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Muni ki reti Rishikesh Uttarakhand,विश्व का योग केन्द्र है। मुनि की रेती

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, December 09, 2009, 11:29:23 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

प्राकृतिक सुंदरता,पर्यावरण


मुनि की रेती की एक खास बात यह है कि यह पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा है। हिमालय की तराईयों से तेजी से निकलती नदी का स्वच्छ जल अनगिनत भक्तगण, आध्यात्मिक गुरुओं तथा छात्रों को यहां आने के लिए प्रेरित करता है।
और यही बात आज मुनि की रेती को ज्ञान का एक मुख्य केन्द्र बनाने में सहायक है।


मुनि की रेती के इर्द-गिर्द हरे-भरे ऋषिमुख पर्वत तथा मनिकुट पर्वत हैं जिसके बीच यह बसा है। इस क्षेत्र के आस-पास सुंदर झरने जैसे गरुड़ चट्टी, मुनि की रेती की प्राकृतिक सुंदरता को और भी बढ़ाते है।

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मुनि की रेती मैं उगने वाले  पेड़-पौधे

जो पेड़-पौधे, मुनि की रेती के आसपास की पहाड़ियों में भरी पड़ी है उनमें मुख्य रुप से शीशम, आम, नीम, चन्दन, अमलताश, कीर तथा कांजु जैसे वृक्ष पार जाते हैं।



स्थानीय पौधों में मुख्य रुप से लन्टाना, काला बांस, बसिंगा, अम्रीता बेल तथा अरंजी शामिल है जिससे अरण्डी का तेल निकाला जाता है।

इसके अलावा इस क्षेत्र में दवाई बनाने वाली एवं तथा सुगन्धित जड़ी-बुटियां पाई जाती है और मुनि की रेती का हर्बल गार्डन देखना सचमुच ज्ञान दायक अनुभव है।

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मुनि की रेती के स्थानीय पशु – पक्षी

स्थानीय पशु-पक्षियों में काकर हिरण, बघीरा, हाथी, मोर, जंगली मुर्गी, लॅगुर तथा बंदर शामिल हैं। हॉलांकि लंगुर बहुतायत देखे जा सकते हैं लेकिन अन्य जानवरों को देख पाना दुर्लभ है।



मुनि की रेती में जुगनु तथा तितलियों की कई प्रजातियां पाई जाती थी लेकिन बढ़ती शहरीकरण के कारण इनकी संख्या दिनोंदिन घटती जा रही है।


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मुनि की रेती का स्थानीय आकर्षण

मुनि की रेती में आपको व्यस्त रखने के लिए अगर आपके पास समय तथा रुचि हो तो वहां बहुत सारी चीजें है। अगर आप साहसिक खेल-कुद में रुचि रखते हों तो मुनि की रेती में कई टूर ऑपरेटर (पर्यटक संचालक) है जो साहसिक (एडवेन्चर) पर्यटन एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है!



और आप नजदीक के क्षेत्रों में नदी बेड़े (राफ्टिंग) या ट्रेकिंग ट्रिप में हिस्सा ले सकते हैं। यदि आप मस्तिष्क के रहस्यों में रुचि रखते हैं यहां कई जाने-माने आश्रम हैं जहां साधना, संस्कृत का विस्तृत ज्ञान, वेदान्त दर्शन तथा हिन्दु के ग्रंथों के ज्ञान की विवेचना की जाती है। वे जो स्वस्थ शरीर में स्वस्थ विचार की धारणा रखते हैं वह मुनि की रेती में योग के विद्वानों से योग सीख सकते हैं।

अगर आप साधना में विश्वास करते हैं तो नव घाट पर बैठना तथा बहती हुई गंगा नदी तथा आसपास के सुन्दर दृश्यों को देखना, खासकर बेड़ों के सीज़न में बेड़ों का जल में चलाना, बेहद मनमोहक तथा समय गुजारने का बढ़िया तरीका है। स्थानीय मंदिरों तथा गंगा आरती में शामिल होना मनोहारी है। यह प्रतिदिन सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय होती हैं।

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प्राचीन आदि बद्रीनारायण शत्रुघ्न मंदिर

प्राचीन मंदिर पौराणिक एवं ऐतिहासिक रुप से मुनि की रेती के लिए एक प्रमुख स्थल है। यह दो मंजिला पार्किंग के नजदीक नव घाट के पास स्थित है। यही वह स्थान है जहां से प्राचीनकाल में कठिन पैदल चार धाम तीर्थ यात्रा शुरु होती थी।

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान राम एवं उनके भाई लंका में रावण के साथ युद्ध में हुई कई मृत्यु के पश्चाताप के लिए उत्तराखंड आए तो भरत ने ऋषिकेश में, लक्ष्मण ने लक्ष्मण झुला के पास, शत्रुघ्न ने मुनि की रेती में तथा भगवान राम ने देव प्रयाग में तपस्या की। यह माना जाता है कि मंदिर के स्थल पर ही शत्रुघ्न ने तपस्या की।

ऐसा माना जाता है कि उत्तराखंड में स्थित चारों में से एक इस मंदिर की स्थापना नौवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने की। इस मंदिर की स्थापत्य उस समय के अन्य मंदिरों से मिलती है। मंदिर का मुख्य मूर्तियाँ आदि बद्री तथा शत्रुघ्न काले पत्थर से नक्काशी युक्त है।

उनके बगल में भगवान राम, सीता तथा लक्ष्मण की मूर्ति के साथ गुरु वशिष्ठ की एक छोटी मूर्ति सफेद संगेमरमर से बनी है। चारों धामों की तीर्थयात्रा सुगमता पूर्ण तथा कठिनाई रहित पूर्ण हो, इसलिए आदि बद्री तथा भगवान शत्रुघ्न की मूर्ति एक साथ स्थापित की गई है, ऐसा माना जाता है।

इस मंदिर परिसर के बाहर हनुमान की प्रतिमा इन्हें सुरक्षा प्रदान करती है और भगवान हनुमान इस क्षेत्र में लोगों द्वारा पूजा-अर्चना का उत्तर देने के लिए जिम्मेवार हैं।

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कैलाश आश्रम मुनि की रेती


ब्रहमविदंयापीठ श्री कैलाश आश्रम की स्थापना वर्ष 1880 में श्रीमत्स्यास्वामी धनराज गिरीजी महाराज ने की। आज भी वे आदरपूर्वक आदि महाराज जी के नाम से पुकारे जाते हैं। आम विश्वास है कि उन्हें स्वप्न में भगवान शिव ने आश्रम में एक शिवलिंग की स्थापना का आदेश दिया था।

इसके अतिरिक्त टिहरी के राजा के अनुरोध पर उन्होंने ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए एक भवन खंड का निर्माण महामंडलेश्वर श्रीमत्स्यास्वामी विदयानन्द गिरीजी महाराज का आवास है। यही शिवलिंग आज भी श्री अभिनव चंद्रेश्वर भगवान (शिव) का रुप धारण करता है।

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कैलाश आश्रम का प्रवेश द्वार मुनि की रेती



इस आश्रम का विस्तार इसके प्रबंधक स्वामी पूर्णानंद गिरीजी द्बारा कैलाश आश्रम के दूसरे एवं चौथे आचार्यों के कार्यकाल में किया गया जिनके नाम क्रमशः आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमत्स्यस्वामी जनार्दन गिरीजी तथा आचार्य महामंडलेश्वर श्रीमत्स्यस्वामी गोविंदानंद गिरीजी था।

आचार्य महामंडलेश्वर विदयानंद गिरीजी ने आश्रम का विस्तृत विकास किया। एक गोशाला, भक्त निवास (श्रद्वालुओं के लिए घर), चैतन्य गिरि अस्पताल, एक छात्रावास, विष्णुधाम, चन्ना भोजनालय (एक रेस्टोरेन्ट) तथा भगवान हर सत्संग भवन का निर्माण कैलाश आश्रम में किया गया हैं।

क्षेत्र का सबसे पुराना आश्रम कैलाश आश्रम अपने वेदान्त के प्राचीन ज्ञान के लिए प्रसिद्व हैं। यह शंकराचार्य की धार्मिक पीठ है। यह एक सिद्व पीठ की तरह है जहां वेद तथा सन्यास से सबंधित ज्ञान की शिक्षा दी जाती है। आज यह विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है जिनकी रुचि उपदेशों को सुनने तथा आध्यात्म ग्रहण करने में है।

शिवानंद आश्रम की स्थापना से पहले इस आश्रम में कई प्रखर विद्वान स्वामी विवेकानंद, स्वामी चिन्मय तथा स्वामी शिवानंद जैसे कुछ लोग यहां रह चुके हैं।

इस आश्रम की अन्य शाखाएं हरिद्वार, उत्तरकाशी, दिल्ली, इलाहाबाद, रोहतक, जम्मु, मध्य प्रदेश, कानपुर, मुजफ्फरनगर में स्थित है।