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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

अभी ले लूँ थोड़ा आराम माँ तेरी गोदी में मैं

अभिलाषा घोसले की
इसलिये उड़े पक्षी संध्या को
मन भागता मेरा तेरी ओर
गोद में ले माँ अपने बच्चों को

बहुत कष्ट सहन कर
जीवन थक से अब चूर हो गया है
माँ मेरे मुख में कुछ खाना डाल दे
ये आँखें अब आतुर हैं सोने को

इस सुख के पीछे लग के
अगर मैंने अपना गांव छोड़ा
एक क्षण भी मुझे माँ
तेरी याद ने अकेला ना छोड़ा

बैचैन है मन मेरा
माँ मेरी तेरी वो भेंट करने को
यादों में तुम्हरे आज माँ
गला मेर आज भीग गया

मेहनत करके मैंने बहुत
रुपया अगर मैंने जमा किया
इस कागज के टुकड़े के लिये
हर बच्चा माँ से दूर हुआ

सब रस्ते छोड़कर
अपने गाँव कैसे पहुँच जाऊं
सेवा करते हुये माँ तेरी
ये देह मेरी माटी में मिल जाये

सुख के दिन आये
जब बच्चा अपने घर को वापस आये
पूरी हो गयी अब सब मजदूरी
अभी ले लूँ थोड़ा आराम माँ तेरी गोदी में मैं
अभी ले लूँ थोड़ा आराम माँ तेरी गोदी में मैं

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

चलो बातें दिल की सुनाऊँ मैं आज

चलो बातें दिल की सुनाऊँ मैं आज
अपने दिल से तुम्हें मिलाऊँ मैं आज

कोई नहीं है ,नजरों ने कही है
चुपके चुपके दिल ने की दिल से ये बात
आज से अभी से तुम भी अपने दिल से
कर लो ना ये शुरुवात
मानलो ना मानलो तुम मेरी ये बात
ये है सुखद स्वप्नों की बारात

हर वक्त वो मिलेगा हर वो ग़ुल खिलेगा
हँसता चेहरा पल पल तुम से आ के मिलेगा
देखो ना देखो ना करना तुम इनको इनकार
ये है मेरे प्रेम की पहली बसंत बहार
आ जाओ ना आ जाओ तुम मेर साथ
वो मेरे प्रेम सुन लो ना मेरी पुकार

मीठा दर्द जाग है आज,कोई इसके पीछे भाग है आज
काँटों भरा ये फूलों का ताज
मौसम का भी जगा है आज रंगीनी मिजाज
अठखेली लेती अब तो आ जाओ ना तुम
कर दो ना कर दो अब तुम अपने स्नेह की बरसात
तृप्त होने क्यों रह रहकर मन ललचा रहा आज

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

रूपांतर

कंठ से गाते हुये
वो गीत जो दिल में उतर जाता है
वो सुर

अनुभव से शब्दों और
शब्दों से जो आँखों में चमकते हैं
वो बुद्धि

वर्दी से निश्चय तक और
निश्चय से बॉडर पर खड़े रहते हैं
वो धैर्य

एकांत से उस शांति तक
उस शांति से जो आनंद मिलता है
वो आत्मविश्वास

अथक प्रयास से प्रगति और
प्रगति से जो ऐश्वर्य को खिलाती है
वो नम्रता

स्पर्श से आधार और
आधार से जो आँसूं टपकते हैं
वो माया

दिल से गालों पर और
गालों से जो स्मृति में घूमते हैं
वो प्रेम

चाहा से अपनेपन में और
अपनेपन से शब्दों में उभरते हैं
वो विशवास

यादों से कृति में और
कृति से समाधान में जो दिखता है
वो अनुभूति

मन से ओठों पर और
ओठों से फिर मन में जाते हैं
वो यादें

बालकृष्ण डी ध्यानी
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पत्थरों को तराशने को

पत्थरों को तराशने को
निकला हूँ खुद को आजमा ने को
नीले आकाश के छोर पे वो
एक राह है जो तेरी ओर चले
पत्थरों को तराशने को .........

कुछ ख़ास पास है वो
अब लेकिन क्यों बर्बाद है वो
उसे फिर आबाद करने के लिये
मेरी सांस क्यों उसकी ओर चले
पत्थरों को तराशने को .........

हर पत्थर अब बोलने लगा
अपने दिल का राज खोलने लगा
टटोल रहा है वो आज तेरे दिल को
देखना है उसे तू आज किस ओर चले
पत्थरों को तराशने को .........

हर ओर एक उदासी है
मातम की तरह छायी वो तन्हाई है
हर एक नजर ढूंढ़ती तुझको
आपस में बातें करती वो बस तेरी परछाई है
पत्थरों को तराशने को .........

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

वो मेरा इन्तजार

करवा चौथ की रात
चांद को छलनी से देखने
खड़ी होगी छत पर वो बेकरार
पुरे दिन की होगी वो भूखी प्यासी
मेरी पत्नी कर रही होगी
वो मेरा इन्तजार
माथे पर सिंधुर लगाये
दुल्हन की तरह होगी वो बिलकुल तैयार
पल पल आज चला जाता होगा
ध्यान उसका उस काले गगन पर आज
किसी के कदमों की आहट सुन कर वो
दौड़ आती होगी आज उस दहलीज के पास
जिस दरवाजे से रोजाना
हमारा आना जाना होता रहता है
ना जाने आज उसका मन
क्यों बार बार रह रहकर बेचैन हो जाता है
ना तो मैं अब तक आया
ना ही वो निर्दयी चन्द्रमा काले गगन में आज
करवा चौथ की रात
चांद को छलनी से देखने
खड़ी होगी छत पर वो बेकरार
पुरे दिन की होगी वो भूखी प्यासी
मेरी पत्नी कर रही होगी
वो मेरा इन्तजार

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

हूँ ... हा ....

कैसे खोजों उसे
जो खोया खुद में ही कहीं
चार दिवारी हो या
हो वो खुला आसमान
बंद है अपने आप से
हूँ ... हा ...वो सांस कहीं आज मेरी
कैसे खोजों उसे .......

बालकृष्ण ध्यानी

devbhumi

चलो आज अपने दिल से पूछे हम

चलो आज अपने दिल से पूछे हम
क्या सही है क्या गलत है ये अपने दिल से बुझे हम

उम्मीद पड़ी मिलेगी मेरी उन राहों में अब तक गढ़ी
चलो आज अब तक उस गढ़ी उम्मीद को उखाड़ लाये हम

सुखी नदी मिलेगी वहां कुछ पड़े मिलेंगे बंजर खेत
दूर दूर तक ना होगा उनका कोई ना होगी अपनों से अब कोई भेंट

हर एक घर वहां खंडहर बन बन पुकार रहा होगा
सुखी घास जलते जंगल उन के सपनो को और जला रहा होगा

अकेला देखता खड़ा सदियों से वो विशालकाय पत्थर
ग्रेनेड के धमाकों से वो विशालकाय पत्थर अब टूटता और बिखरता होगा

कुछ अस्थियां मिलेंगी अब भी वंहा यंहा वहां पड़ी बही
अब गिद्धों का भी उस आसमान में आना जाना काम हो गया है

बूढी सांस बची है जो अब मरने को तैयार है
उस बूढ़े शरीर का ना कोई अब खरीदार शेष यंहा बचा है

काश तुम्हे कोई अपना इनमें अगर दिख जाये
तो सच होगा मेरा आईना अगर तुम से वो बोल जाये

बालकृष्ण डी ध्यानी
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हर अपना बेगाना हो चला

हर अपना बेगाना हो चला ..... २
जिंदगी का ..... २ ये फ़साना हो चला
हर अपना बेगाना हो चला

हँसते हँसते ये आँसूं कब रोने लगे ..... २
लगी जब खबर इसकी एक जमाना गुजर गया
हर अपना बेगाना हो चला

एक एक को अपना जाना माना था ..... २
मुसीबत जब पड़ी वो जाना माना समझ गया
हर अपना बेगाना हो चला

जिंदगी है एक सफर ये माना सनम ..... २
ना तो कोई राहें मिली ना कोई बने मुसाफिर हम
हर अपना बेगाना हो चला

बहुत सुनहरे ख़्वाब देखे थे मैंने भी ..... २
ना ये काली रात ढली ना वो सपना पूरा हुआ
हर अपना बेगाना हो चला

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पहली बार मुझे लगा है ऐसा

पहली बार मुझे लगा है ऐसा
कोई मिला मुझे बिलकुल मेरे जैसा
पहली बार मुझे लगा है ऐसा .......

आँखें बंद करूँ या खोले रखूं मै
उठ जाऊं या फिर सोये रहूँ मै
ये अँधेरी रात वो सुबह के सवेरे
कुछ भी नहीं रहा अब बस में मेरे
पहली बार मुझे लगा है ऐसा .......

वो मीठी मीठी नींद जगी है मुझ में
भीनी माटी की वो सुगंध मिली है उसमे
पहली बरखा की फ़ुवार ने छुआ है
नेमतों ने आकर मेरे दिल से कहा है
पहली बार मुझे लगा है ऐसा .......

प्यार में जीना गुनाह लगता था
तुम से ना मिला था मै तब लगता था
मिली है जब से ये तेरी रंग नूर की आँखें
पागल था मै तब या मै अब लगता हूँ
पहली बार मुझे लगा है ऐसा .......

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मेरे पहाड़ पर कविता

मेरे पहाड़ पर कविता
बस इतना ही आता है मुझको
बस इतना ही भाता है मुझको
मेरे पहाड़ पर कविता

टूटी फूटी वो पंक्ति मेरी
वैसे ही सज रही वो सजनी मेरी
जंचती निरंतर संवारती वो
ना वो बदला ना बदलती वो
मेरे पहाड़ पर कविता

पहाड़ है पुकारता वो
शीर्ष से किसे वो निहारता वो
ओझल होते उसे चित्र दिखते
मन के पटल पर अंकित होते
मेरे पहाड़ पर कविता

पहाड़ से टूटे पत्थर गिर कर
गरमी में पहाड़ पर बैठे थे जो ऐंठकर
रेंग कर गिरते अब उभरकर
वर्षा में आँख के आँसूं बनकर
मेरे पहाड़ पर कविता

अजेय पहाड़ की ये कविता
पहाड़ की वो नारी सरिता
पहाड़ का दुख है अब भी उसका
टूटा क्यों ना विपत्तियों का दुखड़ा
मेरे पहाड़ पर कविता

जो शाश्वत प्रकृति है वो
उस में है ऐसा मेरा पहाड़
एक नदी लम्बी सी वो कविता
मेरी भाषा की है वो गणिता
मेरे पहाड़ पर कविता

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