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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

ये सबकी है कविता

कभी चीखती
कभी चिल्लाती
कभी गुमसुम चुपचाप
अकेले कह जाती
तुझ से मुझ से ये कविता

जिंदगी का ये फलसफा
मिलने-बिछड़ने में है बांटा हुआ
बंटी बंटी ये जिंदगी को
एक हिस्से में वो जोड़ जाती
तुझे मुझे ये कविता

एक बार पढ़ लो उसे
वो तुम्हारी  ही हो जाती
एक रूप कर के वो हमें
हमारा रास्ता वो बन जाती
तेरी मेरी ये कविता

हर शब्दों में है अपनापन
हर कोने में है उसकी पकड़न
दुख के सागर की वो नैया
हमें भाव सागर तार जाती
ये सबकी है कविता 

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

जलते चिता के अंगारों पे

जलते चिता के अंगारों पे
वो प्यास अब भी  बाकी है  ... २
ख़ाक हो गयी अब ये माटी    ... २
पर वो रूह का इंतजार अब भी बाकी है
जलते चिता के अंगारों पे ......

रोते बिलखते आँखों में देखो
वो प्यार मेरा अब  भी बाकी है
अस्थियां चंद रह गयी उस राख में
वो गंगा की धार अब भी बाकी है
जलते चिता के अंगारों पे ......

अब तो शुरू हुआ एक नया  सफर मेरा
इस अंधेर में उस उजाले की राह अब  भी बाकी है
रह जाता सभी का कुछ ना कुछ पीछे
उसे पाने की चाह अब भी  बाकी है
जलते चिता के अंगारों पे ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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चलो खंडहर होते घरों से

चलो खंडहर होते घरों से
आज मिल के आये हम
हर एक दिवारी को
चलो जा के चूम के आये हम

कल शायद ना होगी  खड़ी ये
अपनों के बोझ तले दबी  होगी ये
कुछ पल इसको भी खुशहाल बना आये हम
दो घड़ी इसकी भी देखभाल कर आये हम

चलो आज अपने से मिल के आये हम
उखड़ते टूटते रिश्तों को जोड़ आये हम
कितनी मेहनत प्रेम से जोड़ा होगा इसे
उस अपने ने बनाते वक्त कुछ तो सोचा होगा इसे

चलो उस सोच से आज मिल आये हम
उससे अपनी संवेदना जोड़ आये हम
निश्चित ही तेरे  आँखों को सकून मिलेगा
तेरा अपना खुद ब खुद तुझ से वो जोड़ेगा

चलो खंडहर होते घरों से
आज मिल के आये हम
हर एक दिवारी को
चलो जा के चूम के आये हम

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कुंदन है वो मेरा

अब मेरे दिल को सकून आने लगा
कोई तो है जो मेरी तरह दिन-रातों को बड़-बड़ने लगा
वो किस्सा मुझे याद आने लगा
वो दिल का हिस्सा मेरा जब अपनों के लिये गुनगुनाने लगा

लड़ी थे लड़ाई हम ने मिल के उसके लिये
दी  थी अपनी कुर्बानी  हम ने मिलके उसके लिये
वो जज्बा  ना जाने आज कहाँ खो जाने लगा
वो अपने रूठ कर अपने से एक एक कर जब जाने लगा

मेरे शब्दों को भी होने लगा अब ये अहसास  है
मुझ से दूर गया मेरा अब भी वो मेरे आस पास है 
बस उसके दिल को और कुरेदने की है जरूरत
कुंदन है वो मेरा उसे  उसे  और तपने की है जरूरत

अब मेरे दिल को सकून आने लगा  ..........

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मुझे कहने लगे हैं

मुझे कहने लगे हैं ,अपने आज फिर
कोई गीत सुन दे ,मेरे पहाड़ पे तू आज फिर
मुझे कहने लगे हैं ......

सुबह पहाड़ों वाली
सर्द फूलों की वो घाटी
खेतों में जाते वो नर नारी
तितली भौरों की वो गुंजन
छेड़ सातों सुरों की सरगम
मन मेरा अटका वहीँ पे
कैसे कहूँ मैं तो भटका वहीँ पे
मुझे कहने लगे हैं ......

वहीँ ग्वाला बिखरे सुर बांसुरी का
वहीँ चंचल पायल बजे मधुली का
वहीँ पर है मेरे  देवों की भूमि
वहीँ पर है मेरा सच्चा सवेरा
वहीँ गंगा बहे नित अविरल
वहीँ पर हुआ मेरे कवि मन का  बसेरा
वहीँ पड़ा सब कुछ तेरा मेरा
मुझे कहने लगे हैं ......

रहूँ कहीं भी मैं मेरा नहीं उगता वो सवेरा
जो सवेरा देखा है मैंने वो सवेरा दिखता कहीं नहीं
मुझे कहने लगे हैं ...

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साँसों  से कितना प्यार  है तुम्हें

साँसों  से कितना प्यार  है तुम्हें
उतना ही प्यार मुझे मेरे पहाड़ों से है
दो  शरीर एक जान हैं हम
ये भूमि है  मेरी हम इसकी संतान हैं

आँखें बंद कर लो मन की आँखें खोल दो यहां
देखो  हर जरे जरे में छुपा उसका ही अहसास है
आँखों से कितना प्यार है तुम्हें
उतना ही प्यार मुझे मेरे पहाड़ों से है

ये ऐसा एक वो अहसास का  है रिश्ता
पेड़ पत्थर  फूल काँटों माटी का वो हिस्सा
महसूस करो उसे और दिल से पुकार दो
पहचान वो हमारी एक बार तो तुम आवाज दो

साँसों  से कितना प्यार  है तुम्हें .......

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उड़ान

उड़ चलूँ उड़ चलूँ उड़ चलूँ मैं आज
इस शून्य में यूँ ही ना खो जाऊं मैं आज
नीले रंग का वो देखो रंगहीन आकश
नीले समंदर तू कर देना आज अपना मन विशाल

भगदड़, झपट फेर, फरेब से दूर कहीं
पक्षी-वृंद बनकर उड़ जाऊं इन से मैं दूर अभी
घड़ी की रोक दूँ मैं आज दो घड़ी रफ़्तार
पंख विहीन उड़ जाऊं मैं सात आकाशों के पार

अलग थलग ना पड़ जाऊं इनसे दूर कहीं
कल्पना की ये उड़ाना बन जा तू मेरे पंख अभी
ना कोई स्टेशन हो वहां ना कोई हो वहां ठहराव
मेरे शब्दों का हो वहां पर बिलकुल मुक्त प्रवाह

उड़ चलूँ उड़ चलूँ उड़ चलूँ मैं आज .......

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देखो लंबी कतारें

देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं  लगी हुयी हैं 
भेद खोले खिड़की जिंदगी ने खोली हुयी है खोली हुयी है
देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं लगी हुयी हैं 

अपने भी गये हैं पहले उस कतार में
अब अपनी भी  बारी लगी हुयी है लगी हुयी है
देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं  लगी हुयी हैं 

खाली खाली सा लगने लगा है
खाली खाली वो क्यों करने लगा है करने लगा है
देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं  लगी हुयी हैं 

गुम है वो कब तक यूँ चुप खड़ा
ना जाने क्या होगा जब वो बोल पड़ा वो बोल पड़ा
देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं लगी हुयी हैं   

देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं  लगी हुयी हैं 
भेद खोले खिड़की जिंदगी ने खोली हुयी है खोली हुयी है
देखो लंबी कतारें लगी हुयी हैं लगी हुयी हैं 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

सब की तक़दीर वो ही लिखता है मेरे दोस्त
तेरी और मेरी भी वो ही लिख रहा है
पर फर्क इतना है की तेरी वो  लिख रहा है और मैं लिखवा रहा हूँ

ध्यानी प्रणाम दोस्तों

devbhumi

तुम को देखों तो प्यार आ जाये

तुम को देखों तो प्यार आ जाये
ये चेहरा यूँ ही लाल खुश्क हो जाये

कितनी अंगड़ाई अब लेती है हवा
हर सांस को तेरा ऐतबार हो जाये

हर एक फूल अब तो आमादा है
तेरे हुस्न पर वो कैसे निसार हो जाये

अब अपना यहां कुछ नहीं मिलेगा
जो कुछ था मेरा सब तेरा  हो जाये

हमको अब अच्छी लगी ये तन्हाईयाँ
हर एक पल जो तेरा ख्याल आ जाये

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