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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

को गालो फागुण की होरी
गीत वंसत का कख बिटि सुणणी
थड्या झुमैला, बौ अर लाली
औण वळौं न क्या जी जणणीं।
रीत बचैकी रखण म्यारौ
गीत बचैकी रखण
तीज त्यौहरा खौला मेळौं
थाती बचैकी रखणा।
ब्गत का अगनै अटगणां हम
दौका फौक्यों म भटकणां
रीत रिवाज, सान संस्कृति
घडि़ म अपणीं छ्वडणां।
यीं थाती की समाळ कारा
भौळ कनक्वैकी ह्यरणां,
सख्यों की रीत पुरख्यों की
हम्हरि थाती पछ्याण या च।
अपणां जलडौं कबी नि छ्वडणौं
अपणी माटी समाळ कारणां
रीत बचैकी रखण म्यारौं
गीत समाळी रखणा।।
दिनेश ध्यानी. 23 फरवरी. 2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani
21 hrs
महिला दिवस!
बल
हे दिदी!
तिन बि सूण अमणि
कज्यण्यों को दिन च।
सैर्या दुन्य म
धै लगणीं छन
ताळि बजयेणि छन
रैलि अर गीत गौंणा छन
यनु लगणौं छ कि अब
सब्बि कज्यण्यौं कु
भलु ह्वै जालु
तौं थैं संसद म
तेतीस प्रतिशत आरक्षण
बि मीलि जालु।
छेड-छाड अर बलात्कारौं से
निरभग्यों थैं निजात मीलि जालु।
घर- गौं, खेति-पाति म
मर्द बि अब कज्यण्यों का दगडि
काम-धाम म हाथ बंटालु।
लिंग-भेद अर
बैमनस्यता को नामौ निसा
नि रालु।
क्वी कै कि बेटि बौड्यौं थैं
बुरि नजर ल नि द्याखु
बस यन्नु लगणौं
तौं अमणि बिटि
सब्बि मर्दौं की सोच-विचार
बदलि जाला
अहा दा कनु भलु लगणौं
सच जो यि स्वीणा सच ह्वै जाला।
द भुली तु बि
लाटि कि लाटी हि रैगे
तौं का झूठा सुपिन्यों म एैगे
निरसी यनु जि होंदु त
साख्यों बिटि
सि तन्नि
हम कज्यण्यों का हक म
बात कना छन
नारा लगौंणा छन
महिला दिवस मनौणा छन।
कज्यण्यों का नौं का
नारा कज्यण्यों का नौ का
लगौंण छन अर
उल्लु अपणु सीधु कना छन
अर सुद्दि हमुथैं ब्यळमौंणा छन।
लाटी जरा सोचिदि
जौं मर्दों थैं सत्ता अर समाज म
परिवार अर गृहस्थि म
अपणु हत्थ मत्था धनौं कि
आदत पोडिगे
अपणि बात मनौणा आदत पोडिगे
तौंन हम जनन्यौं कि बात
किलै अर कनम सुणण?
तौंन हमुथैं अफ्फु बरौंबर हक
कनम देण।
द भुली ये महिला दिवस थैं बि
तन्नि समझी
कुछ चकडैतौं की चाल
बक्कि बातौ बबाल।
इना सूणी नि दंेदा सि हमुथैं
बरौबरा दर्जा
हमरू नि होणौं ये से क्वी हर्जा
पण
बेटि-ब्वारियों को मान-सम्मान कर्दा
अपणि सोच थैं बडि कर्दा
दामनि जना अन्याचार अर बलात्कार
कन्न वळौं थैं झट्ट मौत की सजा देंदा।
जो हम जननौं का प्रति जरसि बि जो
तौं का दिलौं म मान-सम्मान होंदु
लाटी त्वी बथौं
आये दिन बेटि ब्वारियों परैं
अत्याचार, बलात्कार, व्यभिचार
हत्या अर छेडछाड का मामला
बढणा किलै रैंदा।
दिनेश ध्यानी 8, मार्च, 2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
March 4 at 10:40am
ह्यूंद अक्वे
बरखा नि ह्वै,
रूड़ी छक्वे
पाणी नि पै।
खेती म नाज
जामु नी च
मळसु जम्यू
पुंगड्यू बीच।
ह्युंद - ह्युवाळ
साग न पात
अन्ना दाणी
काण न मास।
दिनेश ध्यानी ४/३/१६

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी
आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी
बस मि बची और मेरो पहाड़ जी
रैग्या ना क्वी बल अब यख बाकी
मि ही याखुली खड़्यूं एक बीर जी
सुबेर भ्तेक की ब्याखोनी व्हैगे
आच ,भौल को व्हैगे परबात जी
नि आई नि आई क्वी जै परती कि
देख दे मि थे ऊ एक सुर बीर जी
जैल अपरी बोई जल्मभूमि को
कभी ना भूली हुलु वैल उपकार जी
वो हीच च बावनगढ़ों को सचो सपूत
ये मेरो उत्तराखंड पहाड़ को जी
जो बी पड़लु मेरी रचना
वैथे देके जालु अपरो यखलु पहाड़ जी
ऊ झट दौड़ी दौड़ी की आलो और्री
सम्भल ले लो अपरा रीती रिवाज जी
आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रूप की तू ख्ज्यानी छे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
तू भली देखेनि भाग्यानि रे
तू छे ऊ डाली का फूल .... २
जो बल बारा मैना फूलालि रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
दंत पंक्ति ये उजाळि छे
कन हुली आँखि तै खोज्याली रे
रातों का ऊ गैणों का माळा
देकि ते कया बचणा हुला
रूप की तू ख्ज्यानी छे
में ना पूछ सब तेथे खोजणा छ्या
तेरा रूपा का सब दीवाणा रे
बौल्या बने की मि पुछनि छे तू
तेरो ठौर तेरो कख छ ठिकाणों रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
बारा मैनो की बारा ऋतू छे तू
सोलहा दिसा मां अब तेरो ठिकाणों रे
अंदि जांदी मेर ये स्वास थे तू बोल्दे
कै बाटा कै घार तिल आच जणू रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
ऐग्याई दीदी भूली भूलों बोई की फिर याद मेरो पहाड़
बोई पैठा दे मिथे लेणा कुन झट रैबार
भेजी दे भुला थे जल्द तू म्यारो सौरास
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
दे दे ऊं थे तू मेरो बाडोली मेरो पियार मेरो पहाड़
कन लगणू ये दूर भ्तेक लाल लाल मेरो पहाड़
देक णा कुन तू ऐजा ऐबारी तू मेरो घोर सौंसर
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
रंगमत व्हैकि ऐग्याई बसंत मेरो पहाड़
ढोल दामो की अब छै जाली अब गोँ गोँ ब्यार
सुर्ख लाल ग्लोडी मा देकिले प्रेमा की उल्ल्यार
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
इनि खिल्दा रयां ये बुरांस हर बरसी मेरो पहाड़
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सबी कुच हुँदु च यख रे
सबी कुच हुँदु च यख रे
तू किलै की रुंदु च यख
तेरो कया गाई तेन कया लाई
सबी कुच हुँदु च यख ......
रैगे तू बस अपरा दुःख मा
रैगे तू बस अपरा सुख मा
आंसूं हैंसी को भेद फंसी बीच मां
सबी कुच हुँदु च यख ......
देखणाकुन आँखा दिया छन
सोचणाकुन खोज्नाकुन को बुधि रे
कया देखणा सोचणा कया खोज्ना छन तुम
सबी कुच हुँदु च यख ......
सुदी सुदी ग्याई सुदी बोल द्याई
बोल्ण पैल तिल तीळ मात्र बिचारा ना काई
तेरो मनु जन्म इनि ही सुदी ग्याई
सबी कुच हुँदु च यख ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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कुच रैग्याई
कुच रैग्याई मेरो दगडी
कुच रैग्याई हुलू तेरो दगडी
तेरो मेरो करदा करदा
कुच बी नि राई दगडी मेरो तेरो
कुच रैग्याई ................
बथों दगडी बहणी रे वा
गद्नि दगडी सरणी रे वा
कैल समै पाई हुलू वैथे
सब कुच गमैकि तबै समझ आई मिथे
कुच रैग्याई ................
ना अपरा दगड मा राई वा
ना गैर दगड मा बी राई वा
सब कुच छै बल मेरो भितर ई
मेरो जिबान गै गैर को भितर देकिक़ी
कुच रैग्याई ................
मि बी ना बदली तू बी ना बदली
बदल गै सारो जग परी जग ना बदली
देखणा को बस फर्क च मेरो तेरो
माया ने माया दगडी बांधिले रे तेथे मिथे
कुच रैग्याई ................
बालकृष्ण डी ध्यानी
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‪#‎हिमालय‬ बचेगा तो
जीवन बचेगा
मानव का जीवन
फूलों सा खिलेगा
धडकन है तेरी
हिमालय हे मानव
धडकन को रुकने से
बचा ले तु मानव
हिमालय रहेगा तो
खुशहाली होगी
नदियां बहेंगी तो
हरियाली होगी
चारों ओर आलम
खुशियों का होगा
श्वेत चादर ओढे
जब हिमालय होगा
बचा ले तु मानव
हिमालय को अपने
स्वर्ग यैसा फिर
कहीं ना मिलेगा
हिमालय बचेगा तो
जीवन........
सर्वाधिकार सुरक्षित @लेख..सुदेश भट्ट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

संस्कृति वू बांध चा
ज्यु दिखेणा किहि रैगी
गढ़वाली कुमायूँनी मेकप रैगी
भित्र त वा देसी रैगी
इन्नी हाल राला
लोक भाषा संस्कृति
ज्यु अभी हर परिवार मा
एक या द्वी आदिम मा टीकी चा
द्वी दसक तक भि हिट पाली
कुजाणि भै
वर्तमान हाल देखी इन्नी लगणु
बौद्धिक बौगदरा पढ़या लिख्या लुग
जाग जा निथर स्या
संस्कृति बांध
दिखणा कि भि नि राली ।......शैलेन्द्र जोशी