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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 21
एक कोना खाली सा वो

एक कोना खाली सा वो
चीखता रहा वो चिल्लाता रहा
भुला बचपन छूटी जवानी
अब वो किसे ढूंढता रहा वो किसे खोजता रहा

यादों की परछाई धुंधली
सूखे पत्तों की तन्हाई ...२
मीलों खड़ी दूर मंजिल मुझसे
ना जाने क्यों मिलने आयी ये रुसवाई
एक एक ने वो पन्ना पलटा
ना डूब सका वो उसकी गहराई

एक कोना खाली सा
वो चीखता रहा वो चिल्लाता रहा
भुला बचपन छूटी जवानी
अब वो किसे ढूंढता रहा वो किसे खोजता रहा

ओस की बूंदों का वो खारापन
टूटे ऐनक से हुआ उसका आज मिलन ...२
सामना कुछ ऐसा हुआ दोनों में
वो भी ना हो सका अब तक पूरा
अधूरा अधूरा आया था वो
जाने को हुआ वो भी गया अधूरा

एक कोना खाली सा
वो चीखता रहा वो चिल्लाता रहा
भुला बचपन छूटी जवानी
अब वो किसे ढूंढता रहा वो किसे खोजता रहा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 21
मैं समझा था मैं ही दीवानों हूँ

मैं समझा था मैं ही दीवानों हूँ
अपने पहड़ों का इन के नजारों का

गया जंहा जंहा मै
मै तुझसे मिला वंहा वंहा मैं
आँखों से बहा कंही तू
आ सीने लगा कभी तू

मैं समझा था मैं ही बंजार हूँ
अपने पहड़ों से इन बहती धारों से

गुपचुप बैठा मिला तू
खोया खोया उसके दिल में खिला तू
तेरी यादों के लेके साये
बीती बातों में जी रहा वो

मैं समझा था मैं ही जुदा हूँ
अपने पहड़ों से इन गाँव खलिहानों से

पल पल हर मोड़ मिलने लगी तू
मेरे सांसों की डोर जोड़ने लगी तू
जो प्रवासी पहाड़ी मुझसे मिला
उत्तराखंड तू बस दिल में खिला

मैं समझा था मैं ही दीवानों हूँ
अपने पहड़ों का इन के नजारों का

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 20 · Edited
आईना मेरा

आईना मेरा आक़िबत कह गया
आज़र्दाह वो रहा आज़माईश कह गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

पेशानी में उभरी लकीरों को देखकर
आँच के आगो़श में मुझे आगा़ज दे गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आरज़ू मेरी आयन्दा ही रही मुझसे
आते जाते बस वो गुफ्तगू कर गयी
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आज़ाद है वो बस आराईश की तरह
आवाज़ह की वो बस आवाज बनकर रह गयी
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आईना मेरा आक़िबत कह गया
आज़र्दाह वो रहा आज़माईश कह गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
37 minutes ago · Edited
उस शुन्य में

उस खाली आसमान को मैं निहरता हूँ
बस उसके रिक्त में मैं अपने को पाता हूँ

छटपटाता हूँ बड़बड़ाता हूँ
अकेला अपनों से कुसमुसा सा जाता हूँ

बोलना चाहता हूँ बोल नही पाता हूँ
उस अकेले में पीस सा जाता हूँ

देखता हूँ उन्हें निहरता भी हूँ अपनेपन से
पर उन अपनों की आँखों को मैं कंही नही पाता हूँ

उस शुन्य में निहरते निहरते
मैं अपने बनाये शुन्य से घिर जाता हूँ

ध्यानी प्रणाम

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
मैं

मैं क्या सोचता हूँ
मैं क्या खोजता हूँ
सोचने और खोजने में
अक्सर ही मै कुछ भूल जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

जाना होता है कंही ओर
कंही ओर चला जाता हूँ
खोजते खोजते में अक्सर
अपने ही पथ से भटक जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

ना अब तक मै सोच पाया
क्या मै सोचता हूँ
अब तक ना खोज पाया
जिसके लिए बाहर निकलता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ..............

ये सिलसिला चल रहा है
अनंत से किसी को ठीक से पता नही
पर सब सोचते जा रहे है
ना जाने क्या खोजते जा रहे हैं
मैं क्या सोचता हूँ..............

मैं क्या सोचता हूँ
मैं क्या खोजता हूँ
सोचने और खोजने में
अक्सर ही मै कुछ भूल जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

अर्ज है की ..

हम तो दिल की किताब ले कर आये थे यंहा
दिमाग की किताब ने कुछ ऐसा हर्ष किया
ना जाने वो दिल कंहा पीछे छूट गया मुझसे
खोजता रहा मैं जमाना बहुत आगे बढ़ गया

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

क्या था ये

पीला पीताम्बर ओढ़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

काट चौरासी लाख योनियाँ
आकर यंहा फिर जीवन झोंक दिया
राम नाम बस बोल दिया

जन्म मरण ना मिला छुटकारा
ध्यान लगाना था लगा कंही और दिया
राम नाम बस बोल दिया

चरणों में पड़ना था प्रभु तेरे
कंही और भोग दिया व्यर्थ सुख से नाता जोड़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

कपट छल मिथ्या से मन भरा नही
तेरे चरणों से मन से पड़ा नही ऊपरी ऊपरी
राम नाम बस बोल दिया

क्या था ये क्या कर दिया
उन शरण आने बाद भी मन तन सो गया
राम नाम बस बोल दिया

पीला पीताम्बर ओढ़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 22
आज मै फिर रोने आया हूँ

आज मै फिर रोने आया हूँ
जो खो दिया था उसे फिर खोने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

बात उस समय की थी
फिर उसी बात पे मैं तुम से लड़ने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

बद में ना रह जाता कुछ भी है
फिर उस बद को मैं आज करने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

अतिरिक्त ऐसा कुछ होता नही
तत्काल उसे झट मैं पाना चाहता हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

आगे से ना कभी पूछना मुझसे
बचे थे दो आंसूं पास मेरे उन्हें ले मैं रोने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

तब दो राहें बन गयी थी अपनी
फिर उसी पीछे छूटी एक राह पे चलने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी 

वो अन्धेरा

वो अन्धेरा कब तो छटेगा
वो सुरमई उजाला कब तो फटेगा

आशा का दीप जला ले मनवा
निराशा तू दूर भगा ले

कब तक ये भाग्य यूँ दिल छलेगा
महेनत रंग एक दिन निखरेगा

हैराना ना हो इस जग हैरानी से
सब निर्भर अपनी मेहरबानी से

ना लेना मन सहारा किसी का
तू बन जा किनार सभी का

वो अन्धेरा कब तो छटेगा
वो सुरमई उजाला कब तो फटेगा

ध्यानी प्रणाम

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago · Edited
ना जाने

माना की मै इजहार नही कर पाता
खुल के प्यार नही कर पाता
तुम ही हो इस दिल में बसी
फिर भी तुम्हे मै
ये दिल चिर के नही दिखा पाता
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

रहता हूँ अकेला जब भी
बस तेरे यादों में घिरा रहता हूँ
होती जब तुम पास मेर
बस मै तुम्हरे बातों में घिरा रहता हूँ
तकलीफ ना हो तुम्हे थोड़ी भी
इन ही विचारों में डूबा रहता हूँ
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

इतने मौसम बीत गये
साथ साथ तुम्हरे आस पास
फिर भी तुम सदा इस दिल के साथ
और वो ही संकोचित मन पास मेरा
उसमे भरा तुम्हरे लिये ही ढेर सारा प्यार मेरा
करता है अब भी डर डर के इजहार
तुम्हरे जन्मदिन पर मेरा तोहफा
संकोचित कविता का उपहार
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

माना की मै इजहार नही कर पाता
खुल के प्यार नही कर पाता
तुम ही हो इस दिल में बसी
फिर भी तुम्हे मै
ये दिल चिर के नही दिखा पाता
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

ध्यानी प्रणाम

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