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Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 13, 2011, 03:08:21 PM

Bhishma Kukreti

Literature of Garhwal, Kumaun, Himalayas

    Thakrya  : A Satirical poem by the Great poet (Mahakavi ) Kanhayalal Dandriyal

       ठकर्या : महाकवि कन्हैया लाल डंडरियाल की विश्व प्रसिद्ध व्यंगात्मक कविता

(Satire and Irony  in Garhwali literature, Satire and Irony in Himalayan Literature )

         Bhishma Kukreti

   The poem Thakrya of Kanhayalal Dandriyal is the best example of  satire and irony in world literature and is the proof that Kanhayalal Dandriyal is one of the 200 Greates Poets of the world literature born in this earth .  The satire and irony is in each line of poem Thakrya and the readers like to to laugh on wordings but cant because the poet makes pins point on the social structure of that age when children yet to pass high school used to run away from village in search of job. The poem shows the readers that the Great Poet (Mahakavi ) Kanhayalal Dandriyal was master of creating satire with realistic subjects. Yes it is always stated by critics  that the satire should have amoral ground  and Kanhayalal pins point on the whole rural society of Garhwal about children education, escaping from smart works and choose easy job rather to find prosperous job.

The language used in this poem is mixture of Hindi and Garhwali and that is again biggest irony of migrated Garhwalis who leave their own mother tongue and adore Hindi instead of adoring Garhwali language.  The poem ridicules whole society through words and style of mixing two languages . This poem easily positions Kanhayalal Dandriyal with poets as Alduous Huxley, Anthony Burgess , Bret Ellis, George Orwell, Jonathan Swift, Billy Collins, John Stewart, William Golding Stephen Colbert , Lois MacNeice,  Eric Kastner,  Thomas Murner, Dryden, Rochester, Robinson, Charles Dickson, and many more great poets.



                    ठ्यकर्या   

           घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
           जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
जनम के उछ्यादी थे , विद्या की कदर ना की
कण्डाळी की झपाग खै  , ब्व़े की अर बुबाकि भी
जा रहे थे बुळख्या ल्हें, एक दिन स्कूल को
मूड कुछ बिगड़ गया , अदबाटम  भज्याँ क हैं 
     घर भटी अयाँ क हम गढवाळी  भुल्याँ क हैं
      जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
कै गुजरू इनै उनै , पोड़ी सड़कि का किनर
गाँव वालोँ य मित्रु का , घौर कै कभी डिन्नर
कुछ रकम ठी फीस की , कुछ चुराई ड्वारूंद
खर्च कै पुकै पंजै , मैना धंगल्ययाँ क हैं
           घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
           जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
टैक्निकल जौब में, हाथ काले क्यों करें
करें किलै कूली गिरी , ब्यर्थ बोझ से मरें
डिगचि  डिपार्टमेंट का , डिपुटी हम बण्या क हैं
तीस रूप्या रोटी ल्हें , जुल्फा झटग्याँ क हैं
          घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
           जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
क्या कहें पहाड़ से , तंग हम थे आ गये
च्यूडा , भट बुकै  बुकै , दांत खचपचा  गए
कौणयाळी गल्वाड़ से क्वलणि तक पटा गयी
अब तो ठाठ  से यहाँ , पान लबल्यां  क हैं
       घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
           जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
Copyright @ Bhishma Kukreti

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  Satirical poem of Deveshwar Joshi

   Deveshwar Joshi  is famous Hindi and Garhwali poet, story writer. he was
born on 21st June 1938 in village Kund, Hisriyakhal, Tihri Garhwal.*
* Recently, this author got opportunity to meet Deveshwar Joshi in Mumbai.
it was interesting evening with him. Joshi read his Garhwali poems till late
night *
*enjoy his poem, the poem is on Jagar style and is satirical *
*                   *
*               जै दारु दिबता *
*                 देवेश्वर जोशी (दिल्ली)*
* पैलो प्रणाम पौंचे मेरो तै गुरु को जैन यू दारु बणाइ *
*दुजू प्रणाम पौंचे  मेरो  ऊन दारु भक्तों को जौं यू दारु गौळ लगाई *
*            जागरण *
*जै दारू देब जाग कच्ची तू दारु जाग *
*पक्की तू दारु जाग देसी तू दारु जाग *
*अंग्रेजी तू दारु जाग, ब्रांडी की तू बोतले जाग *
*जिन की बोतळ जाग , स्कोच्च की तू बोतल जाग *
*थ्री एक्स रम जाग , ओल्ड मोंक की बोतल जाग *
*व्हिस्की की तू बोतल जाग, बैग्पैप्र के बोतल जाग *
*सैम्पियन का प्याला जाग , बिपर को गिलास जाग *
*दिप्लोमत को क्वार्टर जाग *
*जाग दारु शराब को प्याला जाग *
* - ३-*
*जाग दारु भक्त जाग , छ्वटु  नौनु तैं ब्रांडी दे *
*घर की नार को तू जिन कोइ बोतल दे *
*बच्चों  का सिर जाग बूढों का सिर जाग *
*नौ नाडी बहत्तर कोठों जाग *
*मंत्री को ध्यान जाग , संतरी का ध्यान जाग *
*जाग रे बाबा जाग *
*पी मी का ध्यान जाग सीएम् का ध्यान जाग *
*डीएम् का ध्यान जाग एडीएम् का ध्यान जाग *
*जाग रे बाबा जाग *
*आईएएस का ध्यान जाग, पीसीएस का ध्यान जाग *
*ऑफिसर  साब का ध्यान जाग , कर्मचारी का ध्यान जाग *
*पटवारी का ध्यान जाग , कानूनगो का ध्यान जाग *
*थानेदार का ध्यान जाग दरोगा का ध्यान *
*पाँच का ध्यान जाग परधान का ध्यान जाग *
*डाक्टर का ध्यान जाग , क्म्पौंडर का ध्यान जाग *
*इंजीनियर का ध्यान जाग, ठेकेदार का ध्यान जाग *
*कर्नल का ध्यान जाग , जर्नल का ध्यान जाग *
*बिधायक  का ध्यान जाग सांसद  का ध्यान जाग *
*रेंजर   का ध्यान जाग *
*फोरेस्टर  का ध्यान जाग *
*बी डी ओ  का ध्यान जाग  ए डी ओ  का ध्यान जाग *
*नेता  का ध्यान जाग  अभिनेता  का ध्यान जाग *
*     ४- *
*इंटरनेसनल दिबता तेरो ध्यान जाग *
*बिश्व प्रसिद्ध दारु देब त्वेकी नमस्कार *
*हर जाती हर धर्म का दिबता तेरी जैजैकार *
*जाती पाट को दुश्मन छै धर्मनिरपेक्ष दिबता छे *
*जूठा पिठा नि माणदो , छुवाछुत की बि  जाणदो *
*५-*
*प्रात:   की त्वे पूजा देलू , सूर्योदय के त्वे पूजा देलू *
*ग्विर्मिलाक की त्वे पूजा देल , धडांदि दुफरा की त्वे पूजा देलू *
*गो धूलि की त्वे पूजा देलू बारा बजे रात की त्वे पूजा देलू *
*             ६- *
*जौंळ त्वे बुग्ठ्या देलू, चौसिंग्या त्वे खाडू देलू *
*पांच त्वे सलाद द्योलू , सात त्वे नमकीन देलू *
*इक्कीस भांति को मांस देलू , बखरा की क्च्छ्बोळी द्योलू *
*बखरी की त्वे भित्र्वांस देलू मिरग की कल़ेजी द्योलू *
*घ्व्वेद को फाब्सू द्योलू , माकच को सुरवा देलू *
*जौंळ त्वे मुर्गा देलू , तीतर को मॉस देलू . बटेर को मॉस देलू *
*चकोर को मॉस द्योलू *
*जाग दारु देब त्वेको नमस्कार *
*८-*
*बेरोजगार को तू रोजगार दींदु , बिगड़याँ तू काम बणऊदू *
*मूसुं तैं तू बाग़ बणऔन्दु  बुड्डयौं तैं तू जवान बणऔन्दु *
*जवानुं तैं बुड्या बणऔन्दु शेर तैं गीदड़ बणऔन्दु *
*जौनका गिच्चा दांत नीन पुटका अंत नीन ऊंका ब्योऊ करौंदु*
*हार्दा मुकदमा जितौंदु , जित्यान उक्द्मा हरौंदु *
*बड़ा बड़ा ठेका दिलौंदु , बड़ा बड़ा की मति हरण करदो *
*होणी की निहोणि , निहोणि की होणी करोंदु *
*राजौं तैं रंक बणोऊन्दु  रंक तैं राज दिलौंदु *
*सै णा को गोर भेळ हकांदु चलदा घरु खन्द्वार करदू *
*अच्छा अच्छा कु ठिकाणा लगान्दु *
*हंसदा प्रिवारून रुलांदु *
*रिश्तेदार को माँ रखदो दोस्त की तू शां रखदो *
*.....*
*जै दारु देब की जै देब की *
*Copyright Deveshwar Joshi, Delhi, 2011 *

(Provided by Bhisham Kukreti)


खीमसिंह रावत

बहुत बढ़िया,  जोशी जी
श्री हीरा सिंह राणा  जी का गाना भी याद आया :- शराबे की थैली

;D

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


लघु गढ़वाली रूपक- 'देशी ब्वारी'

पात्र:
महेशानंद - साठ बर्षीय बुजुर्ग
विशाम्बरी - महेशानंद की पचपन वर्षीय पत्नी
राकेश - महेशानंद और विशाम्बरी का २८ वर्षीय जेष्ट पुत्र
लक्ष्मी - २४ वर्षीय राकेश की बहु ,जेष्ठ पुत्र बधु
अन्य पात्र: दिनेश- २५ वर्षीय द्वितीय पुत्र
दिनेश की बहु-२२ बर्षीय पुत्र बधु
( महेशानंद जी छाजा मा बैठीक हुक्का पेंण लग्या छन और कुछ सोच मा भी पड्या छन, इतना मा भैर चौक मा विशाम्बरी आन्दि)

विशाम्बरी (ऊँचा स्वर मा कणान्दी और बोल्दी) हे मेरी बोई.... उहू..... मरग्यु मी त..... बजर पडेंन मास्द्वी यी गवाडी मूंदे, सुबेर बिटिकी काम करदू-करदू हड्गा- मुड्गा दुखण लगिन मेरा त ! "काम कु नौ नी च अर् प्राणी कु थौ नी च", पता नी विधातन मेरी यी खोपड़ी मा क्य लेखी, सदानी इनी खैरी खैन मिन त ! कैन सुद्दी थोडी नी खायी उ औखाणु; "हल भी लायी, फल भी पायी, पर सुखदेव जीन कभी सुख नी पायी" !

महेशानंद हा-हा-हा-ह,... खफ-खफ...हुक्का चिल्म का कस लेते हुए, ...किले छे राकेश कि ब्वै आफी-आफ मा बरणाण लगी, तिन बरडै-बरडै कि पागल ह्वै जाण, मिन बोलियाली !




विशाम्बरी: ( गुस्सा मा ) हां-हाँ, होण दया, तुम्तै भारी च फिकर...



महेशानंद: अरे राकेश कि ब्वै, सुण त सै, तुत जरा-जरा सी बात पर गुस्सा ह्वै जांदी...!


विशाम्बरी: बस-बस, आज तक भौत सुणियाली मिन तुमारी, अब नी सुण सक्दू, सुणि सुणिक मेरा कंदूड फुटि गैन !


महेशानंद: (गुस्सा ह्वैक) ओ हो , राकेश कि ब्वै, तुत मेरी बात सुणीक इन उच्हड़न लग जांदी जन कवी चौबाटा पर कालिंक्या उच्हड़दी, पता नि क्य जोग्लौर आन्दि त्वै परै..... पूरी बात कभी नी सुणण !


विशाम्बरी: बोलियाली न, नि सुणि सक्दू , आज तकै मिन सूणी त च, कुछ तुमारी सुणी, कुछ तुमारा लड़ीक,ब्वारिकी ! (गुस्सा दिखौन्दी और बोल्दी) तुमारा आँखा त अभी गरुडून गाडी नि छन, तुम भी देखणागै होला कि क्य च मेरी फंजोडा फंजोड़ी होंणी ! या उमर च अब मेरी काम करनैगी, है ? दिनेशै ब्वारी स्या सुबेर लीक चलिगी छै बौण, घास का बाना परै, अब औली व्यखिनी दा मजा मा हाथ हिलौन्दी, ततुरु दिन काटदी वा तै बौण, अर् स्याम वक्त द्वी पूली घासै मुंड मा धारीक ऐ जांदी मटकी-मटकीग, शरम भी नी औंदी कुत्ति तै ! जै पर बितदी, वै तै ही पता चल्दु !




महेशानंद: ओ हो त क्य करन मिन, किले छै तू मेरा पिछ्नै हाथ ध्वैगी पड़ीं, साफ़ साफ़ किले नि बोल्दी !


विशाम्बरी: क्य करन तुमुन, मजा मा हुक्का प्या और टांगडा पसारिक बैठ्या रा, और कर भी क्य सक्दै तुम ! बिजां फरकैली तुमुन आज तकै....! ( फिर जोर सी बोल्दी ) कम सी कम इथा त होश होंदी कि छोटा नौना कु ब्यो पैली करियालि, अर् बड़ा लड़ीकै गी क्वी पूछ नी...... उ स्यु सुधि च लटगुणु दिल्ली फुंड ! कतना शर्मै की बात च, लोग दू क्य होला बोलणा ! तुम त इन छा सोचणा जन बुले लोग आफी लान्दन आपरी नौनी तै तुमारा मोर पर धार्नौकु तै ! पिछ्नै बीटी सी चार मसाण और ह्वैगिनी खडा, बिवोंण लैख ! कम सी कम ब्योड़ दुकानी मा त जांदा, सी च दूकान छोरो का भरोषा परै छोड्डी, पतानी क्य छन वार-पार करन लग्या वू!




महेशानंद: इन बोल्दु यार त,तेरा बोल्नौगु मतलब या च कि राकेश कु ब्यो करा!

विशाम्बरी: और नतरै सुदी छौ तुम दगडी दिमाग पचिस्सी करणु, एक ब्वारी और यै जाली त थोडा त काम कु बोझ हल्कू होलू , यी छन बुडेन्दी दा मेरा हड्गा-मुडगा चुरेणा, और कुछ नि ह्वै सक्लू वी सी त, कम सी कम खाणौं त देली पकैगि तै !



महेशानंद: हा-हा-हा,..... अच्छा त तू इ छै सोच्णी कि अगर हाकि ब्वारी भी ऐ जाली त सौब काम तब ब्वारी ही करली और तू भी मजा मा टांगडा पसारी बैठ जाली ! कुजाणी बुढडी... कुजाणी-कुजाणी... यांगा भिन्डी सास न रा, आज्कलै पढ़ी-लेखीं नौनी क्वी काम नी कर्दीन, वू त तेरा धन भाग, जू दिनेशै ब्वारी त्वै सणी काम-काजी मिलिग्याई, तू छै सोच्णी सभी तनी ह्वालि ! तू भी रैगी सदानी जंगली गी जंगली...!

विशाम्बरी: हाँ-हाँ मैं त जंगली छौ, तुम त छा मन्खी, भारी घुमायु तुमुन मै बम्बै, कलकता...!

महेशानंद: हे बुडड़ी! झूट न बोली वा, बुडेन्दी दा कीडा पडला, अगर झूट बोलली त...! तता साल घुमाई मिन तू दिल्ली मुन्दै, वू ठीकि बोलि कैन कि 'बार मॉस दिल्ली रै, अर् भाडै झोकी'...!


विशाम्बरी: (गुस्सा मा ऐन्च छजा मा ऐक तै, महेशानन्द का बगल परै बैठीक तै ) बस, तुम मा त व्योगि छ्यो गाडि अर, लग्या तुम मी सैणि लेक्चर सुणोण, कुछ कर्यन-धर्य्न ना !


महेशानन्द: ओ हो, त नी आन्दि बुडीड रस्ता परै, अच्छा त सुण मेरि बात, हमारु नौनु सोलां पढयू च, ये वास्ता, वै तै ब्वारि भि कम सी कम बारह्वीं' पढीं त खोज्णै पड्ली....


विशाम्बरी: हे मेरी ब्वै, बारां पढी...,तब त करियालि वीन काम काज, भै ज्यादा सी ज्यादा पाच-सात पढी खोजा दू, जरा चिट्ठी-पत्री लेखण-पढ्ण आयि चैन्दी बस, भारि जाण वीन बारां पढीक प्रधान मन्त्री बण्णौ कु त्तै,


महेशानन्द: भै तन्त त्वि जाण, छै-सात पढी दग्डी मा राकेश ब्यो करण तैयार होन्दु भि च कि ना....!


विशाम्बरी: किलै नि कर्लु, मी आफ़ि त सम्झौन्दु वै तै,


महेशानन्द: (परेशान ह्वैक्तै) ओ हो त तु नी छै माण्न्या मेरी बात,चला आज-भोल नौनु भी घौर आण वलु च , वै औन दी, तब वै पूछीक ही ढून्ड्ला नौनि !


( थोडि देर मा नीस खोली कु दरवाजु बज्दु)


महेशानन्द: कुच भै ?


आगन्तुक: मै हू पिताजी, राकेश !


महेशानन्द: (विशाम्बरी तै ) हे बुढडी ! कि छै खुट्टा पसारी बैठी, खडु उठ, नौनु ऐगि दिल्ली बिटिन, चा, पाणि बणौ वै तै..!


राकेश: नमस्ते पिता जी !


महेशानन्द: चिरंजीव बेटा, ठीक छै, औ बैठ, क्य हाल छन दिल्ली फुन्डैगा ?


राकेश: क्या हाल होने है पिताजी, आजकल वहां सडी गर्मी पड रही है बस....उह.....अफ़ ( अपना रुमाल सी चेहरा पर हवा करदु ).... यहा तो फिर भी ठीक-ठाक मौसम है !
(इतना मा विशाम्बरी भितर बिटीक पांण्यों गिलास लान्दि)


राकेश: नमस्ते मांजी !


विशाम्बरी: ( पांण्यों गिलास वै तै पक्डैग तै ) चिरंजीव बेटा ! खुब छै, कथा लम्बि उमर च मेरा बेटै की, आब्बी, हम द्वी बूढ-बुड्या तेरै बारा मा छा बात करना...!


राकेश: मेरे बारे मे क्या बात कर रहे थे मां आप लोग ?


विशाम्बरी: तेरा ब्योगि बात बेटा, तेरा ब्योगि बात छां हम करण लग्यां, बोल दू, पांच-सात पढी नौनि ठीक रालि, भिन्डी पढी-लेखिं लैग भी क्य कर्न, थोडा काम-काज वाली....


राकेश: (बीच मा ही खडु उठ जान्दु और बोल्दु) पांच- सात पढी का मैने अचार डालना है क्या ? पहले तो बी ए हो, नही तो कम से कम इन्टर पास तो होनी ही चाहिये.....(बैग उठैक भितर अपणा कमरा चलि जान्दु)




महेशानन्द: ( विशाम्बरी सी) सुणि यालि तिन, सीधु बी ए च खुजौणु.... ( तोतलु गिचु बणैक ) जाण्दि छै, बी ए कथा तै बोल्दन ? उतनिदा त खुब छै अपरा गिच्चा पर पोलिस लघ्हाणी कि मै आफि सम्झौन्दु अप्णा लडीक तै, अब क्य ह्वै ? वा औखाण च न कि " मेरु नौनु दोण नी सौकुदु, बीस पथा सौक्याल्दु"... भलो...भलो, तेरै बोल्यां पर मैन कखि बात पक्की नी करि , अभि गला-गला ऐ जान्दि हमारा !


विशाम्बरी: उह ....! करा भै त अब जु कुछ करदै, मिन क्या बोल्ण, पालि-सैन्तीकि, पढै-लिखैकि आखिरि मा इनि लगौन्दन यि जुत्ते पटाक, पाला बल यु तै...!
(अगला दिन सुबेर मु )


महेशानन्द: (विशाम्बरी सी)चल्दु छौ भै मै, जरा मेरु लाठु-छ्तुरु लौ दु बल,
(कुछ देर बाद राकेश भैर आन्दु)


राकेश: मां, पिताजी चले गये, क्या कहा पिताजी ने ?


विशाम्बरी: वून क्य बोल्ण, चलिगिन तब देख दू कखि लग जौ सैदा-भैदा.... आस पास त कखी इथा पढी-लेखि नौनि छौ भी नीन...
(महेशानन्द कु प्रवेश)


महेशानन्द: हे मेरि बोइ, बिजां गरम च होणु आज त, एक गिलास पाणि लौ दु बुढ्दी....


विशाम्बरी: ल्या इच..... जल्दि ऐग्या लौटीक, लगि च कखि.......!


महेशानन्द: हां, तेरै मैत का धोरा च एक नौनि, तेरहा मा पढ्नी च , भैर देश रन्दी, अपणा बै-बुबा दग्डी... आज कल सभि घौर छन आयांका गर्मियो की छुटियों मा ! पर एक बात च भै, चाल-चलण नौनि कु बिल्कुल देश्यों जनु च, काम का नौ परै उल्टु भान्डु सुल्टु नी करदी वा...साफ़ साफ़ बतैलि वींगा बै-बुबन ( राकेश की तरफ़ मुडीक तै ) तेरु क्य बिचार च बेटा ?


राकेश: अगर लड्की वाले तैयार है तो ठीक है पिताजी, मेरे साथ उसको भी दिल्ली के ऐड्वांस कल्चर मे रहना है ! ( भितर चली जान्दु)


विशाम्बरी: (महेशानन्द सी) अच्छा त इन करा कि अगर जल्म्पत्री जुड जान्दि त जब्र्यु नौनु छुट्टि पर यख च और वु लोग भी घौर मु छन, फटा-फट ब्यो भी करि दया


महेशानन्द: ठीक च, मै भी जल्दी निपटौणै गी छौ सोच्णु !


(और तब कुछ टैम का बाद ब्यो भी ह्वै जान्दु, महेशानन्द जी लोण मन्त्र भी जाण्दन, जौं लोगु का गोरु-भैसा ढंग सी दूध नी देन्दन वू महेशानन्द जी मु लोण मन्त्रौण कु आन्दन, ये वास्ता घौर मा लोग-बाग औणा, जाणा रन्दन )


इन्नि एक आगन्तुक: पंडाजी पैलोक !


महेशानन्द: आशिर्वाद महाराज !, आवा बैठा,

आगन्तुक: और सुणा, बाल-बच्चा, कुटुम परिवार सब ठीक ठाक छन, मैन सूणि आपन नौना ब्यो करि हालै मा, नौना ब्वारि कख छन्न ?


महेशानन्द; हां, खडेलिन मास्त, तखि होला भितर फुन्ड जनान्यों दग्डी मा कखी लट्कणा !


आगन्तुक: हे बाबा ! ततरी बात किलै छा बोल्णां, ल्या दु जरा ये लोण तै मन्त्र दयान, बिजां दिन बिटीकि कट-पट च कर्ण लग्यु लम्डौण्यां भैंसु.


(महेशानन्द जी लोण की पूडि क भितर धार्यु एक रुप्या सिक्का कीसा मुन्द धार्दन और लोण मन्त्र्दन)


महेशनन्द: ऒम नमो महादेव साकुर जी तुम को नमस्कारा, धरती माता कुर्म देवता तुम को नमस्कारा, रादा को हुन्कार फुन्कार, मर्द को जैकार, ऐला सीता कौन्ति दुर्पदा तुम को नम्स्कारा, (गिच्चा भितर धीरा सी) जो या भैंसी अगर दूध होलि देणी त दूध नि दयान, ब्याण्कु होलि त द्वी थ्वैडा ह्वान ! वांका बाद अपरी मुठ्ठी बौटीक व पर जोर सी फूक मार्दन, और फिर आगन्तुक सी, ल्या ये लोण तै भैंसा तै द्वी दा सुबेर - शाम चटै दयान !
(आगन्तुक का जाण का बाद विशाम्बरी औन्दि)


विशाम्बरी: हे मेरि बै उह ! छी भै, बजर पडेन ये जमाना मुन्दै, बोल्ण कु तै द्वी ब्वारी छन, अर् मेरा यु हाल छन, ऊ भग्यान सी छन मजा मा भितर पड्या का, लोच्डी ऐगि हो जन बुले !


महेशानन्द: (मंद-मंद हंसते हुए) पैली छै बूढ गिताड कि अब नात्ती दु ह्वैगी ! मैन त पैली बोलि यालि छौ कि इना सास कतै न रा कि हाकि ब्वारि का आण पर तु राज माता बणि जालि, अरे बुढ्डी किलै रन्दी त्वै तै इथा सगर-डगर होणी, तु भि चुप बैठ जा दू , हम द्वी झणौ तै पेन्शन ही काफ़ि च, यि मास्द, कर कमै सक्ला त खै लेला, नतरै आफि बजौंदन मुरली !


विशाम्बरी: ऊ भग्यान जब बजौला, तब बजौला मुरली, पर हमारी मुरली त सी आभि बिटीकि बज्ण लैगि, क्य पै मैन युं मास्दु तै पाली-सैन्तीक, सी छ्न बिल्कुल अंग्रेज बण्या, अंग्रेजि मा छन तौन्कि बात चल्णीं, पता नी क्य बुरैं छन हमारि करन लग्या ? ऊ छन सोचणा, यीत बोलिक्तै पढ्या-लिख्या नीन, यून क्य सम्झण की हम क्य छा बोल्णा, पर मै त सौब सम्झ्णु छौ ! ( तबर्यो भितर बीटी राकेश की ब्वारि आवाज लगौन्दि)


लक्ष्मी मांजी टू कप टी
विशाम्बरी: (महेशानन्द की तरफ़ मुडीक तै) सुणियाली तुमुन क्य च तुमारी देशी ब्वारि मी क तै बोल्णी ?


महेशानन्द: ( अटपटा मन सी)


विशाम्बरी( गुस्सा मा उंची आवाज निकाली तै), हू, जन बुले तुमुन नी सुणी, भै मी तै च बोल्णी कि तू खब्ती छै बल !


महेशानन्द: (हुक्का गुड्गुडाते हुए ) भै, बुढ्डी फुन्ड फूक, अब बोलण दी ऊ तै अब जु कुछ बोल्दन, अब क्य कर सक्दा हम ? जुंओ गा बानौ घाघरू त नी छोड सक्दा न ! आपर्वी सिक्का खोट निकल जौ त क्वी क्य कर सक्दु ?

विशाम्बरी: हां, बोल्ण दया, नतरै मी वीकु गिच्चु छौ बुज्डू, जै बौ गु बल बडु भरोशू छौ, स्ये दिदा-दिदा बोलण लगी ! (ये बीच मा लक्ष्मी दुबारा आवाज लगौन्दी)


लक्ष्मी: मांजी , पिलीज टू कप टी


विशाम्बरी: (गुस्सा मा जोर सी) हे बेटी ! पलीत तेरि ब्वै होलि, जैन तु पैदा करी, अर खब्ती ऊ होला मास्द जौन तु यख विवाइ या यी होल जु इनि भद्रा तै यख लैन !
(लक्ष्मी भैर औन्दि पिछ्नै-पिछ्नै राकेश भी दग्डा मा औन्दु)
लक्ष्मी: (गुस्सा मा) मांजी व्हट नोन्सेन्स,टाक सिन्सीबली


विशाम्बरी: क्या ? क्य बोलि तिन, ह्ट नौनु छैंच, अर तु टांग खैंच देलि, ली जरा खैंची दिखौ, छै अपणा बुबै त ! अर अब पालि-सैन्तिकी ये नौनन त्वै दग्डि मिलिगि तै हमारी टांगै त खिच्ण, हे मास्द, शरम कर !


लक्ष्मी: अरे मांजी, तुम तो मेरी हर बात का उल्टा ही अर्थ निकालती हो, मैने तो आपसे सिर्फ़ दो कप चाय बनाने को ही कहा था, खैर, मै खुद बना लेती हू !
(फिर थोडी देर मा किचन बिटीकि आवाज लगौन्दि, अरे मांजी ! स्टोव जल रहा है , चावल कुक्कर मे डाल दू क्या ? (ये कुक्कर और स्टोव तै वा ब्यो मा दैजा लै छै)

विशाम्बरी: हां, शाबास ! चौलु तै कुकुरु मु डाल दी, और तुम तब थौकुली बजान, भै चौल यू मास्दू तै फीर्यन जु इनि लक्ष्मी यख लैन , ( जोर सी) मैन त बोल्लि छौ, देशि ब्वारि नि ल्हवा... नि ल्हवा......!
(पर्दा गिर जाता है )
-पी.सी. गोदियाल
नोट: यह लघु रूपक मैने ११ मई, १९८२ को किसी खास वजह से लिखा था !

(Source - http://uttaranchal.yuku.com/)

Bhishma Kukreti

             



                    क्य मि बुढे गयों ?

( Garhwali Satire and Humour, Uttarakhandi Satire and Humrous Literature, Himalayan satire and Humorous Literature)


                      भीष्म कुकरेती



          फिर बि  मै इन लगद मि बुढे गयों!

         ना ना मि अबि बि दु दु सीढ़ी फळआंग लगैक चढदु . कुद्दी मारण मा अबि बि मिंडक में  से जळदा छन.

फाळ मारण मा मि बांदरूं  से कम नि छौं . काची मुंगरी मि अबि बि बुकै  जान्दो अर रिक अपण

नै साखी/न्यू जनिरेशन   तैं बथान्दन बल काची मुंगरी कन बुकाण सिखणाइ त भीसम मांगन सीखो.

कुखड़ , मुर्गा  हर समय खाण मा म्यार दगड क्या सकासौरी कारल धौं! बल्द जन बुसुड़ बिटेन 

भैर नि आण चांदो मि रुस्वड़ मा इ सेंदु जां से टैम कुटैम खाणो इ रौं . दंत ! बाघ का या कुत्ता का

इन पैना दांत नि ह्वाल जन म्यार छन . इना  गिच मा रान म्यार दान्तुं बीच मा आई ना कि रान को बुगचा

बौणि जांद . अचकालौ  जवान लौड़ उसयाँ बुखण /खाजा बि बुकावन त ऊँ  तैं कचै , डीसेंटरी ह्व़े जांद.

अर मि अबि बि अध्भड़यीं लुतकी , अध्काचू  अंदड़-पिंदड़ पचै जांदू. म्यार   अंदड़  अर जंदरौ पाट भै भुला लगदन.

  पण फिर बि मै इन लगद मि बुढे गयों!

             अब द्याखो ना जख पैलि लोग मै से मिल्दा था त हाई ! हेल्लो!  हाउ डू यू डू? कैरिक सिवा बर्जद छया अच्काल जब

बिटेन मि रिटायर होंऊ त लोग बाग़  हाथ मिलाणो जगा पर म्यार खुटुन्द सिवा लगौन्दन. ज्वान, अध् बुधेड़

जनानी  खुटुन्द सिवा   लगावन त बुरु नि मन्यान्द  पण जब बौ की उमरवाळी कज्याण तुम तैं खुटुन्द सिवा

लगाण बिसे जाव त कखी ना कखी मगज मा बात बैठी जांद ,  मन मा आई जांद बल मि कखी बुड्या त नि ह्व़े ग्येऊँ .

         पैल जब क्वी अपण छ्व्ट या बड़ा ज्वान नौंन -नौन्याळी क परिचय करांद छया त बुल्दा छया, " बेटा अंकल को

हाई करो ! हल्लो! करो!" अर अब !!! य़ी लोक बुल्दन , " बेटा ! दादा जी तैं सिवा लगाओ , प्रणाम करो जैसे  तुम

अपने ग्रैंड मदर याने  नाना नानी को प्रणाम करते हो". अर मै कुण हुकुम बि दीन्दन  बल ," कुकरेती जी ! आप अब बुजुर्ग ह्व़े गेवां त

ज़रा बच्चों तैं आशीर्वाद दे दवाओं !'.  बस एकी साल मा मि अंकल से ददा ह्व़े गयों ? . रिटायर हूण से पैल अंकल

अर रिटायर हूणो परांत ददा, ग्रेण्ड पा?

इथगा फरक ?

       जब तलक मि रिटायर नि ह्व़े छौ त मि कखी बि भैर देस घुमणो जान्दो छौ त क्या जवान क्या बुड्या मै से टूरीस्ट प्लेस की

पूरी जानकारी लीन्दा छया अर अब ! ये मेरी ब्व़े ! अब त लोक बाग़ मी तैं कख घुमणो जाणो अर कख नि जाणो बारा मा

मै अड़ान्दा छन, सिखांदा छन . अब द्याखो ना   रिटायर हूण से पैल मीमा  सात आठ इयर लाइन्स की फ्री फ़्लाइंग स्कीम

का टिकेट छया अर मि वांको फैदा अब ल़ीणो इ रौंद. परसि पुण मि फ्री  स्कीम मा बैन्कौग अर पटाया ग्यौं. बस जनि कत्ति

पछ्याण वालूं तैं पता चौल बल मि बैन्कौग अर पटाया टूर पर ग्यौं त हरेक मै तैं ना म्यार नौनु अर मेरी नौनू ब्वारी तैं

समझाणा बल भीषम की या उमर च बैन्कौग अर पटाया जाणे  की . अरे भीष्म तैं त बदरीनाथ , साईं बाबा , वैष्णो देवी क

जात्रा पर जाण चएंद . अर छै मैना पैलि जब मि नौकरी मा छौ अर मि मकाओ गे छयो त य़ी लोक मकाओ मा छोरी कन होंदन,

मकाओ की वैश्या अर भारत की वेश्याओं मा क्या फरक होंद अर मी जब  मकाओ की वैश्याऊँ क नख सिख वर्णन करदो छौ त

बड़ा रौंस/मजा से सुणदा छया अर ज़रा कम वर्णन करदो छौ त कत्ति नराज बि होंदा छया की मि ठीक से वैश्याऊँ वर्णन नि करणों

छौं अर अब य़ी लोक मै त ना म्यार नौनु-ब्वारी तैं सलाह दीणा छन बल भीषम की उमर बद्रीनाथ-केदारनाथ जात्रा की च.छै इ  मैना

मा इथगा फरक !

       अब द्याखो ना ! सी पर्सी मि उद्योगपति काल़ा जी क कौकटेल पार्टी मा गयों . बड़ो लौन मा पार्टी छे . भौत ही बढ़िया

इंतजाम छौ. पण यीं दें म्यार दगड कुछ अजीब हे ह्व़े . जु बैरा शराब लेकी पौणु/मैमानू  खुणि  ट्रे मा शराबौ गिलास

ल्हेकी घुमणा छया वो मै देखीक ही हौर बैरौं तैं भट्यान्दा  छया बल , " अरे जौनी ! या अरे पोनी !अंकल के लिए कोल्ड ड्रिंक लाओ".

मतलब बैरा बि ...

   पार्टी मा निखालिस कौकटेल को ख़ास इंतजाम छौ. मेरी इच्छा ह्व़े की मि उख कौकटेल 'ऑन द रौक' 

(रल़ो मिसौ वळी शराब अर सिरफ़ बर्फ)    पीउं . पण जनी मि  कौकटेल कौंटर मा ग्यों क़ि पछ्याणक वल़ा बुलण बिसे गेन बल ,

: कुकरेती जी ! आपक वास्ता कोल्ड ड्रिंक को कौंटर सी प्वार तरफ च .". अर पैलि य़ी लोक मी मांगन कौक्स  रिवाइवल, मोड़ी मिस्ता,

कैफ ज्यूरिक , हैंकि पिंकी, बे ब्रीज , ब्लू हवाई  जन कौकटेल क़ि पूरी जानकारी लीन्दा छया . अर अब यि लोक बुलणा  छन बल " कुकरेती जी ! आपक वास्ता

कोल्ड ड्रिंक को कौंटर सी प्वार तरफ च .."

इथगा फ़रक !

              ड़्यार म बि  कुछ इनी हिसाब च . मि बीसेक दिनु बान देहरादून जाणो छौ त मि बाजार बिटेन पछ्याणक दूकान बिटेन नीलो, पिंगल़ो, हूरो, लाल

रंग की चार टी शर्ट लायुं . श्याम तलक मेरी घरवाळी  अर ब्वारी दूकान मा गेन अर मटमैल्या , कनफणि सी रंग की टी शर्ट बदली कौरिक ल़े आइन .

जब मि नाराज होऊं त कज्याणिन ब्वारी अगनै करी दे अर नौने ब्वारी बुन बिस्याई, " पापा !  अब इस उमर में  आप पर फास्ट कलर की टी शर्टें

सूट नहीं करतीं हैं अब तो आपकी उमर सोबर कलर कपड़ों  की है. फास्ट कलर विल नॉट सूट यू ."

मतबल   छै सात इ मैना मा मेरी उमर फास्ट कलर (भड़काऊ ) की नी  रै गे !  .

मेरी समज मा नी आणू   बल अबि त मि सरैल से तंदुरस्त छौं फिर यि लोक रिटायर हूण तैं बुड्या होणे निसाणी किलै समजणा छन ?

ज़रा तुम इ बथावदि बल   क्य मि बुढे गयों ?

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Bhishma Kukreti

                       लोकसभा मा क्य काम-काज हूंद भै  ?             

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                            Bhishm Kukreti
               
                        अच्काल पार्लियामेंट मा रोज इथगा हंगामा/घ्याळ होंद बल लोकसभा या राज्यसभा खुल्दा नीन

अर दुसर दिनों बान मुल्तबी/ 'ऐडजौर्नड फॉर द डे'  करे जान्दन.  बस याँ से पारिलियामेंट सदस्य बिसरी गेन , भूलि गेन

की लोक सभा या राज्य सभा मा काम काज क्य हूंद ?    एम् पीयूँ तैं अब पता इ   नी च बल लोक सभा या राज्य सभा सदस्यों मा क्वी कम

बि होंद.

                 अब सी पर्स्या की त  बात च . परसी मि अपुण एम्.पी (राज्य सभा सदस्य) दगड्या कु इख ग्यों बल मि बि ज़रा पार्लियामेंट

देखूं अर उख क्य क्य होणु च वांको जायजा बि ल्हीयूँ. अब जन कि मेरो दगड्या  बिना बातौ अहिंसक मनिख च

त वै तैं कमांडो की सेक्युरिटी त छ्वाड़ो एम् पी होंउस कुणि एक चौकीदार बि णि मील. म्यार दगडया एम्. पी. न

बीस पचीस माख मारिन, दस पन्दरा मूस पकड़ीन अर  पिंजरा मा बन्द कौरिन अर औथेरिटयूँ   तैं बि दिखाई

तबी बि मेरो दगडया तैं जेड त छ्वाड़ो ए सेक्युरिटी बि नि मील उलटां   एक चौकीदार छौ वै तैं बि  के हैंक

नगर पालिका सेवक को इख भेजी दे . त मै तैं दगड्या एम् पी क इख जाण मा क्वी अट्टवांस/दिक्कत/ बेरियर

नि होंदी , जब जाओ ज़ब आओ . उन अच्काल इन मुस्किल ही होंद पण गांधी जी क सचा च्याला हों त  ह्व़े बि जांद .

      म्यार दगड्या अहिंसक एम् पी. ईं बगत बि जंग्या  अर बन्याण मा पुराणो मर्फी कलर टेलीविजन (यू मीन भेंट मा दे छौ)

मा हिस्टरी चैन्नेल मा क्वी इतिहासौ सीरियल देखणु  छौ. विचारू अहिसक गाँधी बादी एम् पी अबि बि माणदो बल 'हिस्टरी रीपीट्स इटसेल्फ़ बेकौज

नो बडी  लर्न्स फ्रॉम हिस्ट्री .'

            मीन ब्वाल ," हे! भै एम् पी ! काम पर नि जाण ?"

         अहिंसक गांधी बादी एम् पी न पूछ, " यू काम क्य हूंद ?"

                " हैं !  पार्लियामेंट मा कथगा इ काम होंदन. जन कि जु तुम सरकारी पार्टी मा छवां त  मंत्री जी क बोल्यां पर ताळी बजाण अर मेज थपथप्याण

ही काम होंद. " मीन ब्वाल

      अहिंसक गांधी बादी एम् पी न पूछ, : अछा ! अर हौर काम ?"

          मीन अहिंसक गांधी बादी एम् पी तैं याद दिलाई , " अर जु तुम विरोधी पार्टी क एम्. पी. छवां त बस जब बि सरकारी एम् पी या मंत्री अपण बयान

दीण बिस्याई  कि घ्याळ करण बिसे  जाण . कुछ नी त शेम शेम बुलण बिसे जाण."

     " बस य़ी काम च ? " अहिंसक गांधी बादी एम् पी न फिर पूछ

             " नही हौर काम बि छन जं कि कबि कबि टी वी कैमरा उना नि हो त जरा सी ऊँगी बि ल्याओ  ." मीन खुलासा कार

             अहिंसक गांधी बादी एम् पी न  ब्वाल , " ए मेरी ब्व़े ! और अच्छा उख उंगण बि पड़दो? हौर ..?"

           मीन फिर से याद दिलाणे पुट्ठ्या जोर लगाणे/ कोशिश करी , " नै जु पार्लियामेंट मा हो हल्ला , घ्याळ, घपरोळ  नि होणु राउ

त एम्. पी. सरकारी मंत्री से सवाल बि पूछी लीन्दन अर मन मारिक मंत्री जीयूं तैं सवालू जबाब बि दीणी पड़दन ."

         " हे नागराजा ! हे ग्विल्ल!  बस / य़ी काम ! पण क्य क्वी बि एम् पी कुछ बि सवाल पूछी सकद ?" अहिंसक गांधी बादी एम् पी न पूछ

               " ना क्वी बि एम् पी अफिक सवाल नि पूछी सकद . एम् पी तैं वैकी पार्टी टैम दींद अर तबी एम् पी सवाल कौरी सकद ."मीन खुलासा कार

    अहिंसक गांधी बादी एम् पी न अगनै  पूछ, " त अच्काल क्य हो णु च उख ..?"

    मीन बथाइ,' अच्काल त द्वीइ  याने राज्य सभा अर लोक सभा मा कुछ नि होणु च बस सभा अध्यक्ष खुर्सी मा जनी बैठदन तन्नी पार्लियामेंट

मा घ्याळ/ घपरोळ होण बिसे जांद. स्पीकर सब्युं तैं शांत हूणे सल्ला दीन्दन पण  ना त हल्ला ना ही घ्याळ  अर ना ही घपरोळ बन्द होंद अर स्पीकर

पार्लियामेंट तैं दुसर दिनु खुणि अडजोर्न करी दीन्दन . अच्काल बस ई होंद .."

        " य़ी स्पीकर क्य होंद? क्या यूंक काम बुलणों क काम हूंद .", अहिंसक गांधी बादी एम् पी न टक्क लगैक   पूछ

    मीन बिंगाणों कोशिश कार," ना !  ना ! स्पीकर का मतबल स्पीक करण नी च मतबल स्पीकर इख सुणदो च , बुळणों काम त एम् पीज. या मंत्र्युं क होंद.

पारिल्यामेंट मा स्पीकर स्कूल कु क्लास  मोनिटर जन होंद "

     अहिंसक गांधी बादी एम् पी न इन  पूछ जन बुल्यां कै हैंको प्लैनेट बिटेन  अयूँ   ह्वाऊ  , " एक बात त बतादी कि य़ी राज्य सभा, लोक सभा या पार्लियामेंट क्य होंदन भै?"

         अब मि क्य बथों बल लोक सभा, राज्य सभा या पार्लियामेंट क्य होंद. जै देस कु  पार्लियामेंट मा रोज/हर घड़ी  अडजोर्न  पर अडजोर्न ही होणा राल त उखाक

एम्.पी एक दिन बिसरी ही जाल बल पार्लियामेंट क्य होंद! अर पार्लियामेंट मा क्य काम काज होंदन



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                                 तबादला उद्योग

(Garhwali Satire, Garhwali Humour, Satire of Languages from Uttarakhand, Himalayan Satire )



                    भीष्म कुकरेती
         
           तबादला उद्योग   उद्योग बि उनि उद्योग च जन हौर कंसल्टिंग उद्योग होंदन.

जी !  हाँ पैल दलाल /बिचौलिया जु बो छया ऊन अब अपण  बुजिनेस्सौ नाम बदली दे

जन विदेशों मा काल़ो धन भिजण वाळ  अर विदेस बिटेन बगैर एक्साइज  भर्याँ

सामान ल़ाण वाळ अब खुले आम गबरमेंट अप्प्रूबड मनी  ट्रांस्फ्रिंग अजेंसिज अर एक्सपोर्टर-इम्पोर्टर   

ह्व़े गेन  . वैश्याओ क दलाल अब अफुं तैं रांडों दल्ला नि बुल्दन बल्कण मा अफु तैं

इवेंट मनेजमेंट कन्सल्टेंट,  इंटरटेनमेंट कन्सल्टेंट या  यंग मॉडल सप्लायर  बुल्दन.  पैल रांडू दल्ला

कखी बि नि बोल्दु थौ वु क्य काम करदो अब य़ी दल्ला विजिटिंग कार्ड लेकी यंग मॉडल माने 'यंग माल' मतबल

जवान रांड सप्लाई की बात खुले आम दिन मा इ करदन. मनमोहन सिंग को रिफार्म इकोनोमी को

इ कमाल च बल रांडू दल्ला अब यंग मॉडल सप्लायर ह्व़े गेन . इन बि सुणे  गे बल विदेसुं मा

वैश्याऊँ तैं भिजण वाळ अफुं तैं कलचरल एक्सचेंज एजेंसी  का मालक या मैनेजर बुल्दन.

अब रिफार्म इकोनोमी मा यि दलाल  या बिचौलिया कन्सल्टेंट ह्व़े गेन.

           इनी सरकारी कामगत्यूँ तबादला को काम च वो बि एक बड़ो भारी उद्यम च .

इ उद्यम भारत का हरेक कूण मा पसर्युं/फैल्यूं   च. जख सरकारी कामगति/कारिन्दा उख तबादला

उद्यम !  यू भौत बड़ो पण अनऑर्गेनाइजड इंडस्ट्री  च.  सरकार को सामणि होंद पण ये उद्यम तैं उद्यम को दर्जा

दीण कैं  बि सरकार या कैं बि राजकरणि पार्टी को बस मा नी च बस मा  क्या,  कैं माइ को लाल मा

हिम्मत इ नी च बल ये बड़ो उद्यम तैं उद्यम को दर्जा दिए जाओ.किलैकि यू उद्यम छें त च पण यू बड़ो

उद्यम आत्मा जन च . छें  च पण नी च .नी च पण छें च.

           सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर उद्यम एक वास्त्विकता च पण आत्मा जन ना त

ये उद्यम को आदि च ना ही अंत च, ट्रान्सफर उद्यम को जलड़ छन  . ग्व़ाळ छें छन, फांकी  छन पण फिर बि आत्मा जन यू उद्योग रूट लेस च  .

सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर उद्यम छें च पण कखम  च , ये उद्यम तैं कु चलांद . ये उद्योग  क असली स्वरुप क्या च

भारतियुं  तैं क्या भेमता /भगवान् तैं बि नि पता . अरे विकी लीक एक्सपोजर तैं बि नि पता कि भारतीय  सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर 

उद्यम को असली स्वरुप क्या च . सबी माणदन  सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर उद्यम छें च  पण आकार, स्वरुप कै तैं नि पता .

    सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर इंडस्ट्री मा सरकारी अर गैर सरकारी भागीदारी बरोबर की च अर सरकारी-गैरसरकारी

भागीदारी क अमर जोड़ तैं अच्काल फेविकोल का जोड़ नाम दिए गे. सरकार गिरी जाली पण मजाल च ट्रांसफर उद्योग मा

सरकारी-गैरसरकारी भागीदारी पर क्वी अटवाँस/अड़चन ऐ जाओ धौं! यू उद्योग  अविचलित/अविरल  तरां से चलदो. 

         सरकारी कामगत्युं तबादला /ट्रांसफर उद्यम मा गैर सरकारी भागीदारी तैं कथगा इ नाम दिए अवश्य जान्दन जन कि

मिड्डल मैन, पावर ब्रोकर , अर सरकारी कारिन्दा जु अपण ट्रांसफर सरकारी नियम विरुद्ध करान्दन, जु अपण ट्रांसफर अपण

पसर/ सुविधा क बान करान्दन या ट्रांसफर रुक्वांदन  अर   जो ट्रांसफर करदन,  दुई सरकारी जात यूँ गैर सरकारी मिड्डल मैन

या पावर ब्रोकर तैं बड़ा सम्मान कि दृष्टि से दिखदन अर यूँ गैरसरकारी बिचौलियों तैं बढिया दक्षिणा दींण  मा कंजूसी नि करदन .

सरकारी कर्मचार्युं बस चौलल त य़ी गैर सरकारी ट्रांसफर एजेंटू  तैं पद्म  अवार्ड बि दे द्यावन. अर ह्व़े बि सकदो बल क्त्त्युं तैं

मीली बि गे होलू सामाजिक कार्य करता क नाम पर. 

  उत्तराखंड  जन राज्य जु घूस जन सांस्कृतिक धरोहर उत्तरप्रदेश बिटेन लैन अर घूस रुपी सांस्कृतिक धरोहर तैं  उत्तर प्रदेश से बि

बढिया ढंग से संरक्षण ही नि दीणा छन बल्कण यीं घूस, ब्राइबरी, जन  सासंकृतिक धरोहर तैं नया नया जामा देकी विकसित बि

करणा छन  वै राज्य क बारा मा इन सुणे जांद बल ट्रांसफर उद्योग तैं मुख्य मंत्री बि संरक्षण दीन्दन हाँ बस या बात

खबरूं मा ही सुणे जै सक्यांद किलै कि न्याय निसाब  या च जब तलक साबित नि ह्वाऊ तब तलक कै पर उन्नी भगार/लांछन  लगाण पाप त नी च

पर गैर कानूनी च  . इन सुणे जांद बल हरेक मंत्रालय मा ट्रांसफर/तबादला ट्रान्सफर  फीस का नाम से नि लिए जांद बलकण पार्टी फंड

का नाम पर ट्रान्सफर घूस लिए जांद . मीन विकीलीक का कथगा इ ब्लौग बांचिन पण वो बि ये मामला मा चुप इ छन. खैर जो बि

ह्वाऊ इन जरोर बुले जांद बल ट्रांसफर घूस से राजनीतिग्य अर ब्यूरोक्रेट दुई खुस छन अर आण वल़ा सौ सालुं मा भारी से भारी

लोकपाल या लोकायुक्त विधेयक बि ट्रान्सफर  उद्योग तैं नि निमाड़ी सकदन, खतम नि करी सकदन.

अरे जु आत्मा जस   चेतना मा होऊ वै उद्यम तैं कु ख़तम कौरी सकद भै !  जु उद्योग छें च पण जैको आदि-अंत इ पता नि चौल त

वै उद्यम तै क्वी बि कानूंन  क्या ख़तम कॉरल?


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                                   छन्नी , छन्ना अर मट्यंळ


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                  भीष्म कुकरेती 



            अच्काल श्याम ह्व़े ना अर दरेक/प्रत्येक टी.वी. चैनेलुं  मा दिन भर की खबरूं  छांच छुल़े जांद.

क्वी चैनेल नाम दींदु हाई  डिबेट, क्वी बुलद न्यूज़ हावर , क्वी कुछ .

          पण जन हम तैं बीडी -तमाखू ढब पड़ी जांद अर फिर तमाखू पीण बन्द नि होंद , उनि मी तैं टी.वी चैनेलुं

पोलिटिकल डिबेट  दिखणो ढब बि पोड़ी गे. ब्याळी श्याम  घरवाळी न ब्वाल  ," पोलिटिकल डिबेट दिखण से बढिया  तुम चै चिन्नी क प्याला

धून्दा त मी कन्नी क्वी ' 'कब जाएग ए साला 'के' सीरियल' दिखदु.".

                 मीन जबाब दे  "  अरे भै ! दिन मा जब  मी  त्यार अर अपण बांठो  जुठ  भांड  धूंदो त तू 'कब तक बन्द होगा ए 'के ' सीरियल'

नि दिखदी छे की ना?"

          घरवाळी क बुलण छौ , "  दिनु अर श्याम दें  क  'के' सीरियल' मा भौत फरक हूंद. दिनक  'के'  सीरियल लाइट ड्रामा होन्दन. जब की

रातू 'के' सिरियलूं मा हाई इमोशनल ड्रामा होंद  "

                  म्यरो जबाब छौ ," हाँ ! इनी च. दिन का पोलिटिकल डिबेट अर श्याम दें क 'पोलिटिकल डिबेट' मा बि इनी फरक होंद".

                 घरवाळी को जबाब छौ " हुं ! हूंद क्या च ! टी.वी. चैनेलूं ;पोलिटिकल डिबेट  ' मा ? चेंनेल का ऐंकर सवाल पुछ्दु अर राजनैतिक पार्टी क

घाघ फुन्द्यानाथ सीधा जाबाब छोड़ीक इनै उनै क फ़ोकट का जबाब दीन्दन . राजनैतिक   पार्टियूँ क फुन्द्यानाथुं तैं  पूछो तुमर

कुदड़ को क्या हाल छन त वै फ़ुन्द्यानाथौ जबाब हूंद  ,"हमारी विरोधी पार्टि क बल्द  गिंवड़ उज्याड़ खाणा छन". सवाल हूंद  कुदड़ कु

अर यूंक जाबाब हूंद गिंवड़ को "

        मीन बोली , " हुं ! त्यार 'के' सिरियलूं से त कम इल्लोजिकल हून्दन यि 'पोलिटिकल डिबेट."

       " खन्नौ  लौजिक हूंद उख 'पोलिटिकल डिबेटूं  मा.  टी. वी चैनलुं कत्ति एंकर बिसरी जान्दन बल वो सिरफ़ एंकर छन ना की जज . जादातर

टी.वी चैनलुं क एंकर डिबेट से पैलि अपण फैसला सुणे  दीन्दन. इन बि क्या पत्रकारिता कि पत्रकार ही जज बौण जावन ! पत्रकारूं  काम च 

सवाल -जाबाब करण, सूचना दीण, जागृति सराण/फैलाण  ना कि फैसला सुणाण." घरवाळी  न रुसेक   ब्वाल.

        मीन ब्वाल , " त्यार 'के' सिरियलूं से त जादा गंभीर हून्दन 'पोल्यिकल डिबेट' ."

  घरवाळी न नड़केक (गुस्सा ) ब्वाल, " किलै छंवां  यूँ राजनैतिक पार्टयूँ फुन्द्यानाथुं अर एंकरों तैं गाळी खलाणा! "

      मैन  जबाब दे , " नही इन नी च ."

               घरवाळी को कद्दक फैसला छौ , " टी.वी चैनालूं क पोलिटिकल डिबेटऊँ का  राजनैतिक छुयूँ छांच छुलै मा ना त नौण /नौणि निकळदि अर ना ही छांच . .
बस छांच छुल़े हुंद बस दै खराब हूंद , मेनत बि भेळउन्द जोग हुंद, अर हाथ कुछ नि आन्द."

   मीन बोली , " नहे . यू तेरो पोलिटिकल डिबेटों बारा मा  यूँ नेगेटिव सोच च. "

    घरवाळी न फडेक ब्वाल , " हं ! मी नेगिटिव अर उ जु राजनैतिक पार्टयूँ क फुन्द्यानाथ डिबेटों मा भाग लीन्दन ओ क्या  पोजिटिव छ्न ?"

     मीन  पूछ , " मतबल ?"

        घरवाळी को कडक जबाब थौ, " अरे उ जो राजनैतिक पार्टयूँ क नेता डिबेट मा आन्दन सबी गूणी जन बात करदन ."

    मीन घंघतोळ मा पूछ , "गूणी ...?"

        घरवाळी न बिंगायी ," हाँ ! जन गूणी अपण पूँछ त दिखदु इ नी च अर बांदरौ खुणी बोल्दु बल , हे बांदर ! त्यार पूँछ लम्बो च .

इनी छन य़ी राजनीति का फुन्द्यानाथ . बेशरम, बेल्ल्ज्ज . बी जे पी वाळ कोंग्रेस पर भगार लगान्द बल कोंग्रेस्सी भ्रष्ट छ्न .

अर  भूलि जान्दन बल कर्नाटक मा यदुरपा न क्या क्या खेल खेलिन, उत्तराखंड मा निशंक को क्या भ्रष्ट हाक छया . अर इनी कांग्रेसी

छन . कांग्रेसी यदुरप्पा तैं बड़ा पापी बथान्दन पण अपण दें कलमाड़ी, अशोक चौहाण, प्रताप सिंग कैरों की बात बिसरी जान्दन."

              मी कुछ जबाब  द्यून्द  कि नौनु ब्वारी न भितर बिटेन जबाब दे , " हाँ १ पापा ये सब राजनैतिक प्रवक्ता छलनी हैं, सब छन्ना हैं सब मट्यंळ हैं .

अर यूँ सबि राजनैतिक प्रवक्ताओ क हाल इन छन . छन्नि  अपण दुंळ  त दिख्दी नी च पण मट्यंळ खुण बुल्दी बल मट्यंळ फर भौत दुंळ/छेद  छ्न".

            म्यार कक्या ससुर बोल्दा छया बल जब कबि सासू अर ब्वारी एकी भौणम  बुलण बिस्यावन त ससुर तैं उख बिटेन भाजी जाण चएंद .मी

भैर सिगरेट लीणो चली ग्यों

 



Garhwali Satire, Garhwali Humour, Himalayan Language Satire, Satire from Uttarakhandi Languages to be continued.....

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Bhishma Kukreti

                 कवा झूट  बुलण वाळ  तैं किलै नि काटदो



(Garhwali Satire, Garhwal Humorous essays, Satire in Uttarakahndi Languages, Himalayan Languages Satire and Humour )


                                     भीष्म कुकरेती

   

                 पैलो जमानो भलो छौ जब झूट  बुलण वाळ तैं कवा  काटदो छौ. बस झूठ  ब्वालो अर कवा अपण  ड्यूटी खुणि तयार. 

लोक बुल्दन बल युधिस्ठिर  धर्मराज को रूप छौ अर तबी  युधिस्ठिर झूठ नि बोल्दो थौ. पण महाभारत मा इन बि त नि लिख्युं च

बल दुर्योधन न बि कबि झूट ब्वाल. जी नही! दुर्योधन बि झूठ नि बोल्दो थौ. अरे झूठ कनकै बोलणो थौ चाहे ओ युधिस्ठिर ह्वाऊ

या दुर्योधन ह्वाओ द्वी झूठ बोली नि सकदा छा. वै जमानो मा जनि क्वी बि झूट बोल्दो थौ सर से कवा काटणो ऐ जांदा छया.

जनि झूठ  बुले ग्याई तनी कवा कांव कांव करदा झूट बुलेंदर का मूंड पर चूंचै कचांग मारी दीन्दा होला. इन मा युधिस्ठिर त जाणि

द्याओ वैका मंत्री संतरी बि झूट नि बोली सकदा छा.

        पैलो जमानो भलो थौ तबी त वकील नाम को भयंकर सामाजिक जानवर वै टैम पर नि पाए जान्दो थौ. वै टैम पर वकील अर वकालतनामा

क जरोरात इ नि छे. कोर्ट  मा जनि क्वी मुवक्किल, मुद्दई  या गवाह क्वी बि  झूट बोल्दु रैं होलू झट से कवा ऐका पछ्याणक करदा होला बल

झूट क्वा बुलणु च  अर न्यायाधीस तैं कुछ करणे जर्वत इ नी छै. कवा न्याय का पंछी छया . सैत च वैबारी लोक कोर्ट मा नि जांदा छया .

कवा न्याय  करी लीन्दा छया

   अब यू रिवाज ख़तम ह्व़े ग्याई .कुज्याण  भगवान् न कवों शक्ति किलै कम करी दे होलू , भगवान् इ जाणल़ू . पण जु बि ह्वाई

ठीक इ ह्व़े होलू.

   अब ज़रा घड्यावदी, जरा स्वाचदी, जरा विचार कारो त आप बि बोलिला बल ठीक इ ह्व़े जु झूट बुळण वाळऊँ  तैं कवा  नि कटदो.

अच्काल झूठ बोलण वालूँ  तैं कवा काटदो  त भारत मा इ  द्वी चार सौ करोड़ कवों जर्वत होंदी. कुज्याण कु कखम झूठ  बोली दीन्दो 

त वै हिसाब से हरेक भारतीय क पैथर औसतन द्वी कवा त  चयेणा इ छया की ना?

      अब ज़रा  घड्यावदी/स्वाचदी की आप रासन कार्ड ऑफिस मा जयां छंवां  अर आप चपड़सी तैं  पुछणा छंवां बल "साब कख छन ?"

चपड़सी क जबाब होंदु , " साब एक जरुरी मीटिंग मा व्यस्त  छन ." . अर इना  चपड़सी न झूट ब्वाल ना की उना कवा ऐका चपड़सी

क मूंड कच्याण बिसे जालो. कवा क्वी मनिख त छ नि अपण काम मा लापरवाही कारलु. जथगा समय भगवान् न झूट  बुलण वाळ तै 

ठैरायुं  होलू/नियत कर्युं कवा उथगा तैं त ल्यालो की ना ? इथगा मा वी चपड़सी फोन पर साब की बीबी मा बोल्दु, " हाँ मेम साब ! साब ओफिसियल काम मा

भौत व्यस्त छन" अर फिर कवा की जरोरात होली की ना किलैकि साब त अपण  सेक्रेटरी दगड चा -पाणी पीण  मा व्यस्त छन . 

  इन मा  चपड़सी   पर चूंच मारणो या काटणो द्वी कवा ओफिसियाली व्यस्त ह्व़े जाला अर जब आप झूठ बोलिल्या बल आप की

आमदनी मिड्डल इनकम ग्रुप मा ना लोअर इनकम ग्रुप मा च त आप तैं काटणो एक कवा चयेंद अर फिर आपक  ड्यारम त चार इ आदिम छन अर

बोलणा छंवां बल आपक परिवार मा  छै आदिम छन त आप तैं काटणो हैंक कवा चएंद की ना ?

      अच्काल चार मोबाईल फोन अर जण चारेक गर्ल फ्रेंड रखण जरुरी ह्व़े गे. इ द्वी जरोरात बि छन अर स्टेटस  सिम्बल बि छन.

अब आप एक गर्ल फ्रेंड तैं लेकी कै बढिया सी जगा मा शराब की चुस्की ल़ीणा छंवां , कैंडल  डिन्नर की तैयारी होणि इ च कि आपक

बीबी क फोन आये अर आप एक मोबाइल पर बुलणा छंवां, " ए भै !  मी जरा एक महत्व पूर्ण फोरेन क्लाइंट क दगड डिन्नर करणु छौं .."

अर इथगा मा  आप तैं काटणो कवा तैयार पण आप हैंको फोन पर दूसरी गर्ल फ्रेंड क दगड बचळयाणा छंवां, "  स्वीट हार्ट आज मी

जरा अपण साब क दगड बैठ्युं छौं .." आप तैं कटणो हैंको कवा तैयार अर इनी द्वी हौरी गर्ल फ्रेंडू फोन आलो अर आप तैं झूट इ बुलण 

पोड़ल अर खाली आपक इ वास्ता  चार कावों जर्वत ह्व़े जाली जो आप पर कचांग  लगाला.   

        अर  ज़रा घड्यावदी, जरा स्वाचदी, जरा विचार कारो की पार्लियामेंट अर विधान सभा  मा कथगा कवों जरुरत ह्वेली ! ए मेरी ब्व़े !

जख नेता लोक पल पल मा झूट  बुलणा  रौंदन उख त कव्वों की फ़ौज बि कम पोड़ळी . अर फिर चुनावूं टैम पर त नेता, नेताओं चमचा,

अखबार नबीस , खबररशां ( पत्रकार ), बिचौलिया, चुनौ  फंड दीण वाळ अर फंड ल़ीण वाळ  अर इख तलक की वोटर बि झूठ इ बुळणा रौंदन

त चुनाव क  टैम पर भगवान् इथगा  कवा कखन ल्हालो?   

  फिर चलो ! भगवान् कावों इंतजाम करी बि द्यालों पण कवों कु  खाणो इंतजाम कखन होलू. अच्काल त मनिख कवों तैं घी घुसीं रुट्टी

नमकीन वगैरा दीणा रौंदन पण जब कवा झूट  बुलण वालुं तैं काटल त कै मनिख न दीण कवा तैं खाणक  ?

     भगवान् बि हमारो इ त च. इलै भगवान न ये जमानो मा झूठ बुलण पर कवा काटणो रिवाज बन्द करे दे . चलो ठीक इ ह्व़े .   


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to be continued in next issue....

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