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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"वीं भग्यानन कुछ नि बोलि"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
जिंदगी मा, मैन जू भि करि,
दारू पीक दरोळु बण्यौं,
गौं की गुजारी मा, पड़्युं रयौं,
खै पीक बेहोश होयौं,
जनकैक छोरा छारा, घौर ल्हेन,
पर वीं भग्यानन कुछ नि बोलि.....

वींमा मैन झूट भि बोलि,
दुनियान मैकु झूट्टू बोलि,
पर अपणा मन की गेड़,
मैन वींमा कब्बि नि खोलि,
क्या बोन्न हे दुनिया वाळौं,
पर वीं भग्यानन कुछ नि बोलि.....

सारी जिंदगी वींका दगड़ा बिताई,
पर वींकू ख्याल कम ही आई,
जिंदगी भर दुनिया देखि,
वींका हाल फर मैकु,
तरस कब्बि नि आई,
खूब सेवा करि वींन मेरी,
क्या बोन्न कर्म मेरा यना रैन,
पर वीं भग्यानन कुछ नि बोलि.....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १९.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"कविमन की बात"
आज भी याद है मुझे,
वो दिन,
जब ढोल दमौं बजा,
मुश्क्या बाजा भी,
पौणौ की लंगट्यार लगी,
बारात सजी,
और दूल्हा बनकर,
पालकी में बैठा,
क्या तुम्हे भी याद आती है,
अपनी शादी की?
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
१४.१२.२०११

जब नहीं मिलेंगे सन्देश मेरे,
समझना दाल में कुछ काला है,
मेरे बाद आपको,
कौन कुछ बताने वाला है,
मन में तमन्ना है,
जब तक आपके बीच रहेंगे,
कविमन से कुछ तो कहेंगे,
पहाड़ और पहाड़ की संस्कृति पर,
प्यारी गढ़वाली कविताओं के द्वारा,
चाहत है कविमन में मेरी,
आपकी दुआएं मिलती रहें...
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
१४.१२.२०११
E-mail: j_jayara@yahoo.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"दस्तक"

(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
मैं छान का भितर,
सेयुं थौ फंसोरिक,
कै दगड़्यान दस्तक दिनि,
हे चुचा, क्या छैं तू आज सेयुं,
भैर देख घाम ऐगी, ऊजाळु ह्वैगी,
बौग न मार, मेरु बोल्युं सुण,
अपणा मन मा गुण,
भोळ न बोलि मैकु,
बग्त की कदर कर,
फिर बौड़िक नि आलु,
त्वैन भौत पछ्ताण,
फंसोरिक न स्यो,
मैं "दस्तक" देणु छौं आज....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १३.१२.२०११)

क्यों किया था प्यार आपने,
फिर कैसे जुदा हो गये,
इंतज़ार आज भी है मुझे,
कब मिलोगे आप,
इस धरा से जाने से पहले.
(जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु, 13.12.11)

क्या बोन्न बात उत्तराखंड का ढोल की,
वैका प्यारा बोल की,
जुग राजी रै, तू सदानि,
मेरा कविमन की कामना छ....
उत्तराखंडी भाई बंधो...
ढोल कू त्रिस्कार न करा,
ब्यो बारात मा,
ढोल की शान बढ़ावा.....
कवि: जगमोहन सिंह जयाडा "जिज्ञासु" 12.11011

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"दस्तक"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
मैं छान का भितर,
सेयुं थौ फंसोरिक,
कै दगड़्यान दस्तक दिनि,
हे चुचा, क्या छैं तू आज सेयुं,
भैर देख घाम ऐगी, ऊजाळु ह्वैगी,
बौग न मार, मेरु बोल्युं सुण,
अपणा मन मा गुण,
भोळ न बोलि मैकु,
बग्त की कदर कर,
फिर बौड़िक नि आलु,
त्वैन भौत पछ्ताण,
फंसोरिक न स्यो,
मैं "दस्तक" देणु छौं आज....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १३.१२.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हे! हम बौळ्या नि छौं"
(रचनाकार:जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
हात जोड़ै छ आपसी, प्यारा उत्तराखंडी भै बंधो,
तुम यनु नि सोच्यन, हम बौळ्या छौं.....

अपणि प्यारी बोली भाषा मा,
हमारा प्यारा गितांग भैजिन,
वे प्यारा उत्तराखंड की शुर्मा,
द्वी गति बैशाख मेळा मा बुलाई,
कुतग्याळि लगौण वाळा गीत लगैक,
हर उत्तराखंडी का मन मा,
अपणि प्यारी बोली भाषा कू प्रेम जगाई...

हमारू भि प्रयास यु हिछ,
वे प्यारा उत्तराखंड कू मान बढौला,
आज आयां छौं हम यख,
अपणि प्यारी बोली भाषा मा,
भलि भलि छ्वीं बात लगौला,
जब जब जौला मुल्क अपणा,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
घर्या घ्यू अर कंडाळि खौला.....

मान सम्मान बोली भाषा कू,
प्यारा पहाड़ की संस्कृति कू,
आवा मिलि बैठिक आज,
बिंगला अर बिंगौला.......

मुल्क हमारू कथगा प्यारू,
जख फ्योंली, बुरांश, आरू, घिंगारू,
हमारा तुमारा मन मा बस्युं,
क्या बतौण कथगा प्यारू......

हात जोड़ै छ आपसी,
क्या बतौण कवि मन छ हमारू,
यी मन का ऊमाळ कवि "जिज्ञासु" का,
तुम यनु न सोच्यन, यू बौळ्या छ....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १०.११.११ को रचित)
फरीदाबाद मा "अन्ज्वाळ" द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन का खातिर रचिं या मेरी कविता जैन्कू पठन दिनांक ११.१२.११ कू मैन मंच फर मौजूद श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी, श्री हीरा सिंह राणा जी, गणेश खुगशाल "गाणि" जी, डा. मनोज उप्रेती जी अर अन्य कवि मित्रों का समक्ष करि.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"माटु छ मनखि"
(रचनाकार:जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
जरा मन मा सोचा,
क्या सच छ?
फिर किलै अपणा मन मा,
हम तुम यनु नि सोच्दा,
एक दिन यनु आलु, जब हम तुम,
माटा मा मिलिक, माटु बणि जौला,
कुजाणि फिर यीं धरती मा,
कब माटा कू मनखि बणिक,
पुनर्जन्म धरिक औला...

सच जू भि छ मनखि कू,
पर जन्म-भूमि बोली भाषा कू,
ब्वे-बाब, नाता रिश्तों कू,
संस्कृति कू मान सम्मान करा,
अभिमान अपणा मन मा,
जिंदगी मा भला काम फर करा,
याद रखा "माटु छ मनखि".....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित ८.११.२०११ )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"पित्र हमारा देखणा छन"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
झळ-झळ पित्र कूड़ौं बिटि, गौं का न्यौड़ु,
जख भि छन,
ऊजड़दा कूड़ा, बजेंदा पुंगड़ा,
निराश घर गौं, सगोड़ा भि,
हे! हमारा तुमारा,
भौत उदास होयुं छ, बल ऊँकू मयाळु मन,
आज हाथ हमारा तुमारा,
कुछ भि निछ,
सोचि सकदौं, पर कुछ नि करि सकदौं,
च्हैक भि,
किलैकि, आज वक्त की मार छ,
पर क्या होलु, हे बद्रीविशाल जी,
हमारा उत्तराखंड कू यनु विकास हो,
हमारा हाथ सी,
भौ भल्यारी, होंणी खाणी, सब्बि धाणि,
पहाड़ कू मिजाज भलु रौ,
हम भि ख्याल रखौं, अर्थ हो अनर्थ ना,
यनु माणिक, हे! "पित्र हमारा देखणा छन".
(सर्वाधिकार सुरक्षित अवं प्रकाशित २२.११.२०११)
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
Posted by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" at 1:14 AM No comments:
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"उत्तराखंड की धरती मा"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" २४.११.११)
सुणा तुम बतौणु छौं,
उपज्युं एक बीज छौं,
मनखि छौं पहाड़ कू,
गांदू वैका गीत छौं.....

बिना बोल्यां जख बुरांश,
डाळ्यौं मा घुघती हिल्वांस,
गान्दा गीत रूमि झूमि,
वीं उत्तराखंड की धरती मा,
उपज्युं एक बीज छौं,
मनखि छौं पहाड़ कू,
गांदू वैका गीत छौं.....

अलकनन्दा भागीरथी का,
किनारा कथगा छन प्यारा,
घट्ट घुम्दा गाड मा,
वे प्यारा मुल्क हमारा,
वीं उत्तराखंड की धरती मा,
उपज्युं एक बीज छौं,
मनखि छौं पहाड़ कू,
गांदू वैका गीत छौं.....

फ्यौंलि,पय्याँ, आरू, घिंगारू,
जख ऊँचि धार बिटि दिखेंदु
उत्तराखंड हिमालय प्यारू,
पुंगड़ा, पाखा, बण बूट,
रीत रसाण, रौ रिवाज,
पौणा तैं पिठैं लगौंदा,
देवतौं कू मुल्क देवभूमि,
जख देवतौं का धाम छन,
वीं उत्तराखंड की धरती मा,
उपज्युं एक बीज छौं,
मनखि छौं पहाड़ कू,
गांदू वैका गीत छौं.....
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"उत्तराखण्ड मा रेल"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
ऋषिकेश बिटि कर्णप्रयाग तक,
चललि बल रेल,
देखा दौं कथगा सुन्दर छ,
बल यू खेल.....
ह्वै सकदु प्रवासी उत्तराखंडी,
रेल मा बैठिक, अपणा उत्तराखण्ड,
परदेश बिटि बौ़ड़िक आला,
अपणा मुल्क की सुन्दरता मा,
चार चाँद लगाला, ख़ामोशी भगाला,
घरू का बन्द द्वार मोर ऊगाड़ला,
ऊदास कूड़ी पुंगड़ि आबाद होलि,
विकास की बयार बगलि,
सुन्दर सुपिनु अर खेल छ,
अगर! यनु होलु त समझा,
"उत्तराखण्ड मा रेल",
एक भलु खेल छ.......
पर यनु भी ह्वै सकदु,
प्रवासी उत्तराखंडी बौ़ड़िक नि आला,
भैर का लोग, उत्तराखण्ड की जमीन,
कौड़ी का भाव खरीदिक,
महल बणाला, अपणा पाँव जमाला,
हे! उत्तराखंडी भै बन्धो, हमारी ठट्टा लगाला,
यनु होलु खेल, ऊँका खातिर वरदान,
"उत्तराखण्ड मा रेल", जरा सोचा.......
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १७.११.११

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"बाग़ अर रीक्क"
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
जौंकु नौ सुणिक, हे! राम,
मनखि का मन मा,
भारी डौर पैदा ह्वै जान्दि छ,
हो भी किलै ना,
होन्दा ही खतरनाक छन...
कै जमाना रुद्रप्रयाग मा,
निर्भागी मनस्वाख बागन,
कै मनखि खैन,
अजौं भी खांदा छन,
रीक्क मन्ख्यौं बगदौन्दा छन...
पर आज का जमाना मा,
मनखि "बाग़ अर रीक्क",
बण्याँ छन, होयां छन,
मन्ख्यौं का खातिर........
सोचा दौं,
क्या ईलाज छ युंकू?
मनखि ही खोजि सकदु,
जन हमारा उत्तराखंड मा,
भ्रष्ट्राचार का खातिर,
लोकायुक्त बिल पास करिक,
ईलाज कू प्रयास होणु छ.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित १५.११.२०११)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"उत्तराखंड दिवस"
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" ९.१०.११)
जै फर गर्व छ, हरेक उत्तराखंडी तैं,
हो भि किलै न, लड़ी भिड़िक लिनि,
उत्तराखण्ड राज्य, उत्तराखण्ड वासियौंन,
प्यारा प्रवासियौंन, होणी खाणी का खातिर,
पराणु सी प्यारू, दुनिया मा न्यारू,
हे! उत्तराखण्ड राज्य हमारू.....
संकल्प हो सब्यौं कू,
बोली-भाषा, संस्कृति कू सृंगार,
मन सी सदानि, उत्तराखण्ड सी प्यार,
भला काम करिक समाज कू मान,
विरासत फर होयुं चैन्दु अभिमान,
जौन दिनि बलिदान अपणु,
उत्तराखण्ड राज्य निर्माण का खातिर,
मन सी करा ऊँकू सम्मान,
देवभूमि छ हमारी जन्मभूमि,
जख विराजमान छन बद्रीविशाल,
कथगा प्यारू रंगीलो कुमाऊँ,
अर छबीलो प्यारू गढ़वाल.
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)