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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

मुझे मेरे जिंदगी का भागीदार
उसकी ओर मेरे कदम
अपने आप बढ़ जाते हैं
मुझको समझ नहीं आता
लेकिन रस्ते भी भावना समझते हैं
ऐश्वर्य की चाह मुझको
सपने मेरे साहसी हैं
ऊँची उडी आकाश पर टकराये
वो भी अब बलशाली हैं
किताबों का बोझा मेरा
उठाये और सराये क्या ?
उडी मार के लड़खड़ाये
वो मुझ से संभलेगा क्या ?
निशाना अचूक स्थिर उसके हाथ
तीक्ष्ण विचारों के तीर
छेदन किया क्या उसके बुद्धी को
मेरे धनुष की वो तान
खिल गये हास्य उसके
नम्रता के शृंगार
उसके तेजस्वी आँखों में दिखे
मुझे मेरे जिंदगी का भागीदार
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

कल किसने देखा है ?
ये जवान रात को तुझे देख लेने दे जी भर के आज
किस को पता कौन जानता है
कल किसने देखा है ?
तू रंग ले आज सारे रंग
ये आकाश भरके भर ले
आज तुझे इन आँखों में, किसको पता
कल किसने देखा है ?
तू देती मुझे आशा
कल फिर मुझे दिखाने की
पर क्या बोलों तुझे उस विधाता के मन का
खेल किसने देखा है ?
हो जा फिर तू आज जवान
तुझे इन आँखों में फिर भरने दे
इतनी ही इच्छा है मेरी आज पूरी होने दे
तू रंग ले आज सारे रंग मैं देखने को तैयार हूँ
अगर सगे -सबंधी मेरे
निर्दयी घायल हैं
किस को पता कल किसने देखा है ?
ये चांदनी तू मुझे क्यों आज अकेले में इशारे कर रही हो ?
बोलाओ ना तुम्हारे साथी को
क्या वो भी चला गया तुम्हे छोड़ के
मेरी मेरी प्यारी प्रिये जैसा ?फिर आने का वाद देकर
कल की आशा दिखाकर !
मेरा कल आज खतम होने आया है
इसलिये आज तुझे देख रहा हूँ मैं मेरी प्रिये के रूप में
किस को पता कौन जानता है
कल किसने देखा है ?
बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

बात निकली है तो .........
बात निकली है तो दूर तक वो जरूर जायेगी
मेरे पहाड़ों से जा कर वो तो टकराएगी
बात निकली है तो .........
खिंच कर मुझे अपने आप अपनी आगोश में वो ले जायेगी
मेरे पीछे पीछे तुम्हे भी वो अपने पास बुलाएगी
बात निकली है तो .........
वो नजारा कैसे बदलेगा अपने आँखों से दिखायेगी
उस नजारे में अपनों के होने का अहसास दिलाएगी
बात निकली है तो .........
बहुत अकेली हो गयी है वो मैं भी बहुत तन्हा हों
बदलेगा वक्त उसका और मेरा इस बात पे वो ज़िंदा है
बात निकली है तो .........
बालकृष्ण डी ध्यानी
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प्रेम का बादल

सोच के पर सहजता से
वो मेरे पास आ बैठता है
छोटे से हास्य पर भी वो
खूब जोर से हँसता है

समझता है मुझे
समझता है मुझे  वो हँसना तेरा
क्या छुपा के रखा है तूने
डर मत मैंने भी मन में
वैसा ही कुछ संभला के रखा है

नहीं समाप्त होने वाली बातें
चादर लेके सोती हैं अब
तेरी चालकी उतरती वंही
प्रश्नों में वो साफ़ झलकती है

आत्मविश्वास भरा हुआ तू
स्वभाव मोहक रहस्यमय
हर समय तेरी बातें ओठों पर
चाहीये चाहीये तेरी वो आदतें

विशवास बढ़ देता है
वर्तना में भी वो सभ्यता
हाथ में तेरे फिर हाथ देने से
दिल को मिलता है  सकून

आईना में पहली बार
जब आँखों में भरा काजल
नहीं था वो ढुलक दोस्ती का
वो था प्रेम का बादल

बालकृष्ण डी ध्यानी
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खामोश रात जब बात करने लगे

खामोश रात जब बात करने लगे
पड़े पन्ने फड़फड़ाने लगे कलम बड़-बड़ने लगे

कॉफी की चुस्की के साथ कुछ उभरने लगा
अहसास मेरा धीरे धीरे मन का अब उमड़ने लगा

कल्पना में खो जाने का आज मन हुआ
यथार्त को साथ ले जाने का ये भी अब तय हुआ

अँधेरे ने अब अपने बातें करनी शुरू की
मध्यम रौशनी पडोसी के लैंप से हामी भर्ती रही

पल अपनी अनेक तकलीफें गिनता रहा 
सपनों का उड़न खटोल खर्राटे मार सोता रहा

लिखना मेरा आज भी यूँ अधूरा ही रहा
वो खामोश रात बस निरंतर बात करती ही रही

बालकृष्ण डी ध्यानी
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दूर यंहा इस परदेश में

दूर यंहा इस परदेश में
चल आज तुझे अपनों से मिला दूँ
बैठे बैठे आज तुझे मैं
अपने देश पहाड़ से मिला  दूँ

मेरे शब्द तब तृप्त होंगे
आँसूं तुम्हारे इन पर जब दिल से बहेंगे
सुनते रहना और सुख पाना
बीते पल जब तुम्हें आ के मिलेंगे   

बीच बीच में तुम अब हंस भी लेना
इतना सुन्दर गहना तुम यूँ ना खोना
बनाया खिलाया है इसे अपने पहाड़े ने
प्रति रूप हो बस तुम उस दर्पण के

अंतिम पंक्ति में बस इतना कहना है
सोच तुमने क्या दिया है बस लिया है
देने की भावना जब तक ना जागेगी
व्यर्थ मेरा लिखना तुम्हरा सुनना है 

दूर यंहा इस परदेश में ...............

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मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु  विंको स्वाद  कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

शीर्ष पर हिमाला बस्युं चा
यूँ  ह्युं चुलं यूँ डंडा कन्डोंमा घिरियूं चा
क्या बात कैरुं विंकी मि विंकी बात ही कुच और चा
कन बगनी गंगा की धारा
छ्ल छ्ल क नु  मेरु पियार कुच और चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु  विंको स्वाद  कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

ये नीलू सरग ये खुलु आक्स
ये रंगमत यख चौधिस्  मौल्यार
हर एक फूलों मां वा हैंस्दी रैंदी  विंकी बात ही कुच और चा
ढोल दामो झुमैलो छोलिया कि ये बयार चा
मेरु मुलका मेर लोक नृत्य गीतों कु रास्यांण चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु  विंको स्वाद  कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

यख भगवती कू मंडाण
पितृ देबों कू ठों और्री जागर कू जगाण
ब्यो बारात मेल खोलों पिंगली जलेबी बाल मिठै विंकी बात ही कुच और चा
मीठा किन्गोड़ा काफल हिंसोलों कू ये पहाड़
मेरु मैता सौरास कु एक जनि लाड पियार

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु  विंको स्वाद  कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

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मेरी भूमि भूम्याली

मेरी भूमि भूम्याली
बणों बणों मा पसरी हैरायलि
कख जानू ये छोड़ी की लाटा
ये ना छिन तेरा जणा का बाटा
मेरी भूमि भूम्याली

कया कया नि द्याई इन हम थे
कया कया नि पाई हमुल इं से
जब विं थे देना की बारी ऐ
भुला तू ये बकसा उठे कख हीटे
मेरी भूमि भूम्याली

बगत नि रैगे पैलि जनि अब
मिल बी मान नि राई पैली जनि लोक 
पर तू किलै की बदल्नु छे रे
अपरा बाण ही तू किलै जिनु छे रे
मेरी भूमि भूम्याली

देख आस लगै कि वा बी बैंठी चा
तू बी यख रैकी साथ निभै ले
क्या पाई इन ते थे पढ़े लिखे की
तेरो बी सोर बल भैर ही सजे रे
मेरी भूमि भूम्याली

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ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा

ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा
बोई भगवती का मंदिर मा
भेंट चढ़ूँला हात जोडिकी
मोंड टेकोंलु खुठा बौड़ीकी

आशीष देलि बोई जी भोरीकि
अपरा द्वि हाथ खोलि कि
देर ना कैरा स्वामी झट दौड़ी आ
अपरा गौं देब्तों से भेटि जा

नागरा निशाण ढोल दामो बाजू जी
हल्दू चवलों कू टिका कप्ला मा लगुजी
डोली बोई की सरया पाड़ा मा घुमी ऐ
जयकार बोई का चौधिशा मा छैई गे

ऐ बार तू बी ऐजा कौथिगा मा
बोई भगवती का मंदिर मा
भेंट चढ़ूँला हात जोडिकी
मोंड टेकोंलु खुठा बौड़ीकी

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कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा  पोडाली

कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा  पोडाली
ना तोड़ा दीदा,ना इन यूँ कटा ,यूँ डलियुं  ...... २

बरखा नि पौडी बल देबता रुस्युं चा
ऐ बार पाणि बिस्युं चा बल देबता रुस्युं चा
बांज पौड़ी धरती बल देबता रुस्युं चा
अपरू घार अपरू देश  तिसालु बल देबता रुस्युं चा

नि मानी मिल  मेर गलती बल देबता रुस्युं चा
बस मेर च ये हलगर्जि  बल देबता रुस्युं चा
बस चल ल मेर यख मर्जी  बल देबता रुस्युं चा
बस मि छों और्री कोई ना  बल देबता रुस्युं चा

बल चेत जा रे अभी कख देबता रुस्युं चा
तेर निकल जाल रे सब गरमा कख देबता रुस्युं चा
जब तिसलु व्है जाली ये धरती कख देबता रुस्युं चा
बस मोरी जालू तब प्राणी कख देबता रुस्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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