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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

देखी छे क्या तिन

देखी छे क्या अ अ अ  तिन   न न  अ
इन मौल्यार कख बी इन उल्यार कख बी
देखी छे क्या तिन

मुखडी विंकी  बात कैनी देख,मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
कैल नि बिंगी  माया विंकी, मेरु  माया कु रगरायट रे
मेरु  माया कु रगरायट रे
मैसे ही तो बात कैर मैसे ही तू  भेंट  कैर
सुबेर सुबेर तू मैसे ही तू सुरवात कैर
देख ना तू कै और्री मेरो आँखा दगडी अपरू आँखा चार कैर

नि राई जियु मेरु पास ,कख लुक्युं हुलु वो आज रे
कख लुक्युं हुलु वो आज रे
उजाली रूप तेरु चाँद जनि ,चकोर  सी किलै हुग्युं आज रे
चकोर  सी किलै हुग्युं आज रे
मि मी नि राई कख हर्ची गयुं मि आज रे
खोजणा मि थे मेरा अपरा पराया
नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे, नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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व्हैग्याई डिजिटल

व्हैग्याई डिजिटल
देश व्हैग्याई डिजिटल
फेसबुक अपरा मुखडी
मुखडी  देख रंग ग्याई
व्हैग्याई बल डिजिटल  ... २

पाणी नि मिल्नु
बिजली नि अब तक ऐई
बांज पौड़ी गे सारी पुंगड़ी
बल कैल चरण ये मा हैल
व्हैग्याई बल डिजिटल  ... २

भूख नंगा अब भी छिन
रोजगार क्ख्क च जरा बोल्दिन्
बेरोजगारों की फौज खड़ी
स्मार्ट मोबाईल हौस बड़ी
व्हैग्याई बल डिजिटल  ... २

मिल त कुछ नि बोलण
अब त डिजिटल ही चलण
देखा मुखडी अपरी अपरी सजै
कन देखेणु भुलु मि भी बतै
व्हैग्याई बल डिजिटल  ... २

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भुल्दा मनखी

जिकोड़ो दियू ये माया संभाले ना
जुनि थे ये बाटा भाये ना  ...... २

दूर बाटा खूब भागी ये सहेरा कू ...... २
मन नि लागि यख अखेरा कू

उड़ दा चखुला बल उड़ा दा जा
तिल संसार कथये न समझी पायो रे

भुल्दा मनखी बल तू भुल्दा जा
तिल अपरू परायु नि जनि पायो रे   ...... २

द्वि दिना की ये दुनिया रे   ...... २
फिर बी अक्ल दाढ़ तेरी नि आये रे

बगदा पानी बल बगदी जा 
कैल तेथे यख  ना समझी पायो रे

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नि बिसरलो नि बिसरलो

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कन बिसरलो  कन बिसरलो
मातृ जननी को लाज मेरु खंड

कैल बिसरण देन कैल बिसरण देन
निर्दोष मनखी पर ये अत्त्याचार

ऐग्याई ऐग्याई फिर कलो दिन
जिकडो च सबकु खिन -भिन

नई चेनु हम थे तुमरी शोक सभा
मुलायम मायवती थे तू दिला सजा

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

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ईशारा  से मैं बुलन्दी

आँखि  दगड आँख  मटकण दि
ईशारा  से मैं  ऊ बुलन्दी
औ बांदा ईशारा  से मैं बुलन्दी
बता दे ये बांदा तेरु नौ  क्या च

कण छुईं  लगान्दी दिल लुछी जांदी
माया से भोरी ऐ बोरी
मिल अपरी कंधामा ते सरयाँण
बता दे ये बांदा तेरु गौं  क्या च 

कण तै पर माया लगाण
कण तै थे आधु बाटू पर अढ़ण
अपरी आप समझे दे मिथे
छुछि अपरू जियु  को भेद बता दे 

ईशारा  से मैं बुलन्दी
हे बांदा मे ईशारा  से मैं बुलन्दी
ईशारा  से मैं बुलन्दी ......ईशारा  से मैं बुलन्दी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरी बात राई  में दगडी   ..........

मेरी बात राई  में दगडी
वहै गे प्रभात देख कै दगडी
कण रात ग्याई मि जंणदू
अपरू दुःख मि अफि सरदु
मेरी बात राई  में दगडी   ..........

बैठ्युं राई अपरि मि
कोई  नि आई यखरि मा मि
कैल नि अब मि ध्यै लगे
दूर भ्तेकी बी वेळ नि बचे
मेरु स्वास में मा राई
में दगडी ही वा यखुली ग्याई
मेरी बात राई  में दगडी   ..........

ये अंधारु उजाळु को खेल
बिठे नि पाई मि विं दगडी मेल
झुक झुक कैकि दिस ऐई गैई
छूटी ग्याई मेर ज्योंदगी की रेल
सज नि आई या खेल नि पाई
दूर बैठिक मि  बस देख्दी राई
मेरी बात राई  में दगडी   ..........

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वो मोड़ फिर आ गया है

वो मोड़ फिर आ गया है
मेरी जिंदगी में फिर
घर अपने मैं लौट चलों
या चलों फिर किधर ओर मैं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

भटकता फिर रहा हूँ मैं
आज भी अपने में ही कहीं मैं
अंधेरा इतना घिरा था मुझ में
वो दूर रौशनी मुझे क्यों दिखी ही नहीं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

अपना था वो जो भी मेरा मुझे
अब तक वो मुझ से मिला नहीं
लोगो इतने मिले मुझे पर
मेरे साथ कोई क्यों चला नहीं
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

आज फिर अपने किसी ने
मुझे दूर मोड़ से आवाज दी
उत्तर दूँ उसे या
फिर अनसुना कर आगे चलों
वो मोड़ फिर आ गया है ..........

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devbhumi

किलै बोला ना सकी ना

ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना
माया बिना एक दिस बी मि रैं ना सकी ना
पियार मा  क्या आखर हूंद बोला ना सकी ना
यूँ आँखी की भसा बी मि पैड़ ना सकी ना
ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना

मि तै पियार करदु मि तै पर मरदु किलै बोला ना सकी ना
ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना
माया बिना एक दिस बी मि रैं ना सकी ना ......

हाथ मा फूल लेकि मि विन्थे दे ना सकी ना
तिना आखर पियार विन्से किलै बोला ना सकी ना
आंदा जांदा बाटा बैठी विंकी कि मि अड़ै ना सकी ना
मेरो जीकोडी की कथा किलै विं मि सुनै ना सकी ना
ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना

मि तै पियार करदु मि तै पर मरदु किलै बोला ना सकी ना
ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना
माया बिना एक दिस बी मि रैं ना सकी ना ......

मेरो जियो की धक धक विं किलै धके सकी ना
दूर बैठी मेरो ये हाल पास ऐकि विं थे बथे सकी ना
कन खलबलहट मच्यु च यु कैल बिंगै सकी ना
बोगी गै सुर पाणी आँखा कू कैल यख मैटी सकी ना

मि तै पियार करदु मि तै पर मरदु किलै बोला ना सकी ना
ते बिन मेरो जी रैं ना सकी ना
माया बिना एक दिस बी मि रैं ना सकी ना ......

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गिन गिनी की

क्वी अपरू ना क्वी परयु
फिर जियू तिल हाक किलै मारी

घुघूती अब लगीगे वा घुरनि
कै आमा डाई बैठी हुली वा हाक देनि

ढुंगा ढुंगा गारा गारा व्हैगेनी
परदेश जै स्वामी निर्जक व्है कि सैगेनी

मि छों लगि यख यखुली यखुली
आच दूर गयां बाटा कि खुद भंडया आनि

दोफरी बाद रात राता बाद सुबेरा आलू
गिन गिनी की ऐ दिन बीत जालू

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तुम थे देखि

तुम थे देखि त ये बिचार ऐई
जिंदगी घाम , तुम घणेर सौली

आच फिर जियु नि एक आस बंधी
आच जियु थे फिर हमुन समझेई

तुम जबै हर्ची जला तब सोचला
हमुल कया खोई कया पाई
.
हम जैथे गुनगुना नि सक्दा
बगता न इन गीत किलै गाई

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