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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday · Edited
उस शुन्य में

उस खाली आसमान को मैं निहरता हूँ
बस उसके रिक्त में मैं अपने को पाता हूँ

छटपटाता हूँ बड़बड़ाता हूँ
अकेला अपनों से कुसमुसा सा जाता हूँ

बोलना चाहता हूँ बोल नही पाता हूँ
उस अकेले में पीस सा जाता हूँ

देखता हूँ उन्हें निहरता भी हूँ अपनेपन से
पर उन अपनों की आँखों को मैं कंही नही पाता हूँ

उस शुन्य में निहरते निहरते
मैं अपने बनाये शुन्य से घिर जाता हूँ

ध्यानी प्रणाम

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 23
मैं

मैं क्या सोचता हूँ
मैं क्या खोजता हूँ
सोचने और खोजने में
अक्सर ही मै कुछ भूल जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

जाना होता है कंही ओर
कंही ओर चला जाता हूँ
खोजते खोजते में अक्सर
अपने ही पथ से भटक जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

ना अब तक मै सोच पाया
क्या मै सोचता हूँ
अब तक ना खोज पाया
जिसके लिए बाहर निकलता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ..............

ये सिलसिला चल रहा है
अनंत से किसी को ठीक से पता नही
पर सब सोचते जा रहे है
ना जाने क्या खोजते जा रहे हैं
मैं क्या सोचता हूँ..............

मैं क्या सोचता हूँ
मैं क्या खोजता हूँ
सोचने और खोजने में
अक्सर ही मै कुछ भूल जाता हूँ
मैं क्या सोचता हूँ.............

एक उत्तराखंडी

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आईना मेरा

आईना मेरा आक़िबत कह गया
आज़र्दाह वो रहा आज़माईश कह गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

पेशानी में उभरी लकीरों को देखकर
आँच के आगो़श में मुझे आगा़ज दे गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आरज़ू मेरी आयन्दा ही रही मुझसे
आते जाते बस वो गुफ्तगू कर गयी
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आज़ाद है वो बस आराईश की तरह
आवाज़ह की वो बस आवाज बनकर रह गयी
आईना मेरा आक़िबत कह गया

आईना मेरा आक़िबत कह गया
आज़र्दाह वो रहा आज़माईश कह गया
आईना मेरा आक़िबत कह गया

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी with Vijaya Pant Tuli Mountaineer and 78 others
8 hrs ·

दो रास्तें

दो रास्तें सामने मेरे
कौन से राह पर अब मै चलों

मुश्किल में मै परेशां भी मै
जाअों किधर हैंरा भी मै
ना बढ़ते कदम सांसों का दम
भरते रहे भरते रहे

सुख भी मेरे दुःख भी मेरे
कौन से पल बता अब मै चुनों

आंसूं हंसे आँखे नम
सरगम की धुन कैसे गुम
चुनों किसे कुछ ना छूट जाये
देखों दोनों को में एक भी ना रूठा जाये

आता है कल बह जाता है कल
बहते कल में से किसको भरों

तस्वीर मेरी बड़ी बेरंग
इन उजाड़ों में कैसे भरो रंग
देख एक भी रंग ना टूट जाये
वो सपना मेरा खिलता जाये

दो रास्तें सामने मेरे
कौन से राह पर अब मै चलों

ध्यानी प्रणाम

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8 hrs ·

दो रास्तें

दो रास्तें सामने मेरे
कौन से राह पर अब मै चलों

मुश्किल में मै परेशां भी मै
जाअों किधर हैंरा भी मै
ना बढ़ते कदम सांसों का दम
भरते रहे भरते रहे

सुख भी मेरे दुःख भी मेरे
कौन से पल बता अब मै चुनों

आंसूं हंसे आँखे नम
सरगम की धुन कैसे गुम
चुनों किसे कुछ ना छूट जाये
देखों दोनों को में एक भी ना रूठा जाये

आता है कल बह जाता है कल
बहते कल में से किसको भरों

तस्वीर मेरी बड़ी बेरंग
इन उजाड़ों में कैसे भरो रंग
देख एक भी रंग ना टूट जाये
वो सपना मेरा खिलता जाये

दो रास्तें सामने मेरे
कौन से राह पर अब मै चलों

ध्यानी प्रणाम

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 25
वो अन्धेरा

वो अन्धेरा कब तो छटेगा
वो सुरमई उजाला कब तो फटेगा

आशा का दीप जला ले मनवा
निराशा तू दूर भगा ले

कब तक ये भाग्य यूँ दिल छलेगा
महेनत रंग एक दिन निखरेगा

हैराना ना हो इस जग हैरानी से
सब निर्भर अपनी मेहरबानी से

ना लेना मन सहारा किसी का
तू बन जा किनार सभी का

वो अन्धेरा कब तो छटेगा
वो सुरमई उजाला कब तो फटेगा

ध्यानी प्रणाम

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 24 · Edited
ना जाने

माना की मै इजहार नही कर पाता
खुल के प्यार नही कर पाता
तुम ही हो इस दिल में बसी
फिर भी तुम्हे मै
ये दिल चिर के नही दिखा पाता
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

रहता हूँ अकेला जब भी
बस तेरे यादों में घिरा रहता हूँ
होती जब तुम पास मेर
बस मै तुम्हरे बातों में घिरा रहता हूँ
तकलीफ ना हो तुम्हे थोड़ी भी
इन ही विचारों में डूबा रहता हूँ
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

इतने मौसम बीत गये
साथ साथ तुम्हरे आस पास
फिर भी तुम सदा इस दिल के साथ
और वो ही संकोचित मन पास मेरा
उसमे भरा तुम्हरे लिये ही ढेर सारा प्यार मेरा
करता है अब भी डर डर के इजहार
तुम्हरे जन्मदिन पर मेरा तोहफा
संकोचित कविता का उपहार
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

माना की मै इजहार नही कर पाता
खुल के प्यार नही कर पाता
तुम ही हो इस दिल में बसी
फिर भी तुम्हे मै
ये दिल चिर के नही दिखा पाता
ना जाने
फिर भी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है
मै तुम से प्रेम नही करता

ध्यानी प्रणाम

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July 24 · Edited
उस शुन्य में

उस खाली आसमान को मैं निहरता हूँ
बस उसके रिक्त में मैं अपने को पाता हूँ

छटपटाता हूँ बड़बड़ाता हूँ
अकेला अपनों से कुसमुसा सा जाता हूँ

बोलना चाहता हूँ बोल नही पाता हूँ
उस अकेले में पीस सा जाता हूँ

देखता हूँ उन्हें निहरता भी हूँ अपनेपन से
पर उन अपनों की आँखों को मैं कंही नही पाता हूँ

उस शुन्य में निहरते निहरते
मैं अपने बनाये शुन्य से घिर जाता हूँ

ध्यानी प्रणाम

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बालकृष्ण डी ध्यानी with Gokul Negi and 69 others
7 hrs ·

फिर देने लगा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा मुझे समंदर कोई

बांध अपना बांध रखा है शीशा जो चटक सा गया है
देख आईने सूरत अपनी मुझे आईना समझ बैठा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा है मुझे मुकदर कोई

सब ने ऐसा घेर रखा है अकेला दूर देख रहा है
आँखों में बसती है हरयाली सूखे को वो सोख रहा है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा है मुझे रब कोई

पत्थर पत्थर पड़ा हुआ है अंदर बाहर झांक रहा है
किसने समझ लिया उसे अपना किसने परया कर दिया है

फिर देने लगा है गम कोई
श्याद समझ बैठा मुझे समंदर कोई

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

ऐसा है मेरा हिन्दुस्तान

मैंने कभी ना देखा गैर महजबी के वाल पे हिन्दू पर्व हो मुबारक
पर मैंने हर हिन्दू के वाल पे देखा सब धर्मों के पर्व हो मुबारक .... ईद मुबारक
ध्यानी