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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"तुमारा बाना"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" २९.५.२०११)
मैंन कलम हाथ मा उठाई, कल्पना मा तुमारु ख्याल आई,
कुलदेवी भगवती चन्द्रबदनी, सरस्वती जी का आशीर्वाद सी,
हे मेरी प्यारी कविताओं, मेरा मन मा तुमारा सृजन कू,
कुछ यनु ख्याल आई, कोरा कागज फर मैंन कलम घुमाई,
मेरा प्यारा पाठकु अर प्रशंसकुन, मेरु भौत उत्साह बढाई....
गढ़वाली भाषा अर पहाड़ फर कविता, मेरु रचना संसार छ,
मैं कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु", पहाड़ मेरी आस छ,
कालजई कविताओं मेरी, हरेक पर्वतजन का मन मा बसि जावा,
जनु मेरु भाव व्यक्त करयुं छ, ऊँका मन मा पहाड़ प्रेम जगावा,
मेरा मन की आस छ, पहाड़ प्रेम की प्यारी कुतग्याळि लगावा,
मेरु मन बोल्दु छ, देवभूमि उत्तराखंड तैं देखौं अनंत आकाश सी,
समस्त उत्तराखंड तैं देखौं, अपणा आँखौंन जैक बिल्कुल पास सी,
पहाड़ फर मेरी प्यारी कविताओं, मैंन "तुमारा बाना" कलम उठाई ,
प्यारा उत्तराखंडी भै बन्धों का मन मा, पहाड़ प्रेम की आस जगाई.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित, दूरभास: 09868795187)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"भक्कु लगिगी"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
सुण हे भुल्ला,पाड़ की याद औणी,
भारी बितणी छ मन मा, हबरी छ सतौणी.....
पहाड़ छोड़ी दूर परदेश, लगदु छ भारी घाम,
झबड़ताळ सी लगदि छ, पीठी मा पड़दु डाम.....
दिन रात दनका दनकी, होईं रंदि छ राड़ धाड़,
ठंडा बथौं पाणी बिना, याद औन्दु प्यारू पहाड़.....
मेरा मुल्क प्यारी जगा छन, चन्द्रबदनी, अन्जनीसैण,
होला भग्यान काफल खाणा, मेरा प्यारा भाई बैण.....
ठण्डु पाणी छोया ढुंग्यौं कू, होला मनखी पेणा,
तिबारी डिंडाळ्यौं मा, फंसोरिक होला सेणा.....
द्योरू होलु बल बदलेणु, बरखा, बथौं अर किड़कताळ,
कथगा प्यारू लगणु होलु, ठण्डु प्यारू हमारू गढ़वाळ.
मेरा दगड़्या भौत होला, कखि दूर दूर परदेश,
होला ऊ भि भभसेणा, मन जौंकु, अबरी होलु गयुं गढ़देश....
"भक्कु लगिगी" भभसेणु छौं, तरसेणु छ पापी पराण,
मन मा बस्युं प्यारू मुल्क, कनुकै वख अबरी जाण......
(सर्वाधिकार सुरक्षित, पहाड़ी फोरम, मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित)
दिनांक: २७.५.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हमारा मुल्क"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
जख प्यारी डांडी कांठी, छोयों कू ठण्डु पाणी,
मन मा बस्युं सब्यौं का, अर तर्सेंदु छ पराणी.
बांज बुरांस का बण छन, हैंसदा डाळ्यौं मा फूल,
सेरा पुंगड़ा प्यारी घाटी, माधो का मलेथा कूल.
ढुंगा प्यारा पौड़ पाखा, धौळ्यौं कू बगदु पाणी,
खैणा, तिमला, काफळ, हिंसर, अर सब्बि धाणी.
कोदु, झंगोरू, दाळ, गौथ, तोमड़ी, चचेंडी, कंडाळी,
कौंताळ मचौंदा छोरा छारा, मारदा छन फाळी.
बणु मा गोरु बाखरा, जख ग्वैर बजौंदा बाँसुळी,
बेटी ब्वारी गीत लगौंदी, हाथ मा घास की पूळी.
गौं गौं मा मंडाण लगदा, कुल देवतौं तैं मनौंदा,
संकट मा रगछा कनि, ऊँ मन की बात बतौंदा.
अब मोळ माटु होण लगि, हे प्यारा मुल्क हमारा,
विकास की झबड़ताळ सी, पिथेणा ऊ पहाड़ प्यारा.
(सर्वाधिकार सुरक्षित, पहाड़ी फोरम, मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित)
दिनांक: २६.५.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुदरत की आवाज
वर्षातों में सारी नदियाॅं, बडे़ वेग से बहती हैं
तूफानों के उफानो को वशुन्धरा ही सहती है
उजड़ गया है चमन, प्रकृति मौन सदा से रहती है
परिभांषा में, भूकम्पों की , धरती सब कुछ कहती हैे
सूखी नदियाॅं,बंजर धरती, अभी से मातम मना रही हैं
ये विकाश की परिभांषा विध्वंस पथों को बना रही है
नियम ऋतु के बदल रहें हैं आकालों की अभिलाशा में
मूरख मानवता जीती है, आशा, तृष्णा की भांषा में
जंगल काटो, पानी बाॅंटो, अव्वल दोयम धरती छाॅंटो
खनिजसम्पदा के पोषण से,धरती के रग रग को चाटो
प्रहरी के प्रहारों से सोन्दर्य धरा का खोता है
मौसम भी तो धरती की मुर्दा लाशों को ढोता है
कंहा गयी वो शर्दी, गर्मी, बर्षातों की फुहर छटा
कंहा गयी वो मेघों के , गर्जाने वाली श्याम घटा
कंहा गयी वो तितली,चिडियाँ,कंहा गयी वो सुमन लटा
वो बसन्त भी कंहा गया, द्रुम की डालों का पीत पटा
क्षत, विक्षत मानवता के शव, मृत शैया पर लेट गये
आकाल,प्रलय प्रलापों से, बे-समय मौत की भेंट गये
इस कुदरत के संवेदन में, ये दीन दशा जब होती है
तब-तब भूत, पिचासों के मानव को धरती ढोती हैे
सूनामी,ये हुद-हुद है,कंही प्रलय प्रताप प्रकट खुद है
देख नजारा कुदरत का, ये संकट भी तो अदभुत है
नंगे - भूखे ही मरते हैं, कुदरत की कर्कस आहों से
परिवर्तित होता है मौसम, मानव के मरे गुनाहों से
अस्तित्व बचाना है अपना, संसाधन में घटतोल करो
जंगल और जमीनों में,ना कुदरत से कल्लोल करो
श्रृंगार करो फिर से माॅं का अस्तित्व धरा में लाने को
मैं आग लगाने बैठा हूॅं , चिन्गारी से समझाने को ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कबी आल दीदों यी
दिन बचपन क बौडी की
खुद लगंणी आज दगड्यों
आम की डल डाल्युं की
दिन भर डबखा डबखी
बड की बडुल्युं मा
झूला खिल्दा छा जब दगड्यों
डल डल्युं की लुर्युं मा
बसकल्या गाड गदन्या
जांण ढंडियुं नयांण कु
डबखा डबखी रैंदी छैयी
तिमला खैंण खांण कु
कुर्चे पतडे हर्ची गेन
दिन म्यार बचपन
खुज्यांणु छौं युं नन तिनों मा
अपणु मी बचपन
कब आल दीदों यी
दिन बचपन क बौडी की
खुद लगंणी आज दगड्यों
आम की डल डाल्यूं....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लौंकदी कुयडी मा
हैरी भरी डांड्यूं मा
झर्र झुरेगे मेरु परांण
गदन्युं कु सुंस्याट मा
मैत की मी खुद लैगे
पुंगड्यूं की धांण मा
भै बैंण्युं की याद यैगे
लौंकदी कुयडी मा
गाड की कुयडी मांजी
पौंछी गे यख धार मा
जिकुडी उदास मेरी
लौंकदी कुयडी मा
घनघोर कुयडी लगीं
दिखेंणी नी मैत की धार
बसकल्या रुण झूंण मांजी
खुद लगीं कुयडी मा
लौंकदी कुयडी मा
हैरी भरी डांड्यू....
मेरी सबी दीदी भूल्यूं तै समर्पित या खुदेड रचना सर्वाधिकार @सुदेश भट्ट दगड्या

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे मां त्वै बिना
जिकुडी हुंयी उदास च
घुंड घुंड बरफ मा बुये
ड्यूटी लगीं लद्दाख च
ह्यूं पड्युं सरा यख
ऊंची नीसी डांड्युं मा
तेरी खुद लगदी मांजी
मीतै रात की ड्यूटी मा
जडु हुयुं भारी यख
छौं मी रात की ड्यूटी मा
बरफ गलै की मांजी
पींणु छौं यख पांणी हां
बंकरों मा ड्यूटी कबी
जांदु छौं पेटरोलिंग मा
देश क खातिर मांजी
बरखा ओर बत्वांण्युं मा
हे मां त्वै बिना
जिकुडी हुयीं उदास.....
सीमा पर तैनात देश क सिपयुं तै समर्पित सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भट्ट "दगड्या

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रंगीलो उल्यारु दीदों
रोंत्यालु पहाड हो
बांजी तिबरी डिंड्याल्युं मे
फिर से पुरंणी बहार हो
पांणी मे पंद्यरों कु
बंठो कु खमणाट हो
दीदी भूली घसेर्युं की
फिर से वही लंगार हो
घस्यांद बल्दु की
घंडुल्यु की ताल हो
जौल मा बैठंण कु दीदों
नन तिनों मा रगर्याट हो
बिसक्यां गाड गदन्यों मा
फिर से सुंस्याट हो
लौंकदी कुयडी मा दीदों
दीदी भूली लगीं मैत क बाट हो
रंगीलो उल्यारु दीदों
रौंत्यालु पहाड......
सर्वाधिकार सुरक्षित @लेख सुदेश भट्ट "दगडया"8860087884

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैट्रो क कुरच्याट मा
गाड्यूं कु पुंप्याट मा
रगाबगी हुंयी दीदों
दिल्ली क रगर्याट मा
अपुंण पर्या कुई नी यख
रुप्यों की बस माया च
घामु मा छौं लरक तरक
दिल्ली का फूटपाथों मा
डबखा डबखी रोज दीदों
नौकरी खुज्यांणु छौं
पेट क खातिर दीदों
गाली सेठुक खांणु छौं
औल पौली छोडी कुडी
बांजी कैकी यैग्यों मी
बांजी तिबरी डिंड्याल्युं की
खुद लगीं यी दिल्ली मा
मैट्रो कु कुरच्याट मा
गाड्यूं क पुंप्याट ......
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भट्ट "दगडया"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिम कार्बेट में .....
कुड़
पोथा ! भले मूँ
खन्योर है गियूँ मगर
म्यार् हाड़ - कणिंकन् में
आजि ले तात भयी .....
तु नि समझनै त
आफि रुँछ
बखत् छ ......
पलटण् में देर जि लागैं
क्वे दुहौर् आल
जै कैं
करयाड़ि में
सिन्टई जसि
मुनि टिप ल्ही रयी
तिमुल 'क बोट
तेरि , मेरि और
वीक ले काथ् सुणै द्योल
पुर बखाई ' क
हिसाब और किताब ले
बतैै द्योल् .....
तब
यो पक्क जाँण् कि
त्यार् नौव जास्
डबडबाई आँखन् में
चानेर एक नि रौ । ज्ञान पंत
खन्योर् ... खंडहर , हाड़ कणिंक .... हड्डी पसली , तात ..... प्राण , करयाड़ि ... घर का पिछवाड़ा