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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
June 23 at 4:16pm
खाली होते गांव
खाली होते इन गांवों की
फिकर किसे है?
बंजर खेत-बीरान घरों की
चाह किस है?
भाग रहे हैं सब-अब
छोडके इन गांवों को
हम भी भागे, तुम भी भागे
जाने का अब दोष किसे दें?
कहने को सब कहते हैं
क्यों बढा पलायन
लेकिन सच में रूके पलायन
फिकर किसे है?
जिस धरती के नेता
विवेकी लोग पलायन वादी होंगे
उस धरती को बंजर होने से
आखिर कब तक रोकोगे?
धार-धार अरू गांव-गांव
अब बीराने पडे हैं
घर-आंगन खेती उदास
ब्ंजर से पडे हैं।
कौन करेगा अब फिर से
आबाद धरा को?
जब-सब के सब
आराम परस्त हैं।
पुरखौं ने क्या सोचा होगा?
किस खातिर दिन-रात
पहाडों से लडकर
इन खेतों को बनाया होगा।
अभी वक्त है शायद
हम तुम जाग सके तो
इस धरती, इस माटी को
संभाल सकेें तो।
है, सब साधन
रोटी अरू हवा पानी भी
बस मन में दृढ इच्छा हो
गांवों मे बसने की।
रोने - धाने से कब
किसके स्वपन सधे हैं?
दोषारोपण करने से कब
कष्ट मिटे हैं?
आओ फिर से ले संकल्प
गांव की सुध लेनी है
जैसा भी हो कष्ट
गांव में ही बसना है।
दिनेश ध्यानी
23, जून, 2016।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Darshan Singh
June 6 at 11:21am
सुपिणा मा गौं
ब्यालि राति म्यारु सुपिणा मा,
म्यारु गौं म्यारु मुलुक आई।
बल खुद लगणीं च दि, तु रूणू किलै छाई।।

अरे इना सूणिदी, पैलि जरा चुप ह्वैदी।
मेरी बात पर जोर से गेड बांधि देदी।।

कैदन त्यारा दाजी परदाजी यख ऐंई।
जौंल कूड़ि फुंगडी अर घाटा बाटा सजैंई।।
पैलि त उ सिरफ चार मौं ऐंई,
आज तुम चौसठ ह्वैग्योऊ।
फुंगड्यूं का खंडका देखिदी,
भलु च भंडिसि उंद चलि ग्योऊ।।

यखी रैंदा त कनुक्वै हिटदा।
सैर्या गळ्या बाटा बिगाणां रैन्दा।।
अरै त्यारा ब्वै बाबुल इलैई त पढैई।
नौकरी कैर ब्वाल अब ज्वान ह्वैगेईं।।

वैदिन जांद तू कनु रूणु छाई।
समझ वैदिनी तिल गौं छोडि द्याई।।।

अपणा बाल बच्चों म खुश रैई।
कभि कभि मैमान सि आणु जाणु रैई।।
अपणि खुद मिटै अर मिथैं भि देखि जैई।
खुश छौं मी, तु अपुणु पराण ना झुरैई।।

अपणि बोलि भाषा संस्कार ना बिसरैई।
जख भि रैलु खुश रै,अपणि पछ्याण बणैई।।

सर्वाधिकार सुरक्षित @:-
दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई"
दिनांक :-06/06/2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

झिर झिर कैकि ऐजादी
झिर झिर कैकि ऐजादी
बरखा मेरो पहाड़ों मा
ऊ आंसू को पाणी लुके देई
मेरी बोई की आंख्युं का
झिर झिर कैकि ऐजादी ....
एकान्त आलो या
या तू ये रात दिन मा
भितर को कोंना बैठी हुलि
यखुली यखुली रुनि वा
झिर झिर कैकि ऐजादी ....
खैरी पीड़ा विपदा लुकनि हुलि
विंकी हैंसदरि मुखडी का पैथर वा
म्यलदु मेरी बोई
म्यलदु विंकी मुखडी या
झिर झिर कैकि ऐजादी ....
चाल तू इन ना चमकी
सिंयी होली अब बी वा
विंकी की निंदी ना तोड़ी
कदगा बरसी भ्तेक ना सिंयी वा
झिर झिर कैकि ऐजादी ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सब बखत को फेर चा
जख बिलि नि तख मूसा नचणु
देख कन लग्युं अब ये खेल चा
सबि और्री फैल्युं इन दैल फ़ैल चा
सब बखत को फेर चा .........
खाली हाथ सुदी मुखमा नी जांदु
बल जी अब देखा सबि धानी मा
अब टक्कों कि रेल पेल चा
सब बखत को फेर चा .........
जैल नि धोई अपरो मुख,
ऊ क्या देक्लो औरों को सुख.
बल अपरा मा लग्युं सारो लेण देंण चा
सब बखत को फेर चा .........
टका न पैसा यख अब
बल जी गौं-गौं भैंसा जख तख
कन मची झुठो यो जय जय चा
सब बखत को फेर चा .........
ना लेणु कैथे एक अब
ना देणु कैथे अब द्वी
संभाली धरि ना धरि सिक अब
सब बखत को फेर चा .........
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मनखी ये तेरो मन
जिंदगी एक
कदगा सवाल लेकि आंदि
विंका जवाब खोजदा खोजदा
उमरी सबै गुजरी जांदि
कदगा अयां कदगा गयां
क्वी नि वैकु हिसाब
पूछी ले एक से भी
मिली ना विंको कैथे जवाब
मिथै लगनू इन अब त
व्हैग्याई सबी को खाना खराब
पी पी की ईं तिस नि बुझनी
कन लगि हुलि इन प्यास
ब्योखनी को सिलू घाम
कै बाटो व्हैलू जानू
रति पिछने सुबेर आंदु
ये बता मा छे कदगा दम
झुठो च ये संसार
कैल नि पायी यख पार
ब्यर्थ ही फिरनु रैंदु रे
मनखी ये तेरो मन
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किलै की तू
जिंदगी तू किलै बीच मा ऐजांदी
कबै हसोंदी तू कबै किलै मि रोलोंदी
जीना चांदो क्वी वै थे तू मार देंदी
मरनो चांदो जो वैथे किलै तू बच्चोंदी
बता तू किलै समझ मा नि ओंदी
किलै मीथे यकुली कैकि तू भूल जांदी
इतगा दूर तू किलै सुर बौडी जांदी
खुद अपरा पिछने किलै कि तू छोड़ देंदी
मरणा पैल किलै तू मिथे नि बथो देंदी
ये बेल मा जीनू किलै नि तू सिखै जांदी
अपरो भरोस किलै तू नि दे जांदी
झट आंदी पास मेरो फुर्र तू उडी जांदी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सादर आप सबना सामणी
---भाषाकि-पुकार---
आपणै घर में आपूंकें हियाव् जस चितोंनयूं
आपणै घर भितेर आपणै लिजी लुकणेकि ठौर ढुढनयूं
कब अपणाल म्यार आपणै लोग मैं कें
मैं रात-दिन हण-गण जास लाग रौंनयूं
आपणै घर........।
के कमी रैगै हुनेलि मैं में आंखिर
किलै पराई कर दी हुनेल मैं कें आंखिर
मैं आपणै सवालोंक जवाब ढुढनयूं
आपणै घर.........।
सब जाणनी एक हातल न बाजनि ताइ
कमी उनन् में लै हुनेली जनून मैं बिसराइ
दुखै घङि में पुराण दिनन कें याद करनयूं
आपणै घर..........।
जो भ्याराक् छन उनरी खूब चौल हैरै
यस लागना जांणि कलौ उनून घूस दिरै
मैं भितेर एक कुण में निसासी जै रयूं
आपणै घर में.........।
जो जरासा मैं कें बुलाणेकि कोशिश करनयी
उननकें लोग अनपढ गवार नाम धरनयी
मैं फ्याच्च कनै आपण मुख में हाण ल्हिनयूं
आपणै घर में...........।
कभतै मन में भौत उदेख जस लागिजां
मन करूँ उङी-उङी बेर कैं दूर न्हेंजां
मैं मनाक् खयालन कें बङि मुश्किलल दबूनयूं
आपणै घर में...........।
मैं आपणै लोगोंन कट्ठ कनै कठिमोरी हाल्यूं
दूहरै के बात आपणोंनै छट्ट कनै छोङि हाल्यूं
मरी न रयी मैं आजी सांस ल्हिनयूं
आपणै घर में.........।
कभतै आपूं कें कभतै आपणी किस्मत कें कोसुं
मैं खुदै भुलि गयूं कि मैं को छुं
दुणियैकि भीङ में आपणी पछ्याण ढुढनयूं
आपणै घर में...........।
उनन् धैं के कूँ जो नना नान् छन्
पैली मूख त उनोंनै मोङौ जो कुङिक पुरूख छन्
मैं ऊ पुरूखन धैं आज न्यायिक निसाफ मांगनयूं
किलै मैं आपणै घर में.......।
धैं क्वे सुणछौ मेरि धाद कबेर पुकारनयूं
अचेत प्राणी जस एक च्यांरि छोङनयूं
बुदेइला दिन म्यार कबेर सोचनयूं
आपणै घर में........।
आपण इस्कूलों में एक हिस् म्यरलै हुण चैंछी
एक बिषयाक रूप में मैंकें लै पढाई जांण चैंछी
मैं आपणी हकैकि बात करनयूं
आपणै घर में आपूंकें हियाव जस चितोंनयूं।
---आपक मितुर राजेंद्र ढैला---

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Bhaukhandi Uttarakhandi
14 hrs
"कभी कफोला की डाली मा"I
"कभी आमा की डाली मा"II
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"I
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"II
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"I
"तेरी घूर - घूर सुणी, मेरी हिया भोरी यान्द"I
"किले घुरुणी घुगुती मन दुखी जान्द मेरु मन दुखी जान्दII'
"कभी कफोला की डाली मा"I
"कभी आमा की डाली मा"II
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"I
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"II
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"I
"कभी तिबरी डांडियाली मा"II
कभी हमरी ठंगरी मा"I
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"II
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"I
"घुघूती किले घुरुणीणीणीणी"II

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ै जिंदगी---
.
आहा मेरि पहाड़ै जिंदगीकि पहाड़ जसि पीङ
कभै बादल फाटियो दर्द तो कभै बारिशै शीर,
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
कभै शराबल निखाण दी कभै महंगाईक मार
म्यार मुलुक पाणिक तूफान ऐरौ,कतू करि हाली शिकार,
कभै भूकंपै हलचल कभै भूस्खलनै की चीर
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
कतू नान् अनाथ हैगी,कतू घरोंक् चुल बुझिगो
कतू डङा-डाङ हैरै, सबों कें आपणनकि फिकर हैरै,
आब कस चला बिधाताल यो आपदा नामक तीर
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
किलै दियो पातक् आब यतुक बौयाट हैगो
किलै म्यार पहाड़ में यतुक तौयाट हैगो,
स्वर्ग जसी भूमि छी मेरि,
किलै आज वांकी खबर सुणबेर,कलेजी ऊनै चीर
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
जाँ घस्यारोंकि छम्म दातुलि बाजेंछि
और कैं दूर जंगोव में ग्वावोंकि मुरूलि बाजेंछि,
आज वी पहाड़ में कास् हाल हैरी
आपदा डरल् लोगोंकी बदई चाल हैरी,
कब थामेलि ? मेरि पहाड़कि यो न कई पीङ
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
कसी नान्-नान् नानतिन इस्कूल पढाल्
कसी लोगबाग आपणि गुजर बसर कराल्,
सोची-सोची बेर कोठि में पङनै लकीर
आहा मेरि पहाड़ै......।
.
केदारनाथ भूमि जो विरान हैगै
पूजा स्थल छी कब्रिस्तान हैगै,
क्वे कुनई मनखी आपुंकें जादे हुश्यार समझना
प्रकृति दगङी खूब छेड़छाड़ करना
तबत यस हुना,
पैं को निकालल् म्यर पहाड़ कैं यो दुख बटी भ्यैर,
को होल् ऊ दियाप्त डांगरी या बाबा पीर
आहा मेरि पहाड़ै.......।
.
हे विधाता आब थामी दे तौ अङहोती कैं पहाड़ बटी
हात जोङी,कान पकङी विनती करनु तूहूँ यो तली भाबर बटी,
त्यरै रचाई संसार छ यो,त्यारै बणाई सब तस्वीर
आहा मेरि पहाड़ै जिंदगीकि पहाड़ जसि पीङ।
ओहो मेरि पहाड़ै जिंदगीकि पहाड़ जसि पीङ।।।
.
---राजेंद्र ढैला---

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant
July 3 at 10:01am
जिम कार्बेट पार्काक् शेर ...
उज्याव्
चाँछैं
" भ्यार " कै
चा ।
झिमौड़
है जालै त
को
मुँख लगाल ।
असल् सेठ त
" जमीन " वाल् छन्
मनखी
डबलन् में मर्रि रौ ।
चौमासन में
सड़क बगनै रुँछ
पगडंडी कैं
के नि हुँन् । भ्यार --बाहर , झिमौड़ --ततैया , डबलन् - पैसों में , बगनै - टूटती रहना
पगडंडी के लिए कुमाऊँनी शब्द बताइएगा ।