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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
मेरे लिये

नजरों ने तेरी कहा रोक जा मेरे लिये
कैसे कर दूँ बयां तू क्या है मेरे लिये

नैनों के आगे तुम हो
नजरों के अंदर हो तुम
पलकें खुली हो या बंद
इस दिल की धड़कन हो तुम

ना कोई शिकवा है ना शिकायत
मजहबों से बड़ी है ये मोहब्बत

खुदा का नूर सा वो टपकता
रहमत उस यार के बंदगी में
आँखों की भाषा लिखी पड़ी
रोक जा पढ़ ले उसे दो घड़ी

सांसों की रफ़्तार चढ़ी थमी
चाहे मिले दोजक या इसे जमी

धड़कता ही रहा वो सीने में
असल मजा इस संग जीने में
रुक्सत हो जाना सबको एक दिन
डूब जा कतरा कतरा उन सांसों को पीने में

नजरों ने तेरी कहा रोक जा मेरे लिये
कैसे कर दूँ बयां तू क्या है मेरे लिये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 29
अहंकार को जितना दबाने की कोशिश करोगे वो उतना ही और उभरेगा

संभल जाओ दोस्तों ये लाइलाज है जितना हो सके अपने से उसे दूर रखें ...... जनहित में

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 29
रेगिस्तान दे रहा वो इशारा

रेगिस्तान वो निर्जन है
मस्र्स्थल बना वो जीवन है
मस्र्भूमि का ले वो किनार
मृगजल स्थान दे वो सहरा
तट बिखरा रेती वो समय का
कैसे खेल खिलाये ये विश्व सारा
रेगिस्तान दे रहा वो इशारा

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 28
फिर देने लगा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा मुझे समंदर कोई

बांध अपना बांध रखा है शीशा जो चटक सा गया है
देख आईने सूरत अपनी मुझे आईना समझ बैठा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा है मुझे मुकदर कोई

सब ने ऐसा घेर रखा है अकेला दूर देख रहा है
आँखों में बसती है हरयाली सूखे को वो सोख रहा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा है मुझे रब कोई

पत्थर पत्थर पड़ा हुआ है अंदर बाहर झांक रहा है
किसने समझ लिया उसे अपना किसने परया कर दिया है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा मुझे समंदर कोई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hrs · Edited ·

मेरी बेटी हो तुम

मेरी बेटी हो तुम
सुनहरी धूप हो नीम के छांव तक
मेरे ममता के साथ चल उन बादलों के गांव तक
बन मेरा सहारा
बेटी तू ही मेरा किनार
मेरी बेटी हो तुम

मेरी बेटी हो तुम
जीवन का आदि.अन्त तुम्ही से
सतरंगी इन्द्रधनुष की दुनिया तुम्ही हो
कोरा कागज हो तुम
भव सागर की तारक हो तुम
मेरी बेटी हो तुम

मेरी बेटी हो तुम
धन कामना का जोड़ हो
मंदिर और साधु-संत की दौड़ हो
गृहस्थ की मेरी पहली कुंजी
आनन्द बेल की तू पूंजी
कुल के दात्री हो तुम
मेरी बेटी हो तुम

मेरी बेटी हो तुम
दो कुटुम्ब का जोड़ हो तुम
मधु-अमृत और सम्मान का मोड़ हो तुम
सुख-दुःख की बाती
मेरे सुबहा मेरी रात्रि
मेरी लाडी मेरी बेटी
मेरी बेटी हो तुम

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

अफ़सोस है की वो अलमारी की तरह यूँ पड़ी रही
आज़ादी मिली पर अब तक फंदे से वो लटकी रही

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 31 · Edited
हर याद के साथ
.
हर याद के साथ जुडी है बात तेरी
याद आती हो तुम यूँ ही कभी
हर याद के साथ जुडी है बात तेरी

कह दो जो तुम को कहना है
उम्र भर अब तुम्हरी बातों के ही संग तो रहना है

साथ दे जाती हो तुम
उन बातों यादों में मिल ही जाती हो तुम
जिन से मेरा ना कभी कुछ मतलब था
अब लगता है की वो ही सब कुछ था

दूरियां ही सब रंग दिखा जाती हैं
चढ़े बुखार को वो यूँ ही बिखेरती जाती हैं
जब तक अहम को ना लगे ठोकर उसके
खुद नाचती हैं और नचाती हैं

खैर वो सब बीती बात है उन बातों का क्या
तेरे साथ गुजरी उन रातों का क्या
दिल में एक नासूर नस्तर सा वो चुबा जाती है
आँखों से टपक टपक कर वो गिर जाती हैं

हर याद के साथ जुडी है बात तेरी
याद आती हो तुम यूँ ही कभी
हर याद के साथ जुडी है बात तेरी

कह दो जो तुम को कहना है
उम्र भर अब तुम्हरी बातों के ही संग तो रहना है

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 31
मेरे लिये

नजरों ने तेरी कहा रोक जा मेरे लिये
कैसे कर दूँ बयां तू क्या है मेरे लिये

नैनों के आगे तुम हो
नजरों के अंदर हो तुम
पलकें खुली हो या बंद
इस दिल की धड़कन हो तुम

ना कोई शिकवा है ना शिकायत
मजहबों से बड़ी है ये मोहब्बत

खुदा का नूर सा वो टपकता
रहमत उस यार के बंदगी में
आँखों की भाषा लिखी पड़ी
रोक जा पढ़ ले उसे दो घड़ी

सांसों की रफ़्तार चढ़ी थमी
चाहे मिले दोजक या इसे जमी

धड़कता ही रहा वो सीने में
असल मजा इस संग जीने में
रुक्सत हो जाना सबको एक दिन
डूब जा कतरा कतरा उन सांसों को पीने में

नजरों ने तेरी कहा रोक जा मेरे लिये
कैसे कर दूँ बयां तू क्या है मेरे लिये

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 29
अहंकार को जितना दबाने की कोशिश करोगे वो उतना ही और उभरेगा

संभल जाओ दोस्तों ये लाइलाज है जितना हो सके अपने से उसे दूर रखें ...... जनहित में

ध्यानी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 29 
मैं तो सारे गीले शिकवे पीछे छोड़ आया था
पर तू ही है जो उसे अभी तक निभा रहा है

ध्यानी