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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हमsरि नजर (गढ़वाली कविता )
s -आधी अ
रचना -- देवेन्द्र प्रसाद जोशी ( जन्म -1952 ,कोळिण्डा , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Devendra Prasad Joshi
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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हमsरि नजर
ब्वगदा गदनौं
छ्वाया -छंछडौं
अर माटा पर गै।
हमsरि नजर
झडदा पातौं
अर लमडदा ल्वाडौं पर गै।
पर हमsरि नजर
तूणी अर देवदारा
टकटका डाळो पर नि गै
घाम बरखा अर ह्यूं से निझरक
मुंड उठै खड़ा
उच्चा उच्चा डाँडौं नि गै

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Gyan Pant
May 7 at 10:43am
बस यों ही ....
दर्द हुआ है तो
जरुरी नहीं कहीं चोट लगी हो
या खून भी निकला हो ......
जैसे बादल
गगन में आए
घाव कुछ हरे कर गये
तुम्हारे और
हमारे भी .....
पवन आयी
उड़ा ले गयी
मन - गगन से ......
लोग कहते हैं
मीठा होता है दर्द
कभी - कभी .....
प्रकति के साथ
बने रहने के लिए
जरुरी होता है
बादलों का आना
और जाना भी
सुख -- दुख की तरह .....
जीवन में
"हरा " रहने के लिए
सोचता हूँ
कुछ घाव भी
जरुरी होते होंगे ...
क्योंकि
नई कोपलें
अक्सर " घाव " से ही
फूटती दिखीं हैं मुझे .... । ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Bhishma Kukreti
May 11 at 8:50am
अधिकार ( शिल्पकार विमर्श गढ़वाली कविता )
रचना -- सुरेन्द्र पाल ( जन्म - गढमोनू , खातस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poetry by - Surendra Pal
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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कबि मिन पौढ़ी छौ
स्वतंत्रता अर समानता को 'अधिकार '
संविधानम छ
मिन सोची बडू भग्यान छौं मि
जु स्वतंत्र भारत म छौं
पर सच समिणम ऐ
त सरैल तडपि गे
गरीब जख्या तखौ
समानता अकडीं छ दूर
कितब्यूं पुटुक मुक
लुकयुं छ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये म्यारा गुलाब छन

ये म्यारा गुलाब छन
ये म्यारा पहाड़ छन

दे साथ दे बोई दौड़ी ऐजा दीदी भूली
रिंगा रिंगा ये मेरो पहाड़

ये छन म्यारा झुमैला झौड़ा
ये छन म्यारा छपेली न्योली

आँगड़ी घाघरा कनुडि कुण्डल
गलो गलोबन्द पिछौड़ा पाजैब

ये छन म्यारा बाल मिठाई
ये छन म्यारा गैंता की दाल अ

गौचर मेला ये उत्तरायणी
हरेला की ये देख पूर्णागिरि

ये छन म्यारा कामो गढ़वाल
ये छन म्यारा उत्तराखंड

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तू ठहरी coffee की शौक़ीन
, मैं ठहरा चूल्हे की चाय का अमली।
--तू ठहरी DJ और लाउंज वाली , मैं
ठहरा पहाड़ी ढोल - दमुआ वाला ।
--तुझे शौक़ ठहरा स्विमिंग पूल का , मैं
ठहरा नदियों - धारों वाला ।
--Mom-dad कहना तो नहीं सीखा ,
लेकिन इजा और बौजु से सब सीखा ।
--तूने आज तक डाँट भी खाई की नहीं,
लेकिन मैंने तो मार के साथ शिशूने का
ढाग भी खाया है।
-- pop म्यूज़िक नहीं सुनता भूली ,मैं
पहाड़ी गाने वाला ठहरा।
--Dehli का नहीं
भूली, मैं उत्तराखंड
वाला ठहरा । —

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गुणनिधि जोशी
2 hrs
सास ब्वारी सम्वाद -:)
सासु- ब्वारी डाड़ किलै मारणै छी ?
ब्वारी- बताऔ के मि भैंस जस छुँ ?
सास- न ब्वारी न !
ब्वारी- के मि कचौड़ी जस छुँ ?
सास- नै हो नै !
ब्वारी- क्या म्यार गिज गोरख्याली जस छन ?
सास- कॊ कुण लाग रौ तुथें यश ?
ब्वारी- के म्योर नाक पकौड़ा जस छी ?
सास- नै ब्वारी नै !
ब्वारी- तो फिर गों वाल मथें किलै कुणों छी कि तू आपुणि सासु जस छी !
सासु बेहोश......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

एक शहरी ने अकड़ कर कुछ यू कहा...
तुम रहते हो गधेरो और गाड में।
क्या रखा है ऐसा तेरे पहाड़ में ।।
मैने जबाब कूछ यू दिया
जंगल में जो दम रहता है
शेर के अपनी दहाड़ में
इस धरती पर उससे भी बढ़कर
दम रहता है पहाड़ में
ईजा की हाथ की बनी रोटी
और बोज्यू की फटकार में ।
वो मिठास मिल नहीं सकती
तेरे इस महेंगे बाज़ार में
दुनिया फस चुकी हो चाहे चोकलेटो के जाल में ।
पर वो स्वाद कभी नहीं मिल सकता जो मिलता अल्मोडी बाल में
फ़िल्टर और शील बंद पानी में
भी मिलावट का खेल है ।
मेरे नौले और धारे के आगे
ये पानी भी फेल है
चाहे कूलर पंखे, ए सी लगाले फिर भी वो हवा नहीं मिल पाती है ।
जो प्राकर्तिक हवा ठण्डक मेरे पहाडो में आती है
बर्गर पिजा कुछ भी खाले पर वो स्वाद नहीं मिल पाता है ।
जो स्वाद पहाडो में आलू के थेचुवे में आ जाता है
तेरी तंदूरी रुमाली रोटी
चारे जैसी लगती है ।
तेरे नसीब में नहीं वो रोटी
जो पहाड़ो में चूले में पकती है
दादा दादी और चाचा चाची
तुमको दूर के अब लगते हैं ।
मेरे पहाड़ो में आमा बुबु काका काकी एक कुटुम्भ में रहते हैं
जितने तेरे केलेंडर में
सारे रविवार हैं ।
उससे ज्यादा पहाड़ो में
पर्व और त्यौहार है
मत कर गुमान इन शहरो का
ये खेल है चंद पहरों का ।
जिस दिन पहाड़ अपनी जगह से हिल जाएगा ।
उस दिन तेरे शहरो का अस्तित्व मिट जाएगा
जय उत्तराखण्ड
जय भारत
जय देवभूमि

हमारी संस्कृति हमारी पहचान है ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Bhaukhandi Uttarakhandi
May 18 at 6:06pm
ना मिल्न की खुसी होली ना बिछुडन कु गम
उदास छा हम
कन के बतान की कन छीन हम बस इतगा समझा की
ब्याली भी यखुली छा ... और आज भी यखुली छान हम ...........
तस्सली सी ज़रा हो जायेगी..फक़्त इतना तो बता दिजिये.....??
क्या आप को भी हिचकिया आती हैं, जब हम याद करते हैं.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Rajendra Dhaila
May 18 at 9:56pm
--जन्म दिन विशेष पर--
फूलोंक् जस हौंसिया हुण
आपुं दगै औरों केंलै खुशी दिण
मनखी हुणक छ पैल गुण
मनखी हुणक छ पैल गुण।
.....कभै स्वच न कि आपण लै जनम दिन मनाई जाल किलैकि पहाड़ में हम यतु तरक्की वाल न भया, आजी लै हमार तरबै जनम दिन क्याप्प भय। यो त फेसबुकक कमाल कवो कि आब हमरलै जनम दिन मनाई जानौ।
आपूं सब स्नेही मित्रनाक प्यारा-प्यारा संदेश,शुभकामना,शुभ आशीर्वाद,प्राप्त भयी, भौत भल लागो,दिल कें अपार हर्ष मिलौ,अघिल कै लै यसीकै प्यार दुलार मिलते रौल आपुं सबनक। यै भरोस दगङी एक बार पुन: आपुं सबनक कोटी-कोटी सादर आभार धन्यवाद।
--आपुण पहाड़ी ढुस्स मैंस राजेंद्र ढैला--

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


हितेश उपाध्याय
May 16 at 10:46pm
* गर्मियों की छुट्टियों में मेरे पहाड़ जरूर आना **
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