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शेर दा अनपढ -उत्तराखंड के प्रसिद्ध कवि-SHER DA ANPAD-FAMOUS POET OF UTTARAKHAND

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 25, 2007, 01:55:05 PM

Risky Pathak

Below are the lines/poem which sherda recited at a function held at Kausani in 2008

गुणों  में  सौ  गुण  भरिया
यो दुनि में गुनै  चैनी
जो फूलो में खुसबू हुनी
ऊ द्याप्त दगे पूजी जानी

मंखी में गुण जै होला द्याप्त समान होल
और द्याप्त जै भीमै होला भीमै आसमान होल

रंग चदा ऊ लालो को, जो रंग में भिज गयी
मन्ख्या बाछ छी ऊ, द्याप्ता ठौर पूज गयी


Risky Pathak

Sabha's by Sherdaa


जा बात बात में हाथ मारनी वेथी कूनी ग्राम सभा
और जा हर बात में लात मारनी वेथी कूनी विधान सभा
जा एक कू और सब सुनानी वेथी कूनी शोक सभा
और जा सब कूनी ओ बाज्यू क्वे ने सुनों वेथी कूनी लोक सभा

Risky Pathak

Sherda Poem "Ko Chhai Tu???"



भुर भुर उज्याई जसी जानि रते ब्यान
भिकुवे सिकड़ी कसि उडी जै निसान
खित करने हसन और झु करने चान
क्वाथिन कुत्काई जै लगनु मुखक बुलान
मिसिर जै मिथ लागू के कार्तिकी मौ छे तू
पूषेक पाल्यु जस ओ खत्युनी को छै तू

दै जसी गौर उजई और बिगोद जै चिती
हिसाऊ किल्मोदी कसि मणि खट्ट मीठी
आँख की तारी कास आँख में ले रीठी
ऊ देई फुलदेई है जै जो देई तू हिटी
हाथ पाटने हरै जाँ छै कि रूडी दयो छै तू
सूर सूरी बयाल जसी ओ च्यापिनी को छै तू

जाले छै तू देखि छै भांग फूल पात में
और नोड़ी जै बिलै रे छै म्येर दिन रात में
को फूल अंगाओ हालू रंग जै सबु में छै
न तू क्वे न मैं क्वे मी तू में तू मी में छै
तारु जै अनवार हंसे धार पर जो छै तू
ब्योली जै डोली भिदेर ओ रूपसी को छै तू

उतुके चौमास देखि छै तू उतुके रयूड
सयूनकी सनगी देखि छै उतुके स्यून
कभी हरयाव चढ़ी और कभी कुंछई च्यूड
गद्युड़े छाल भिदेर तू काकडी फूलयूड
भ्येर पे अनार दानी और भिदेर पे स्यो छै तू
नौ रति पाऊ जानि ओ दाब्नी को छै तू


ब्योज में क्वाथ में रे छै और सैणा  में सिरान
म्येर दगे भल लगे मन में दिशान
शरीर मातन में त्वी छै तराण
जानि को जुग बति जुग जुगे पछ्यान
साँसों में कुत्कने है सामनी जै कि छै तू
मायदार माया जस ओ लम्छिनी को छै तू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

के दगडियों सी गोछा?
क्यूं दोस्तो सो गये?
1994 के उत्तराखण्ड आन्दोलन में अचानक विराम लगने से उत्पन्न व्यथा को कुमाऊनी कवि शेरदा "अनपढ" ने इन शब्दों में व्यक्त किया.इस दौर में भी इस कविता की प्रासंगिकता कम नही हुई है, जब राज्य बने 7 साल बीत चुके हैं और आम जनता नेताओं और पूंजीपतियों के द्वारा राज्य को असहाय होकर लुटता देख रहे हैं. कहीं भी विरोध की चिंगारी सुलगती नही दिख रही है. उम्मीद है कि शेरदा "अनपढ" की यह कविता युवा उत्तराखण्डियों को उद्वेलित जरूर करेगी.
चार कदम लै नि हिटा, हाय तुम पटै गो छा? के दगडियों से गोछा?
डान कान धात मनानेई, धात छ ऊ धात को?
सार गौ त बटि रौ, तुम जै भै गो छा?
भुलि गो छा बन्दूक गोई, दाद भुलि कि छाति भुलि गिछा इज्जत लुटि,
तुमरै मैं बैणि मरि हिमालाक शेर छो तुम, दु भीतर फै गो छा? के दगडियों से गोछा?
काहू गो परण तुमर, मरणै कसमा खै छी उत्तराखण्ड औं उत्तराखण्ड,
पहाडक ढुंग लै बोलाछि कस छिया बेलि तुम, आज कस है गो छा के दगडियों से गोछा?
एकलो नि हुन दगडियो, मिल बेर कमाल होल किरमोई तराणै लै,
हाथि लै पैमाल होल ठाड उठो बाट लागो, छिया के के है गो छा? के दगडियों से गोछा?
तुम पुजला मज्याव में, तो दुनिया लै पुजि जालि तुमरि कमर खुजलि तो,
सबूं कमरि खुजि जालि निमाई जै जगूना, जगाई जै निमुंछा के दगडियों से गोछा?
जांठि खाओ, जैल जाओ, गिर जाओ उठने र वो गर्दन लै काटि जौ तो,
धड हिटनै र वो के ल्यूंल कोछि कायेडि थै, ल्यै गो छा? के दगडियों से गोछा?

http://jayuttarakhand.blogspot.com/2007/12/blog-post_8393.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
Exclusive Interview of Sherda Anpad Famous Poet of Uttarakhand.

Interview was taken by Mr Charu Tiwari, Editor Janpaksh.

'मन में हो लगन, मु_ी में हो गगन'

कुमाऊनी भाषा के जाने-माने कवि शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' का जीवन सफर इतना रोचक रहा है कि उस पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। वह कभी स्कूल नहीं गये, पर स्कूल जाने वाले बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी उनकी कविता मेें निहित सादगी, गांभीर्य और हास्य को देखकर हतप्रभ रह जाते हैं। शेर दा के स्वभाव में बचपन से एक मस्ती है और इसी मस्ती में उन्होंने पहाड़ को लेकर जो रचनाकर्म किया है उसमें इतना वैविध्य और चुटीलापन है कि कोई भी उनकी कविता सुनकर उन्हें दाद दिये बगैर नहीं रह सकता। अपनी इसी मस्ती में वह अस्सी पार कर चुके हैं और अभी भी उनका रचनाकर्म जारी है। हल्द्वानी में उनके श्याम विहार स्थित आवास पर उनके जीवन और रचनाकर्म पर जब वरिष्ठ पत्रकार दीप भट्ट की उनसे विस्तार से बातचीत हुई तो उनकी यादों का सिलसिला उमड़ पड़ा। फिर शेरदा को जानने के लिए जगह कम पड़ गयी, इसलिए हमें अपने इस स्तम्भ की सीमायें तोडऩी पड़ीं। शेरदा हैं तो फलक भी बड़ा होगा। हमने इस साक्षात्कार को तीन पृष्ठों में प्रकाशित किया है। उन्हें जानने-समझने के लिए यह बहुत जरूरी है। पेश है उनसे हुई बातचीत के चुनिन्दा अंश :-

आपके बचपन की यादें किस तरह की हैं?

अपनी इस कविता- 'गुच्ची खेलनै बचपन बीतौ/ अल्माड़ गौं माल में/ बुढ़ापा हल्द्वानी कटौ/ जवानी नैनीताल में/ अब शरीर पंचर हैगौ/ चिमड़ पड़ गयी गाल में/ शेर दा सवा सेर ही/ फंस गौ बडऩा जाल में।' में मैंने अपने बचपन को व्यक्त करने की कोशिश की है। मुझे अपनी पैदाइश का दिन ठीक-ठीक याद नहीं है। उस जमाने में ऐसा चलन भी नहीं था। बाद में रचनाकर्म शुरू हुआ तो मित्रों ने तीन अक्टूबर १९३३ जन्मतिथि घोषित कर दी। मेरी पैदाइश अल्मोड़ा बाजार से दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित माल गांव की है। मेरा गांव हरा-भरा था। खूब साग-सब्जी होती थी। दूध और साग-सब्जी शहर में बेचते थे। हां, अनाज नहीं बेचा जाता था। मैं चार साल का था तो पिताजी चल बसे। माली हालत खराब हो गयी। जमीन, मां का जर-जेवर सब गिरवी रखना पड़ा। होश आया तो मुझे इतना याद है कि हम लोग गांव के ही किसी व्यक्ति के मकान में रहते थे। हम दो भाई थे। मुझसे बड़े भाई भीम सिंह और मैं। बड़े भाई तो अब गुजर गये।

इन हालात में तो काफी संघर्ष करना पड़ा होगा?

गांव में किसी की गाय-भैंस चराने निकल गया तो किसी के बच्चे को खिलाने का काम कर दिया। बच्चे को झूला झुलाने का काम करता था तो बाद में अपने इसी अनुभव को इस कविता में व्यक्त किया-

'पांच सालैकि उमर/गौं में नौकरि करण फैटूं/ काम छी नान भौक/ डाल हलकूण/ उलै डाड़ नि मारछी/ द्विनौका है रौछि/मन बहलुण।'
इस काम के बदले मुझे आठ आने मिलते थे।


आप स्कूल तो कभी गये नहीं, फिर अक्षर ज्ञान कैसे हुआ?

आठ साल की उम्र हुई तो शहर आ गया। बचुली मास्टरनी के यहां काम करने लगा। घर में नौकर रखने से पहले हर कोई अता-पता पूछता है तो उसने भी पूछा। मैंने बताया मां है, पर पिताजी गुजर गये। उसने भी सोचा कि बिना बाप का लडक़ा है। गरीब है, इसको पढ़ा देते हैं, तो उसने मुझे अक्षर ज्ञान कराया। फिर कुछ दिन वहीं गुजरे। बारह साल की उम्र में आगरा चला गया।


आगरा के अनुभव कैसे रहे?


आगरा में छोटी-मोटी नौकरियां कीं। वहां रहने का साधन था। दाज्यू इंप्लायमेंट दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी कर्मी थे। एक साल घूमता रहा। एक दिन सौभाग्यवश आर्मी के भर्ती दफ्तर में पहुंच गया। वहां बच्चा कंपनी की भर्ती हो रही थी। मैं भी लाइन मेें लग गया। अफसर ने पूछा कुछ पढ़े-लिखे हो तो अखबार पढऩे को दिया तो थोड़ा-थोड़ा पढ़ दिया। क्योंकि मुझे बचपन से पढऩे का बहुत शौक था। मास्टरनी जितना सिखाती थी उससे आगे पढऩे लगता था। शहर जाता था तो जो शब्द समझ में नहीं आते उन्हें पढ़े-लिखे लोगों से समझ लेता। तो इस तरह आगरा पहुंचने तक पढऩे-लिखने का अच्छा अनुभव हो गया। मुझे कविता करने का बहुत शौक था। उन्होंने मुझे बच्चा कंपनी में छांट लिया। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है, ३१ अगस्त १९५०।

बच्चा कंपनी में भर्ती होने के बाद के अनुभव कैसे रहे?

बच्चा कंपनी में भर्ती करके मुझे मेरठ भेज दिया। बड़ा अच्छा लगा। सभी अच्छे लोग थे। मैं बहुत खुश था। उसी खुशी के माहौल में कविता फूटी- 'म्यर ग्वल-गंगनाथ/ मैहूं दैण है पड़ी/ भान मांजणि हाथ/ रैफल ऐ पड़ी।'

हंसी-खुशी के माहौल में आनंद आने लगा। वहां पढ़े-लिखे लोग थे और मैं अनपढ़। मेरठ में ही तीन-चार साल बच्चा कंपनी में गुजारे। उसके बाद १७-१८ साल की उम्र में फौज का सिपाही बन गया। सिपाही बनने के बाद मोटर ड्राइविंग मेरा ट्रेड था। गाड़ी चलाना सिखाया। वहां से पासआउट हुए तो पोस्टिंग में चला गया जालंधर भेज दिया गया। जालंधर के बाद झांसी चला गया। झांसी के बाद जम्मू-कश्मीर चला गया। वहां पूरे इलाके में घूमा। नारियां, राजौरी, पूंछ, नौशेरा में ड्यूटी की। बारह साल यहां गुजारे। तेरहवें साल पूना चला गया।

आपने कहीं लिखा है कि पूना से ही असल में आपके काव्य कर्म की शुरुआत हुई, पूना में उस वक्त किस तरह का माहौल था?

पूना में मैं १९६२ में गया। चीन की लड़ाई चल रही थी। युद्ध में जो लोग घायल हो गये, उनके साथ संगत रहने लगी। उनसे लड़ाई के बारे में जिक्र सुना तो मेरे दिल में ऐसा हुआ कि एक किताब लिखूं इस वाकये पर। तो मेरी पहली किताब हिन्दी में 'ये कहानी है नेफा और लद्दाख की' शीर्षक से प्रकाशित होकर आयी। इस किताब को मैंने जवानों के बीच बांटा। पूना में एक अनुभव और हुआ। पूना में पहाड़ की कुमाऊं-गढ़वाल और नेपाल की औरतें कोठों में देखीं। मुझे मेरे साथी जवानों ने बताया तो मुझे बेहद दुख हुआ। मेरे मन में आया कि इन पर किताब लिखूं। किताब 'दीदी-बैंणि' लिखी।

क्या कुमाऊनी में लिखने की शुरुआत पूना से ही हुई?

कुमाऊनी में किताब लिखने की शुरुआत पूना से ही हुई। मैं कोठों में गया नहीं था। मैंने कल्पना की। सोचा पहाड़ के जो लोग नौकरी के लिए प्लेन्स आ जाते हैं, जब घर वापस जाते हैं तो औरतों को बहला-फुसलाकर कोठों पर ले आते हैं। तो मैंने उनकी कहानी बनायी। उनके दुख-दर्द को समेटा। साथ ही जमाने को टोका। लिखा- 'गरीबी त्यर कारण/ दिन रात नि देखी/ गुल्ली डंडा देखौ/ शेर दा कलम-दवात नि देखी।'

फिर लिखता चला गया। 'दीदी-बैंणि' काव्य संग्रह की ही ये कविता है-

'सुण लिया भला मैसो/ पहाड़ रूनैरो/ नान-ठुल सब सुणो/ यौ म्यरौ कुरेदो/ दीदी-बैंणि सुण लिया/ अरज करुंनू/ चार बाता पहाड़ा का/ तुम संग कुनूं/ चार बात लिख दिनूं/ जो म्यरा दिलै में/ आजकल पहाड़ में/ हैरौ छौ जुलम/ नान ठुला दीदी-बैंणि/ भाजण फै गई/ कतुक पहाडक़ बैंणि/ देश में एै गयी/ भाल घर कतुक/ हैगी आज बदनाम/ जाग-जाग सुणि/ नई एक नई काम।'
फिर कुछ ऐसा हुआ कि मुझे कवितायें लिखने का सुर लग गया।


पूना से पहाड़ वापसी कब हुई?

सन १९६३ की बात रही होगी शायद। वहां मेरे पेट में अल्सर हो गया और मैं मेडिकल ग्राउंड में रिटायर होकर घर आ गया। उम्र यही कोई रही होगी २४-२५ साल की। घर पहुंचा तो उसे कविता में इस तरह व्यक्त किया- 'पुज गयों अल्माड़ गौं माल/ तब चाखि मैन अल्माड़कि/ चमड़ी बाल।'
तो कविता का रोग लग गया था।


तब गांव का माहौल कितना बदल गया था?

गांव में ऐसा कोई नहीं था जिससे कोई बातचीत कर सकूं। मैंने गांव वालों से पूछा कि आप किसी टीचर-मास्टर को या फिर ऐसी जगह जानते हैं, जहां कोई पढ़ा-लिखा आदमी मिल जाये। किसी ने पता बताया, वहां चला गया। मैंने अपना परिचय दिया। दो किताबें दिखायीं, तो उन्होंने कहा हमारे कॉलेज में एक चारु चंद्र पांडे हैं। वो कविता भी करते हैं, विशेषकर पहाड़ी में। उनसे मिला। वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा मैं आपको ब्रजेंद्र लाल शाह से मिलाता हूं। वह कविता के बड़े जानकार हैं। पहाड़ में सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए एक सेंटर खुलने जा रहा है। वह उसके डायरेक्टर बनने वाले हैं।


कैसे रहे ब्रजेंद्र लाल शाह से मिलने के अनुभव?


बहुत अच्छे। उन्होंने मेरा परिचय जाना। कहा आज तो मैं कहीं जा रहा हूं, संडे के दिन आना। आपने जो लिखा है संडे को सुनेंगे। मैं इंतजार करता रहा संडे का। मैं वहां चला गया। उनके साथ दो-चार लोग और थे। किताबें दिखायीं। मैंने उनको एक कविता सुनायी। अपने जीवन की पहली कविता थी। कविता थी- 'नै घाघरि/ नै सुरपाल/ कसि काटीं ह्यून हिंगाव।'

यह सिर्फ मुखड़ा था। कविता लंबी-चौड़ी थी। सुनकर वह बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने तपाक से कहा- 'शेर सिंह का शब्द चयन बहुत अच्छा है।' हो सकता है जिंदगी में पहली मर्तबा सुना ये शब्द। शब्द चयन। उन्होंने कहा यहां पर होली आने वाली है। हम रैम्जे हाल में होली मनाते हैं। उस दिन सब कुछ-न-कुछ सुनाते हैं। कविता लाना, तुम्हें भी मौका देंगे। पंद्रह-बीस दिन के बाद होली आयी। टाइम पर चला गया। उन्होंने मुझे देखते ही कहा पोयट (श्चशद्गह्ल) आ गया।

मैंने कविता सुनायी - 'होई धमकी रै चैत में/ सैंणि लटक रै मैत में।'
लंबी-चौड़ी कविता थी। रिस्पांस भी अच्छा मिला। लोग खुश हुए। मैं भी खुश हुआ। तब से मेरा चस्का बढ़ा ही गया। उन्होंने कहा नैनीताल में सेंटर खुल गया है। तुम वहां एप्लाई कर दो। तुम्हारे जैसे कवि-कलाकार की जरूरत है। मेरा हौंसला बढ़ा। कॉल लैटर आ गया। मैं नैनीताल इंटरव्यू के लिए गया। इंटरव्यू लेने कुछ लोग दिल्ली से आये थे, कुछ गढ़वाल-कुमाऊं के लोग थे। कुल पचास लोग छांटे गये। सेंटर का नाम था 'गीत एवं नाट्य प्रभाग।'


गीत एवं नाट्य प्रभाग में काम के अनुभव कैसे रहे?

बस नया सफर शुरू हो गया। अयारपाटा में दफ्तर खुला। हमने काम शुरू कर दिया। गीत बनने लगे। कंपोज होने लगे। इस तरह बहुत सी कवितायें लिखीं। इन्हें लोगों ने काफी पसंद किया। मुझसे मेरे अधिकारी कहते थे ये पहाड़ का रवीन्द्रनाथ टैगोर है। जब यह सुनता तो मुझे लगता मेरे अंदर कुछ न कुछ तो है। कुछ कवितायें मंच के लिए लिखीं तो कुछ साहित्य के लिए। मंच से कोई मतलब नहीं था। खास महफिलों में तब भी सुनाता था, अब भी सुनाता हूं।

उन दिनों जो गीत लिखे उनमें से कुछ याद हैं क्या?

एक गीत है जो हर जगह सुनाता था-
'म्यर हंसी हुड़कि बजाला बमाबम/ कुरकाती बिणाई मैंलैकि लगूंल/ मेरी सुआ हंसिया नाचली छमाछम/ अलग्वाजा बांसुई मैंलैकि बजूंला।'
इस तरह बहुत गीत लिखे। हम अपने प्रोग्रामों में गाते थे। यहीं से मेरा संपर्क आकाशवाणी लखनऊ से हो गया। उन्होंने मुझे कवि सम्मेलन में बुलाया। मेरी कविता सुनकर सब बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा-अनपढ़ ये नहीं, हम लोग हैं। इतनी अच्छी कविता कर रहे हैं। हौंसला बढ़ता गया। फिर मेरी किताबें निकलती गयीं।


अब तक आपकी कुल कितनी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं?

'दीदी-बैंणि', 'हसणैं बहार', 'हमार मै-बाप', 'मेरी लटि-पटि', 'जांठिक घुंघुर', 'फचैक' और 'शेरदा समग्र।' फिलहाल कुमाऊं विश्वविद्यालय में मुझ पर पांच शोध कर रहे हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता हूं। 'हंसणैं बहार' और 'पंच म्याव' टाइटल से दो कैसेट बाजार में आ चुके हैं।

आज के नौजवानों को कोई संदेश देना चाहते हैं?

यही कहना चाहता हूं नवयुवकों से और अपने पहाड़ के बच्चों से -
मन में हो लगन,
मुट्ठी में हो गगन।


जीवन में कोई आदर्श भी रहा आपका?

मुझे बड़े लोगों से बड़ी प्रेरणा मिली। गांधी जी, नेहरू जी, सुभाष जी, ये सभी मेरे प्रेरणा स्रोत रहे। आकाशवाणी लखनऊ में इन पर खूब कवितायें कीं। बापू पर कुमाऊनी में एक कविता लिखी जो मुझे आज भी बहुत पसंद है- 'हुलर आओ बापू तुम माठू माठ/ आशा लागि रयूं मैं बाट-बाट/ मैंकणि तुम्हारि नराई लागिरै/ चरख मैं ऐल कताई लागि रै/ खद्दर ऊण की बुणाई लागि रै/ गांधी टोपिनै की सिणाई लागि रै/ मैंके लागिं प्यारा तैरी ख्वारै चानि/ मैंकणि खैदेली तेरी नाखैकी डानि/ मुख-मुख चैरूं छै तू गिज ताणि/ कि भली छाजिछं धोती नानि-नान/ हुलर चड़ कसि जाना छन मार-मार/ हुलर आओ बापू तुम माठू-माठ।'

जीवन में इस आखिरी पड़ाव पर कैसा महसूस करते हैं?

अपने मन की जिंदगी जी। मैं तो अनपढ़ था, पर लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया, हौंसला दिया। मुझे प्रोत्साहित किया, तो कहां से कहां पहुंच गये।
आज भी इज्जत देते हैं, मान करते हैं। मैं लोगों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया।

Anil Arya / अनिल आर्य

शेर दा ग्रेट छन .. मैली लै उनर  यक नाटक दियेखी "रानी बौराणी"  .. अरे यातुक जय की बढ़िया प्रस्तुति .. तब बै मै उनर फैन छौं    .:)

Dinesh Bijalwan


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शेरदा के काव्य पर आखिरी बात 
  Story Update : Monday, May 21, 2012     1:18 AM 
     

[/t][/t]   राजीव पांडे
शेरदा आज हमारे बीच नहीं रहे। ये शेरदा अनपढ़ का आखिरी साक्षात्कार जो कुछ दिन पहले अमर उजाला ने उनके आवास पर लिया था।

नेफा और लदद्खा से काव्य जीवन की शुरूआत करने वाले शेरदा अनपढ़ कुमाऊं के महान कवि गूमानी और गौर्दा की पंरपरा के थे। 1939 में गौर्दा के जाने के बाद कुमाउंनी काव्य में जो शून्य उभरा था उसे अकेले शेरदा अनपढ़ ने भरा था। अब उनके आगे इस परंपरा का कोई दूसरा लोक कवि नजर नहीं आता।
शेरदा की कविताओं की काव्यात्मकता, छंद, लय और तुक उन्हें अन्य से विशिष्ट बनाती है। गूमानी की तरह शेरदा की कविताओं में लोक की पीड़ा है तो गौर्दा की तरह का राष्टप्रेम भी है। उनके बिना कुमाउंनी काव्य की चर्चा हमेशा अधूरी रहेगी। उनके काव्य के कई आयाम हैं। शेरदा लोक से सीखकर लोक के लिए लिखने वाले कवि थे। सामाजिक विसंगतियां उनकी कविताओं के केन्द्र में रहीं। कुमाउंनी कविता की उनकी पहली लघु पुस्तिका 'दीदी-बैणी' इसका मजबूत हस्ताक्षर है। शेरदा की कविताओें में जीवन का संघर्ष और उनकी मर्मस्पर्शी गाथाएं हैं तो हास-परिहास का गजब मेल भी उनकी कविताओं में मौजूद है।

गुच्ची खेलनै बचपन बिती
अलमाड़ गौं माल में
बुढ़ापा हल्द्वाणि कटौ
जवानी नैनीताल में

ये शेरदा का परिचय देने का अंदाज है। गुच्ची खेलते हुए अल्मोड़ा के गांव मॉल में उनका बचपन बीता। 86 साल के शेरदा अभी हल्द्वानी में रहते हैं। जवानी का एक बड़ा हिस्सा नैनीताल में बीता था। इस उम्र में भी उनकी वैचारिक ऊर्जा का कोई सानी नहीं है। उस दिन जब मैं करीब 11 बजे शेरदा से मिलने पहुंचा तो वह सुबह-सुबह देहरादून से लौटे थे। रातभर सफर के बाद चेहरे पर चमक देखकर मैंने पूछ ही लिया इतनी ताकत कहां से जुटाते हैं तो शेरदा बोले,

अब शरीर पंचर हैगो
चिमाड़ पड़ि गेईं गाल में
शेरदा सवा शेर छि
फसि गो बडुवाका जाल में

उनकी इन चार लाइनों में कमजोर काया के कारण पिछले दस वर्षों में नया कुछ न लिख पाने की टीस है। गालों में पड़ी झुरियों पर हाथ फेरते हुए कहते हैं, अब शरीर पंचर हो गया है। कभी शेरदा सवा शेर था और आज मकड़ी के जाल में फंसा है। अलग राज्य बनने के बाद शेरदा ने कुछ लिखा ही नहीं। नये राज्य के हालातोें पर बात करनी चाही तो अपनी चार पंक्तियों में सारी पीड़ा कह दी,

नैं नौकरी नैं चाकरी
नैं देई-द्वार घर
ओ शेरदा
यौ मुलुक छु त्योर

न नौैकरी, न चाकरी, न घर-द्वार ओ शेरदा ये देश है तेरा। ये है शेरदा की ऊपर दी गई चार पंक्तियों का अर्थ। जो आज राज्य की सबसे बड़ी समस्या और उत्तराखंड पर लगे पलायन के कलंक का प्रमुख कारण है। शेरदा की बड़ी खासियत यही है कि राज्य की हर उस समस्या को जिसे आवाज की आवश्यकता थी उन्होंने कविता में ऐसे पिरोया जैसे वह उनकी अपनी पीड़ा हो। ये शेरदा को लोक के और करीब लाने के साथ ही कई भाषाओं में कविता करने वाले पहले कुमाउंनी कवि गूमानी और बाद में गौर्दा के समांतर लाकर खड़ा करती है। लेकिन शेरदा के पूरे जीवन का संघर्ष और घोर गैर साहित्यक माहौल में उनकी प्रतिभा का इस तरह उभरना उन्हें अन्य कवियों से बहुत आगे ले जाता है।

गरीब घर में पैद हयूं
अफाम छि बौज्यू हिट दिं
तब पडौसियों क मकान में रूंछी
जर, जमीन बौज्यू कि बीमारी में
गिरवी पड़ि गे
इजाक ख्वार मुशीबत पड़ि गे
दुंग बोकि बेर पेट भरछीं
बौल-बुति करि बेर झुगलि ल्यू छी
दिन बार बितनैं गईं, दिन मांस काटीनैं गईं
और दुख दगाड़ हिटनै गईं

ये शेरदा के जीवन संघर्ष की गाथा है। गरीब घर में पैदा हुए। शेरदा कहते हैं कविता का पहला पाठ उन्होंने अपनी मां से ही सीखा। वह गीत गुनगुनाती थी और शेरदा उनके पीछे-पीछे गाते थे। मां की मदद के लिए पांच साल के शेरदा ने गांव में ही नौकरी की और इसके बाद अल्मोड़ा में एक अध्यापिका के घर पर उन्हें काम मिला। यहीं शेरदा को अक्षर ज्ञान भी हुआ। इसके बाद कुछ करने की तमन्ना में शेरदा को भी घर से दूर जाना पड़ा जो पहाड़ के हर युवा बेरोेजगार की कहानी है। इलाहाबाद, और आगरा में रहकर शेरदा ने होटलों में काम किया। इसके बाद,

एक दिन डोईनै-डोईनै
आगरा में भरती दफ्फतर पुजि गयूं
बौय कंपनी भरती हुनैछीं
मै लै ठाड़ है गयूं
चार फेल बतै बेर एएससी बौय कंपनी में
31 अगस्त 1950 में भरती है गयूं

एक दिन घूमते-घूमते शेरदा आगरा भर्ती दफ्फतर पहुंच गए। खुद को चौथी फेल बताकर सेना में भर्ती हुए। यहीं से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया। हालांकि इसके बाद मलेरिया और क्षय रोग से उन्हें संघर्ष करना पड़ा। क्षय रोग के इलाज के लिए उन्हें पूना के मिलिट्री हास्पिटल में भर्ती कराया गया। यहां ढाई साल तक उनका उपचार हुआ। इसी बीच 1962 में भारत-चीन युद्ध के घायल फौजियों के साथ रहने का मौका मिला। घायल जवानों का  दर्द ही शेरदा की पहली रचना ये कहानी है नेफा लद्दखा की बना। इसकी लघु पुस्तिका को छपवाकर शेरदा ने उन्हीं जवानों में चार आने में बांटा।  उनकी कुमाउंनी कविताओं की शुरूआत भी पूना में ही हुई। पूना के बाजार और कोठों में पहाड़ से भगाकर लाई गईं औरतों से मिल शेरदा विचलित हुए और उनकी पीड़ा को कविता में पिरोकर 'दीदी-बैणी' लिखी। इसे भी शेरदा ने स्वयं छपवाया और पीड़ितों में ही 60 पैसे में बेचा। इसके बाद शेरदा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1963 में सेना से घर आए।  अपने गांव माल आकर 'हॅसणौ बाहर' और 'हमार मै-बाप' कविता संग्रह छापे। अब तक चार लघु पुस्तिकाओं के साथ शेरदा के तीन कुमाउंनी कविता संग्रह आ चुके हैं। मेरि लटि पटि 1981। ये संग्रह पिछले तीन दशक से कुमाऊं विश्वविद्यालय के  स्नातकोत्तर पाठयक्रम में भी शामिल है। इसके अलावा जांठित घुडुर 1994, फचैक बालम सिंह जनौटी के साथ 1996 में । शेरदा ने कुमाउनी में काठौती में गंगा 1985 शीर्षक से एक गीत नृत्य नाटिका भी लिखी है। अब शेरदा आगे कुछ नहीं लिखना चाहते। पीड़ा इस बात की है कि लोगों को अपनी भाषा से प्रेम ही नहीं। बड़ी सादगी से कहते हैं कौन खरीदता है कुमाऊंनी में लिखाी किताबाें को।



Source -http://www.amarujala.com/state/Uttarakhand/58517-2.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

स्वय रची शेर दा की दो लाइन की यह कविता!

शेर दा - शेर दा है रैयी बाहर भितेर
म्यर च्यल ले धात लागून रैयी. शेर दा क भेर
होति हुनी मेले कुनियु, अन्हुति हुन भ्गे
बैणी नानी  कुनि भे, ओ ईजा सियाणी रानि ले कुन भ्गे!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Prayag Pande जाने -माने  कुमाऊँनी  कवि श्री शेर सिंह बिष्ट "अनपढ़ " ने २०  मई  को हल्द्वानी में देह त्याग दिया है | हास्य के जरिये समाज की विषमताओं को चोट करने में निपुण और जमीन से जुड़े लोक कलाकार स्वर्गीय " शेरदा " को " मौत और मनखी " शीर्षक की  उन्हीं  रचना की निम्न पक्तियों के साथ  श्रृद्धांजलि और अंतिम सलाम !
मौत कुनै - मारि हालौ ,
मनखी कूना  - कां मरुँ ??
अनाड़ी -
तू हार छै मैं हारूँ ?
मैं पुरुष छूं रे धरतीक ,आग - पाणी दगे म्यौर मेल छू |
ज्यूंन  और  मरनौक  म्यौर  रात -  दिनौक   खेल  छू |
मरण  देखि  जो  डरों  मनखी  उ  मनखियौक मन  छू |
मरी    मेंले     ज्यूंन   रूं   जो  उ  अनमोल   रतन   छू  |
तू कुनै है मारि हालो ; अनाड़ी ! मैं कां मरुँ ?
तू हारे छै मैं हारूँ?
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बतुनै    कन !     कां     मरुँ ;    तू   हारै  छै  मैं  हारूँ ?
प्राण  छू    रे   प्राण   मैं ,मनखियौक    पूर्वज    छूं   |
धरती   कै   चमकुणी    माटक           सूरज      छूं   |
जीत   छू    यो  जीत   अमर  सदा     अमरे      रौलि |
लोक  - लोक  में चमक्नै  लोक़ - लोक चमकुनै रौलि |
त्वील मैं हूँ छल करौ ,
मैल च्वल बदल करौ ,
त्वील सोचौ - मैं मरुँ ,
अनाड़ी !
तू हारै छै मैं हारूँ ?|