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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पतरोळ.....
बणु कू हि जग्वाळु निछ,
संस्कृति कू भी जग्वाळु छ,
पतरोळ की पिड़ा,
पहाड़ प्यारु हमारु छ....
उड्यार पेट सेयुं थौ,
हम्न यू देखि,
ईलै अपणि कलम सी,
बात यनि लिखि....
भौत खुश ह्वै,
हमारा औण सी,
कौथिग सी लग्युं थौ,
वेका घौर मा....
पतरोळ जिन बताई,
मेरी एक शर्त छ,
यकुलांस कू सतैयुं छौं,
तुमारु एक फर्ज छ....
ज्यु तुमारु जू भि कन्नु,
अपणा हातुन बणावा,
अफु भी खावा तुम,
मैकु भी खलावा.....
समूण समेत हम सनै,
अड़ेथण भी आई,
कथ्गा प्रेम करदु हमसि,
अहसास कराई......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 2.7.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नौ गरै....


जै मनखि का शांत होन,
खूब होन्दि खाणी बाणी,
बिफरि जान्दा जब,
तब होन्दि टोटग ऊताणि.....


देखणा होला उत्तराखंड मा,
तौंका मन की नि जाणी,
करग्यन अपणा मन की,
ह्रवैग्यन अब गाणि स्याणि....


शनि गरै की नजर त,
होन्दि छ भारी बिकामि,
भुग्तदु रै जान्दु मनखि,
मति भी ह्रवै जान्दि निकामि....


हे भगवान! कै मनखि का,
खराब नि होयां चैन्दा गरै,
तब ह्रवै जान्दि मनखि कू,
सब जगा बिटि हरै तरै....


कवि छौं, कबलाट लग्दु,
कै फर असंद छ औणि,
हे यूं नौ गरै की माया,
क्या कुदिन छ दिखौणि.......


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
ग्राम-बागी नौसा, पट्टी-चंद्रवदनी,
टिहरी गढ़वाळ(उत्तराखंड)
दूरभाष: 09654972366
दिनांक 5.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किलक्वार....


मान्न लग्यां था रात मा,
मैंन पूछि कू होला?
बतौन्दारौन बताई,
बिचारौं की आत्मा,
भटकणि छन बल,
ज्यूंदा ज्यु,
किलैकि ऊंका मन की,
नि ह्रवै सकि,
हे राम! ऊ हिछन,
किलकणा रात मा.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
दिनांक 5.4.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तड़कौन्दा छन,
बात समझ नि औणि,
देखणा होला उत्तराखंड तैं,
व्यथा छ वेकी बतौणि?


हात काटिक दिनि था तुम्न,
सी छन मौज मनौणा,
आस तुमारी मार्यालि तौन,
अपणि मवासि बणौणा.....


पाड़ कू बिकास तौन नि कन्न,
अजौं भी चेति जावा,
बजेंदा उत्तराखंड कू तुम,
हातुन भाग बणावा.......


गेर भरेणि निछन तौंकी,
दूध कतै न पिलावा,
तौंका बिस सी दूर रयन तुम,
अजौं भी बिंगि जावा.....


दुमुख्या छन गिच्ची तौंकी,
तुमतैं छन भरमौन्दा,
बंजेदा पहाड़ की छ्वीं सी,
मन सी तब बिसरौन्दा.....


वंत सी अलग दिखेन्दा,
मिलि जुलिक खांदा,
खांदि बग्त पांची आंग्ळा,
जन दगड़ा ह्रवै जांदा......


गुरौं न पाळा भला का खातिर,
तौं तैं किनारा लगावा,
पहाड़ का होनहार ज्वानु तैं,
पहाड़ की डोर थमावा......


-जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासू',
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी- चंदवदनी,टिहरी गढ़वाळ, उत्तराखंड।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सेंटुला.....



सोचणा छन,
हम पिछ्नै किलै रौं,
मूल उत्तराखंडी छौं,
राजनीति मा जौं,
उत्तराखंड़यौं का सुपिना,
सच करि जौं,
सेंटुलौं की बात फर,
यकीन होणु छ,
किलैकि पाड़ मा,
सेंटुलौं की संख्या,
अति बात छ,
मनख्यौं का बजाय,
पहाड़ का विकास की,
चाबी तौंका हात छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट,
दिनांक 29.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जल दिवस छ आज.....22.3.2016


बिना पाणी का मनखि,
ज्युंदा नि रै सकदा,
विकाराळ जब बणि जांदु,
बेमौत छन मरदा.....


पाणी प्रदूषित छ होणु,
एक दिन दुर्लभ ह्रवै जालु,
बूंद बूंद बचौण कू बग्त,
झटपट हि ऐ जालु......


चेति जावा दिन दूर निछ,
बूंद बूंद जल बचावा,
जल संकट की त्रास्दि कू,
संरक्षण करिक ऊपाय बतावा....


पाणी आज बिकणु छ,
देखा बाजार बणिगी,
जल माफिया कू बल,
पाणी फर कब्जा ह्रवेगि....


जल बिन जीवन संभव निछ,
येका खातिर युद्व भी होला,
कल्पना निछ सच्चाई छ,
आंखा कंदूड़ तुम खोला....


संकल्प लेवा मन सी,
पाणी बेकार नि बगौणु,
बिंगणा निछन मनखि आज,
पणी दिन दिन दुर्लभ होणु....


जल दिवस छ आज,
चिंता मग्न कवि जिज्ञासू,
धौळी हमारी सूखणी छन,
हिमालय का औण आंसू......


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट पाणी फर,
दिनांक 22.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता दिवस फर... 21.3.2016

कवितौं कू कौंताळ मचैयुं,
किलैकि आज बल,
कवितौं कू दिवस छ,
कवि 'जिज्ञासू' अजाण बण्युं,
जंजाळ की यीं दुन्यां मा,
काम काज मा विवश छ....

कवि शैलेन्द्र जोशी जिन,
पहाड़ बिटि बताई,
कविता दिवस छ आज,
तब मैकु ख्याल आई....

बधै हो कवि दगड़्यौं,
कल्पना मा कलम घुमावा,
कविता दिवस छ आज,
मन का भाव बतावा....

कल्पना मा डूबिक हम,
कवितौं कू जल्म करौंदा,
लग्यां रवा सृजन फर,
बित्यां दिन बौड़िक नि औन्दा....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट
दिनांक 21.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अहसास मेरु....


दिल्ली अयां मैकु,
कै साल ह्वेग्यन,
ब्वे बाब स्वर्गवासी ह्रवैन,
कूड़ी पुंगड़ि बंजेग्यन,
आवाद रखणु बस कू निछ,
नौकरी आवाद रख्णु छौं,
पर जख्या तख्खि छौं
एक दिन सोचि मन मा,
क्या मिलि मैकु?


मिलि त एक नौकरी,
दंवाळा फर सी बंध्युं छौं,
सुबेर जांदु ब्याखुनि बग्त,
जेब कतरौं सी बचिक,
घर बौड़िक औंदु,
बस की जग्वाळ मा,
जिंदगी बितौन्दु,
गाड़्यौं का भिभड़ाटमा,
मोटर सैकिल चलौण कू,
सूर सांसू नि औन्दु,
बोल्दन लोग मैकु,
आपकी नौकरी सरकारी,
तुमारी मौज छ भारी,
घुण्डु हि जाण्लु या पठठु,
कनि मौज होणि छ।


गढ़वाळि मा बोल्दन,
दिल्ली गयौं भाड़ हि झोकी,
बात सच लगणि छ,
रिटैरमेंट का कुछ साल छन,
मेरा गौं का न्यौड़ु,
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क,
योजना का तहत बण्नि छ,
सैत लौटिक जौलु,
अपणा प्यारा गौं मुल्क,
मन मा आस जगणि छ....


अहसास मेरु,
मैकु बाटु बतौणु छ,
उत्तराखंड की धरती कू,
श्रृंगार मेरा हात सी हो,
मन मा आस जगौणु छ......

18.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गुळ्न....



पुराणा जमाना मा,
हमारा पाड़ का मनखि,
जब रात होंदि थै,
द्वार फर गुळ्न लगैक,
सेन्दा था फंसोरिक,
चोर क्या,
बाग भी भिचोळिक
खोलि नि सक्दु थौ,
पट्ट ढक्यां द्वार।

सेंदि बग्त दादी जी,
सुणौन्दि थै कथा,
भूत पिचासु की,
लग्दि थै भारी डौर,
तब मन मा,
ख्याल औन्दु थौ,
द्वार फर त,
मोटी गु्ळ्न छ,
लगैयीं दादी जी की...

कबरि भैर,
भिभड़ाट होन्दु त,
गुळ्न हात मा धरिक,
भैर औन्दा था,
दाना सयाणा,
बाग घुराणु हो त,
तब गुळ्न बजौन्दा,
आवाज लगौन्दा,
इलै कि बाग,
दूर भगि जौ....

पैलवान मनखि,
गुळ्न हात मा धरिक,
जांदा था कौथिग,
किलैकि पैलि,
थौळ कौथिग मा,
मारपीट कू,
घत्त ऐ जान्दु थौ,
तब गुळ्न काम,
ऐ जान्दि थै,
जान बचौण अर,
मारपीट का खातिर....


दिनांक 2.2.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऋतु मौळ्यार....


ऐजा ऐजा यूं डांडी कांठ्यौं मा,
बानी बानी का फूल हैंसणा छन,
बुरांस हेरिक फ्यौंलि का फूल,
पिंगळा रंग मा रंग्यां छन.......


गौं फुंड गुर्याळ हैंसि हैंसिक,
अपणा रंग मा रंगौणा छन,
अयां छौं उत्तखण्ड की धरती मा,
मुल मुल हैंसि बतौणा छन.....


रैबार मौळ्यार कू सब्यौं तैं,
हे अपणा उत्तराखण्ड ऐ जवा,
डांडी कांठी रंगि छन अबरि,
अपणु माणी देखि जवा.....


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
ऋतु मौळ्यार तैं समर्पित
दिनांक 29.2.2016