिकार ना अपितु अति भोजन प्रियता 
   अर कचर  पचर खाणो कारण     गेरी इन चढ़ी गे जन बुल्यां   नौ मैना दुबास्ता जनानी की गेरी हो।  हाँ मुख पर जरा जरा पीलो पण च पर मै नि लगद यु कम्प्यूटर व्यसनी चिन्ह च अपितु भौत दिनों से मि भैर घूम इ नि छौ तो सूर्य किरण अप्राप्ति से गल्वड़ -सल्वड़ पील पोड़ गे ह्वाल।  पर मि देर रात तक कम्प्यूटरs समिण त नि रौंद बैठ्युं। 
मि अर कम्प्यूटर ठसकी व्यसनी ? ना जी ना बिलकुल कत्तई ना। हाँ     उ ठीक च जब दाढ़ी बणानो टैम हूंद मि  फेसबुक म अपर ना हौरुं Like , Comments , Love टटोळणु रौंद कि मि जु गढ़वाली नाटकों इतिहास पोस्ट करदो तो केवल चार Like एक फोकट माँ great कमेंट अर दगड्यों फोटो पर 400 Like अर 200 comments . इन मा दाढ़ी प्राचीन ऋषि मुन्युं तरां बढ़ गे।  अर दोष कम्प्यूटर ौ नी च अपितु मीन काका हाथरसी की कविता पौढ़  बल " औरत की सोभा साड़ी  में , मकान की शोभा सीढ़ी में मर्द की शोभा दाढ़ी में '  अब काका हाथरसी च्याला हूण क्वी गुनाह या व्यसन तो नी ना !
  मि अर कम्प्यूटर ऐडिक्ट ?  जब अपण चेयर की गंदी गद्दी साफ़ करणौ बगत  रौंद तब मि धनेश  कोठारी , दिनेश ध्यानी सरीखों पोस्ट पढ़णु रौंद , ईर्ष्या , जळण  माँ राख हूणु रौंद  कि कन यूंन  भौत सा ब्लॉगों म अपण साहित्य प्रचारित कर याल।  अरे चेयर की गंदी गद्दे तो कबि बि साफ़ ह्वेई जाली किन्तु सहोदर साहित्यकारों की प्रगति से जळण बि महत्वपूर्ण च निथर बिचारा धनेश कोठरी , दिनेश ध्यानी निरसे नि जाल ? सहोदर साहित्यकारों की उन्नति पर जळण तैं कम्प्यूटर ऐडिक्ट त नि बुले सक्यांद ना ?
       फोकट म लोगुंन अफवा फैलाई दे बल भीषम कम्प्यूटर ऐडिक्ट ह्वे गे अर मेरी वाइफन सच्च मानी दे।  यांसे क्या ह्वे मि अल्लू , प्याज , हरी मिर्च , हरी भुज्जी , सुख्यूं आदो , छांछ ,  जु  मि ऑनलाइन मंगांद थौ  स्यु मेरी वाइफन बंद कराई दे , डेबिट कार्ड कैंसल हि कराई दे।  अब वाइफ बुल्दी बल चलो रियल शॉपिंग कारो अर वर्चुअल शॉपिंग बंद कारो।  वाइफ तै कनै बतौं जथगा समय मि रियल शॉपिंग म लगान्दु उथगा समय म मि सोशल मीडिया म दगड्यों पोस्ट की बड़ाई कम्मेन्ट्स देलु तो बिचारों साहस बढ़ल कि ना ? खामखां लोगुंन म्यार ऑनलाइन शॉपिंग तै कम्प्यूटर एडिक्शन नाम दे दयायी अर मि तै बदनाम कर दे । 
   मै नि लगद मि कम्प्यूटर ैदिक व्यसनी छौं।  हाँ कम्प्यूटर से प्यार च अर जरा सि खांद दैं बि की बोर्ड नि दिखे तो मे से खाये नि ज्यांद , ट्वायलेट म मोबाईल कम्प्यूटर नि हो तो झाड़ा ठीक से नि हूंद।  पर यो तो प्यार च , कम्प्यूटर लव च ये तै कम्प्यूटर एडिक्शन बुलण सरासर अत्याचार च।  आपकी राय क्या च ?

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मई 2009

Bhishma Kukreti

कैमा रोण (कांता घिल्डियाल की दिल छूने वाली कविता)

कवि नाम :   कांता डंगवाल घिल्डियाल   (जन्म ,-1974 पयाड़ी , खस पट्टी , टिहरी गढ़वाल )
Poetry by : Kanta Dangwal Ghildiyal
(Chronological History of Garhwali Poem, verses -284)
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला -  284  )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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कैमा रोण
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ढक्यां मोरू की
जरयीं  सांगळ पर
बरसूं बिटेन झुंटेयां
ताळों  हेरि हेरीक
छोरा छापर ह्वे जंदिन
गुठ्यारम घैंट्या किला ,
गिंजाळियों की धम्म धम्म
दगड़ हैंसदी उर्ख्याळी
मोर अग्वाड़ी झपन्यळि
फल फूलूं की डाळि
द्यो द्यबतौँ  की खदरी ,
धारा मंगरी तिबारी डिंड्यळि
भितरु असदें दि , चुल्ली , जंदरी
रौंत्याळि डांडी , नजिली पुंगड़ी
ब्वे की दिनी कुट्यरी बुज्यड़ी
चलमली सवादी पैणै पकोड़ी
बाड़ी -सगोड़ी , पुंगड़ी पटळि
दगड्यो की समूण  पराज बाडुळि
चोकम नाचदी  घेण्डुड़ी सेंटुलि 
गौं म थरपीं द्यब्तौं मंडुळि
बाटा फुण्ड बजदी  गाज्यों   की घंडुलि
वबरा भित्र धरीं कुटळि दाथुड़ि
नाड़ि नसुड़ि न्याजा निसाण
दाना सयाणा , धौ धियाण
(धाद , मई 2018 )



Bhishma Kukreti

Kanta Dangwal Ghildiyal : Garhwali Poetess using Figures of Speech with ease

(Chronological History and Review of Garhwali Poetry series -284)
Review by Bhishma Kukreti
   Kanta Ghildiyal published three or four Garhwali poems . However, Kanta Dangwal Ghildiyal gort full praise from editor and critic Madan Duklan and poetry critic Manju Dhoundiyal for Kanta using figures of speeches with ease and perfection as Metaphor, similes, alliteration, pun , homonym etc.
  Kanta Dangwal Ghildiyal was born in 1974 in Payari village , khas Patti of Tehri Garhwal. Kanta is post graduate in English.

कैमा रोण (कांता घिल्डियाल की दिल छूने वाली कविता)

कवि नाम :   कांता डंगवाल घिल्डियाल   (जन्म ,-1974 पयाड़ी , खस पट्टी , टिहरी गढ़वाल )
Poetry by : Kanta Dangwal Ghildiyal
(Chronological History of Garhwali Poem, verses -284)
s = आधी अ
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला -  284  )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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कैमा रोण
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ढक्यां मोरू की
जरयीं  सांगळ पर
बरसूं बिटेन झुंटेयां
ताळों  हेरि हेरीक
छोरा छापर ह्वे जंदिन
गुठ्यारम घैंट्या किला ,
गिंजाळियों की धम्म धम्म
दगड़ हैंसदी उर्ख्याळी
मोर अग्वाड़ी झपन्यळि
फल फूलूं की डाळि
द्यो द्यबतौँ  की खदरी ,
धारा मंगरी तिबारी डिंड्यळि
भितरु असदें दि , चुल्ली , जंदरी
रौंत्याळि डांडी , नजिली पुंगड़ी
ब्वे की दिनी कुट्यरी बुज्यड़ी
चलमली सवादी पैणै पकोड़ी
बाड़ी -सगोड़ी , पुंगड़ी पटळि
दगड्यो की समूण  पराज बाडुळि
चोकम नाचदी  घेण्डुड़ी सेंटुलि 
गौं म थरपीं द्यब्तौं मंडुळि
बाटा फुण्ड बजदी  गाज्यों   की घंडुलि
वबरा भित्र धरीं कुटळि दाथुड़ि
नाड़ि नसुड़ि न्याजा निसाण
दाना सयाणा , धौ धियाण
(Curtsy : धाद , मई 2018 )


Copyright@ Bhishma Kukreti < may 2019
Uses of Figure of speeches as similes, metaphor in Garhwali Poetries from Pauri Garhwal, South Asia ; Uses of Figure of speeches as similes, metaphor in Garhwali Poetries from Tehri Garhwal, South Asia ; Uses of Figure of speeches as similes, metaphor in Garhwali Poetries from Uttarkashi Garhwal, South Asia ; Uses of Figure of speeches as similes, metaphor in Garhwali Poetries from Chamoli Garhwal, South Asia ; Uses of Figure of speeches as similes, metaphor in Garhwali Poetries from Rudraprayag Garhwal, South Asia ;





Bhishma Kukreti

Ramu Patrol: Garhwali Drama depicting the Unresolved Forest Conflicts existing from Ramayana Era

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Stage Plays)
(  Stage Play 'Ramu Patrol 'written by Kula Nand Ghanshala  )
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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The question "Whose either state or the villagers right should be on the forest is unresolved from the time civilization started or copper era started. Ramayana story discusses through epical story the problems of right on forest (either by State is owner or villagers). The disputes or conflicts between state and villagers accelerate from British period when British declared rights of state on forests of Garhwal and leaving a small forest portion for the villagers. After independent, the situation worsened for ownership of forest or using nearby forest /forest produces by villagers and causing various environmental problems too.
  In Ramu Patrol drama, The famous North India language  Garhwali stage playwright Kula Nand Ghanshala tried for  depicting  all those problems of ownership of forests, need of villagers, need of protection, cutting state forests cruelly, Mussulmen using their power for destroying forests , forest fires destroying forest and then villagers agreeing for new plantation for preserving forests . This author was witness and Kula Nand Ghanshala too that in past if there is forest fire, villagers used to go to defuse further fire and were ready for preserving forests. But now, people are not interested in preserving forests because State does not give right on forest products to villagers or state does not permit for cutting their own trees.
   At the end Ghanshala conclude that cooperation among villagers, administration and state is must for preserving forest and environment.
There are eight scenes on this fine drama depicting the problem of environment and villagers needs. There are 15 performers in the drama those discuss and clear  the need and environmental issues.
        The dialogues are as per the class of performer as
Ram Singh Forest Guard-(with pride – Are Ram Singh Forest Guard ka Hondu kwee dalu ta kya ek Haryu Patta bhi ni todi sakdu
Poor man Danu (dwee hath Jodi ) – Dida mi dal ni chhaun katnau , mi ta munda chhaun katnu
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Shiva Nand (musclemen) –jaa be daanu tu faad lakhda dekhdu mi kan ni fanan daindu yu lakhda (ram singh ki tarfa dekhik)
  There is reasonable speed in the social and inspiration drama  due to various sentiments andt barring last lyrical messages,  there is no stereotype teaching and that is the characteristic of Ghanshala. The story seems to be realistic and day to day readers .Though, Kula Nand  depicts the problem of cutting our own trees through satirical and humorous means  but it is tragedy in real life for getting permission for cutting own planted trees or owned tree .
  Editor, Critic, Film performers, poet Madan Duklan rightly state that Ghanshala is College for Drama students.
As drama critics appreciate Mary Kathryn Nagle ,Jihae Park for their work on forest and  environment protection , same way t. Dr Manju Dhoundiyal a literature exert  appreciates the work of Kula Nand Ghanshala for his efforts on environment .
Ramu patrol (Garhwali Drama)
From drama Collection Rangchhol (2019)
Playwright: Kula Nand Ghanshala
Publisher :Samy Sakshya
Dehradun , North India

Copyright@ Bhishma Kukreti , May 2019
Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Garhwal ;  Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Pauri Garhwal ;  Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Chamoli Garhwal ;  Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Rudraprayag Garhwal ;  Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Uttarkashi Garhwal Garhwali Drama depicting forest uses Problems from Tehri Garhwal ; 

Bhishma Kukreti

 

म्यार बैंकॉक पटाया मसाज  का अनुभव
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चबोड़ , चखन्यौ , मसखरी : भीष्म कुकरेती
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  म्यार दिमागम , मगजम मसाज याने मालिश की द्वी छवि छन। 
पैल  छवि फिल्म या टीवी सीरियलों मा या तो सूमो टाइपो पहलवान कै  पितक्यूं मनिखो मालिशौ बहाना इन धुलै करद जन बुलया आटो ना माटु गुंदणु हो।  फिल्मों म जमींदार या भयानक हत्त्यारा खलनायक बि पहलवानो से मालिश करवाणो छवि मया दिमाग म च त दगड़म अमरीश प्यूरी , अनवर जान खलनायक की मालिश करदा छमना पात्तरुं  छवि बि दिमागम बैठीं च जी। 
  दुसर   छवि च दगड्यों सुणायीं बात - भाई बहिन जी - थाई मसाज याने श्रृंगार युक्त मसाज याने पटाया या बैंकॉक म मसाज।  म्यार दुकानदार मित्र बैंकॉक पटाया का अपण मसाज अनुभव तै इन रसीली भौण म सुणांदन बल ज्यू बुल्यांद आबि फ़्लैट पकड़ी बैंकॉक पटाया भाजी जौं।  पर फिर सुचदो बल मि तै महिला मालिशदारों से मालिश कराणो िनी शौक हूंद त हॉंककॉंग मकाउ  यात्रा म ही जनान्युं से मालिश करवै लींदो। 
मालिश , मसाज पर चिंता सुदि नि ह्वे।  भौत क्या कई सालों से गर्दन अर कमर दर्द की परेशानी छे।  जवानी म त डा अर द्वी ब्यौ या वाइफ अर भैर धरीं प्रेमिका मनिख झेल लींदो किन्तु बुढ़ापा म ना त डा सयेंदु ना ही द्वी कज्याण्युं  से सांजस्य हूंद। िनी जवानी म पेन किलर या अन्य दवाईयों से कमर दर्द अर गर्दन दर्द झेलणु  पर अब यीं उमर म परमानेंट सोल्यूसन की खोज म म्यार चार साल लग गेन।  एक मंहगा डाक्टरन त इख तक बोलि दे जथगा बि कमर बचीं च बचा ऐज बोनस।  अब द्याखौ कलियुग म इन बि डाक्टर छन जो जिंदगी बचाणम कम विश्वास करद बल्कि जिंदगी तै बोनस समजदु।  खैर इना उना भटकण अर यार दोस्त इ ना तांत्रिक मांत्रिकों की सलाह से मीन कनक्लूजन , निष्कर्ष निकाळ बल मसाज ही आखरी विकल्प च गर्दन अर कमर दर्द से निजात पाणो।
    पर मसाज से मै इन डौर लगणी राई बल कखी मसाज करंदेर या करंदेरी मि तै इन कुर्ची दे जन टीवी सीरियलों म सूमो पहलवान मसाज करदो दै मरीज तै पिटद या गुंदद मतलब खुटन थंथ्याद  ।  पता नि मन मा इन किलै नि आयी बल  मसाज बैंकॉक पटाया स्टाइल म बि त ह्वे सकद।  मि डौरन मालिश टाळणु रौं किन्तु भौत दिन तक नि टाळि साकु।  तब घरवाळि एक मालिश विषज्ञाणिम मै लीग।  मै लग मि भारत म ही बैंकॉक पटाया अनुभव करलु।
लेडीज मसाज मेकर बड़ी खूबसूरत छे अर अंग्रेजी जानकार छे तो स्यूर छौ बल सया छमना पातर त के इ होली।  अंग्रेजी ज्ञान भौत सी कमी छुपाई लुकाई दींद।
  लेडी मसाज मेकरन पैल मेंसे अर मेरी घरवळि से लिखित म लिखवाई बल मालिश से कुछ नुक्सान मि त मसाज मेकर ना मि इ जुम्मेवार होलु।  एकुण बुल्दन बल जैक मोर सीइ भौर। 
  लेडी मसाज मेकरन मै भितर ओप्रेसन रूम म भ्याज जख अति सुंदर अप्सरा सम बिगरैलि असिस्टिंग मसाज मेकरोंन में तै लंगोट पैरणो दे।  बैंकॉक पटाया मसाज अनुभवी दगड्योंन कबि  नि बताई बल मसाज म लंगोट पैरण पोड़द।  असिस्टिंग लेडी मसाज मेकरन लंगोट का बेड़ एक तौलिया पैरणो बवाल। अर मि तै एक कठोर किन्तु आरामदायक टेबल म उल्टां पड़ाळ दे।  मीन द्याख आस पास क्वी तेल फुलेल की क्वी बोतल नि छे जब कि दगड्यों अनुभव बुलणु छौ आस पास मालिस हेतु बनि बनि तेल बोतल हूण  चयेणु छौ। 
     थ्वड़ा देरम सीनियर मसाज मेकर आयी अर जूनियर मसाज मेकर  सावधान ह्वे गेन।  सं म्यार टेबल क पास चरी तरफ खड़ ह्वे गेन।
सीनियर मसाज मेकरन मेरी गर्दन की हड्डी पटकांद पूछ - कखम च डा ? मीन बताई अर मसाज मेकर हाथ सरकाणि राई फिर वींक हाथ उखम चल गए जख्म डा छौ मीन हांमी भौर।  सीनियर मसाज मेकरन जोर से हथन दबायी अर अपण जूनियरों तै आँखों आँखों म आज्ञा दे।  एक म्यार बैं खुटक कर अंगुळि नंग , दुसर दैं खुटक कर   अंगुळि नंग जोर से दबाण लग गेन मि तै इन डा ह्वे कि मि किराण मिसे ग्यों।   एक जूनियर न बोल ," मर्द जैसे बिहेव करो।  डोंट कराई लाइक हारे हुए लीडर '
   मि चुप ह्वे ग्यों ।  अफु तैं मर्द शाबित जि करण।  फिर मि तै यांसे बि बिंडी डाउ ह्वे  दिखाणो बान मि चुप्प इ रौ। गर्दन का तीन जगा डा छे तो हर हिस्सा  का दर्द वास्ता जूनियर मसाज मेकरुंन खुटक अलग अंगुळयूं नंग दबैन।  दर्द ह्वे  च भौत  ह्वै पर मि  पूरी तरह से सॉलिड मर्द बण गे  छौ।  सीनियरन फिर कमर का हिस्सा पटकै    कमर म हर अंग का  वास्ता मसाज मेकरुंन म्यार हाथs विभिन्न अंगळयुं नंग दबैन दर्द ह्वे  पर  मीन मर्दानगी नि छ्वाड़।
आधा या पौण घंटा सीनियर म्यार गर्दन या कमर का कै हिस्सा पटकाओ   अर जखम बि  दर्द हो प्रतिक्रिया स्वरूप जूनियर मसाज मेकर कखि ना कखि  दबाणा रैन। फिर जब   सब फारिक ह्वे त मि  तै खड़ करे गे अर कमर व गर्दन इना ऊना करणो आदेश दिए गे।   मीन कमर हलायी , गर्दन हिलायी , शरीर खुट तक झुकाई पर कखि दर्द नि ह्वे।  सब मसाज मेकर मे से अधिक खुस ह्वेन।
सीनियर  मसाज मेकरन बोल - मिस्टर कुकरेती यू मे नाउ  जो ऐंड रिलैक्स फोर हॉल  लाइफ। 
मीन आश्चर्य से पूछ - ऐंड व्हट अबाउट मसाज ?
एक जूनियर मसाज मेकरन उत्तर दे - ब्लडी फूल ! दिस इज नॉट मसाज सेंटर।   यह अक्युपंचर सेंटर है।  आते समय बाहर बोर्ड  नहीं पढ़ा क्या। बोर्ड में म साफ़ लिखा है "आयुर्वेद अक्युपंचर सेंटर" !   

Copyright @ Bhishma Kukreti , मई 2019
( जु कथा सच्च लग त मेरी कल्पनाशक्ति की प्रशंसा करण नि बिसरेन )

Garhwali Humor on Bangkok Pattaya Massage by writer of Jaspur Garhwal; Garhwali Humor on Bangkok Pattaya Massage by writer of Dhangu Garhwal; Garhwali Humor on Bangkok Pattaya Massage by writer of Dwarikhal Block Garhwal;Garhwali Humor on Bangkok Pattaya Massage by writer of Yamkeshwar Constituency Garhwal;Garhwali Humor on Bangkok Pattaya Massage by writer of Garhwal, Uttarakhand .


Bhishma Kukreti

  Baghai Bani: Garhwali Tale illustrating the reasoning for Tiger becoming Man-Eater

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Stories  series )
( Review of Story ' Baghai Bani '(213,written by Mahesha Nand )
Review by Bhishma Kukreti ( Literature Historian )
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   Those lived in rural Garhwal they knew that Tigers don't attack human beings nor they kill their prey until they are hungry.
         However, these days, it is common Guldar or Tigers or leopards attacking human beings and eating human flesh too.
   Mahesha Nand xplains the reason for tigers or Guldar becoming Man-eater through his modern story 'Baghai Bani' . 
Mahesha Nand is successful in telling the story through personification style. In this story, Tiger and Tigress talk as human beings talk.  The dialogues between tiger snd tiger open many secrets of relationship among forest , humans and wild animals.
Mahesha Nand showed the hunger , the tragedy emotional of hunger and then he also discusses the real difference between Pap and Punya (sins and virtues ).
  As Mahesha Nand famous for using words those are no more in common uses among Garhwali for illustrating story.
The dialogues between tiger and tigress are interesting and offer interest to the readers .
Over all the story puts sound impression on readers for protecting the forest and environment .
Copyright@ Bhishma Kukreti , May 2019
Garhwali Story – Baghai Bani
Story taken from collection Augar by Mahesha Nand
Publication Year -2013
Publisher Khabar Sar Prakashan ,Ppauri
Copyright@ Bhishma Kukreti, May 2019
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