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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

एक अंधेरा जलता है

एक अंधेरा जलता है
एक सवेरा चलता है
देखना है अब इन में से पहले
तू किस से और कैसे निपटता है
एक अंधेरा जलता है ......

दूर है वो पर पास तेरे
पास है वो पर बहुत दूर तुझ से
चुनना है अब तुझ को ही
कौन तेरे साथ अब चलता है
एक अंधेरा जलता है ......

फर्क तेरे बस इस सोच का है
तू उसे अब खुद में कैसे ढालता है
बस बैठे रहेगा क्या तू ऐसे ही
या फिर दो कदम तू उसके साथ चलता है
एक अंधेरा जलता है ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

दोनों को कुछ कहना था

दोनों को कुछ कहना था
दोनों ही कुछ ना कह पाये जी
धरती और आकश को मिलना था
दोनों भी अब तक ना मिल पाये जी
दोनों को कुछ कहना था ................

एक उम्र पड़ी है वो रेल के जैसी
भागती रहती है दो पटरी पे यूँ ही
उम्मीद में है वो कोई आयेगा स्टेशन
वो पटरियां तब आपस में मिल जायेंगी
ऐसा मगर क्यों होता नहीं
दोनों को कुछ कहना था ................

एक दूसरे पर निर्भर सब है
साथ में चलते रहना ही वो सुख है
दुःख जब बाँट लोगे आधा आधा
समझ जाओगे तुम वो अपना वादा
दूर हैं पर पास सदा तुम्हारे
दोनों को कुछ कहना था ................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

वो मोड़ फिर आ गया है

वो मोड़ फिर आ गया है
मेरी जिंदगी में फिर
घर अपने मैं लौट चलों
या चलों फिर किधर ओर मैं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

भटकता फिर रहा हूँ मैं
आज भी अपने में ही कहीं मैं
अंधेरा इतना घिरा था मुझ में
वो दूर रौशनी मुझे क्यों दिखी ही नहीं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

अपना था वो जो भी मेरा मुझे
अब तक वो मुझ से मिला नहीं
लोगो इतने मिले मुझे पर
मेरे साथ कोई क्यों चला नहीं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

आज फिर अपने किसी ने
मुझे दूर मोड़ से आवाज दी
उत्तर दूँ उसे या
फिर अनसुना कर आगे चलों
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

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devbhumi

मेरे गांव के घर पे

मेरे गांव के घर पे
एक दीपक तुम जला देना
रहता कोई है अब भी वहां
ऐसा सब को बता देना
मेरे गांव के घर पे ......

सूना सूना ना लगे किसी को
मेरे घर से भी बग्वाल गुजार देना
ढोल दामो तुम वहां पर बजाकर
वो पहाड़ का उत्साह दिखा देना
मेरे गांव के घर पे ......

देहली पर आटे की रंगोली बनकर
थोड़े फूल पात्ती भी चढ़ा देना
नत मत हो कर मेरे पित्तरों से
मेरी क्षमा याचना भी कर देना
मेरे गांव के घर पे ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अपने को थाम लूँ
अपने को थाम लूँ
या फिर एक और जाम लूँ
देखों महफ़िल के इस मूड को
या अपनों के मुख देख छोड़ दूँ
अपने को थाम लूँ ...
रंगीन दुनिया रंगीन सपने तेरे
रंगीन गलियों में सब तेरे अटके
सादगी से मेरे परहेज कर
मेरे पहाड़ी आज कहाँ भटके
अपने को थाम लूँ ...
लिखने को तो बहुत कुछ था
पर पत्थरों पर ही मेरा दिल लगा
भुला था मैं यंहा कांटे भी मिलेंगे
पर ना भुला उनमें ही तू मेरे प्रेम के फूल खिलेंगे
अपने को थाम लूँ ...
वो ऊँची उड़ान वाले पंछी मेरे
कभी आके तू तेरे टूटे हुये घोसले देख ले
फिर या तू अपने आँसूं अब से संभल ले
फिर ये मौका तुझे मिले ना मिले
अपने को थाम लूँ ...
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हवा हूँ मैं हवा हूँ
हवा हूँ मैं हवा हूँ
मैं आ कर गुजर जाऊंगा
पास आ कर मैं तेरे जब भी जाऊंगा
एक अहसास तुझे मेरे होने का दे जाऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
उड़ते रहते है जो मेरे ख़याल तेरे साथ में
बातें करते है जो आ के बिलकुल तेरे पास में
वो वैसे जज्बात तुझ में मैं हर वक्त जगा जाऊंगा
तुझे छू ने इसी बहाने मैं बार बार आऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
कभी सर झट दौड़ के तेरे पास से मैं उड़ जाऊंगा
कभी माध्यम माध्यम बह के तेरे समीप आऊंगा
बेचैन होगी जब भी तू अकेले अकेले में
देख कैसे ना कैसे मैं तुझ से अपनी बातें कर जाऊंगा
हवा हूँ मैं हवा हूँ
नाराज ना होना ना कभी होना ख़फ़ा तू
कभी ना करना शक़ मेरी वफ़ा की जफ़ा पर तू
कभी बह ना सका अगर अपने से ही अपने में
समझ लेना की मैं था बहुत मजबूर उस घेरे में
हवा हूँ मैं हवा हूँ
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

महफ़िलें बस दो पल की
महफ़िलें बस दो पल की
पल में कहानी जो बन जाये वो कल की
उम्र कहता है की वो बस बहता पानी
कभी ठहरा हो तो हमसे वो अब कह दो अब जी
महफ़िलें बस दो पल की
मैंने भी बड़ी कोशिशें की थी
कभी अपने से यूँ अकेले अकेले में
बहुत उजाला भी हुआ था
उन काली रातों के घने अंधेरों में
महफ़िलें बस दो पल की
क्या ढूंढने चली जाती है वो फिर भी
अक्सर उन सुनी खामोश सड़कों में
नहीं खोज पाती है वो फिर भी वैसी नज़रें
जिसमें लिखा हो सब कुछ पता चल जाये वो बस पल में
महफ़िलें बस दो पल की
जरा सा धोखा है वो बस उन आँखों का
जो दिल दिमाग के ऊपर एक पर्दा डाल देता है
हकीकत की निगाहों का वो रास्ता उनसे काट देती है
फर्क महसूस ही नहीं होता वो हमको इतना मार देती है
महफ़िलें बस दो पल की
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बदलते चेहरों में
बदलते चेहरों में
एक चेहरा मेरा भी है
कैसे कर दूँ मैं खुद से मना
वो चेहरा मेरा ही है
बदलते चेहरों में ............
धुप थी वो बड़ी
छाया थी वो घनी
चेहरे पर घिरती झुर्रियों ने थी
वो बात मुझ से आके अब कही
बदलते चेहरों में ............
कैसे बदलते हैं ये चेहरे
लगा के खुद पर ही अब पहरे
बह जाती है वो धार फिर भी
ना बस में तेरे ना वो बस में मेरे
बदलते चेहरों में ............
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैंने देखा है
मैंने देखा है
शहर,गाँव को बहुत करीब से
ये मौका मिलता है
बस हर उस एक बदनसीब को
जिसका चूल्हा नहीं जलता
दो वक्त उस वक्त के समीप से
तब अपने से चल पड़ते हैं ये कदम
ना जाने किधर और किस फ़िक्र से
भूख लगती है तब रोटियां भी खूब नचाती हैं
आँखों को मूंदकर तब वो झूठे सपने दिखाती हैं
शहर आया हूँ अब वो मेरे अपने भी मिले
कभी गले लगते थे अब मीलों के फ़ासले पड़े दिखे
कहना है बस झूठ फरेब की इस नगरी से
देख तुझे देखकर मेरे गाँव का कहीं दिल ना दुःख जाये
मैंने देखा है ...................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शायद ही तुम को
अकेले सन्नाटे को चीरना वो मेरा मकसद नहीं था
अपनों से मिलाना ही उस राह का शायद मकसद होगा
रोज नया आयाम लेती है जिंदगी यूँ ही फिजूल नहीं
कारण होगा कुछ ना कुछ वो फिजूल यूँ रोज बदलती नहीं
हर एक वो लिख देता जो उसे वो लिखाना चाहता है
एक एक पत्ता पत्ता अब भी उसके इशारे का मोहताज है
धरती है वो वो मेरा आकश कहीं अब मिलते देखा नहीं
पागल हैं वो जो अपना घर जला दूसरों का बसा देते हैं
सत्ता की लालच ने धरती अब हर जगह पर वो बाँटी है
बता दो तुम एक जगह भी जंहा लूटा नहीं इस ख़ाकी ने है
बस में लिख के यंहा से अब अकेला कहीं मैं चला जाऊंगा
लगता है शायद ही तुम को कभी मैं अकेले यूँ ही याद आऊंगा
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