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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

मुल्क बणाई

कैका बणा मुल्क बणाई कै बणा
छोड़िकि जाणा छन किलै सब भाई कै बणा

कैका बणा गोली मिल यख खाई कै बणा
तेरा आंख्युं ल बल आंसूं चुलैई कै बणा

कैका बणा मेरो रौंतेलों मुल्का कै बणा
अप्रि ब्यथा वैल खुद किलै लगैई कै बणा

कैका बणा मिन भाणा बनेई कै बणा
कैथे सुणाण मिल यकुली हे राई कै बणा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी
देश हो या हो अब भैरदेशा जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

लुन रोटी अब मिल नि खाणु जी
बर्गर पिज्जा जब म्यारा स्वामी लाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

रामी नि बनने ना मीथै बहूरानी जी
पैल टिकिट कटै जब स्वामी मुंबई दिखाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

ये उकाला का बाटा अब व्हैजा टाटा
दोई मैन की छुट्टी मा स्वामी स्विजरलैंड घुमाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

हीटे हीटे ये पहाड़ किले अब कमरी पटणु जी
हवाई जहाज मा जब म्यारा स्वामी मि थे उढणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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फिर बी फैशन हो ऐसा जी

खानु कू नि पैंसा
फिर बी जमानु चैणु ऐसा जी
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

छोरी जनि लट्लु
ब्याल च की बैठूल नि समझने हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

बोबा व्हैगे बोई जी
बोई व्हैगे अब बोबा हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

कन बदली हुणि च
वो कख जाने की सोचणी हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

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मि त लिख द्यूलु लाख कविता

मि त लिख द्यूलु लाख कविता
वैल नि पैढ़ स्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

पड़ी राई सदनी कुल्हणा भितर
भैरी नि ऐस्की त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

लाख विपदा लाख पीड़ा सैई विल
आंसूं आखों मा राई त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

ढुंगा गारा ही रे गैल्या अब मेरो
तिल ऐ समझी नि त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

झम्प मारी की ये मेर कविता ग्याई
क्वी अपरो ना मिल त मिल कया कण
मि त लिख द्यूलु लाख कविता

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पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

क्वी पोंछीगे लंदन त क्वी पोंछीगे अमेरिका जी
उत्तराखण्ड दिस मनिगे अब मेरा देश परदेशा मा जी

एक दिनों को सोर हुंयुँ ३६३ दिन सब बिसरी भूल जी
ये मेरो उत्तराखण्ड ते थे सब अपरा अब भूलि गयां जी

उत्तराखण्ड नाईट धरियुंच प्रवासी भै - बन्दों न अब सजी धजी जी
द्वि चार लस्का ढसक लगे की ऊँ पर दारू खूब अब चढ़ गै जी

कन इनि तुम थे अपरुँ की खुद लगनि मि अचरज मा पड़यूँ जी
उत्तराखण्ड शहीदों का सुप्निया किलै पड्यां अब भी अपुरा जी

पंद्रह बरस व्हैगैनी पंद्रह बरस जी
उत्तराखण्ड तै बनि कि ये ढुंगों गारों मा पंद्रह बरस जी

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आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें
ना टिहरी ना अल्मोड़ा ना पौड़ी इन्हे चलो मिलाकर एक बनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पंद्रह बरस भागे अपने से एक जोर से आवाज देके उसे बुलायें
नवंबर की इस पावन बेला को मिलकर चलो आज साथ मनायें
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

कोदो मंडवा खायेंगे क्यों ना हम अब अपना उत्तराखंड सजायेंगे
चलो मिलकर एक सुर में गायेंगे और भी अपने भाई बहन आयेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

देहरादून गैरसैण में हम पहाड़ी तनिक भी फर्क ना आने देंगे
शहीदों के सपनों की राजधानी लेकिन हम पहाड़ पे ही बनायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

पलायन की इस बहती गंगा में हम रोजगार का बांध लगायेंगे
स्वरोजगार बीज से हम खंडहर घरों बांज खेतों को लहलहायेंगे
आओ राज्य गठन के शहीदों का सपनों का उत्तराखंड बनायें

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थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा

थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा.... २
कन और्री कब
बैठ्युं रैग्युं
बैठ्युं रैग्युं लिखणु इन सिलाणु थे
जबेर जबेर लगि तब
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

कबै जामा मेरी मोरिगे छे
कबै आपा मेरी ख्वैगे छे
खोजी खोजी यख वख वैथे मिल
तबैर और्री थग्ल्या पौड़ीगे छे
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

भाग मेरा ये करमा का छन
काप्ला इन रेघया कैल रेट्या छन
जमै नि थे ना गमै मि थे
किले लगलूँ का इन थग्ल्या पौड्या छन
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

जद्गा सिल्दु वद्ग चिरड्या छन
अपरा अपरी मा धागा लग्या छन
हर्ची गै कै सुख अब कै दुःख मा
थग्ल्या आपरी गिनती गीणा छन
थग्ल्या लग्यां जिंदगी मा
थग्ल्या लग्यां थग्ल्या लग्यां

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उत्तराखंड मेरा

उत्तराखंड मेरा उत्तराखंड मेरा
अभिमान मेरा स्वाभिमान मेरा

कुमाऊंनी-गढ़वाली भाषा मेरी
मस्तक पर देश के प्रेम की वो रेखा

हिमालय पहाड़ों की ये श्रेणीयाँ
पहाड़ी सीने में बजती है वो वीणा

पराक्रम की ये भूमि मेरी
शूरवीर की नहीं है यंहा कमी

माधव भंड़री का इतिहास बोलता है
चन्द्रसिंह गढ़वाली चंदा बन डोलता है

सुनते हैं रमी बहूरानी की हम गाथा
कितने सर झुकते हैं बद्री-केदार के द्वार

जाती धर्म यंहा पर अनेक हैं
रहते हैं बन के सदा हम एक यंहा

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जितने फूल थे सब चुन चुन ले गये मेरे वो अपने
जब मेरी बारी आयी तो कांटे ही रह गये मेरे लिये

बालकृष्ण डी. ध्यानी

devbhumi


की हम ही अकेले पड़े हैं

आती जाती सांसों को
सब पता होता है मालुम होता है
हाथ से कुछ ना कुछ उस समय छूटता जा रहा है

अपने लोगों से दूर जाते पल
उस छूटने वाले को पता होता है मालुम होता है
अपना कोई बिछड़ के चला जा रहा है

खून का रिश्ता जो अटूट है
वो रिश्ता जो बंधा है पता होता है मालुम होता है
वो नाता वो क्षण अब ढीला होता जा रहा है

मन के एक कोने में जमा रखा हुआ क्षण
अकेले में हवा खाते घूमते हुये
मालुम होता है वो जमा क्षण मिटता जा रहा है

दिल में अगर प्रेम है तो मिलन अब होगा ही
पर अब हर मिलन में
फिर मिलन की तृष्ण कम होती जा रही है

दिल पर लगे घावों पर से पट्टी निकलने पर
वो फिर से बहने लगते हैं
फिर मालुम होता है घाव कभी भरा ही नहीं था

यश का दिन कभी उदय होगा इस इन्तजार में
आज का दिन कभी ढल गया ये मालुम भी नहीं होता
और फिर मालुम होता है, ये दिन हाथ से ऐसे ही चला गया

उस आधार की मुझे
जिंदगी के हर रस्ते हर मोड़ पर जरुरत थी
अब पता चलता है वो आधार मुझसे अब खूब दूर चला गया है

कभी अभी ये जिंदगी
आदमी को कैसे अकेला बना देती है
इसका अनुभव आते आते तब मालूम होता है
की हम ही अकेले पड़े हैं

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