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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बालकृष्ण डी ध्यानी
November 29 at 6:55am · Manama, Bahrain · Edited ·
चल मेरे दिल अब तो हंस ले
अब अपने तू इस दिल से ..... २
दिल मेरा मुस्कुराये
ले मेरे इन आँखों के सहारे
इस दुखी दिल से
चल मेरे दिल अब तो हंस ले .... ३
सतत जारी है .....
ध्यानी प्रणाम .... शुभप्रभात जी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बालकृष्ण डी ध्यानी
November 27 at 7:07am · Edited ·
आयी हो तुम फिर मेरी सुबह बन के
हंस के मेरे साथ फिर तुम अब चलने
कैसे कर देती हो तुम रोज ये करिश्मा
देखे तुम में हर रोज नूर का बहता चश्मा
सतत जारी .....
ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हवा हूँ मैं हवा हूँ
हवा हूँ मैं हवा हूँ
मैं आ कर गुजर जाऊंगा
पास आ कर मैं तेरे जब भी जाऊंगा
एक अहसास तुझे मेरे होने का दे जाऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
उड़ते रहते है जो मेरे ख़याल तेरे साथ में
बातें करते है जो आ के बिलकुल तेरे पास में
वो वैसे जज्बात तुझ में मैं हर वक्त जगा जाऊंगा
तुझे छू ने इसी बहाने मैं बार बार आऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
कभी सर झट दौड़ के तेरे पास से मैं उड़ जाऊंगा
कभी माध्यम माध्यम बह के तेरे समीप आऊंगा
बेचैन होगी जब भी तू अकेले अकेले में
देख कैसे ना कैसे मैं तुझ से अपनी बातें कर जाऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
नाराज ना होना ना कभी होना ख़फ़ा तू
कभी ना करना शक़ मेरी वफ़ा की जफ़ा पर तू
कभी बह ना सका अगर अपने से ही अपने में
समझ लेना की मैं था बहुत मजबूर उस घेरे में
हवा हूँ मैं हवा हूँ
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

महफ़िलें बस दो पल की
महफ़िलें बस दो पल की
पल में कहानी जो बन जाये वो कल की
उम्र कहता है की वो बस बहता पानी
कभी ठहरा हो तो हमसे वो अब कह दो अब जी
महफ़िलें बस दो पल की
मैंने भी बड़ी कोशिशें की थी
कभी अपने से यूँ अकेले अकेले में
बहुत उजाला भी हुआ था
उन काली रातों के घने अंधेरों में
महफ़िलें बस दो पल की
क्या ढूंढने चली जाती है वो फिर भी
अक्सर उन सुनी खामोश सड़कों में
नहीं खोज पाती है वो फिर भी वैसी नज़रें
जिसमें लिखा हो सब कुछ पता चल जाये वो बस पल में
महफ़िलें बस दो पल की
जरा सा धोखा है वो बस उन आँखों का
जो दिल दिमाग के ऊपर एक पर्दा डाल देता है
हकीकत की निगाहों का वो रास्ता उनसे काट देती है
फर्क महसूस ही नहीं होता वो हमको इतना मार देती है
महफ़िलें बस दो पल की
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बदलते चेहरों में
बदलते चेहरों में
एक चेहरा मेरा भी है
कैसे कर दूँ मैं खुद से मना
वो चेहरा मेरा ही है
बदलते चेहरों में ............
धुप थी वो बड़ी
छाया थी वो घनी
चेहरे पर घिरती झुर्रियों ने थी
वो बात मुझ से आके अब कही
बदलते चेहरों में ............
कैसे बदलते हैं ये चेहरे
लगा के खुद पर ही अब पहरे
बह जाती है वो धार फिर भी
ना बस में तेरे ना वो बस में मेरे
बदलते चेहरों में ............
बालकृष्ण डी ध्यानी
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मैंने देखा है
मैंने देखा है
शहर,गाँव को बहुत करीब से
ये मौका मिलता है
बस हर उस एक बदनसीब को
जिसका चूल्हा नहीं जलता
दो वक्त उस वक्त के समीप से
तब अपने से चल पड़ते हैं ये कदम
ना जाने किधर और किस फ़िक्र से
भूख लगती है तब रोटियां भी खूब नचाती हैं
आँखों को मूंदकर तब वो झूठे सपने दिखाती हैं
शहर आया हूँ अब वो मेरे अपने भी मिले
कभी गले लगते थे अब मीलों के फ़ासले पड़े दिखे
कहना है बस झूठ फरेब की इस नगरी से
देख तुझे देखकर मेरे गाँव का कहीं दिल ना दुःख जाये
मैंने देखा है ...................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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देखो प्यार करने का मौसम आ गया
देखो प्यार करने का मौसम आ गया
नजरों को चार करने का मौसम आ गया
चलो ठंडी ठंडी गुलाबी हवा अब वहां बहने लगी है
अब उस प्रेम को इजहार करने का मौसम आ गया
बर्फ ही बर्फ अब बिछ रही उन पहाड़ों की चोटियों पर
मुझमे दफन हुई उम्मीदों को आग देने का मौसम आ गया
सुनहरी धुप खिली है दूर तक उन हसीन वादियों में
चलो अब उनके साथ साथ चलने का मौसम आ गया
दरख्तों पर उन किरणों को जो देखा मैंने जब लिपटे हुये
अब लगा उनको अपने आगोश में लेने का मौसम आ गया
देखो प्यार करने का मौसम आ गया .... ३
बालकृष्ण डी ध्यानी
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अभी खड़ा वो इंतजार
अभी खड़ा वो इंतजार
अभी बड़ा वो बेकरार
क्यों किया इसने किसी से प्यार
क्यों किया ये आँखें चार
अभी खड़ा वो इंतजार
अभी बड़ा वो बेकरार
आँखों का था कसूर सब
दिल को क्यों मिली सजा
धड़कन के साथ बह रही
देखो आँखों से बहता वो प्यार
अभी खड़ा वो इंतजार
अभी बड़ा वो बेकरार
उम्मीद ये लगी है
आयेगी वो यहीं है
झूठा निकला उसका वो करार
ना आयी यंहा वो एक बार
अभी खड़ा वो इंतजार
अभी बड़ा वो बेकरार
कैसे करूँ यकीन मैं
बेवफ़ा वो बिलकुल नहीं
फिर भी खड़ा मैं यूँ ही रहा
क्योंकि करता हूँ मैं उससे बहुत प्यार
अभी खड़ा वो इंतजार
अभी बड़ा वो बेकरार
बालकृष्ण डी ध्यानी
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देखो प्यार करने का मौसम आ गया
देखो प्यार करने का मौसम आ गया
नजरों को चार करने का मौसम आ गया
चलो ठंडी ठंडी गुलाबी हवा अब वहां बहने लगी है
अब उस प्रेम को इजहार करने का मौसम आ गया
बर्फ ही बर्फ अब बिछ रही उन पहाड़ों की चोटियों पर
मुझमे दफन हुई उम्मीदों को आग देने का मौसम आ गया
सुनहरी धुप खिली है दूर तक उन हसीन वादियों में
चलो अब उनके साथ साथ चलने का मौसम आ गया
दरख्तों पर उन किरणों को जो देखा मैंने जब लिपटे हुये
अब लगा उनको अपने आगोश में लेने का मौसम आ गया
देखो प्यार करने का मौसम आ गया .... ३
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सोच ये सोच
सोच ये सोच
बदलनी चाहिये
सब कुछ ये बदल जायेगा
जब ये सोच ही बदल जायेगी
सोच ये सोच
बदलनी चाहिये ये
खोज खुद के भीतर खोज
क्या है वो सोच जो बदलनी चाहिये
आँखें उठकर कर हर ओर देख ले
बिखरा पड़ा समान है वो तेरा समेट ले
सोच ये सोच
बदलनी चाहिये ये
सब कुछ अब बदल रहा है
खुद का प्रतिबिंब तुझ से अब ये कह रहा है
मान ले इस परिवर्तन की सच्चाई को
जान ले तू नहीं तो खुद मिट जायेगा
सोच ये सोच
बदलनी चाहिये ये
पहले खुद पे भरोसा कर
फिर लोगों में जाकर परोसा कर
वो प्रगति की सुबह यंहा पर होगी
वो माटी अपनी तुझ से कहेगी
सोच ये सोच
बदलनी चाहिये ये
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