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Muni ki reti Rishikesh Uttarakhand,विश्व का योग केन्द्र है। मुनि की रेती

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, December 09, 2009, 11:29:23 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


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औषधि बगीचा, मुनि की रेती

ऋषिकेश-गंगोत्री रोड पर ओंकारानंद आश्रम तथा भद्रकाली मंदिर की और चले तो डॉ सुशीला तिवारी औषधि बगीचा मिलेगा जहां वनौषधि तथा सुगंधित जड़ी-बुटियों की भरमार है। इसकी स्थापना वर्ष 2003 में उत्तराखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ एन डी तिवारी के आदेशानुसार हुआ तथा यह 4.23 हेक्टेअर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह सरकार के वन विभाग द्वारा संचालित है।

जैसे ही इस गार्डेन में घुसते हैं, नींबू घास हमारे इन्द्रियों को खुशबु से सुगंधित कर देती है। बगीचे के केन्द्र में बांस के गजीबो में वन विभाग द्वारा संचालित महिलाओं की स्वयं सहायता समुह लेमन घास के गुदे से अगरबत्ती बनाती हैं। वहां के प्रधान अधिकारी (इंचार्ज) श्री ओ. पी. सिंह वहां पर लगी विभिन्न प्रजातियों की दुर्लभ जड़ी-बुटियों एवं पौधे के बारे में बताते हैं। उदाहरण के लिए अगर स्तीविया रौरिदिना को लें तो इसकी पत्तियां तीक्ष्ण है और इसमें कोई आश्चर्च की बात नहीं।

यह चीनी से 300 गुणा ज्यादा मीठा होता है जिसका प्रयोग मधुमेह रोगियों के लिए मिठास तथा दवाइयां बनाने के लिए किया जाता है। अलो वेरा के औषधीय गुण से हम सभी परिचित हैं और इनके कई प्रजातियों के पौधे यहां हैं। अगर इसके गुदे को कच्चा खाया जाय तो यह लीवर के लिए उपयोगी है।

उसके बाद थूनेर टेक्सासबकाला की बात करें तो यह ऊंचाई के स्थान पर पाया जाने वाला है जिसे प्रयोग के तौर पर यहां लाया गया है। इसके एक ग्राम तेल का मूल्य 1.20 लाख रुपये हैं जिसके प्रयोग कैंसर के उपचार के लिए किया जाता है।

यहां 160 से अधिक प्रजातियों के पौधे तथा जड़ी-बुटियों है। इस गार्डेन के मुख्य ग्राहक किसान तथा औषधि बनाने वाली कम्पनियां हैं जो भारतीय वन अधिकारियों, वन के रखवालों तथा वन के सुरक्षा कर्मियों को प्रशिक्षण भी देते हैं।यहां ये पौधे तथा महिलाओं के बनाये अगरबत्तियां खरीद सकते है

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दयानंद आश्रम

स्वामी दयानंद आश्रम का बुनियादी कार्य स्वामी दयानंद स्वरस्वती (19वीं सदी के महान सुधारक के नाम पर रखा गया जिन्होंने आर्य समाज की स्थापना की) द्वारा वर्ष 1963 में शुरु किया गया तथा वर्ष 1982 में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ। मुनी की रेती में पुरानी झाड़ी या शीशम झाड़ी में अवस्थित यह आश्रम वैदिक शिक्षण के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के धर्मार्थ कार्यकलापों का केन्द्र रहा है।

आश्रम में वर्षभर स्वामी जी के शिष्यों के लिए वेदान्त पर लघु एवं दीर्घकालीन पाठ्यक्रमों का नियमित रूप से आयोजन किया जाता है। साथ ही, आध्यात्मिक कक्षाओं और शिविरों का भी आयोजन किया जाता है।

परिसर के भीतर भगवान श्री गंगाधरेश्वर मंदिर अवस्थित है। इसका मुख गंगा नदी की तरफ है। यहां साधुओं द्वारा प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्मचारीगण और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए हुए भक्तजन प्रतिदिन प्रातः और सान्ध्य प्रार्थना में भाग लेते हैं।

आश्रम में साधुओं और दर्शनार्थी भक्तजनों के लिए भंडारा (मुफ्त भोजन) का प्रबंध भी किया जाता है और धर्मार्थ औषधालय भी चलाया जाता है जिसमें इस क्षेत्र में रह रहीं महिलाओं, बच्चों और वृद्धजनों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का निशुल्क निवारण किया जाता है। साथ ही साथ, उन्हें स्वच्छता के महत्व से भी अवगत कराया जाता है।

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बाबा मस्तराम गुफा


बाबा मस्तराम मुनी की रेती के सुविख्यात और जाने-माने नाम है। इन्होंने अपना जीवन निस्वार्थ सेवा में बिता दिया। वर्ष 1987 में इनका निधन हो गया। गंगा तट पर स्थित जिस गुफा में वे आजीवन रहे, वह अब शहर का ऐतिहासिक स्थान है। उनके शिष्य और दर्शनार्थी इसे देखने आते हैं।

यह कहा जाता है कि बाबा मस्तराम, जो गुफा में साधना करने में अपना समय बिताते थे, अपने मिलने वालों को समाज सेवा का पाठ पढ़ाया करते थे। वह गुफा से तभी बाहर निकलते थे जब नदी का पानी ऊपर चढ़ता था। तब, वे आश्रम में रहा करते थे।

बाबा ने सन् 1963 में आश्रम की स्थापना की थी। यह आश्रम अभी भी सत्कार्यों जैसे निर्धनों और जरुरतमंदों को खिलाना, गायों के लिए चारा देने में लगा हुआ है। यह अन्य प्रकार की सामाजिक सेवा में भी लगा हुआ है।

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मुनि की रेती के निकटवर्ती आकर्षण

मुनि की रेती, आस-पास की प्राकृतिक की प्राकृतिक सुंदरता तथा अपनी धार्मिक तथा एतिहासिक विरासत के कारण अदभूत है। फल-स्वरुप यात्रियों के लिए इस शहर के नजदीक में कई घुमने योग्य स्थान हैं।

प्राकृतिक सुंदरता के लिए आप गरुड़ चट्टी जलप्रपात जा सकते हैं तथा छोटे बनाबटी जलप्रपातों के ट्रेक के प्रारंभ में ही अवस्थित गरुड़ को समर्पित मंदिर भी जा सकते हैं। या आप इससे कठिन ट्रेक, नीरागड्डू जलप्रपात देखने जा सकते हैं जहां आपके कठिन मेहनत का फल वहां की असीम सुंदरता में देखने को मिलेगी।

अगर धार्मिक स्थल को देखना है तो यहां से लगभग 28 किलोमीटर दूर एक बेहतर स्थान कुंजादेवी मंदिर है, जो एक पूजनीय सिद्वपीठ है। अन्य पूजनीय स्थल में भगवान शिव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर है। घूमने योग्य अन्य स्थान जो नजदीक में है, उनमें लक्ष्मण झूला, लक्ष्मण मंदिर तथा ऋषिकेश शामिल है।

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ऋषिकेश

ऋषिकेशजहां पहुंचकर गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ आगे बढ़ जाती है। हरिद्वार से मात्र 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऋषिकेश विश्व प्रसिद्ध एक योग केंद्र है।

ऋषिकेश का शांत वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है।उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से बहती गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है।

ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। कहा जाता है कि इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। हर साल यहां के आश्रमों के बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहां आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।