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गढवाली शैली का  उपमा

गढ़वाली भोजन रेसिपी ( उपमा )
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सरोज शर्मा सहारनपुर बटिक

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सामग्री
1कप सूजी
1 शिमला मर्च
1 प्याज बड़ु
मटर 1/2 कटवरि
सवीट कार्न 1/3 कटवरि
बीन्स 1/3 कटवरि
गाजर 1
राई 1/2 चम्मच
कडी पत्ता थोड़ा-बहुत
लूण स्वादानुसार
मर्च इच्छानुसार
हल्दी 1/4 चम्मच
हैर मर्च 2
1 टमाटर
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उपमा रेसिपी /विधि

सबया सबजी बरीक काटिक धैर दयाव
अब कड़ै मा तेल गरम कैरिक राई तड़काव अब कडी पत्ता भि डाल दयाव
प्याज इतगा भूनण कि बस पारदर्शी ह्वै जाव
अब बारी बारी से सबया सब्जी डालिक भून ल्याव बहुत ज्यादा नि भूनण लूण स्वादानुसार मर्च हल्दी डालिक 3 कटवरी पाणि डालिक थड़कन दयाव ,अब येमा सूजी डालिक हिलाव
3-4 मिनट मा तैयार ह्वै जांद, ढकिक सिम पर 1/2 और पकाव गैस बंद कर दयाव ,ऊपर से एक चम्मच घी डालिक परोसा ,बड़िया नाश्ता च खावा और खिलावा
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निर्गीत , अर  बहिर्गीत परिभाषा
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  पंचों ५ वों  ( पूर्व रंग विधान)  , पद /गद्य भाग ३८   बिटेन  ४४  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १४५
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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दिबतौं  बात सूणी  नारद जीन  बोली - निर्गीत (केवल ट्यूनिंग )  जु कि  विस्तार आदि धातुवाद्यों पर आश्रित छन नष्ट नि हूण  चएंदन।  किन्तु यो ही उपोहन (क्रिया ) अर धातु वाद्यों से युक्त ह्वेकि सप्तरूपों तै प्राप्त होला। अर दैत्य /दानव  गण ये निर्गीत क आकर्षण से आवद्ध हूणो  कारण ये तै नि कौर साकला। ३८-४०।
हे मुनिजन ! इनि यी निर्गीत (ट्यूनिंग ) जु  दैत्यों वृथाभिमान  शांति   हेतु निर्मित करे गे जब देवगणों से सम्मान प्राप्त कारल त वहिर्गीत बुले जाल।  ४१।
ये निर्गीतौ धातुतंतु युक्त चित्रवीणा पर निपुण वादकों द्वारा वर्ण , अलंकार अर लघु -गुरु अक्षरों से युक्त प्रयोग करे जाय।  ४२। 
यु शब्द या पद रहित केवल निर्थक वर्णों से गाये जाणो कारण निर्गीत बुले जांद।  अर यी देवगणों असंतुष्टि कारण बहिर्गीत ह्वे जांद।  ४३।
जु निर्गीतौ  स्वरूप सप्तरूप युक्त मीन बताई तथा उत्थापनादि क मीन अभिघान कार वांक कारण बतांदु।  ४४। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - १६४ -  १६५
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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नाड़ी स्वेद , उपानह स्वेद (पसीना लीण )
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद   बिटेन २९  - ३८ तक
  अनुवाद भाग -  ११०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती

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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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नाड़ीस्वेदौ कुण -
पालतू पशु अर  जलीय जंतु का मांस , दूध , बखरौ दूध ,सुंगरौ मध्य भाग ,पित्त , रक्त ,ऐरंडौ बीज , तिल ,यूं  सब्युं  तैं उबाळी नाळ से स्वेद द्यावो।  देश काल समज वळ सुयोग्य वैद्य स्वेद द्यावो। यू स्वेद वात्त रोगम हितकारी हूंद। निथर गिलोय , ऐरंड ,ल्यासणो , मूली  बीज ,बांसा , रेणु ,करंज , आक ,पाषाणभेद ,चंगेरी क पत्ता,सहजन, शिलाह्वा, तुलसी भेद, यूं पत्तों अर बक्क्ल  देश -काल समज रखण वळ वैद्य तै नाड़ी स्वेद दीण चयेंद।  यू  स्वेद कफ जन्य रोगुं  म हितकारी स्वेद छन। बड़ी जवाण ,पंचमूल , झिंटी ,दैक पाणी , आठ परकारा मूत ,अम्ल वर्ग से ,स्नेह , घृत,तेल आदि दगड़ काय /क्वाथ बणै  कफ वात्त म स्वेद दीण  चयेंद।  पालतू पशु मांस आदि क क्वाथ , क्रमश वात जन्य , कफ जन्य अर  वात्त -कफ जन्य रोग म रोगी तै क्वाथम खड़ो करी  स्वेद द्यावो।  स्वेद दीणो घी , दूध अर तेल क कोठा बि बणै दीण  चयेंद।  २९-३४।
उपनाह विधि -
ग्युंक दरकच  चूर्ण , जौ चूर्ण ,कांजी , तेल ,मद्यकिट , तैं  मिलैक गरम करी  कुटरी /पोटली बांधि  वात्तजन्य रोगुंम हितकारी हूंद। चंदन , अगरु आदि  द्रव्य मद्य पात्र म बैठ्युं  तळछट प्रक्षेप , जीवन्ति सौंफ ,कफ जन्य रोग म  लेप  बंधे जाण  चयेंद।  ये तै वात्त -कफ रोग्युं म प्रयोग करण  चयेंद।  दुर्गंध रहित , बाळ वळ अर उष्ण वीर्य वळी  खालों से लेप  बंधण  चयेंद।  जब इन  चमड़ा नई मील तो रेशम या ऊन का पटयोग करण चयेंद।  रात म बंध्युं  लेप तै बांधिक रखण अर  दिनम खोल  दीण  चयेंद।  दिनम बंध्युं लेप तै रातम खोल दीण  चयेंद।  शीत ऋतुओं  म लेप बंध्यू  बि  रावो तो क्वी डौर   नी।  ३५ -३८

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १७६  बिटेन   १७८   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली   

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       चौंड जसपुर (टिहरी )  भवन में पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ  कला, अलकंरण, उत्कीर्णन, अंकन

Traditional House Wood Carving Art of, Chund  Jaspur ,  Tehri   
गढ़वाल, कुमाऊँ,  भवनों (तिबारी, जंगलेदार निमदारी, बाखली, खोली, मोरी, कोटिबनाल ) में पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ  कला, अलकंरण, उत्कीर्णन, अंकन-489   

संकलन - भीष्म कुकरेती 
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 चौंड  जसपुर का भवन उत्कृष्ट प्रकार का  तिपुर  या ढैपुर भवन है।  भवन में उत्कृष्ट काष्ठ कला दृष्टिगोचर हो रही है। 
चौंड  जसपुर के प्रस्तुत भवन के पहली मंजिल में तिबारी उत्कृष्ट किस्म की है।  तिबारी चार स्तम्भों की है। स्तम्भ में उलटे कमल दल , ड्यूल व सीधे कमल दल दो स्थान में हैं।  मुरिन्ड सपाट है व तोरणम नहीं है। 
चौंड  जसपुर के प्रस्तुत भवन में छत के आधार पर दास में ज्यामितीय कटान की कला दर्शनीय व प्रशंसनीय है।  लगभग भवन में २० के  लकड़ी के दास हैं। 
दास/छत के आधार हेतु ब्रैकेट  में कायस्थ कला प्रशंसनीय है। 
आश्चर्य है कि  उत्कृष्ट भवन में मानवीय (देव या जंतु ) के चित्र नहीं हैं।  हो सकता है खोली में मानवीय चित्र अंकन हो किन्तु खोली छायाचित्र में दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। 
  सूचना व फोटो आभार:   अरविन्द भट्ट   
यह आलेख कला संबंधित है , मिलकियत संबंधी नही है I   भौगोलिक स्तिथि और व भागीदारों  के नामों में त्रुटि   संभव है I 
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
गढ़वाल, कुमाऊं , देहरादून , हरिद्वार ,  उत्तराखंड  , हिमालय की पारम्परिक भवन  (तिबारी, जंगलेदार निमदारी  , बाखली , खोली , मोरी कोटि बनाल ) काष्ठ  कला  , अलकंरण , अंकन लोक कला  घनसाली तहसील  टिहरी गढवाल  में   पारम्परिक भवन काष्ठ कला  ;  टिहरी तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला , ;   धनौल्टी,   टिहरी गढवाल  में  पारम्परिक  भवन काष्ठ कला, लकड़ी नक्काशी ;   जाखणी  तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला;   प्रताप  नगर तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, नक्काशी ;   देव प्रयाग    तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, ; Traditional House Wood carving Art from  Tehri;

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गढवाली शैली प्याज पकोड़ा
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उषा बिज्लवाण- देहरादून।
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मन्खी ३। समै- २० मिनट।
सामग्री- ३००ग्राम प्याज, २०० ग्राम बेसण, ५० ग्राम कौर्न फ्लोर, लोण एक बड़ू चम्मच, कसूरी मेथी १ चम्मच, हरू धणियां एक मुट्ठी बरीक कट्यूं, ४ हरी मर्च , आदू कोर्यूं १/२ चम्मच, अजवैन १/२ चम्मच, चाट मसालू १/२ चम्मच, लाल मर्च पौडर एक चम्मच, कशमीरी लाल मर्च १/२ चम्मच, हींग १/२ चम्मच तलनक तेल।
 विधी- प्याज तै साफ धुलीक बरीक काट ल्या तेल छोड़ीक सबी सामग्री मिलै द्या गैस मा कढै रखा तेल डाला पकोड़ों की सामग्री तै खूब फेंटा थोड़ा हरू पजन्या पड़ जाओ त सोना मा सुहागा अब कै भी आकार मा पकोड़ा तल ल्या गरमा गरम हरी चटणी अर आदा की चा दगड़ी परोसा
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दूध में आटे का  गढवाली   हलवा ‌ लंगड़
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गढवाली भोजन रेसिपी
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अनिता ढौंडियाल कोटद्वार
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सामान
दूध आधा लीटर,आटू एक कटोरी, चिन्नी एक कटोरी
एक छ्वटु चम्मच हैरी इलैची
बणाणू सगोर/रेसिपी
दूध गैस मा धैर द्या उमल जाव त चिन्नी मिलै द्या
अब एक हाथन आटू धीरे धीरे दूध मा डाला अर हैंका हाथन
मिलौणा रावा गुरमुला नि होण चैंदन
पन्द्रह मिनट तक पकावा दगड़ा मा मिलौंणा भि रावा
हैरी इलैची भि डाल द्या झौल कम रखण
ल्या ह्वेगी तैयार चलमुलु हलवा

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गढवाली खीर रेसिपी 


सरोज शर्मा सहारनपुर बटिक
खीर बणाण कु सगोर
एक छवट कटवरि चौंल भिगै दयाव
1 लीटर दूध
घी 1 चम्मच
चिन्नी स्वादानुसार
दूध क पौडर 4 पाउच
काजू ,किशमिश, बदाम, केसर 4-5 धागा
सगोर /खीर रेसिपी
गैस मा कुकर धैर दयाव, ये मा घी गरम कैरिक चौंल डालिक भूना, हल्का गुलाबी हूण तक
अब ये मा 1 छवटि कटवरि दूध डालिक 2 सीटी लगाव ढक्कन खोलिक थोड़ा दूध डालिक मैश कैरिक सबया दूध डालिक गाढ़ू हुण तक पकाव
अब ये मा दूध क पौडर भी मिलाव गुठली नि बणण चैंद लगातार चलांद राव अब चिन्नी भी डालिक काजू किशमिश बदाम भि काटिक डाल दयाव ,केसर भी दूध मा घोलिक मिलाव
गैस बंद कैर दयाव बाउल मा निकालिक ऊपर से काजू बदाम से सजाव गरम या ठंडी फ्रिज मा धैरिक खाव

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 तरला दलाल :  महिलाओं  कुण  प्रेरक चरित्र

भारतम म पाक शास्त्र ग्रंथ रचना इतिहास   भाग  -२२

भारतम  स्वतंत्रता उपरान्त    कुक  बुक प्रकाशन को ब्यौरा  भाग - ७
Cookbooks after  Independent  India  - 
-। 
संकलन -भीष्म कुकरेती
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तरला दलाल एक प्रसिद्ध रेसिपी लेखिका, कुक प्रदर्शनीकार व शेफ बि  छे।  तरला दलाल एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व छे। 
तरला दलाल न सबसे पैल १९७४ म द प्लेजर ऑफ़ वेजिटेरियन कुकिंग।  वैक बाद १०० पुस्तक प्रकाशित ह्वेन।
तरला दलाल क जन्म पुणे म ३ जुलाई १९३६ म ह्वे अर  कैलाशवास २०१३ म ह्वे।
तरला दलाल न कुकिंग क्लास की शुरुवात १९६६  बिटेन शुरू कार। तब यु  वाक्य शुरू ह्वे "यदि तुम अपण  बेटी ब्यौ कराण चाणा तो तरला दलाल की क्लास म भ्याजो"
तरला क विशेष कुक बुक छन -
द कम्प्लीट गुजराती कुक बुक
नो योर फ्लॉवर्स
इटालियन कुकबुक
हेल्दी ब्रेकफास्ट
सैंडविचेज
करीज  ऐंड कढीज
चिप्स ऐंड डिप्स बेक्ड डिशेज
पंजाबी खाना
डिलिशियस डाइबिक रेसिपीज
इनि १०० तक पुस्तक छन।
तरला दलाल तै कथगा ी पुरुष्कार मिलें अर  भारत सरकारन  २००७ म पदम् पुरुष्कार से समान दे। 


 सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती
भारत में पाक शास्त्र / cookbooks  ग्रंथ इतिहास; ब्रिटिश राज में  भारत में पाक शास्त्र / cookbooks  ग्रंथ इतिहास;    ग्रंथ इतिहास;  श्रृंखला जारी रहेगी , Cookbooks in British Period in India ; भारत म ब्रिटिश युग म पाक शास्त्र  ग्रंथ प्रकाशन, भारत म स्वतन्त्रता बाद कुक बुक्स प्रकाशन

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में प्रतिहार नरेश  मिहिर भोज (८३३   -८८५ ईशवी )
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Pratihar  King  Mihir Bhoj ( 833   -885 AD )
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -३२
Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -32

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  309                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३०९               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 रामभद्र पुत्र भोज को सन ८३३ लगभग प्रतिहार सिंघासन प्राप्त हुआ था।  प्रतिहार नरेश भोज को ८३६ ईस्वी में कान्यकुब्ज पर शासन स्थापितीकरण की सफलता मिली।  ८४३ के लगभग भोज को पूर्व राजस्थान की ओर  शासन में ध्यान देना पड़ा।  देवपाल से पराजित होने के बाद भोज को दक्षिण की ओर  ध्यान देना पड़ा।  (Age of  Emperial Kannauj  page 29 ) .
८४५ - ८६० तक भोज ने राष्ट्रकूट पर आक्रमण किया किन्तु नरेश ध्रुव से हार का सामना करना पड़ा।  कलचुरी नरेश  ने भी भोज को हराया।   इस कारण भोज राज्य प्रसार न कर स्का . भोज ने ८६१ लगभग जोधपुर कस्टर पर विजय हासिल की थी। 
सन ८५० िश्वि में देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी कमजोर साबित हुए तो प्रतिहार भोज को उत्तर में राज्य विस्तार का अवसर प्रशस्त हो गया।
शिलालेख से विदित होता है कि भोज ने दिग्विजय की योजना बनाई और मगध , राष्ट्रकूट , पर अधिकार कर लिया (Tripathi , Age of  Emperial Kannauj  page31 ) I
भोजन ने उत्तराखंड  कत्यूरी नरेश सलोणाादित्य  से सिंघसन छीना (८७६ -८७८ )। 
प्रतिहार भोज का राज गुरत व काठियावाड़ के कुछ भाग पर भी रहा।  उत्तर पश्चिम में पंजाब पर भी अधिकार था।  गोरखपुर पर भी भोज का शासन था।  बुंदेलखंड पर भी भोज का अधिकार था।  उत्तराखंड पर भी कुछ न कुछ हिसाब से भोज का अधिकार था। 
भोज बलवान व महत्वाकांक्षी था व भगवती भक्त राजा था।  भोज की मृत्यु लगभग ८८५ सन के लगभग हुयी ( १ ) .
अर्थात प्रतिहार नरेश का शसन सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर पर कुछ न कुछ रूप से था।   
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संदर्भ :
  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४३६- ४३८   
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   ..

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पिज्जा,  पीजा
उषा बिज्लवाण- देहरादून।

मन्खी- २।
समै- ३५ मिनट।
सामग्री- पिज्जा बेस १,
पिज्जा सौस
 १/२ कटोरी, मोजरेला चीज
१/२ कटोरी, टौपिंग तै १ शिमला मर्च चकोर कटीं, १प्याज़ चकोर कट्यूं ,पनीर चकोर कटीं,
विधी- पिज्जा बेस तैं तेल लगीं बेकिंग ट्रे पर रखीक अच्छे से चारों तरफ पिज्जा सौस लगै द्या अब ऐंच बटी कदूकस कर्यूं मोजरेला चीज फैलै द्या अब टौपिंग तै कट्यां प्याज़, शिमला मर्च और पिज्जा सौस मा लपेटीक पनीर सजै द्या फिर थोड़ा सा चीज और बुरक द्या ओवन तैं पहली गरम करा फिर १८० डिग्री पर १/२ घन्टा तक पका तैयार छ पिज्जा निकलीक गरम गरम परोसा
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