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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चकबन्दी आंदोलन.....


गरीब क्रांति का रुप मा,
पहाड़ की समृद्धि का खातिर,
करि सकदु चमत्कार,
पहाड़ का घर गौं की,
खुशहाली का खातिर,
जैकी छ दरकार......


चकबंदी आंदोलन,
एक जन आंदोलन छ,
जू होयुं चैंदु साकार,
आंदोलन की आवाज,
सुण्नि छ सरकार....


स्वैच्छिक अर कानूनी तौर फर,
पहाड़ का मनखि करि सकदा,
चकबंदी कू सुपिनु साकार,
खेत, खल्याण की तरक्की हो,
बणि सक्दु विकास कू आधार...


सब्बि पुंगड़ा एक जगा होन,
तब हो तौंकु श्रृंगार,
गरीब क्रांति फलिभूत हो,
बणु बिकास कू आधार....


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
दिनांक 24.2.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड का गौं....



आज बिन मनख्यौं का,
सुनसान होणा देखा दौं,
हेरिक दिल मा दर्द होन्दु,
हम हि देणा छौं घौ.....


कथ्गा खुशी थै वे दिन,
जब बणि थौ राज्य हमारु,
खेत, खल्याण, घर, गौं की,
होणि खाणी फर थौ सारु.....


तै दिन बिटि होणु छ,
मैदान कू अति विकास,
पहाड़ आज खौळ्युं छ,
मरिगी वेकी आस.......


प्रतिनिधित्व पहाड़ कू,
ये प्रकार सी कम होणु,
पहाड़ पलायन की मार सी,
दिन दिन दुखी ह्वै रोणु.....


मन मा भारी आस थै,
फललि फूललि संस्कृति हमारी,
गौं गौं मा विकास होलु,
प्रवास नि होलि लाचारी.....


कब होन्दा खान्दा होला,
उत्तराखण्ड का प्यारा गौं,
ज्यु करदु प्रवास त्यागिक,
अपणा प्यारा गौं जौं.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 24.2.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़....


हम्तैं ज्यु पराण सी प्यारु छ,
यीं दुन्यां मा न्यारु छ,
हृदय सी अथाह प्यार करा,
जल्म स्थान हमारु छ.....


दिखेण मा बड़ा भारी,
लौंफेन्दा छन आगास,
ऊब उठण की प्रेरणा देन्दा,
जगौन्दा हमारा मन मा आस.....


पहाड़ का मनख्यौंन,
पहाड़ सी प्रेरणा पाई,
प्रगति करि अग्नै बढ़िक,
पहाड़ कू मान बढ़ाई.....


आज बग्त की बात छ,
हमारु पहाड़ होयुं ऊदास,
बंजेणा छन कूड़ा पुंगड़ा,
टूटणि छ वेकी आस......


मनख्यौं पहाड़ कू दर्द बिंगा,
पोंजा आज वेका आंसू,
भौत पछतैल्या एक दिन,
पहाड़ होणु छ क्वांसु.....


पहाड़ जब कौंप्दु छ,
ह्वै जान्दु तब बिकराळ,
याद करा कनि आपदा औन्दिन,
हमारा कुमाऊं अर गढ़वाळ.....

जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासू'

ग्राम: बागी नौसा, पट्टी.चंद्रवदनी,
टिहरी गढ़वाळ, उत्तराखण्ड।
दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गुमखाळ......



ऊंचि धार ऐंच छ,
जख होंदु बथौं कू फफराट,
जू मनखि वख रंदन,
ऊंका छन भला ठाट.....


गुमखाळ सी पैलि,
दिखेन्दि छ कुळैंयौं की लंगट्यार,
मन भारी रंगमतु होन्दु तौं देखिक,
देन्दि छन अथाह प्यार....


रौंस सी लग्दि भारी,
जब पार करदा छौं हम ऊकाळ,
दूर बिटि अति प्यारु लग्दु,
धार मा बस्युं गुमखाळ.......


चौदह फरवरी 2016 कू गयौं,
मैं, श्री सुनील नेगी, श्री विनोद नौंटियाळ,
हम्तैं दूर बिटि देखिक हैंसणु थौ,
रौंत्याळु प्यारु गुमखाळ.....


अहसास होणु थौं हम्तैं,
स्वर्ग सी भी सुंदर छ पहाड़,
गुमखाळ की डांड्यौं मा,
चौदिशु दिखेणा जंगळ झाड़....


जब लौटिक दिल्ली जथैं अयौं,
मन होणु थौ भारी ऊदास,
सोचण लग्यां था मन मा,
गुमखाळ कब औला तेरा पास......


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
गुमखाळ फर मेरा कविमन कू कबलाट,
दिनांक 14.2.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(बाग,रीक्क, बांदर अर सुंगर)
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु)
हे राम! क्या बोन्न तब?
आज हमारा उत्तराखंड मा,
यूंकू राज होयुं छ.....

बाग कुजाणि घर बण फुंड,
क्यौकु डुक्कन्न लग्यां छन,
खौंबाग भी होयां छन,
गौं फुंड जू मनखि रयां छन,
डन्न लग्युं छ ऊंकू मन....

कूड़ा की पठाळ,
बांदर हलकौणा छन,
चौक मा लगिं चचेंन्डी,
काखड़ी,मुंगरी दनकौणा छन...

रीक्क बण बूट मा,
मनख्यौं बग्दौणा छन,
हॉस्पिटल मा लोग तब,
इलाज का खातिर औणा छन.....

सुंगर आबाद अर बांजा पुंगडौं,
लोट पोट ह्वैक, उत्पात कन्ना छन,
क्या बोण, क्या लौण फसल पात?
बल हताश होयां छन,
नेतौं की बात क्या बोन्न,
ऊ बिना बोयां लौण लग्यां छन....
(सर्वाधिकार सुरक्षित अवं प्रकाशित २९.१२.२०११)
www.pahariforum.net
Posted by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" at 10:46 PM No comments:
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"पहाड़ की पोथली"
जू करदि छन चुंच्याट,
दिन भर डाळ्यौं मा बैठिक,
फुर्र यथैं वथैं उड़ी उड़िक,
जान्दी छन झपन्याळि डाळ्यौं मा,
जन भीमळ, खड़ीक, बांज, बुरांश की,
अर पैदा करदि छन,
चुंच्याट मचैक मनभावन,
कर्ण प्रिय गीत संगीत.......

पहाड़ की की प्यारी घुघती,
जब घुरान्दी छ,
तब खुदेड़ भौत खुदेन्दा छन,
पोथली अर इंसान कू रिश्ता,
कथगा मार्मिक छ,
पोथल्यौं का प्रति प्रेम करा,
दगड़्या छन हमारी,
"पहाड़ की पोथली"......
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी-चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २८.१२.२०११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"ढाक के वही तीन पात"
सोचा था ऊजाला होगा,
खुशहाल होंगे खेत खलिहान,
जन्म हुआ था उत्तराखंड का,
मन में था बहुत अभिमान...

आबाद नहीं बेघर हुए,
पहाड़ के लिए आज भी रात,
गावों में ख़ामोशी पसरी,
जैसी थी वैसी है बात.....

पर्वतजन मनन करो,
हमारे उत्तराखंड में अब चुनाव,
वक्त है सतर्क हो जाओ,
मूछों पर अब दे दो ताव.....

बकरी नहीं बाघ बनो,
ढंग से करो प्रतिनिधि का चुनाव,
जो सपने साकार करे,
फिर न हो, मन में पछताव.....

कवि "जिज्ञासु" दुविधा में,
देखो बहुत दुःख की बात,
पहाड़ आज खाली हो गया,
पर्वतजन है खाली हाथ,
निराश है देवभूमि भी,
उत्तराखंड बनाने के बाद,
ढाक के वही तीन पात....

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी-चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २७.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पराणु सी प्यारू पहाड़
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
हमर पहाड़, म्यर पहाड़,
हमारू पहाड़, मेरु पहाड़,
देवतौं कू प्यारू पहाड़,
ब्वै बाबू कू प्यारू पहाड़,
मन मा बस्युं प्यारू पहाड़,
पर्वतजन कू प्यारू पहाड़,
दुनिया मा न्यारू पहाड़,
जू भी बोला,
पराणु सी प्यारू पहाड़...
देवतौं कू वास जख,
बद्री-केदार जख,
शिवजी कू कैलाश जख,
गंगा माँ कू, नन्दा माँ कू,
प्यारू छ मैत जख,
मुल हैंस्दु बुरांश जख,
हिंवाळि कांठ्यौं तैं हेरी,
गर्व होन्दु छ मन मा,
जन्म-भूमि ज्व छ मेरी,
पराणु सी प्यारू पहाड़...पहाड़ का रंग प्यारा,
पय्याँ,फ्योंली अर बुरांश,
दिख्दा छन जख न्यारा,
बांज, बुरांश, देवदार, कैल,
कुळैं की डाळी कू छैल,
जख धोंदी गंगा माँ,
मनख्यौं का तन मन कू मैल,
सदानि जुगराजि रान,
पराणु सी प्यारू पहाड़...(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २७.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"चिठ्ठी वींका नौं"
(जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
मैं यख राजि ख़ुशी छौं,
तू तख होलि,
मेरा नौना नौनी का दगड़ा,
यानि प्यारा बाल बच्चों दगड़ि...

तू लिखणी छैं, सैडा गौं की ब्वारी,
बाल बच्चों समेत प्रदेश चलिग्यन,
गौं छोड़िक, अपणा ऊं दगड़ि,
अबरी दां जब मैं घौर औलु,
त्वे भी ल्ह्यौलु अपणा दगड़ा,
तू जग्वाळ मा रै, निराश न ह्वै....

प्यारी ब्वै कू क्या होलु?
ब्वैन त बोन्न,
मैं नि औन्दु तुमारा दगड़ा,
मेरु त ज्यू नि लगदु,
परदेश मा, भक्कु भी भौत लगदु,
अपणा ज्युन्दा ज्यू,
नि छोड़ी सकदु घर बार,
प्यारू मुल्क, प्यारा मैत जनु....

तू निराश न ह्वै, जग्वाळ मा रै,
मेरु भी मन नि लगदु यख,
अब घर गौं त छोडण ही पड़लु,
या बग्त की बात छ......
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २३.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"कथगा दिनु मा मिल्यौं आज"
(जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
मेरु बचपन कू एक दगड्या,
अपणा प्यारा मुल्क पहाड़ मा,
चन्द्रबदनी मंदिर का मेळा मा,
ऊँचि धार ऐंच मैकु मिलि.

ऊ अर मैं,
शहर की जिंदगी सी दूर,
बेखबर खड़ा था होयां था,
ओडा का डांडा बिटि,
ठण्डु बथौं फर फर औणु थौ,
कखि दूर हैन्स्दु हिमालय,
दूध जनु सफ़ेद अर प्यारू,
बांज बुरांश कू मुल्क हमारू,
हमारा मन मा ऊलार पैदा कन्नु थौ.

बचपन की छ्वीं बात लगिन,
कख कख छन दगड्या प्यारा,
घर अर परिवार की बात,
कुतग्याळि सी लग्यन मन मा,
बित्याँ दिनु की बात याद करिक,
समय कू पता नि लगि,
कथगा देर बैठ्याँ रैग्यौं,
समय सामणि खड़ु थौ,
वैन बोलि, जवा अब घौर जवा,
मिन्न कू अब बगत ख़त्म ह्वैगी,
दगड्या अर मैं अपणा बाटा हिट्यौं,
हमारा मुख सी छुटि,
"कथगा दिनु मा मिल्यौं आज".
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २१.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"कथगा खैल्यु"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
भिन्डी त नि बोल्दौं मैं,
पर जथगा मेरा भाग मा होलु,
राळी राळिक अपणा हाथन,
बड़ा बड़ा गफ्फा मारिक,
अर सपोड़िक जरूर खौलु,
तुमारु नि खौलु, कैकु नि खौलु,
अपणा हाथुन मेहनत की खौलु...

पूछा वे सनै, जू फ़ोकट की,
लूट औताळि की, बिराणी पीठी मा,
सदानि खांदु, बेदर्द ह्वैक,
पिचास की तरौं, मनखि ह्वैक भी,
तब्बित पूछि नेगीदान,
अपणा गढ़वाली गीत का द्वारा,
हे तू "कथगा खैल्यु" हराम की,
चुचा मेहनत की खा.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २०.१२.११)