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Muni ki reti Rishikesh Uttarakhand,विश्व का योग केन्द्र है। मुनि की रेती

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, December 09, 2009, 11:29:23 PM


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यहां के लोगों का पारम्परिक पेशा पशुपालन तथा खेती था लेकिन तब भी खेती आसपास के गांवो में होती थी, जैसे कि आज भी। धान, चावल, मकई, गेहूं, भृंगोरा, चावल, आलु एवं उड़द आदि की परम्परागत खेती होती थी जो आज भी उगाये जाते हैं। वास्तव में, बासमती चावल की खेती तपोवन में, जो यहां से दो किलोमीटर दूर है, इस क्षेत्र में प्रसिद्द है और ऐसा कहा जाता है कि मुनि की रेती तक इस चावल की खुशबु आती थी। उन दिनों यह प्राचीन शत्रुघ्न मंदिर में प्रसाद की तरह चढ़ाया जाता था।

लेकिन खेती व्यवसाय से अधिक यहां के अधिकांश निवासी, मुनि की रेती में साधना तथा आश्रम में शांति की खोज में आने वाले लोगों की सेवा से अपना आजीविका कमाते हैं। यह परम्परा आज भी चली आ रही है और इस बात से प्रमाणित होता है कि यहां की लगभग 80 प्रतिशत आबादी आश्रमों में काम करती है।



हिमालय के पहाड़ी लोगों में एक सामान्य बात है कि महिलाएं पारम्परिक पोशाक घाघरा तथा अंगरीस जबकि पुरुष कुर्त्ता तथा धोती एवं गढ़वाली टोपी पहनते हैं।

जाड़े की ढंडक से बचने के लिए वे गर्म कम्बल या लम्बा शॉल ओढ़ते हैं। अब सामान्य रुप से उत्तरी भारतियों की तरह महिलाएं साड़ी तथा सलवार-कमीज तथा पुरुष शर्ट तथा पेंट पहनते हैं।

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शिवानंद आश्रम, मुनि की रेती

श्री शिवानंद आश्रम जाने माने शिवानंद आश्रम की स्थापना वर्ष 1932 में स्वामी शिवानंद द्वारा की गई। एक स्थानीय इतिहासकार श्री बदोला के अनुसार मुनि की रेती स्वामी शिवानंद की तपोभूमि थी, जो एक मेडिकल डॉक्टर थे एवं मन की आन्तरिक शांति के लिए इस क्षेत्र में आए।

वर्ष 1972 में जब श्री शिवानंद आश्रम में नारायण कुटीर के अग्रभाग की खुदाई हुई तो पुरातात्विक महत्व की चीजें पाई गई जिसने इस आश्रम को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली।



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जो भी लोग उनके पास उपचार के लिए आए स्वामी शिवानंद ने उनका इलाज किया और आज यह आश्रम केवल स्थानीय रोगियों का ही इलाज नहीं करता हैं वरन पश्चिम उत्तर प्रदेश तथा सम्पूर्ण उत्तराखंड के रोगियों का भी इलाज करता है। इसके अलावा इलाज के लिए अन्यत्र भेजे जाने वाले रोगियों का खर्च भी उठाता है।

यह आश्रम गरीब छात्रों के पुस्तकों का मूल्य तथा खर्चे भी उठाता है तथा उन्हें छात्रवृति के अलावा निराश्रितों को रहने की सुविधा तथा लोगों के बीच सामान्य चिकित्सा एवं आंख के अस्पतालों द्वारा पहुँचता है। यह आश्रम कुष्ठ रोग से ग्रसित लोगों को भीख मांगने से बचाने के उद्देश्य से उन रोगियों की चिकित्सा तथा ब्रहृमपुरी के पास बसाये इन रोगियों की कॉलोनी की देख भी करता है।

शहर के बीचोबीच स्थित शिवानंद आश्रम आध्यात्मिक ज्ञान का श्रोत एवं वेदांत तथा योग के केन्द्र के रुप में जाना जाता है।



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ओंकारानंद आश्रम हिमालय

यह आश्रम मुख्य शहर से थोड़ा ऊपर पहाड़ी क्षेत्र में ऋषिकेश तथा गंगा के समीप मुनि की रेती में अवस्थित है। वर्ष 1967 में स्थापित इस आश्रम में विश्व के लोग जिसमें कुछ पश्चिमी यूरोप के तथा अधिकांशतः भारतीय लोग रहते हैं। उच्च शिक्षित तथा विभिन्न शैक्षणिक तथा इंजिनियरिंग विषयों में विशिष्टता प्राप्त ये आदी शंकराचार्य सरस्वती संप्रदाय के संन्यासी/मुनि हैं जो श्रृंगेरी के श्री शारदापीठ से जुड़े हैं।

यह आश्रम संन्यासियों के एक समूह द्वारा संचालित किया जाता है तथा इस आश्रम के प्रेसीडंट/अध्यक्ष स्वीट्जरलैंड में जन्मे स्वामी विश्वेश्वरानंद हैं जो भारत में होने वाले कार्यकलापों जिनमें साधुओं के आश्रम/मंदिरों, विद्यालयों तथा शैक्षणिक संस्थानों, गांवों के उत्थान एवं काम करने वाले आवासीय स्वामी, शिक्षकों तथा प्रोफेसरों के भवन की देखभाल, में शामिल हैं।

इस भवन में कांचीपूरम के जाने माने स्थापति श्री एस. रविचन्द्रन द्वारा दक्षिण भारतीय कलाकारों तथा राजमिस्त्रियों की सहायता एवं श्रम द्वारा दक्षिण भारतीय रीतियों एवं वास्तुशास्त्र के अनुसार बने ओंकारानंद कामाक्षी देवी मंदिर  दर्शनीय है जो विशिष्ट एवं योजनाबद्ध ढ़ंग से डिजाईन की गई है।

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राम झुला

222 फीट लंबे राम झुला का शुभारंभ अप्रेल 1986 में किया गया जो मुनि की रेती के एक छोर को चिन्हित करता है। कार्यालयी तौर पर इसका नाम शिवानंद झुला है!



लेकिन रिक्शा तथा तांगा चालकों ने इसे राम झुला कहना शुरू कर दिया, चूंकि यह लक्ष्मण झुला की तुलना में बड़ा है इसलिए उनके बड़े भाई का नाम राम के आधार पर यह राम झुला पुकारा जाने लगा।

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