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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बालकृष्ण डी ध्यानी
November 19 at 9:14pm · Manama, Bahrain ·
बात दिल की ना दिल में अब यूँ ही रह जाये
सवेरे शाम हो गयी ये रात भी ना गुजर जाये
तन्हा फिरते हैं हम बस अब अपने ही बस्म में
एक पग निकल दो कहीं अब ना देर हो जाये
ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हर रोज ये सुबह यंहा आती है
हर रोज ये सुबह यंहा आती है
हर रोज ये शाम यंहा गाती है
किसी को आँसूं किसी को हंसी
ये जिंदगी यूँ ही ना दे जाती है
लेना है तुझे जो भी यंहा ले ले
देना है तुझे जो भी यंहा दे दे
बस बात एक ये तू गांठ ले
प्रेम ही प्रेम तू यंहा बाँट ले
भूल से भी ना तुझ से भूल हो
जो दिया ऊपरवाले ने वो तुझे सब कबूल हो
सब कुछ तुझ पर ही निर्भर है अब
कौन सा लक्ष्य कौन रास्ता तुझे अनकूल हो
तेरी राह पर तेरे पीछे अब और भी चलेंगे
देख उनके सपनों की ना कोई दिशा भूल हो
मेरे देश के कंधो पर कंधा है मेरे गाँव का
देखे तेरे कंधों से अब की बार ना कोई चूक हो
हर रोज ये सुबह यंहा आती है ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब भी बाकी हैं
कुछ काम करने बाकी थे
बहुत सारे नाम लेने अब भी बाकी हैं
रह गये अधूरे अपने से ही कोने में
वो टूटे सपने अधूरे अब भी बाकी हैं
इतने रोये हम जीवन भर
उन आँखों में आँसूं अब भी बाकी हैं
बहुत कुछ कह दिया था मैंने उनको
पर कुछ बात कहनी अब भी बाकी हैं
अपने में ऐसे उलझे रह गये हम
कुछ और धागे खोलने अब भी बाकी हैं
कुछ तुम्हारे भी अब भी बाकी होंगे
जिस तरह वो मेरे अब भी बाकी हैं

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चलो मौसम बदलने वाला है
चलो मौसम बदलने वाला है
पहाड़ की चोटियों पर अब ठंडी बर्फ बरसने वाली है
शुष्क गर्मी से वो देगी छुटकारा
बरखा से मिला था जो थोड़ा सहारा
शीत लहर गूंजेगी इन हवाओं में
सर्द बहेगी इन फिजाओं में
जल श्रोत इन राहों के ठोस हो जाएंगे
तब हर वो तन मन जन ठिठुरेगा
आग की लपटों में वो अब झुलसेगा
सुबह अब थोड़ी और देर से जागेगी
रातें और थोड़ी देर हमारे संग अँधेरे में भागेंगी
उस सुबह में धुंध की एक लहर बिछी होगी
ओस की नम आँखों में वो कमी दबी होगी
उसे उस किरण का बेसब्री से इंतजार होगा
वो सूरज ना जाने आज उसका कहाँ छुपा होगा
आलस से थमी रोकी जिंदगी जवाँ होगी
मोहब्बत ही मोहब्बत अब यंहा होगी
फिर भी हमे ना रोकना है
किसी औरों के आगे ना झुकना है
आलस त्याग अपने कर्म पथ पर
सदैव निरंतर यूँ ही आगे बढ़ना है आगे बढ़ना है
चलो मौसम बदलने वाला है .......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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दोगले लोग हैं दोगली है ये दुनिया
दोगले लोग हैं दोगली है ये दुनिया
कैसे लोग हैं कैसे कैसों से छिपी लिपि है ये दुनिया
दर्द अपना है तो परायी हो गयी है ये दुनिया
सुने घर मेरे पड़े हैं खिली पड़ी उनकी है ये दुनिया
दशक पहले किस्मत पर हमे छोड़ कर चल दी है ये दुनिया
बड़े बोल बोल कर अब क्यों मौन हो गयी है ये दुनिया
स्वर्ग मेरा था वो उसे नरक बन गयी है ये दुनिया
सह रहा हूँ मैं अब भी तू इतने से ही डर गयी है ये दुनिया
मुझे विशवास है अब भी मेरे देश पर तू डगमगा गयी है ये दुनिया
हंसा रहा हूँ मैं सब खो कर भी तू क्यों रो रही है ये दुनिया
बालकृष्ण डी ध्यानी
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दोगले लोग हैं दोगली है ये दुनिया
दोगले लोग हैं दोगली है ये दुनिया
कैसे लोग हैं कैसे कैसों से छिपी लिपि है ये दुनिया
दर्द अपना है तो परायी हो गयी है ये दुनिया
सुने घर मेरे पड़े हैं खिली पड़ी उनकी है ये दुनिया
दशक पहले किस्मत पर हमे छोड़ कर चल दी है ये दुनिया
बड़े बोल बोल कर अब क्यों मौन हो गयी है ये दुनिया
स्वर्ग मेरा था वो उसे नरक बना गयी है ये दुनिया
सह रहा हूँ मैं अब भी तू इतने से ही डर गयी है ये दुनिया
मुझे विशवास है अब भी मेरे देश पर तू डगमगा गयी है ये दुनिया
हंसा रहा हूँ मैं सब खो कर भी तू क्यों रो रही है ये दुनिया
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कैल जादू कै हुली
कैल जादू कै हुली
ऐ ब्योलि कैल सजै हुली
नखर्याली नाक की ये नथुली
सोना मा कैल गढ़े हुली
कैल जादू कै हुली ..................
पसरयाली बिखर्याली ये
ल्जयाली लोक्यंली धोप्यली ये
ये गैणा ढुंगा और्री गारे का
कैल इन टिप टिप्या हुला
कैल जादू कै हुली ..................
अन्ख्युं को ऊ मेरो रगरयाट
जीकोडी को मेरो ऊ झकझायट
ये मेरो भूमि को रे भूम्याला
ये जगमग- २ रे बोग्यला
कैल जादू कै हुली ..................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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बस इतना ही था
इतना जिंदगी का है फलसफां
बस जियो जिंदगी हँसते हँसते
बस यही चीजें मायने रखती है
जब आईना उसे देख के हँसता है
जी भरके जियो यंहा एक एक पल
ना जाने कब निकल जाये ये पल
बस यही बात यंहा पर कीमती है
तेरी हंसी दूसरे में जब हंसती है
बस ये सब कुछ था तेरे अंदर ही
पर उसे तू खोजता रहा कहाँ कहाँ
ना ये तेरी बस्ती है ना मेरी है
छूट जाएगी सब जो तेरी हस्ती है
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैं अपने में ही कहीं ग़ुम हूँ
अपना ना कोई यंहा
सब कुछ है यंहा पर पराया
कोने कोने में बिखरा हुआ
मैंने जब उनमे खुद को है पाया
टूटे सपने टूटे वादे
खुद से उलझे पड़े हुये
रिश्तों की उलझन में उलझे
कोने खुद से अनसुलझे ही लगे हुये हैं
एक ही रास्ता है वो रोज का
एक ही वो आने जाने वाला मंजर है
खिंजा खिंजा सा रहता है ये दिल
खुद से पाला जो मैंने वो समंदर है
रेखायें उभरती है समय समय पर
उन उजालों के अंधेरों में से
दिन डुबता है अब मेरा उन उजालों में
जिस में ना कोई बची अब हलचल है
आक्रोश ही आक्रोश पनप रहा है
चिल्लाता हूँ अब मैं खुद के अंदर हूँ
ना जाने क्या दबा रहा हूँ मैं
क्या मैंने देखा ऐसा जो बाहर है
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उखाड़ लेता
उखाड़ लेता
मैं भी उनके सर
उनके घर में ही घुस कर
काश ....
उखाड़ लेता
मैं भी उनके सर
ना रखते अगर
मेरे अपने मुझे
उनकी उन
नीतियों से बाँध कर
काश ....
उखाड़ लेता
मैं भी उनके सर
मेरा अपना
आज कोई खोया है
मेरी सीमा में
ही वो रहकर
काश ....
उखाड़ लेता
मैं भी उनके सर
घुसपेठीये आते है
जैसे आते हैं वो घुसकर
क्या हम भी
जा नहीं सकते वैसे
काश ....
उखाड़ लेता
मैं भी उनके सर
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