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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
June 30 · Edited
तुम में है कुछ बात

तुम में है कुछ बात
कुछ बात बस जो तुम में है

उन आँखों में हो रही है बात
वो जज्बात जो तुम में है

अल्फ़ाज़ खामोश है पर हो रही बात
वो मदमस्त मदहोश अंदाज जो तुम में है

दूर हो या हो तुम पास वो पास बुलाने का हुनर
मेरे सरताज मेरे सरकार वो बात बस तुम में है

वो अंदाज वो तेरा इकरार
वो तड़प वो इन्तजार वो प्यार बस तुम में है

तुम में है कुछ बात
कुछ बात बस जो तुम में है

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
9 hours ago
कुछ नही चाहिये मुझको

कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही हाँ कुछ नही
जो मिल गयी
जो मिल गयी माँ के हाथों की बनी दो रोटियाँ
मुझे जन्नत मिल गयी अब क्या चाहिये मुझको
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

बचपन की वो लोरियाँ दूध भात की कटोरियाँ
सारे दिन थक कर भी माँ सुनाती थी कहानीयां
और क्या चाहिये था मुझको और क्या
दो मीठे बोल दो माँ की वो प्यारे हाथों की थपकियाँ
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

बचपन छूटा लड़कपन छूटा
जवानी अपने ही रंग घर गृहस्थी संग बिता
अब भी याद आती हो तुम मेरा साथ दे जाती हो तुम
माँ उस कोने में जब उदास बन झूठा झूठा मै जब रूठा
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही हाँ कुछ नही
जो मिल गयी
जो मिल गयी माँ के हाथों की बनी दो रोटियाँ
मुझे जन्नत मिल गयी अब क्या चाहिये मुझको
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 3
यूँ ही तन्हा उभरे हैं

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
ये जो जिस्म के अंदर मेरे ये ख़याल
उन से ही जाके जा पूछों मै
इनके वो अनसुलझे सवाल

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
दिल की दीवारों में जा जकड़े हैं
छोड़े ना छूटते ना टूटते
आँखों की वो अकेली रोती धार

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
मौसम खड़ा उदास उजाड़ा मेरे द्वार
बादल बिन बरसे गरजे है ये क्यों प्यास
कैसा है ये सावन आया अब की बार

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
मलते मलते पलकों का बुरा हाल
कैद में पंछी उड़ने को बेकरार
रहा ना कुछ बस रह गयी वो मिलन की चाह

यूँ ही तन्हा उभरे हैं
ये जो जिस्म के अंदर मेरे ये ख़याल
उन से ही जाके जा पूछों मै
इनके वो अनसुलझे सवाल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 2
बस छू कर

बस छू कर
गिरा गया कोई
नयनों से घायल कर
मुझे मुझसे ले गया कोई

बस एक वो
तेरी तिरछी नजर
शुरू हुआ वो
मेरा अनजान सफर

आँखें बंद कर के
दिल चलने को आज किधर
हो के मदहोश
बस चला वो तेरी ही तरफ

बस छू कर
गिरा गया कोई
गैर था मै अपने से ही
मुझे अपना बना गया कोई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 1
यूँ दूर दूर रहना.

ना होगा अब तुम से
ना होगा अब हम से
यूँ दूर दूर रहना.....२

तुम हो तो ज़िदगी है
तुम ही से मेरी बंदगी है
साँसों की आवन-जावन हो तुम
सुनो धड़कन मेरी इस दिल की कहानी हो तुम

ना होगा अब तुम से
ना होगा अब हम से
यूँ दूर दूर रहना.....२

रवानगी ना हो अकेले
छोड़ ना जाना तन्हा यूँ जिंदगी के मेले
साथी मेरे सातों जन्म के
देखो तुम अपना वादा निभाना

ना होगा अब तुम से
ना होगा अब हम से
यूँ दूर दूर रहना.....२

उस सुनहरे फलक पर
चाँद सितारों के सफर पर
यूँ मेरे हाथों में तुम अपना हाथ दे जाना
देख अकेले ना साथ छोड़ जाना

ना होगा अब तुम से
ना होगा अब हम से
यूँ दूर दूर रहना.....२

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
June 30 · Edited
तुम में है कुछ बात

तुम में है कुछ बात
कुछ बात बस जो तुम में है

उन आँखों में हो रही है बात
वो जज्बात जो तुम में है

अल्फ़ाज़ खामोश है पर हो रही बात
वो मदमस्त मदहोश अंदाज जो तुम में है

दूर हो या हो तुम पास वो पास बुलाने का हुनर
मेरे सरताज मेरे सरकार वो बात बस तुम में है

वो अंदाज वो तेरा इकरार
वो तड़प वो इन्तजार वो प्यार बस तुम में है

तुम में है कुछ बात
कुछ बात बस जो तुम में है

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बालकृष्ण डी ध्यानी
June 29
कुछ तो

कुछ तो आयेगा साथ मेरे
उदास ना होना तू दिल पास मेरे
कुछ तो आयेगा साथ मेरे

बहुत कुछ है कम कुछ भी नही
पास सब हैं पर अब कुछ भी नही
कुछ तो आयेगा साथ मेरे

मंजिलें हैं राहें हैं पर फासले बड़े
सुस्त कदमों के साथ मगर जायें किधर
कुछ तो आयेगा साथ मेरे

प्यासा हूँ नदी बह के आयेगी यंहा
सागर से दूर वो जायेगी कंहा
कुछ तो आयेगा साथ मेरे

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बालकृष्ण डी ध्यानी
June 29
फिर वो कोरा पन्ना पास मेरे

फिर वो कोरा पन्ना पास मेरे
यादों की बीती बारात लिये

नये सुबह का आगाज था
बिता पल ही वो अब साथ था

फिर वो कोरा पन्ना पास मेरे
हजारों चेहरे खड़े बस सवाल लिये

चित्र उभरे वो ख्याल में
बस प्रश्नों के ही जवाबों में

फिर वो कोरा पन्ना पास मेरे
मेरे अंतरमन की आवाज लिये

दिन बहता है रात बहती है
बह गया है वो नई सुबह के अहसास लिए

फिर वो कोरा पन्ना पास मेरे
यादों की बीती बारात लिये

एक उत्तराखंडी
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हल्के हल्के

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
बूंदों की बरसात यंहा वंहा
भीगा मन भीगा तन
भीगा भीगा खड़ा वो जंवा समा

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
छायी पहड़ों पे बादलों की घटा
रिन्दों बिन्दुं ने क्षण में उसे सरोबोर किया
गीले गीली से हरे आवरण में ओढ़ लिया
उस मन ने मुझे अपनी ओर किया

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
नई नवेली दुल्हन सज के पीया से मिलन की तड़प
ऐसे भावों के साथ मुझे झकझोर दिया
ले आलिंगन में मुझे उसने तेरी ओर किया

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
मदमाती रहे वो हंसती रहे खिलखिलाती रहे वो
सावन के तू ये बरखा
मेर तन मन सदा हिचकोले खाती रहे
यूँ शब्दों में मेरी कविता बन गुन-गुनाती

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
बूंदों की बरसात यंहा वंहा
भीगा मन भीगा तन
भीगा भीगा खड़ा वो जंवा समा

एक उत्तराखंडी

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Yesterday
हल्के हल्के

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
बूंदों की बरसात यंहा वंहा
भीगा मन भीगा तन
भीगा भीगा खड़ा वो जंवा समा

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
छायी पहड़ों पे बादलों की घटा
रिन्दों बिन्दुं ने क्षण में उसे सरोबोर किया
गीले गीली से हरे आवरण में ओढ़ लिया
उस मन ने मुझे अपनी ओर किया

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
नई नवेली दुल्हन सज के पीया से मिलन की तड़प
ऐसे भावों के साथ मुझे झकझोर दिया
ले आलिंगन में मुझे उसने तेरी ओर किया

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
मदमाती रहे वो हंसती रहे खिलखिलाती रहे वो
सावन के तू ये बरखा
मेर तन मन सदा हिचकोले खाती रहे
यूँ शब्दों में मेरी कविता बन गुन-गुनाती

हल्के हल्के
गिरी अहसास की
बूंदों की बरसात यंहा वंहा
भीगा मन भीगा तन
भीगा भीगा खड़ा वो जंवा समा

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