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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 13
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी
ऐ चाँद मैं भी निहार रहा हूँ
तुम कुछ तो बोल रही होगी
मैं भी चुप कंहा रह पा रहा हूँ
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

बस दूरियां कर रही हैं बाते अपनी
नजदीकियां अब भी वो हम से रुसवा है
रफ़्तार की यूँ होड़ मची हुयी मुझ में
दिल है की वो अब भी नादां है
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

बादलों में छुपकर निकल रहा है
फिर बादलों में जा छिप रहा है चंदा
तू ग़म ना कर ना तन्हाई से डर
ना घबराना ये दिल मेरे बस तू याद आ रहा है
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

ये रात गुजर जायेगी ये सहर
कतरा कतरा जिंदगी की गुजर
मिलेंगे हम ये आस रखना मेरे हमदम
बचा लेना थोड़ी मेरे लिये साँसों का सफर
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी
ऐ चाँद मैं भी निहार रहा हूँ
तुम कुछ तो बोल रही होगी
मैं भी चुप कंहा रह पा रहा हूँ
ऐ चाँद तुम भी देख रही होगी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
July 12 · Edited
सपने मेरे तेरे

सपने मेरे जो ना रहे मेरे
सपने तेरे जो ना रहे तेरे
एक पथ पर जब तुम संग चले मेरे
सपने मेरे जो ना रहे मेरे ना तेरे

सपने मेरे कुछ कुछ वो तेरे
अधूरे कुछ कुछ हो गये पुरे
चलो चलें उधर चलें वो जिधर सपने तेरे मेरे
सपने मेरे जो ना रहे मेरे ना तेरे

जुड़ गये साथ साथ सब जब वो
जब लिये साथ सात जन्मों के फेरे
एक धागे में बंध गये सारे वो सपने तेरे मेरे
सपने मेरे जो ना रहे मेरे ना तेरे

सपने मेरे जो ना रहे मेरे
सपने तेरे जो ना रहे तेरे
एक पथ पर जब तुम संग चले मेरे
सपने मेरे जो ना रहे मेरे ना तेरे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
पहाड़ों की वो बरसात की बूंदें

बादलों का घूंघट उतारती पहाड़ियों को निहारतीं
पहाड़ों पर गिरती पड़ती वो बरसात की बूंदें
कुछ कह जाती है

नये कोपल फूटेंगे कई फल फूल श्रंगार रचेंगे
झर झरते झरनो का उद्गम हो कर
नदी के कल कल की ओर बढ़ जाती है

कुछ बूंदें लुभाती कुछ दुःख दे जाती है
कुछ लिखने को मजबूर कर जाती है
और कुछ भूलने को मजबूर कर जाती है

कुछ मौत के डर से खुद कांपती हुयी
कुछ आशंका, भविष्य के दब दबे में डूबती हुयी
कुछ आस और विशवास भीनी खुश्बो महकाती हुयी

फिर लगी है आज पहाड़ों की बरसात
पिछली बरसात की क्यों वो याद उभरती है
फिर ना दिखाना वो दिन पहाड़ों की वो बरसात की बूंदें

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

अफ़सोस रहा उम्रभर उनसे कह ना सका
आसान नहीं उन शब्दों को अल्फाज देना !!!!

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

रिश्तों की तलवार टंगी वो लगातार
झूल रहें हैं जी हंस लो चलो इस बार

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
22 hours ago
मेरे पहाड़ में

मेरे पहाड़ में
हर तरफ आग है
धुंआ भी उठ रहा साथ साथ है
सुखी लकड़ियों के साथ
गीली लकड़ियों जलना भी आज है

मेरे पहाड़ में
आग में आंसुओं से आज
वो भीगे ख़त जला रही होगी
ससुराल में आज उसे मायके की
याद क्यों सता रही होगी

मेरे पहाड़ में
अब न किस्से छेड़ो
राजा रानियों के इस तरह दिल बहलाने
चाहें भरपूर पैसा और सुख-चैन खोजो
यौवन डाल मुरझा जाये फिर खिली ना जाये

मेरे पहाड़ में
हर तरफ आग है
धुंआ भी उठ रहा साथ साथ है
सुखी लकड़ियों के साथ
गीली लकड़ियों जलना भी आज है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

अर्ज है की ..

हम तो दिल की किताब ले कर आये थे यंहा
दिमाग की किताब ने कुछ ऐसा हर्ष किया
ना जाने वो दिल कंहा पीछे छूट गया मुझसे
खोजता रहा मैं जमाना बहुत आगे बढ़ गया

ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

क्या था ये

पीला पीताम्बर ओढ़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

काट चौरासी लाख योनियाँ
आकर यंहा फिर जीवन झोंक दिया
राम नाम बस बोल दिया

जन्म मरण ना मिला छुटकारा
ध्यान लगाना था लगा कंही और दिया
राम नाम बस बोल दिया

चरणों में पड़ना था प्रभु तेरे
कंही और भोग दिया व्यर्थ सुख से नाता जोड़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

कपट छल मिथ्या से मन भरा नही
तेरे चरणों से मन से पड़ा नही ऊपरी ऊपरी
राम नाम बस बोल दिया

क्या था ये क्या कर दिया
उन शरण आने बाद भी मन तन सो गया
राम नाम बस बोल दिया

पीला पीताम्बर ओढ़ दिया
राम नाम बस बोल दिया

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
आज मै फिर रोने आया हूँ

आज मै फिर रोने आया हूँ
जो खो दिया था उसे फिर खोने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

बात उस समय की थी
फिर उसी बात पे मैं तुम से लड़ने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

बद में ना रह जाता कुछ भी है
फिर उस बद को मैं आज करने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

अतिरिक्त ऐसा कुछ होता नही
तत्काल उसे झट मैं पाना चाहता हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

आगे से ना कभी पूछना मुझसे
बचे थे दो आंसूं पास मेरे उन्हें ले मैं रोने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

तब दो राहें बन गयी थी अपनी
फिर उसी पीछे छूटी एक राह पे चलने आया हूँ
आज मै फिर रोने आया हूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday · Edited
औ भैना भारी छों लाचार हो...२

पैलव्ड़यु पैलव्ड़यु लोक आना हुला
चूड़ी बिंदी फुंदडीयों की मेस लाना हुला ...२
नैय लता त्वे पुथे तेर दीदी की भेजी च
पैर अबेर नि कारा हो ...२
औ स्याळी कर पैठा सारा हो ... ५

ध्यानी जी का शुभप्रभात प्रणाम ये लाईन दिल से बंध गयी (खुदेणी ना रैई)
अल्बम का आख्रिर अंतरा है गीत का