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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

बात  करतें है

बात  करतें है
चीज, काम मिसरा, पद, चरण  ... २
पदार्थ, मामला, द्रव्य, कारण, वजह  हो जब

बात  करतें है
शब्द, वचन,लफ्ज़ का सफर ... २
कर्म, कार्य, दस्तावेज़, कृति अब

बात  करतें है
तथ्य हक़ीक़त, घटना मिल के ... २
यक़ीन ये  सत्य है

बात  करतें है
समाचार,विवरण,तर्पण 
मामला, कुटिया, झोंपड़ा और  कब्र

बात  करतें है.......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

मोम पिघलती रही और दर्द यूँ जलता रहा

मोम पिघलती रही और दर्द यूँ जलता रहा
हर शख्स खड़ा यहां पल पल बदलता रहा

दिये और लौ एक दूजे से लपक झपकते रहे
अंधेर और उजाले से ये पल फर्क करता रहा 

मशालें जली भी थी मशालें अब बुझ गयी
जंगल जलता रहा वो गाँव बस छूटता रहा

तेरे शहर बसाने देख लाशों का अंबार लगा
कोई यहां बिकता रहा कोई खरीदार बना

अब भी फर्क उतना ही अब इस जमाने में
मोम पिघलती रही और दर्द यूँ जलता रहा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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फेस बुक पर
आज कल रंग बिरंगी चेहरों को देख कर
एक प्रश्न सा अब मन में जगने लगा है
तीन रंगों का ऐसा अनोखा मेल देख कर
अब खुद ब खुद ये दिल से कहने लगा है

पर ये खेल क्यों
बस लगता है अब क्यों ये बस एक खेल है
देखा चारों ओर ओढ़ा आडंबर ने लगता वो भेस है
मैं पूछ लिया जब अपने तन से और मन से
सच कहना तू दिल से ये तेरा अधिकार क्षेत्र  है

सदा ऊँचा रहे
फिर भी साफ़ नही तुम में वो बात नहीं है
खड़े हैं वो दिन रात निगरानी कर सीमा पर
उन के जैसा तुम में थोड़ा भी जजबात नहीं है
रहना तिरंगा सदा मेरे इस शीश ऊपर ही

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कैसे एक पल भी मैं उन्हें भूल जाऊं

फिर आज बैठे बैठे तुम मुझसे मिल रही हो
फूलों में काँटों के संग तुम आज भी खिल रही हो
मेरी ये धरती मेरा स्वर्ग है
कह दूँ तुझे मैं आज ये तू मेरा सब कुछ है
फिर आज बैठे बैठे ...... २

नाजुक है वो कोमल है वो शीतल जैसे धार
बहती रहती है मेरी धमनियों हर पल तू मेरे साथ
हर एक पत्थर तेरा यंहा पर
मेरे गढ़ देश मेरे पहाड़ की है वो पुकार
फिर आज बैठे बैठे ...... २

कितने बलिदानों के बाद तू मुझको मिला है
ऐसी पावन धरती मेरी मैने यहां पर जन्म लिया है
शत शत नमन है उन शहीदों को
कैसे एक पल भी मैं उन्हें भूल जाऊं
फिर आज बैठे बैठे ...... २

बालकृष्ण डी ध्यानी
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अब भी गरीबी सताती है मुझको

अब भी गरीबी सताती है मुझको
आँसूं के घूंट पिलाती है मुझको
देख अमीरी जल जल मैं जाऊं
खाव्बों में भी मैं उसको पाना चाहूँ

अब  भी गरीबी लड़ती है मुझको
रोज रोटी के सपने वो दिखाती है मुझको
देख अमीरी मैं लोभ में आ जाऊं
कैसे भी हो उसे मैं पाना चाहूँ

अब भी गरीबी आगे बढ़ाती मुझको
रातों को सुख की नींद सुलाती मुझको
अब भी अमीरी भूख दिखाती है
पीछे बुला मुझे दूर भगा ले जाती है

अब भी गरीबी सताती है मुझको ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया

पांचवी कक्षा में प्रेम मतलब क्या है ये मालुम ही ना था
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
दसवी कक्षा में बस पढाई पढाई और पढाई
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
अब थोड़ा सा मालूम होने लगा है की प्रेम मतलब क्या है
पर बारावी कक्षा मतलब जिंदगी की शुरवात
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
स्कूल में लड़कियों से जयादा दोस्ती कभी की ही नहीं
इस कारण कॉलेज में भी दोस्ती संभालने आयी नहीं 
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
अब लड़कियों से दोस्ती खूब है पर प्रपोज करने की हिम्मत कभी हुयी ही नहीं
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
हर समय सामने वाले की भावना का विचार किया,अगर उसने ना बोल दिया तो 
कहीं मैं एक अच्छा दोस्त ना खो दूँ
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
कभी लगता है की लड़कियों के मन का समझ आ जाता तो कितना अच्छा होता
लेकिन वो कभी समझ में आया ही नहीं
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया
अब प्रेमी जोड़ों  को देखकर ... दिल बहुत जलता है
फिर विचार आया अभी शादी को को पांच वर्ष है बहुत है !
अब क्या करों अभी तो कोई मुझे मिलती ही नहीं
इसलिये किसी से प्रेम करने का रह गया

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देखो  बीती बातों पर रोना आया

देखो  बीती बातों पर रोना आया
अब तो हर मुलाकातों पर रोना आया
देखो  बीती बातों पर रोना आया

उस डगर उस पल पर मेरा जब  होना
जिस पथ पर पड़ा था मुझे सब कुछ खोना
उस हर वक्त पर मुझे रोना आया

आदमी चला जाता है यादें रह जाती हैं
उन यादों के कोने  में जब पड़ा सोना
उस कोने उभरी तस्वीरों पे रोना आया

देखो  बीती बातों पर रोना आया ......

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माना एक और एक दो  होते हैं

माना एक और एक दो  होते हैं
पर मैंने एक एक ग्यारह होते भी देखा है
लोगों के सामने ज्याद हंसने  वालों को
चुपके अकेले में खूब रोते भी देखा है
माना एक और एक दो  होते हैं

अक्सर कानों से सुनने वालों को
एकांत  में अकेले खुद से बड़बड़ाते  देखा
अकसर  बाहर खूब  बोल ने वाले  लोगों को
घर में चुपचाप अपनों की सुनते देखा है
माना एक और एक दो  होते हैं

कहना है बस इतना मेरा अपने लोगों से
एक  तस्वीर के दो  रूप और दो रंग होते हैं
जो दिखता  है वो ही यंहा पर बिकता हैं 
हर एक बिकी चीज यंहा  खरा सोना नहीं होता है
माना एक और एक दो  होते हैं.........

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नाश ऐसा मुझे अपनी कल्पनाओं में तेरे संग ध्यानी
लिखे बगैर ही मेरे आँखों में नशा बन उतरती हो तुम
ध्यानी

devbhumi

अंधेरा काफी हो गया

थोड़ा उजाला रखो अंधेरा काफी हो गया
दीपक संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

आ गये चारों दिशाओं से तुफ़न जिंदगी के
रिश्ते संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

काले बादल बिजली आ गये फिर एक बार
घोसला संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

ये गोशाला सांस कंपकंपाती  हिमपात  में
दिल संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

जलते बवंडर में हकीकत राख हो जायेगी
सपने  संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

इस राह में पराये अब अपने श्वास हैं
हाथ में हाथ रखो अंधेरा काफी हो गया

खोजने में कस्तुरी के शिकारी ये सभी
हिरण संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

बाजार ये फुलों का फूल बिकते हैं यंहा
कली संभल के रखो अंधेरा काफी हो गया

दिल में पाले जख्मों के संग अभी
कंदील एक लगाव  अंधेरा काफी हो गया

अंधेरा काफी हो गया ..........

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