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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

अब भी वक्त है ,अब भी तू चेत ले रे

अब भी वक्त है ,अब भी चेत ले
बचा ले अपने पहाड़ को ,बिखरते घर संसार को
अब भी वक्त है ,अब भी तू चेत ले रे

अब भी तू ना जगा तो वो सवेरा तेरा अन्धेरा रहेगा
तेरा वक्त तो गुजर गया सोच ले तू अपने बच्चों को क्या देगा
अब भी वक्त है ,अब भी तू चेत ले रे

भागती दौड़ती इस जिंदगी से दो घड़ी रुक के पूछ ले रे
भाग रहा है तू पीछे या तुझ से आगे वो दौड़ा रही है
अब भी वक्त है ,अब भी तू चेत ले रे

कर दिया है फैसला मैंने आज अपने आप से
बाप दादों ने जो खड़ा किया मैं सजाऊंगा उसे अपने हाथ से
अब भी वक्त है ,अब भी तू चेत ले रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

अब अंधेरा बढ़ने लगा है

अब अंधेरा बढ़ने लगा है
दिल मेरा ये डर ने लगा है

लेके चिमनी का वो उजाला
पथ पे मेरे कौन दूर खड़ा है

देता दिलासा रह रहकर वो
आती जाती हवा ने कहा है

मेरा पहाड़ परिवार इंतजार में
वक्त है बस गुजरता चला है

पल पल उसके पीछे भागों
वो आगे दौड़े पीछे कुछ छूट रहा है

अब अंधेरा बढ़ने लगा है
दिल मेरा ये डर ने लगा है

बालकृष्ण डी ध्यानी
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पन्ना आक्रोश से अब चिला रहा है

अपने कब्र पर मैं खुद रोने गया
ना तो वंहा मैं था ना कोई खुदा मिला

चंद लाईने लिखी वो मशहूर हुयी
कलम का शुक्रिया अदा यूँ हो गया

साहित्य अकादमी खिताब मिला देश से
क्या खता अब क्यों कर लौटाने मैं चला

लौटाने का लगता अब यूँ फैशन चला
मै भी उसमे खुद से क्या अब कूद पड़ा

कलम घुटने टेक कर यूँ रेंगने लगी
सोच बेबस माटी बिखरी पड़ी मिली है

पन्ना आक्रोश से अब चिला रहा है
आँख बंद है अब दिल ना साज रहा

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अपने से उसे कैसे निकालों मै

अपने से उसे कैसे निकालों मै
जो मेरे अंदर छुपा है जी
इंसान हूँ मैं मैं हूँ उसकी इंसानियत
आज दबी है वो दिल के किस चौराहे पे

आँखों से बहता दर्द हो पराया
मेरी हंसी किसी दर्द भरे चेहरे खिलाऊँ मैं
भूखे को रोटी अगर बन जाऊं
नंगे बदन को मैं कपड़ा

अपने लिए तो यंहा जीते सभी हैं
किसी गैर के लिए अगर मैं जी जाऊं
जीना मेरा जीना तब होगा सार्थक
कसी और के दुःख दर्द का प्याला मैं पी जाऊं

राग द्वेष का वो झूठा आडंबर
अहंकार से घिरा वो अहंकारी मन
लाभ लोभ के लालच में जग
कैसे इन से अकेला बच जाऊं मैं

अपने से उसे कैसे निकालों मै .......

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जो बोल दिया उसे याद रख

जो बोल दिया उसे याद रख
उस बात को अपने पास रख

अच्छी लगे चाहे लगे बुरी
उस याद को अपने साथ कर

ना जाने कब कौन काम आ जाये
उन रिश्तों को आबाद कर

ले सदा हंसी अपने चेहरे पर
उस दर्द पर तो मात कर

जो बोल दिया उसे याद रख
उस बात को अपने पास रख

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मैं अधूर जब भी हो जाऊं

मैं अधूर जब भी हो जाऊं
तुम तब आके मुझे पूरा कर देना

सात जन्मों की वो प्रियतमा मेरी
हर जन्म में ये वाद तुम जरूर निभा देना

हर सांस पर मेरे अधिकार हो तेरा
ऐसा सिंधुर तुम अपने माथे सजा देना

हर हरे कांच पर तेरी हो खन खन
वो अमर प्रीत गठ बंधन तू गढ़ देना

मैं तेरा तू मेरी कहे ये मंजुल हवा
वो अहसास पल पल दिल में जगा देना

कहना है बस वो प्रित मेरे गीत मेरे
तुम अपनी सारी वो रीत निभा देना

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मेरी इच्छा

अगर मैं खत्म हो गया यंह पर
पर ये यात्रा खत्म होने वाली नहीं
चार लकड़ियों के साथ
मेरी इच्छा जलने वाली नहीं
राख सो जायेगी मट्टी के गोद में
पर सपने सोने वाले नहीं
रहेंगे भटकते इधर उधर
लेकिन वो साया फिर दिखेगा नहीं
अंकगणित की आशायें ऐसे
एक पल में खत्म नहीं होती
जलते रहेंगे वो शांत चंद्रमा के जैसे
जलते रहेंगे वो तेजस्वी तारों के जैसे
बुझने वाले वो दिये की तरह
अंधेर फैलाये चारों ओर
गोधली बेल जब आयेगी
काले कपडे पहनकर
उस समय
वो डूबा सूर्य उदय हुआ होगा कहीं ओर
उसकी उष्णता ऐसे खत्म होने वाली नहीं
बुझी हुयी मशाल जैसे
फिर जला दी जाये
उन असंतोष हाथों में वो
होगी शुरू
एक नई यात्रा की
उसी रस्ते को पकड़ के
पहुंचेगा वो एक दिन
परिवर्तन के उस क्षितिज पर
तब तक उसकी पलकें
तूफ़ान में भी एक पल झपकेंगी नहीं

बालकृष्ण डी ध्यानी
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फिर भी मैं अपना पहला कदम खोजता हूँ

में अपने खींची रेखाओं के पीछे भागता रहता हूँ
कभी उन्हें खरोंचता कभी मिटाता रहता हूँ

बहुत कोशिश करता हूँ उस अन्धकार को प्रकाश दिखाने की
पर हर बार उसके घेरे में मैंने खुद को जकड़ा पाता हूँ

कभी सांस अटक जाती है अपने आप में खुद के भीतर ही
बड़ी परेशानी के बाद उसमें से मैं निकल पाता हूँ

कभी सोचता हूँ क्यों उन रेखाओं को मैं खरोंचता मिटाता हूँ
ऐ सवाल मैं रोज अपने आप से एक बार तो कह जाता हूँ

फिर भी अपने को उसका एक बार भी उत्तर नहीं दे पाता हूँ
दो की दुनिया हजार गम फिर भी मैं अपना पहला कदम खोजता हूँ

में अपने खींची रेखाओं के पीछे भागता रहता हूँ
कभी उन्हें खरोंचता कभी मिटाता रहता हूँ

बालकृष्ण डी ध्यानी
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हर एक देख रहा है

हर एक देख रहा है
आज क्यों मुझे पलट पलट के
१५ से १६ हुयी मैं आज बस उसकी नजर से

बाग़ की कली फूल बन गयी है अब
काटों का दामन पकड़ पकड़ के
माली परेशान हैं अब सारे चमन के

भौरों ने फीते कसने शुरू कर दिये
कभी इस ओर कभी उस ओर कसके
बड़े बेहूदगी बड़े बेशर्म से

राह पर चलना दुश्वार हुआ है ये ग़ालिब
कभी तेरी गजल सुन के कभी मेरी नजर पढ़ के
आ जाते हैं लोफ़र राह में मेरे अब भटक भटक के

हर एक देख रहा है
आज क्यों मुझे पलट पलट के
१५ से १६ हुयी मैं आज बस उसकी नजर से

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आलू टमाटर भिन्डी गोभी

आलू टमाटर भिन्डी गोभी
हो गयी है सब गोल
गायब हो गयी दाल हमारी
वो प्याज तेरा क्या मोल

मुर्गे की अब सुनता है दिल
जब फुर्र उड़ गयी ये दाल
दाल बराबर मुर्गी है अब
है ना ये अब अनोखा मेल

अच्छे दिन की ये मारामारी
बरसों की है ये बची उधारी
कैसे ना कैसे उभर आयेगा ये
देख खेल रहा समय सारा खेल

आलू टमाटर भिन्डी गोभी ......

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