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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्डी श्रेया घोषाल दीपा पंत जी मीठी सुरीली आवाज का मैं जबरदस्त फेन हु उनको समर्पित एक रचना उत्तरखण्ड इस बेटी को
मिसरी सी बाच
मीठी मीठी
गीत सरस सुरिले उनके
जैसे हवाओ ने बजायी बांसुरी
नदियों ने दिया संगीत
और तान छेड़ दी
सुरीली उन्होने
मिसरी बाच मीठी मीठी
सुरीली सरस उनकी । शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

महिला दिवस!
बल
हे दिदी!
तिन बि सूण अमणि
कज्यण्यों को दिन च।
सैर्या दुन्य म
धै लगणीं छन
ताळि बजयेणि छन
रैलि अर गीत गौंणा छन
यनु लगणौं छ कि अब
सब्बि कज्यण्यौं कु
भलु ह्वै जालु
तौं थैं संसद म
तेतीस प्रतिशत आरक्षण
बि मीलि जालु।
छेड-छाड अर बलात्कारौं से
निरभग्यों थैं निजात मीलि जालु।
घर- गौं, खेति-पाति म
मर्द बि अब कज्यण्यों का दगडि
काम-धाम म हाथ बंटालु।
लिंग-भेद अर
बैमनस्यता को नामौ निसा
नि रालु।
क्वी कै कि बेटि बौड्यौं थैं
बुरि नजर ल नि द्याखु
बस यन्नु लगणौं
तौं अमणि बिटि
सब्बि मर्दौं की सोच-विचार
बदलि जाला
अहा दा कनु भलु लगणौं
सच जो यि स्वीणा सच ह्वै जाला।
द भुली तु बि
लाटि कि लाटी हि रैगे
तौं का झूठा सुपिन्यों म एैगे
निरसी यनु जि होंदु त
साख्यों बिटि
सि तन्नि
हम कज्यण्यों का हक म
बात कना छन
नारा लगौंणा छन
महिला दिवस मनौणा छन।
कज्यण्यों का नौं का
नारा कज्यण्यों का नौ का
लगौंण छन अर
उल्लु अपणु सीधु कना छन
अर सुद्दि हमुथैं ब्यळमौंणा छन।
लाटी जरा सोचिदि
जौं मर्दों थैं सत्ता अर समाज म
परिवार अर गृहस्थि म
अपणु हत्थ मत्था धनौं कि
आदत पोडिगे
अपणि बात मनौणा आदत पोडिगे
तौंन हम जनन्यौं कि बात
किलै अर कनम सुणण?
तौंन हमुथैं अफ्फु बरौंबर हक
कनम देण।
द भुली ये महिला दिवस थैं बि
तन्नि समझी
कुछ चकडैतौं की चाल
बक्कि बातौ बबाल।
इना सूणी नि दंेदा सि हमुथैं
बरौबरा दर्जा
हमरू नि होणौं ये से क्वी हर्जा
पण
बेटि-ब्वारियों को मान-सम्मान कर्दा
अपणि सोच थैं बडि कर्दा
दामनि जना अन्याचार अर बलात्कार
कन्न वळौं थैं झट्ट मौत की सजा देंदा।
जो हम जननौं का प्रति जरसि बि जो
तौं का दिलौं म मान-सम्मान होंदु
लाटी त्वी बथौं
आये दिन बेटि ब्वारियों परैं
अत्याचार, बलात्कार, व्यभिचार
हत्या अर छेडछाड का मामला
बढणा किलै रैंदा।
दिनेश ध्यानी 8, मार्च, 2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani
March 4 at 10:40am
ह्यूंद अक्वे
बरखा नि ह्वै,
रूड़ी छक्वे
पाणी नि पै।
खेती म नाज
जामु नी च
मळसु जम्यू
पुंगड्यू बीच।
ह्युंद - ह्युवाळ
साग न पात
अन्ना दाणी
काण न मास।
दिनेश ध्यानी ४/३/१६

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जैवों मि जख बी
जैवों मि जख बी
रावों मि कख बी भुलो ना भुल्दी मि गढ़वाली छों
पिरिती मेरो ये गढ़वाली गीत मेरो गढ़वाली
मेरी बोली बी गढ़वाली मी पहाड़ी छों
जैवों मि जख बी .......
खै मि खै यख मा पिज्जा
पर मैसे वो चुनो को रौव्टा स्वाद भुल्दु निछ
यख सब परया छन पर मि कबी अपरो थे भुल्दु निछो
मेरो जोकोडी मां सदनी म्यारा ढोल दामो बजदीन
यख ऐकि बी ऐ परै भूमि मां मेरो दगडी गढ़वाल कामो नचदिन
जैवों मि जख बी .......
कन परित दंडीचा कन माया लगींचा
कन ऐ जीकोडी भित्र ये घुघूती की घूर घूर लगींचा
को हाक देणु व्हालु क्वी खुद लगाणु व्हालु
बोई को बोगोणा मेरा आंसूं को मिथे रोलाणु व्हालु
मिथे ये परदेश रै रै की को बोलाणो व्हालु
जैवों मि जख बी .......
ये कोना कोना संसार को मिल अब नापी लिंयां जी
जै सुख म्यारो पहाड़ों डंडा धारों मा छ्या वा कखि ना मिल्यां जी
उडों मि अब कख बी परी भुल्दी ना वा आपरी भुंई
ऐंदी रैंदी च पिछने पिछने मेरा अपरे पहाड़े की छुईं
काद्गा भलो लगदी बोलणा कुन मेरा वा दीदी भूली
जैवों मि जख बी .......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी
आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी
बस मि बची और मेरो पहाड़ जी
रैग्या ना क्वी बल अब यख बाकी
मि ही याखुली खड़्यूं एक बीर जी
सुबेर भ्तेक की ब्याखोनी व्हैगे
आच ,भौल को व्हैगे परबात जी
नि आई नि आई क्वी जै परती कि
देख दे मि थे ऊ एक सुर बीर जी
जैल अपरी बोई जल्मभूमि को
कभी ना भूली हुलु वैल उपकार जी
वो हीच च बावनगढ़ों को सचो सपूत
ये मेरो उत्तराखंड पहाड़ को जी
जो बी पड़लु मेरी रचना
वैथे देके जालु अपरो यखलु पहाड़ जी
ऊ झट दौड़ी दौड़ी की आलो और्री
सम्भल ले लो अपरा रीती रिवाज जी
आंदी जांदी सांस ऐ बोंदी .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रूप की तू ख्ज्यानी छे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
तू भली देखेनि भाग्यानि रे
तू छे ऊ डाली का फूल .... २
जो बल बारा मैना फूलालि रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
दंत पंक्ति ये उजाळि छे
कन हुली आँखि तै खोज्याली रे
रातों का ऊ गैणों का माळा
देकि ते कया बचणा हुला
रूप की तू ख्ज्यानी छे
में ना पूछ सब तेथे खोजणा छ्या
तेरा रूपा का सब दीवाणा रे
बौल्या बने की मि पुछनि छे तू
तेरो ठौर तेरो कख छ ठिकाणों रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
बारा मैनो की बारा ऋतू छे तू
सोलहा दिसा मां अब तेरो ठिकाणों रे
अंदि जांदी मेर ये स्वास थे तू बोल्दे
कै बाटा कै घार तिल आच जणू रे
रूप की तू ख्ज्यानी छे
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
ऐग्याई दीदी भूली भूलों बोई की फिर याद मेरो पहाड़
बोई पैठा दे मिथे लेणा कुन झट रैबार
भेजी दे भुला थे जल्द तू म्यारो सौरास
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
दे दे ऊं थे तू मेरो बाडोली मेरो पियार मेरो पहाड़
कन लगणू ये दूर भ्तेक लाल लाल मेरो पहाड़
देक णा कुन तू ऐजा ऐबारी तू मेरो घोर सौंसर
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
रंगमत व्हैकि ऐग्याई बसंत मेरो पहाड़
ढोल दामो की अब छै जाली अब गोँ गोँ ब्यार
सुर्ख लाल ग्लोडी मा देकिले प्रेमा की उल्ल्यार
बुरांस फूली लाल मेरो पहाड़ों मा आच... २
इनि खिल्दा रयां ये बुरांस हर बरसी मेरो पहाड़
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जीमो की बस चले हिले डुले पहाड़ों मां
जीमो की बस चले हिले डुले पहाड़ों मां
धका धक ई जीकोडी करण लगे किलै दिल्मा
एक बी टका निच मेरा सुलार का किसा मा
झक मक झक मक किलै कारण लगे वा मेरा आंखां मा
जीमो की बस चले हिले डुले पहाड़ों मां .........
यात्री छों सीट मां सिरदा ही अबै बिछे जांदो
जणू छों जणू छों तै छोड़ी की अब कख जणू
आंख्युं मा छन दड़याँ वा मेरा हजार सुप्निया
टूटी टूटी उजड़ी कि सबी का सब यखी छन पौड्यां
जीमो की बस चले हिले डुले पहाड़ों मां .........
और्री लगा देंदी जोर दीदी ज़रा हाक दे देंदी वैथे
कख ऊ जांदू जो परती की तेरा आँखा मां ऊ जबै देक देन्दु
न ईन धक धका फिर ईं जीमो की बस अब हुँदा
जबै सब दीदा भुला अपरा पहाड़े मा ही राजी कुसी हुँदा
जीमो की बस चले हिले डुले पहाड़ों मां .........
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अब मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे
मिथे मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे
देक दीदा ऊ मिथे रे धैय लगाणु लग्युं रे ... २
मिथे मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे ......
हैरी भैरी दांडी कंठी
ऊ बिगरेली ह्युं कि चलों-चांठी
ढुंगा गार ऊ देक हाक देंण लग्यां रे
मिथे ऊ मेरा अपरा पास बोलण लग्यां रे
मिथे मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे ......
कंडो धारों मा ऊ बिज्यां उकाळो
विपदा पीड़ा खैरी को सदनी मेरो पहाड़ो
हर्ची गे मेरो बालपन फिर मिथे देख्णु लग्युं रे
देक मेर सुकी तांसी मां ऊ बडुळि लगाणु लग्युं रे
मिथे मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे ......
मि त बल अब इतगा ही जण दू
वै दस डंडा परी छ मेरो गौं मुल्को
वै का ही बणा अटक्यूँ छ ये मेरो जियू परणु रे
अणु मि अणु दीदा जरा ठैर देक तैथे
मिथे मेरो पहाड़ बोलण लग्युं रे ......
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जैवों मि जख बी
जैवों मि जख बी
रावों मि कख बी भुलो ना भुल्दी मि गढ़वाली छों
पिरिती मेरो ये गढ़वाली गीत मेरो गढ़वाली
मेरी बोली बी गढ़वाली मी पहाड़ी छों
जैवों मि जख बी .......
खै मि खै यख मा पिज्जा
पर मैसे वो चुनो को रौव्टा स्वाद भुल्दु निछ
यख सब परया छन पर मि कबी अपरो थे भुल्दु निछो
मेरो जोकोडी मां सदनी म्यारा ढोल दामो बजदीन
यख ऐकि बी ऐ परै भूमि मां मेरो दगडी गढ़वाल कामो नचदिन
जैवों मि जख बी .......
कन परित दंडीचा कन माया लगींचा
कन ऐ जीकोडी भित्र ये घुघूती की घूर घूर लगींचा
को हाक देणु व्हालु क्वी खुद लगाणु व्हालु
बोई को बोगोणा मेरा आंसूं को मिथे रोलाणु व्हालु
मिथे ये परदेश रै रै की को बोलाणो व्हालु
जैवों मि जख बी .......
ये कोना कोना संसार को मिल अब नापी लिंयां जी
जै सुख म्यारो पहाड़ों डंडा धारों मा छ्या वा कखि ना मिल्यां जी
उडों मि अब कख बी परी भुल्दी ना वा आपरी भुंई
ऐंदी रैंदी च पिछने पिछने मेरा अपरे पहाड़े की छुईं
काद्गा भलो लगदी बोलणा कुन मेरा वा दीदी भूली
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