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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हे निहोण्यां निखाण्यां"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
कथगा ज्वान ह्वैगें तू,
अब कै सनै पछाण्नि भि नि छैं,
बोल दौं कू छौं मैं?
हे बाबा! कथगा लम्बा लटुला छन तेरा,
क्या छैं तू बण्युं?
देशी न पाड़ी,
हे कनि मति मरि तेरी,
कबरी अयैं तू परदेश बिटि घौर?
ब्याळि आया हूँ मैं बौडी,
मेरा पराण भौत खुदे रहा था,
ब्वै बाब की भौत याद आ रही थी,
अर बौडी तेरी भी.....
हट्ट.."हे निहोण्यां निखाण्यां",
क्या हिंदी फूक रहा है मेरा दगड़ा,
मैकु त अपणि बोली भाषा,
भौत प्यारी लग्दि छ.......
चल, मेरी कोदा की रोठी,
अर पळिंगा की भूजि बणैयीं छ,
खैली हे चुचा तू......
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १८.१०.११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"अंग्वाळ"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
मारदा छन मनखि,
अपणौ़ फर, दगड़्यौं फर,
डाळा फर,
भौत दिनु बिटि बिगळ्याँ,
अर घर बौड़्याँ,
प्यारा दगड़्या, लंगि संगि फर....
उत्तराखंड हिमालय,
डाँडी-काँठी भि मारदि छन,
अफुमा, देखि होलि आपन,
जब जाँदा होला,
देवभूमि-जन्मभूमि,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ.....
अपणि संस्कृति फर,
प्यारी बोली भाषा फर भि,
मारीं चैन्दी,
हे चुचौं, बल "अंग्वाळ",
जू प्यार कू प्रतीत छ.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित, १४.१०.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"मलेथा"
माधो सिंह भण्डारी जी की,
जन्मभूमि-कर्मभूमि,
पवित्र माटी प्यारे गाँव की,
होगी उन्होनें चूमी......
कूल बनाकर किया सृंगार,
माधो जी ने तेरा मलेथा,
दिया बलिदान प्रिय पुत्र का,
हृदय उनका क्रूर नहीं था....
बिन पानी के खेत थे,
पीने को नहीं था पानी,
दर्द दूर किया सदा के लिए,
मलेथा तुझे दी जवानी.....
आज आम के बगीचे हैं,
सजती लहसुन प्याज की क्यारी,
मलेथा तेरी कूल बनाकर,
अमर आज माधो सिंह भण्डारी......
महान त्याग माधो जी का,
जो दिया पुत्र का बलिदान,
धन्य है जन्मभूमि मलेथा,
माधो जी उत्तराखंड की शान........
दिनांक: ८.११.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"भुला कख छ तेरू गौं"
रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
पूछा दौं वे सनै,
जैन पहाड़ छोड़्यालि,
बोललु ऊ, पूछ्लु ऊ,
हिंदी मा,
क्या मतलब छ तेरु?
द बोला, कनु कसूर करि,
क्यौकु पूछि होलु,
मैन त सोचि थौ,
बतालु गर्व सी,
अपणा प्यारा गौं कू नौं....
क्या बोन्न! खौळेग्यौं,
अफुमा, चुप्प चाणिक,
पर मैकु त भलु लगदु,
जब क्वी पूछ्दु ,
"भुला कख छ तेरू गौं"...
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित, दिनांक: १२.१०.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"पहाड़"
पर्वजनों का प्यारा,

जहाँ देवताओं का वास,
पर्वतराज हिमालय जहाँ,
शिव शंकर जी का कैलास....

सीना ताने सदा खड़े,
चूम रहे अनंत आकाश,
सन्देश उनका पर्वतजन को,
कभी न होना निराश.....

वीर भडों की जन्मभूमि,
जहाँ प्रकृति का सृंगार,
झूमते हैं मद मस्त होकर,
बांज, बुरांश और देवदार....

चार धाम प्रसिद्ध हैं,
जहाँ पवित्र हैं पंच प्रयाग,
पंच बद्री-केदार हैं,
हे! पर्वतजन तू जाग.....

गंगा-यमुना का मायका,
पवित्र है जिनका जल,
बहती हैं सागर की ओर,
नीर हैं जिनका निर्मल......

हे! पहाड़ सौंदर्य तेरा,
निहार हर्षित होता कविमन,
अनुभूति कवि "जिज्ञासु" की,
धन्य है तू, हे! पर्वतजन......

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: ९.११.२०११
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड.
निवास: दिल्ली प्रवास
दूरभाष: ०९८६८७९५१८७
मित्र वेदप्रकाश भट्ट जी के अनुरोध पर उनकी सांस्कृतिक पत्रिका के लिए रचित.
E-mail: vedprakash1976@yahoo.co.in

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हे! गौं का प्रधान"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
गौं कु तू विकास कर,
तू छैं गौं की शान,
बल गौं विकास की कल्पना,
सच मा छ महान.....
पैंसा देणी द्वी हाथुन,
उत्तराखंड की सरकार,
जन्मभूमि की सेवा कर,
अर कर तू सृंगार.....
गौं का बण बूट कू,
गौं का बाटा घाटौं कू,
बचौण कू कर प्रयास,
गौं का पाणी, धारौं कू,
कर विकास, कर विकास.....
"हे! गौं का प्रधान"
तू छैं गौं की शान........

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नहीं भूलेगा पहाड़
गांधी जी के देश में,
उनके जन्मदिन पर,
गंगा, यमुना के मैत्यौं पर,
अमानवीय अत्याचारों का प्रहार,
अत्याचारियौं द्वारा,
कभी नहीं भूलेगा पहाड़,
२,अक्तूबर,१९९४ को,
व्यथित पर्वतजन,
जिनका होता है, सीधा मन,
बद्रीविशाल जी अत्याचारियौं को,
सजा जरूर देंगे......

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
३.१०.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"जोंखा"
(कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
जौंकू हमारा उत्तराखण्ड मा,
भारी मान सम्मान छ,
सच मा बोला,
मर्द की शान छन,
ललकार भी करदा छन लोग,
छन बे त्वे फर जोंखा,
पर क्या बोन्न?
बग्त बल बलवान होंदु,
जोंखा वाळा भी कबरी,
जैका सामणी नतमस्तक ह्वैक,
लाचार सी ह्वै जाँदा छन.

पर जोंखा वाळा की खोज,
बग्त औण फर जरूर होन्दि छ,
किलैकि ऊं फर लोग थोड़ा भौत,
भरौंसू करदा छन,
सामाजिक अर,
राजनितिक दृष्टि सी भी,
ज्व भलि बात छ,
हे! बद्रीविशाल जी,
उत्तराखण्ड कू कल्याण हो.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १३.९.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"पर्वतजन और हिमालय"
रिश्ता कायम रहे, हिमालय अमर रहे,
गंगा यमुना का मैत, शिव शंकर का प्यारा,
जहाँ से निकलती हैं, इनकी अविरल धारा,
जनजीवन का अस्तित्व, सुखमय जीवन हमारा,
हिमालय तुम महान हो, निहार-निहार खुश होता,
पर्वतजन प्यारा,
"पर्वतजन और हिमालय" का रिश्ता,
कायम है अतीत से, चिंता उसे है आपकी,
हे हिमालय.....अस्तित्व कायम रहे तुम्हारा.....
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
E-Mail: j_jayara@yahoo.com 7.9.2011( सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(द्वी बुंद दारू)
द्वारा/रचित/ जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
पिलै देवा मैकु, भलु होलु तुमारु,
बोन्न लग्युं छौं, बात यनि छ,
कपाळि मा आज, मेरा होयुं छ,
कुजाणि किलै, भारी मुंडारू........
क्या बोन्न लठ्याळौं,
मिलि जांदी मैकु, पैला फूल की,
पहाड़ की प्यारी, जैंकु बोल्दा छन,
जौनसार अर हमारा मुल्क की,
कच्ची-कच्ची दारू........
कवि मन मा प्यारू, पहाड़ बस्युं छ,
"द्वी बुंद दारू" का खोज,
कवि "जिज्ञासु" कू मन,
वे पहाड़ गयुं छ,
क्या बोन्न तुमारा बिन भी,
भारी उदास होयुं छ.........
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित ६.९.२०११)